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सर्दियों में घूम आइए राजस्थान! जयपुर से जैसलमेर तक इन 5 जगहों की खूबसूरती आपका दिल जीत लेगी!

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सर्दियों का मौसम शुरू होते ही घूमने-फिरने वालों की भीड़ राजस्थान की ओर बढ़ने लगती है। गुलाबी शहर जयपुर से लेकर स्वर्ण नगरी जैसलमेर तक, राजस्थान की धरती सर्दियों में और भी रंगीन और जीवंत हो जाती है। यहां का तापमान नवंबर से फरवरी के बीच 8°C से 25°C तक रहता है, जो पर्यटन के लिए एकदम अनुकूल माना जाता है। अगर आप इस सर्दी में किसी शानदार ट्रिप की योजना बना रहे हैं, तो राजस्थान की ये 5 जगहें आपके सफर को यादगार बना देंगी। जयपुर गुलाबी शहर की शाही झलक राजस्थान की राजधानी जयपुर सर्दियों में बेहद मनमोहक हो जाती है। आमेर किला, सिटी पैलेस, हवा महल और जंतर-मंतर जैसी ऐतिहासिक जगहें यहां की पहचान हैं। सर्दियों में यहां पर्यटक ऊंट सवारी, हॉट एयर बलून राइड और राजस्थानी व्यंजन का आनंद लेते हैं। जनवरी में आयोजित जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल देश-विदेश के साहित्य प्रेमियों को आकर्षित करता है।(गुलाबी शहर जयपुर से लेकर स्वर्ण नगरी जैसलमेर तक, ) पुष्कर आध्यात्म और रोमांच का संगम जयपुर से लगभग 150 किमी दूर स्थित पुष्कर अपने ब्रह्मा मंदिर और खूबसूरत झील के लिए प्रसिद्ध है। नवंबर-दिसंबर में यहां का मौसम बेहद सुखद रहता है और ऊंट मेला भी देखने लायक होता है। इस समय आप यहां मेले का आनंद भी ले सकते हैं। यह भारत का एकमात्र ऐसा स्थान है जहां भगवान ब्रह्मा का मंदिर है। सर्दियों में पुष्कर की गलियां विदेशी पर्यटकों से गुलजार रहती हैं। अजमेर सूफी दरगाह की शांति पुष्कर के पास स्थित अजमेर ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के लिए प्रसिद्ध है। सर्दियों में यहां की हवाएं ठंडी और वातावरण बेहद शांत रहता है। दरगाह शरीफ के अलावा तारागढ़ किला और आना सागर झील भी सैलानियों के आकर्षण का केंद्र हैं। उदयपुर झीलों का शहर अगर आप सर्दियों में एक रोमांटिक आनंद चाहते हैं, तो उदयपुर आपके लिए परफेक्ट जगह है। पिछोला झील, फतेह सागर झील, सिटी पैलेस और मानसून पैलेस यहां की खूबसूरती को चार चांद लगाते हैं। दिसंबर-जनवरी में यहां का तापमान 10°C के करीब रहता है, जो नौका विहार और पैलेस टूर के लिए बिल्कुल सही समय है। जैसलमेर थार रेगिस्तान की सुनहरी रेत गोल्डन सिटी जैसलमेर सर्दियों में अपनी असली चमक दिखाता है। यहां का जैसलमेर किला, सम सैंड ड्यून्स और डेजर्ट सफारी सैलानियों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं। जनवरी-फरवरी में आयोजित डेजर्ट फेस्टिवल में लोक संगीत, ऊंट दौड़ और राजस्थानी संस्कृति का शानदार मिश्रण देखने को मिलता है। सर्दियों में राजस्थान का हर कोना रंग, संस्कृति और इतिहास से सराबोर होता है। चाहे आप शाही महलों की भव्यता देखना चाहें, रेगिस्तान की रेत में एडवेंचर करना चाहें या झीलों के किनारे सुकून पाना राजस्थान सब कुछ एक साथ पेश करता है। तो इस सर्दी बैग पैक कीजिए और जयपुर से जैसलमेर तक का सफर तय कर लीजिए, क्योंकि यहां की खूबसूरती से आपकी नजरें सच में नहीं हटेंगी!

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लखनऊ, नवाबों का शहर बना ‘यूनेस्को क्रिएटिव सिटी’, जानिए क्यों मिला यह सम्मान और क्या होगा असर?

