भारतीय गांवों की लोक कलाएं, सस्टेनेबिलिटी की हैं मिसाल
भारत देश की आत्मा उसके गांवों में बसती है और गांवों में पनपती है भारत की संस्कृति। भारतीय संस्कृति बहुत विशाल है। जिसमें विभिन्न पहनावा, खान-पान, लोक कलाएं, रंग, और त्योहारों का अनूठा संगम देखने को मिलता है।
भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अंग हैं भारत के ग्रामीण इलाकों की अनोखी लोक कलाएं। लोक कलाओं का तात्पर्य उन कला रूपों से होता है जो किसी विशेष क्षेत्र की संस्कृति को प्रतिबिंबित करती हैं और पीढ़ियों से उसकी विरासत में निहित होती हैं।
क्या होती है सस्टेनेबिलिटी?
सस्टेनेबिलिटी जिसे आप सततता या टिकाऊपन के रूप में समझ सकते हैं। इसका अर्थ होता है, भविष्य की पीढ़ियों की जरूरत को ध्यान में रखते हुए वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति करना। आसान भाषा में हम इसे ऐसे समझ सकते हैं कि हमारी आज की जरूरतें भी पूरी हो जाएं और कल आने वाली पीढ़ी को इसके चलते कोई परेशानी न झेलनी पड़े।

भारतीय ग्रामीण लोक कलाएं और सस्टेनेबिलिटी
मधुबनी चित्रकला। Madhubani art
मधुबनी चित्रकला भारत की एक पारंपरिक लोक कला है। इसे प्रकृतिक सामग्री का उपयोग कर तैयार किया जाता है जिस कारण यह स्वाभाविक रूप से पर्यावरण अनुकूल और टिकाऊ है। मधुबनी चित्रकला में रंग से लेकर ब्रश तक जिस सामग्री का प्रयोग किया जाता है वह प्राकृतिक रूप से तैयार की जाती है। पौधों, फूलों और खनिजों से मिलने वाले प्राकृतिक रंग और पेड़ की छाल अथवा बांस की छड़ियों का ब्रश बनाने के लिए उपयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए हल्दी को भी पीले रंग के तौर पर इस्तेमाल कर लिया जाता है। मधुबनी चित्रकला केवल कागज पर ही नहीं बल्कि कपड़ों के कैनवास पर भी की जाती है।

मधुबनी चित्रकला न केवल भारतीय संस्कृति को प्रतिबिंबित करती है बल्कि सस्टेनेबिलिटी का एक भी बेहतरीन उदाहरण पेश करती है।
वारली चित्रकला। Warli art
वारली चित्रकला भारत के महाराष्ट्र और गुजरात राज्य की एक प्रसिद्ध कला है। वारली चित्रकला पारंपरिक रूप से विवाह समारोह के दौरान बनाई जाती है। ये प्रवेश द्वार के सामने और रसोई की दीवारों के बाहरी हिस्सों पर देखी जा सकती है। वारली चित्रकला में प्रकृति एक आवश्यक तत्व है क्योंकि इसमें न केवल प्राकृतिक सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है बल्कि विभिन्न चित्रों के माध्यम से इमली के पेड़, खजूर के पेड़, ताड़ी के पेड़ जैसे पेड़ों को चित्रों के माध्यम से दर्शाया जाता है।

वारली चित्रकला के लिए प्राकृतिक और स्थानीय रूप से प्राप्त सामग्री का उपयोग किया जाता है जो इसे टिकाऊ बनाती है और प्रकृति के साथ इसके संबंधों को दर्शाती है। इसमें हानिकारक रसायनों का प्रयोग करने से बचा जाता है और चावल और बांस जैसे प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग किया जाता है। कैनवास के रूप में मिट्टी या गोबर से लिपि हुई दीवारों का इस्तेमाल किया जाता है।
कठपुतली। Puppet

भारतीय कलाओं में कठपुतली एक बहुत सुंदर कला के रूप में जानी जाती है। कठपुतली एक जीवंत कला है, इसकी ऐतिहासिक जड़ें आज भी बेहद मजबूत है। कठपुतली बनाने के लिए कलाकार पुराने बचे कपड़ों का इस्तेमाल कर लेते हैं। कठपुतली के माध्यम से संदेशों को प्रदर्शित किया जाता है। कठपुतली कला पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक मुद्दों और टिकाऊपन के प्रति प्रभावी ढंग से संदेश दे सकती है।ये जागरूकता को बढ़ावा देने में सहायक सिद्ध होगा।
फुलकारी। Phulkari

फुलकारी कढ़ाई पंजाब राज्य का एक पारंपरिक शिल्प है। फुलकारी एक हस्तकला है, जिसके लिए मशीनों की अपेक्षा हाथों का प्रयोग किया जाता है। क्योंकि इसमें मशीनों का उपयोग नहीं किया जाता इसलिए अपशिष्ट की संभावनाएं स्वतः ही कम हो जाती हैं।
पट्टचित्र। Pattachitra
पट्टचित्र उड़ीसा राज्य की एक पारंपरिक चित्रकला है जो कपड़ों पर की जाती है। पट्ट का अर्थ होता है कपड़ा, पट्टचित्र का अर्थ होता है एक ऐसी कला जो कपड़े पर की जाती है। इसे आध्यात्मिक रूप से भगवान जगन्नाथ और अन्य देवी देवताओं से जोड़कर देखा जाता है।

पट्टचित्र के लिए कैनवास के रूप में कपड़े का इस्तेमाल किया जाता है जो प्रायः सूती कपड़ा होता है। उसके ऊपर खनिज अथवा सब्जियों से प्राप्त प्राकृतिक रंग का उपयोग किया जाता है। साथ ही इसमें चाक या मिट्टी के पाउडर का लेप लगाया जाता है। जो पर्यावरण के साथ इसके सुंदर संबंध को दिखाता है।
बांस शिल्प। Bamboo craft
भारत के झारखंड राज्य में प्रसिद्ध बांस शिल्प, एक पारंपरिक कला है। बांस शिल्प के अंतर्गत टोकरियां, फूलदान, चटाई, और सजावट का सामान भी बनाया जाता है। झारखंड का यह शिल्प न केवल एक कला है बल्कि झारखंड की सांस्कृतिक विरासत का एक अभिन्न अंग भी है।

बांस से बनने वाले इन सामानों में हानिकारक रसायन या पदार्थों का इस्तेमाल नहीं किया जाता जिससे यह टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल होते हैं।
नारियल शिल्प। Coconut craft

आज के समय में नारियल शिल्प न केवल दक्षिण भारत बल्कि पूरे देश भर में प्रचलित हो चला है। नारियल शिल्प, एक पारंपरिक कला है जिसमें नारियल के खोल का इस्तेमाल करके उन्हें तराशा जाता है और उपयोग की जाने वाली वस्तुओं में ढाला जाता है। इससे न केवल नारियल के खोल को इस्तेमाल में लाया जाता है बल्कि स्वच्छता को भी बढ़ावा मिलता है।
भारतीय लोक कलाएं अपने आप में बेहद अनोखी और खूबसूरत हैं। ये न केवल संस्कृति को बढ़ावा देती हैं बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।