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लखनऊ की रचनात्मक विरासत, जहां तहज़ीब और कला मिलकर रचते हैं इतिहास लखनऊ, जिसे प्यार से ‘नवाबों का शहर’ कहा जाता है, हमेशा से अपनी तहज़ीब, अदब, कला और स्वाद के लिए प्रसिद्ध रहा है। यह शहर केवल इमारतों या व्यंजनों से नहीं, बल्कि अपनी आत्मा में बसी उस संस्कृति से पहचाना जाता है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती गई है। लखनऊ की गलियों में गूंजती शायरी, चौक की चिकन कारी, और महफिलों की गायकी आज भी इसकी जीवंत संस्कृति का प्रमाण हैं। लखनऊ की पहचान उसकी चिकन कारी कढ़ाई, ज़री-ज़रदोज़ी, पत्थर की नक्काशी और अवधी खानपान में झलकती है। यहां की कला केवल शिल्प नहीं बल्कि जीवन का हिस्सा है। यही रचनात्मकता, यही सांस्कृतिक गहराई आज लखनऊ को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान दिला चुकी है। यूनेस्को की क्रिएटिव सिटी नेटवर्क में शामिल होकर लखनऊ ने यह साबित कर दिया है कि परंपरा और आधुनिकता का संगम ही असली रचनात्मकता है। यूनेस्को क्रिएटिव सिटी नेटवर्क क्या है और इसमें लखनऊ क्यों चुना गया? यूनेस्को क्रिएटिव सिटी नेटवर्क (UNESCO Creative Cities Network – UCCN) एक वैश्विक पहल है जो दुनिया के उन शहरों को जोड़ती है जो कला, संस्कृति, नवाचार और रचनात्मकता के क्षेत्र में उत्कृष्ट हैं। यह नेटवर्क 2004 में स्थापित हुआ था ताकि दुनिया भर के शहर अपनी रचनात्मक पहचान को साझा कर सकें और एक-दूसरे से सीख सकें। लखनऊ को इस नेटवर्क में Crafts and Folk Art श्रेणी में शामिल किया गया है। इस श्रेणी में वही शहर आते हैं जिनके पास विशिष्ट हस्तशिल्प, पारंपरिक कलाएं और लोक विरासत मौजूद होती है। लखनऊ की चिकन कारी, ज़री कढ़ाई और लोक संगीत ने इसे इस उपाधि के योग्य बनाया। यूनेस्को ने माना कि लखनऊ वह शहर है जिसने अपनी कला को न केवल सहेजा बल्कि आधुनिक दृष्टिकोण से पुनर्जीवित भी किया है। यह सम्मान न सिर्फ लखनऊ की सांस्कृतिक विविधता का, बल्कि भारत की पारंपरिक रचनात्मकता का भी उत्सव है।(यूनेस्को की क्रिएटिव सिटी नेटवर्क में शामिल होकर लखनऊ) चिकनकारी, ज़री और अवधी स्वाद लखनऊ को खास बनाती हैं ये परंपराएं लखनऊ की पहचान उसकी चिकन कारी के बिना अधूरी है। यह सुई-धागे की वह जादूगरी है जिसने दुनिया भर में अपनी नफासत से पहचान बनाई है। एक-एक टांका जैसे कला की कहानी कहता है। आज भी चौक और अमीनाबाद की गलियों में महिलाएं अपनी उंगलियों से इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। इसी तरह लखनऊ की ज़री-ज़रदोज़ी कला भी नवाबी काल से चली आ रही है। यह कढ़ाई शाही परिधान और शाही शान का प्रतीक रही है। और फिर आता है लखनऊ का खाना टुंडे कबाबी, गालौटी कबाब, निहारी, शीरमाल और मखमली कुल्फ़ी जैसी डिशेज़ दुनिया भर में लोगों की पसंद हैं। यह खाना केवल स्वाद नहीं बल्कि नवाबी संस्कृति का विस्तार है। इन्हीं रचनात्मक परंपराओं के कारण लखनऊ को ‘क्रिएटिव सिटी’ का दर्जा मिला है। यह शहर दिखाता है कि कैसे कला और भोजन एक साथ संस्कृति की आत्मा को जीवित रखते हैं। क्रिएटिव सिटी बनने से पर्यटन को मिलेगा नया आयाम लखनऊ का यूनेस्को क्रिएटिव सिटी नेटवर्क में शामिल होना केवल सम्मान नहीं बल्कि पर्यटन के लिए बड़ा अवसर भी है। अब लखनऊ क्रिएटिव और कल्चरल टूरिज़्म का केंद्र बनेगा। दुनिया भर के पर्यटक अब केवल इमारतें देखने नहीं बल्कि यहां की लोककला, हस्तशिल्प और स्वाद का अनुभव करने आएंगे। चिकनकारी वर्कशॉप्स, अवधी फूड फेस्टिवल्स, शायरी की महफिलें और क्राफ्ट मार्केट्स लखनऊ के पर्यटन को नई दिशा देंगे। सरकार और पर्यटन विभाग अब ऐसे प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं जो स्थानीय कारीगरों को वैश्विक बाजार से जोड़ेंगे। इससे न केवल शहर की आर्थिक स्थिति सुधरेगी, बल्कि विदेशी निवेश और रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। लखनऊ अब ‘हेरिटेज टूरिज़्म’ से आगे बढ़कर ‘क्रिएटिव टूरिज़्म’ का नया चेहरा बनने की राह पर है। स्थानीय कलाकारों और अर्थव्यवस्था को मिलेगा वैश्विक मंच यूनेस्को की यह पहचान लखनऊ के कलाकारों और कारीगरों के लिए वरदान साबित होगी। अब उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने हुनर को दिखाने का मौका मिलेगा। चिकनकारी, ज़री, लकड़ी की नक्काशी, मिट्टी के बर्तन, और लोक कला से जुड़े शिल्पकारों को विश्व स्तर पर पहचान मिलेगी। सरकार की नई योजनाओं के तहत क्राफ्ट हब, आर्ट क्लस्टर और हेरिटेज मार्केट्स विकसित किए जाएंगे, जिससे स्थानीय रोजगार में बढ़ोतरी होगी। इससे लखनऊ की लोकल इकॉनमी (Local Economy) को नई ऊर्जा मिलेगी और शहर में युवाओं के लिए रचनात्मक रोजगार के अवसर खुलेंगे। यह पहल न केवल संस्कृति को सहेजने का काम करेगी बल्कि यह साबित करेगी कि कला भी आर्थिक विकास का एक अहम जरिया बन सकती है। पर्यटन पर पड़ेगा बड़ा असर दुनिया भरेगी लखनऊ की सैर भारत के कई शहर पहले ही यूनेस्को क्रिएटिव सिटी नेटवर्क का हिस्सा बन चुके हैं जयपुर (क्राफ्ट्स एंड फोक आर्ट), वाराणसी (म्यूज़िक), चेन्नई (म्यूज़िक), मुंबई (फिल्म), हैदराबाद (गैस्ट्रोनॉमी), ग्वालियर (म्यूज़िक) और सूरत (डिज़ाइन)। अब लखनऊ का नाम इस सूची में जुड़ गया है और इसकी चमक सबसे अलग है क्योंकि यह शहर केवल कला या संगीत से नहीं बल्कि अपनी संस्कृति, स्वाद, भाषा और तहज़ीब से लोगों के दिलों में बसता है। भविष्य में लखनऊ में अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक उत्सवों, कला प्रदर्शनियों और ग्लोबल फूड फेस्टिवल्स का आयोजन किया जा सकेगा। इससे यह शहर न केवल पर्यटकों बल्कि निवेशकों का भी पसंदीदा जगह बनेगी। लखनऊ की यह उपलब्धि आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करेगी कि परंपरा को संभालते हुए आधुनिकता से कैसे जुड़ा जा सकता है। यह शहर अब केवल भारत की पहचान नहीं बल्कि पूरी दुनिया में भारतीय कला और संस्कृति का प्रतीक बन चुका है। लखनऊ का यूनेस्को क्रिएटिव सिटी नेटवर्क में शामिल होना सिर्फ एक सम्मान नहीं, बल्कि यह उस विरासत की स्वीकृति है जो सदियों से इस शहर की आत्मा में बसती है। अब लखनऊ अपनी कला, तहज़ीब और स्वाद से पूरी दुनिया को यह बताने जा रहा है कि रचनात्मकता जब परंपरा से मिलती है, तो इतिहास बनता है।

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जिम कॉर्बेट वॉटरफॉल कुमाऊं की गोद में बसा रोमांच और प्राकृतिक सौंदर्य का बेजोड़ मुजस्समा!

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जिम कॉर्बेट वॉटरफॉल का परिचय जिम कॉर्बेट वॉटरफॉल उत्तराखंड की हरी-भरी वादियों में स्थित किसी नायाब हीरे से कम नहीं! साथ ही प्रकृति प्रेमियों और एडवेंचर के शौकीनों के लिए वास्तव में किसी जन्नत से कम नहीं है। नैनीताल जिले के रामनगर क्षेत्र में स्थित यह झरना जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के पास बहता है। करीब 60 फीट ऊंचाई से गिरता यह झरना चारों ओर फैले सघन साल, सागौन और बांस के पेड़ों से घिरा हुआ है, जो इसे एक मनमोहक दृश्य प्रदान करता है। पानी का यह झरना न सिर्फ अपनी ऊंचाई और प्रवाह के कारण प्रसिद्ध है, बल्कि यहां की शांति, हरियाली और ताजगी भरी हवा से मन एकदम तरोताज़ा हो जाता है। मात्र 100 रुपए की टिकिट में आप देख पाएंगे एक बहुत ही बेहतरीन जगह को। दीदार कर पाएंगे प्रकृति के अद्भुत नमूने का। जिम कॉर्बेट वॉटरफॉल को स्थानीय लोग कॉर्बेट फॉल के नाम से भी जानते हैं। यह जगह हर मौसम में सुंदर दिखाई देती है, परंतु मानसून और सर्दियों के समय यहां की सुंदरता कई गुना बढ़ जाती है। बारिश के बाद जब आसपास की हरियाली और भी गहरी हो जाती है और झरने का पानी तेज़ी से गिरता है, तो यह दृश्य फोटोग्राफरों और नेचर लवर्स के लिए किसी सपने से कम नहीं लगता। यहां का माहौल बेहद शांतिपूर्ण है। पक्षियों की चहचहाहट, झरने की गूंज और ठंडी हवा मिलकर ऐसा प्यारा दृश्य बनाते हैं कि व्यक्ति खुद को प्रकृति की गोद में खोया हुआ महसूस करता है।(जिम कॉर्बेट वॉटरफॉल को स्थानीय लोग कॉर्बेट फॉल के नाम से भी जानते हैं। ) यही कारण है कि यहां स्थानीय पर्यटकों के साथ-साथ देश-विदेश से आने वाले सैलानियों की भी भीड़ देखने को मिलती है। यदि आप भी शोर-शराबे से दूर, कुछ पल प्रकृति के साथ बिताना चाहते हैं, तो जिम कॉर्बेट वॉटर फॉल आपके लिए एक आदर्श स्थान है। यहां आप झरने के पास बैठकर प्रकृति की ध्वनि को महसूस कर सकते हैं और कुछ देर के लिए शहर की भागदौड़ से खुद को मुक्त कर सकते हैं। जिम कॉर्बेट वॉटर फॉल तक कैसे पहुंचे? जिम कॉर्बेट वॉटरफॉल तक पहुंचना उतना ही आसान है जितना कि इसे खोजने का आनंद। यह झरना रामनगर से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जो जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के मुख्य द्वार से लगभग 3 किलोमीटर आगे है। अगर आप दिल्ली से यात्रा कर रहे हैं, तो यहां तक का सफर करीब 260 किलोमीटर का है, जिसे आप सड़क, रेल या निजी वाहन से तय कर सकते हैं। सड़क मार्ग से पहुंचने का तरीका दिल्ली से नैनीताल रोड के माध्यम से रामनगर पहुंचा जा सकता है। दिल्ली, गाजियाबाद, मुरादाबाद, काशीपुर और रामनगर का रास्ता सबसे आसान है। रामनगर से आगे कॉर्बेट फॉल की ओर जाने वाला मार्ग घने जंगलों से होकर गुजरता है। इस रास्ते में आपको हरियाली, शांत हवा और कभी-कभी जंगली जानवरों की झलक भी मिल सकती है। रेल मार्ग से यात्रा रामनगर रेलवे स्टेशन सबसे नजदीकी स्टेशन है, जहां से आपको टैक्सी या लोकल बस आसानी से मिल जाती है। दिल्ली, लखनऊ और हरिद्वार से रामनगर के लिए रोजाना ट्रेनें चलती हैं। हवाई जहाज से यात्रा यदि आप हवाई यात्रा करना चाहते हैं तो पंतनगर एयरपोर्ट निकटतम हवाई अड्डा है, जो लगभग 80 किलोमीटर की दूरी पर है। एयरपोर्ट से टैक्सी या बस के माध्यम से आप कॉर्बेट फॉल तक पहुंच सकते हैं। कॉर्बेट फॉल तक पहुंचने के लिए सड़क के अंत में लगभग 2 किलोमीटर का पैदल रास्ता तय करना होता है। यह रास्ता बेहद रोमांचक और खूबसूरत है घने जंगलों के बीच से गुजरता यह मार्ग आपको ट्रेकिंग का आनंद देता है। रास्ते में पक्षियों की आवाज़ें और ठंडी हवा का एहसास आपकी थकान मिटा देता है। यहां की प्राकृतिक खूबसूरती जिम कॉर्बेट वॉटर फॉल की सबसे बड़ी खूबी है इसका प्राकृतिक अंदाज। यहां हर तरफ हरियाली है ऊंचे साल के पेड़, लहराते बांस के झुरमुट और चारों ओर फैली अनेक वनस्पतियां इस जगह को जीवंत बना देती हैं। झरना एक पत्थरीली चट्टान से नीचे गिरता है और उसका पानी नीचे छोटे तालाब में इकट्ठा होता है, जहां सैलानी पैर डुबोकर घंटों बैठते हैं। सुबह के समय जब सूरज की पहली किरणें झरने की बूंदों पर पड़ती हैं, तो उनमें इंद्रधनुष जैसा दृश्य बन जाता है। यह नजारा किसी पोस्ट कार्ड की तस्वीर जैसा खूबसूरत लगता है। यहां का वातावरण इतना स्वच्छ है और मजेदार है कि आपको सिर्फ झरने की गूंज और पक्षियों की आवाज़ें ही सुनाई देती हैं। कॉर्बेट फॉल फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए भी स्वर्ग समान जगह है। यहां का हर कोना एक नया एंगल और एक नया फ्रेम प्रदान करता है। अगर आप प्रकृति के करीब रहना पसंद करते हैं, तो यहां कुछ घंटे बिताना आपके लिए यादगार साबित होगा। एडवेंचर और गतिविधियां जिम कॉर्बेट वॉटरफॉल सिर्फ शांति का प्रतीक नहीं, बल्कि रोमांच का ठिकाना भी है। यहां आने वाले सैलानी ट्रेकिंग, बर्ड वॉचिंग, नेचर वॉक और पिकनिक जैसी कई एक्टिविटीज का आनंद ले सकते हैं। झरने तक पहुंचने का रास्ता खुद एक छोटा ट्रेक है, जो घने जंगलों से होकर गुजरता है। इस दौरान आपको विभिन्न प्रजातियों के पक्षी और कभी-कभी हिरण या बंदरों की झलक भी देखने को मिल सकती है। एडवेंचर प्रेमियों के लिए यहां की रात में कैम्पिंग का अनुभव बेहद खास होता है। तारों से सजा आसमान, ठंडी हवा और झरने की आवाज़ एक ऐसा माहौल बनाते हैं जो आत्मा तक सुकून पहुंचाता है। हालांकि ध्यान रहे कि जंगल के नियमों के अनुसार ही कैम्पिंग करें और किसी भी तरह की हानि न पहुंचाएं। यहां आप स्थानीय गाइड की मदद से नेचर ट्रेल्स पर जा सकते हैं, जहां जानवरों की झलक और वनस्पतियों का ज्ञान मिलता है। अब सवाल यह है कि रुकें कहां? जिम कॉर्बेट वॉटरफॉल घूमने आने वाले सैलानियों के लिए रहने की कोई कमी नहीं है। यहां हर बजट के हिसाब से होटल, रिजोर्ट्स और होमस्टे उपलब्ध हैं। रामनगर में स्थित रिजोर्ट्स और कॉटेज में आप आराम से ठहर सकते हैं। यदि आप लक्ज़री अनुभव चाहते हैं, तो जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के आसपास कई प्रीमियम रिजोर्ट्स उपलब्ध हैं जो स्पा, पूल और जंगल सफारी जैसी सुविधाएं

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नैनीताल के रामनगर का गिरिजा देवी मंदिर किसी ने बनाया नहीं है, बल्कि नदी में बहकर आया था!

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एक नजर गिरिजा देवी मंदिर पर रामनगर का चमत्कारी गिरिजा देवी मंदिर – आज हम बात करने वाले हैं नैनीताल जिले में स्थित रामनगर के गिरिजा देवी मंदिर की, जहां आप रोमांच और श्रद्धा दोनों पा सकते हैं। नदी के पानी की सरगम के बीचों-बीच स्थित इस मंदिर की अपनी एक अनोखी कहानी है, जो हर किसी को अचंभित करने वाली है। खूबसूरत वादियों से घिरा यह मंदिर अध्यात्म के साथ-साथ घुमक्कड़ों के लिए एक बेमिसाल डेस्टिनेशन है। आप यहां कोसी नदी के किनारे पत्थरों पर बैठकर जीवन की सारी थकान को अलविदा कह सकते हैं। पानी में पैर डालकर, तन और मन को तृप्त करती ठंडी हवाएं आपको यहां आने के लिए मजबूर करती हैं। मंदिर सौ फीट की ऊंचाई पर बना हुआ है। इसका पहाड़ियों के बीचों-बीच खड़ा होना हृदय में और मिठास भरता है। तन और मन की थकान उतारने के वास्ते यह जगह वास्तव में किसी जन्नत से कम नहीं है। 90 सीढ़ियां चढ़कर आप यहां गिरिजा देवी जी के दर्शन कर सकते हैं। इसके अलावा मंदिर के दरवाजे पर ही लगे बाजार से मनचाहा सामान खरीद सकते हैं। आइए, परत-दर-परत आज हम इस खूबसूरत डेस्टिनेशन को समझते हैं।(रामनगर का चमत्कारी गिरिजा देवी मंदिर) क्या है इस वादियों के बीच बने मंदिर का अतीत? लोकल लोगों के अनुसार हमने पाया कि यह मंदिर सनातनी नहीं है, न ही यहां इसकी स्थापना की गई थी। यह तो मां गिरिजा देवी की काया है। उनका यह मंदिर हजारों साल पहले बाढ़ के पानी में बहकर आया था। माना जाता है कि गिरिराज पुत्री देवी गिरिजा, जो भगवान शिव की पत्नी पार्वती का ही एक रूप हैं, उनकी मूर्ति एक बार यहां खुदाई में पाई गई थी। दूसरा मानना यह है कि कोसी नदी में बाढ़ आने के कारण पर्वत गिरी के कटाव से एक बड़े पर्वत का टुकड़ा बहकर यहां से गुजरा। उस दौरान भगवान भैरव ने कहा – “थी राऊ, बैना थी राऊ” मतलब “रुक जाओ बहन, रुक जाओ। ” तब यह चट्टान वहां रुक गई और फिर यहां मंदिर बन गया। आज लाखों श्रद्धालु यहां भक्ति भाव से आते हैं। मंदिर के नीचे भगवान भैरव का मंदिर है। भक्तजन जब तक भगवान भैरव के दर्शन न करें, तो उनका यहां आना अधूरा माना जाता है। भगवान भैरव के इस मंदिर में खिचड़ी का प्रसाद चढ़ाया जाता है। 100 फीट ऊंचे टीले पर बने इस मंदिर में काले ग्रेनाइट से बनी 9वीं शताब्दी की लक्ष्मीनारायण की मूर्ति भी है। इस मंदिर को सबसे पहले रामनगर के शासक कत्यूरी राजाओं ने 1840 में खोजा था। तब से 1970 के दशक तक यह मंदिर अपनी उसी स्थिति में था जैसे कि बाढ़ में बहकर आया था। लेकिन 1940 के समय ही इस मंदिर को व्यवस्थित किया गया था। आज यहां लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं — कोई दर्शन करने तो कोई कोसी नदी में स्नान करने। गिरिजा देवी से गर्जिया देवी मंदिर कैसे हुआ? जब आप रामनगर से मंदिर की ओर कूच करेंगे तो आपको कई जगह हाइवे पर साइनबोर्ड पर शेर, हिरण और अन्य जानवरों के चित्र देखने को मिल जाएंगे। ये संकेत देते हैं कि आप सावधानी से वाहन चलाएं, क्योंकि अक्सर रोड पर जानवर आ जाते हैं और हादसे हो जाते हैं। कारण यह है कि जिम कॉर्बेट से यह मंदिर महज 7 से 8 किलोमीटर की दूरी पर ही है और देवी का यह मंदिर चारों तरफ से जंगल से घिरा हुआ है। माना जाता है कि यहां पहले शेर आया करते थे और वे इस मंदिर की परिक्रमा किया करते थे। साथ ही अपनी तेज गर्जना देते थे। शेरों की इस गर्जना और देवी गिरिजा के प्रति उनके भक्ति भाव को देखते हुए इस जगह का नाम गर्जिया देवी मंदिर कर दिया गया। यहां आसपास घूमने के लिए और क्या-क्या है? सबसे पहले तो आप जंगल सफारी कीजिए और जंगल का आनंद लीजिए। इस तरफ यानी रामनगर के आसपास बफर जोन है, जिसमें जानवर दिखने की संभावना कम होती है। फिर भी यदि आप जंगल का रोमांच जीना चाहते हैं तो यह आपकी ट्रिप का बेहतरीन हिस्सा हो सकता है। इसके अलावा आप जिम कॉर्बेट का घर (बंगला) भी देख सकते हैं, जो बहुत प्यारा और जानकारियों से भरपूर संग्रहालय है। साथ ही आप यहां पर कॉर्बेट झरना और कैम्पिंग साइट भी विज़िट कर सकते हैं। दो घंटे की दूरी पर आप नैनीताल जैसी बेहतरीन और दिल को गदगद कर देने वाली डेस्टिनेशन का मजा भी ले सकते हैं। यदि यह कहा जाए कि प्रकृति प्रेमियों के लिए यह जगह स्वर्ग है तो इसमें कोई बड़ी बात नहीं है। कैसे पहुंचें गिरिजा देवी मंदिर? नैनीताल से 73 किलोमीटर और रामनगर से 19 किलोमीटर दूर कोसी नदी की बहती धारा में खड़े इस मंदिर तक पहुंचना बहुत आसान है। जैसा कि हम जानते हैं, रामनगर हाइवे से जुड़ा हुआ है। तो रामनगर तक आप बस, कार या बाइक से सफर कर सकते हैं। इसके अलावा यदि आप ट्रेन से यात्रा करना चाहते हैं, तब भी आपका स्वागत है क्योंकि रामनगर इंडियन रेलवे से जुड़ा हुआ है। मतलब आप जैसे भी आना चाहें, यहां बहुत ही आसानी से पहुंच सकते हैं। फ्लाइट से आने का विचार है तो वह भी बुरा नहीं है। यहां से मात्र 83 से 85 किलोमीटर दूर पंतनगर में हवाई सेवा उपलब्ध है। तो आप निश्चिंत रहें। बैग पैक कीजिए और जल्द ही गिरिजा देवी मंदिर का प्लान बनाइए, इस खूबसूरत नज़ारे का लुत्फ उठाने के लिए। कहां रुकें और क्या खाएं? उत्तराखंड का यह पूरा इलाका टूरिज्म के लिए जाना जाता है। यहां हर 100 मीटर पर आपको अच्छे-अच्छे होटल, गेस्ट हाउस और रिज़ॉर्ट मिल जाएंगे, जो बेहद आरामदायक और सुविधाओं से लैस होते हैं — सस्ते से लेकर महंगे तक। खाने की बात करें तो यहां का लोकल फूड आज़माना सबसे बेहतर रहेगा। जब हम घर से बाहर निकलते हैं, तो हर जगह का कल्चर और फूड हमें जीना चाहिए। बाकी आपकी इच्छा — आप जैसा उचित समझें। यदि एक दिन के लिए आप घूमने आ रहे हैं, तो खाना जैसी चीजें साथ ला सकते हैं। लेकिन यदि आपका ट्रिप एक दिन से ज्यादा का है, तो

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पटना शहर की अनकही दास्तान, पाटलिपुत्र से पटना तक की सम्पूर्ण यात्रा! जो उधेड़ती है इतिहास की कई परतें!

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भारत की धरती पर बसे कई शहरों में से एक ऐसा शहर भी है, जो इतिहास, संस्कृति और आधुनिकता का अद्भुत नजारा पेश करता है। यह शहर है पटना बिहार की राजधानी और गंगा के दक्षिणी तट पर बसा एक प्राचीन नगर। पटना सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि यह भारत के इतिहास का वह अध्याय है जो समय के कई कालखंडों की कहानियां सुनाता है। कभी पाटलिपुत्र के नाम से प्रसिद्ध यह नगर आज आधुनिक भारत की पहचान बन चुका है। यहां अतीत की गूंज भी है और भविष्य की धड़कन भी। पटना का जिक्र आते ही गंगा की लहरें, बुद्ध की शांति, अशोक का शासन और आधुनिक सड़कों की रौनक मन में एक साथ उतर आते हैं। कहा भी गया है जहां इतिहास सांस लेता है, वहां भविष्य जन्म लेता है।और वास्तव में यह माना जा सकता है की यह बात पटना के लिए ही कही गई है। पाटलिपुत्र से पटना तक का सफर, क्या खूब राज छिपे हैं इसमें पटना का इतिहास 2500 वर्षों से भी अधिक पुराना है। यह वही पवित्र भूमि है जहां  मौर्य वंश ने भारत की एकता की नींव रखी थी। सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य और अशोक महान ने यहीं से अपने शासन का विस्तार किया था। उस समय यह शहर पाटलिपुत्र के नाम से जाना जाता था, जो शिक्षा, कला, व्यापार और राजनीति का केंद्र था। चीनी यात्री फाह्यान और ह्वेनसांग ने भी अपनी यात्राओं में इस नगर की समृद्धि का वर्णन किया था। पाटलिपुत्र की मिट्टी में इतिहास की खुशबू अब भी घुली हुई महसूस की जा सकती है। हर पुरानी दीवार, हर मंदिर और हर घाट उस गौरवशाली अतीत की कहानी कहता है। आज से चार सौ साल पहले अंग्रेज़ों के शासनकाल में यह शहर प्रशासनिक केंद्र बना और धीरे-धीरे इसका नाम पटना पड़ गया। आज पटना उस विरासत का आधुनिक रूप है, जो भारत की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक की गवाही देता है। प्रकृति और संस्कृति के अद्भुत मेल के रूप में पटना   पटना की सबसे बड़ी पहचान है गंगा नदी। यह सिर्फ एक जलधारा नहीं, बल्कि शहर की आत्मा है। गंगा के बिना पटना की कल्पना अधूरी कही जा सकती है। सुबह की आरती, दीपों से जगमगाते घाट, और गंगा स्नान के दृश्य मन को शांति से भर देते हैं। गंगा पटना को जीवन देती है खेती के लिए पानी, व्यापार के लिए मार्ग और लोगों के लिए श्रद्धा। यहां के घाटों पर जब सूरज उगता है, तो गंगा के जल पर उसकी सुनहरी किरणें झिलमिलाती हैं। ऐसा लगता है जैसे पूरा शहर रोशनी की चादर ओढ़े खड़ा हो। यहां की हवा में इतिहास की सोंधी महक है और संस्कृति की मिठास। कहा भी जाता है गंगा जहां बहती है, वहां जीवन खिल उठता है। पटना के गंगा तट पर न सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह पर्यटन का आकर्षण भी बन चुका है। हजारों की संख्या में पर्यटक यहां गंगा आरती, नौका विहार और घाटों के दृश्य देखने आते हैं।(पटना का इतिहास 2500 वर्षों से भी अधिक पुराना है।) पर्यटकों के लिए खजाने के पिटारे जैसा है पटना पटना का पर्यटन बिहार की पहचान का प्रतीक बन चुका है। “Patna tourism” आज गूगल पर सबसे अधिक खोजे जाने वाले कीवर्ड्स में से एक है। इसका कारण है यहां की ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता। गोलघर, पटन देवी मंदिर, गांधी मैदान, बिहार म्यूजियम, संजय गांधी बायोलॉजिकल पार्क, कुम्हरार पार्क और गंगा घाट ये सभी स्थान शहर को खास बनाते हैं। गोलघर का इतिहास अंग्रेज़ों के दौर से जुड़ा है। इसका विशाल गुंबद आज भी शहर की पहचान है। बिहार म्यूजियम में प्राचीन मूर्तियां, सिक्के और कलाकृतियां रखी गई हैं, जो पटना की गौरवशाली विरासत को दर्शाती हैं। पटन देवी मंदिर आस्था का केंद्र है जहां दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। यहां का हर कोना किसी न किसी कहानी से जुड़ा है। पटना का पर्यटन सिर्फ घूमने-फिरने का अनुभव नहीं है, बल्कि अतीत को छूने का अवसर है। पटना में हवा सी तेज विकास और प्रगति की रफ्तार पटना आज सिर्फ अतीत में जीने वाला शहर नहीं है, बल्कि यह आधुनिक भारत के साथ कदम मिलाकर चल रहा है। यह मानिए “Modern Patna” अब विकास की नई पहचान बन चुका है। यहां स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट, मेट्रो रेल, फ्लाईओवर, शॉपिंग मॉल, शिक्षा संस्थान और टेक्नोलॉजी हब लगातार बढ़ रहे हैं। आईटी पार्क, मेडिकल हब और बिजनेस सेंटर की योजनाएं पटना को आधुनिक शहरी जीवन की नई दिशा दे रही हैं। शहर के युवाओं में जोश है और सरकार के प्रयासों से शहर की रफ्तार तेज़ हो रही है। जैसे कहा भी गया है जो समय के साथ नहीं बदलता, वो समय के पीछे रह जाता है।पटना ने इस कहावत को सच साबित किया है। यह शहर अब न केवल बिहार का गर्व है बल्कि उत्तर भारत के तेजी से उभरते शहरी केंद्रों में से एक बन चुका है। अक्सर पूछे जाने वाले सवाल- पटना बिहार की राजधानी कब बना? पटना का क्षेत्रफल कितना है? पटना में कितने जिले हैं? पटना कहां है? पटना के फैमस मार्केट्स? जीवनशैली और खानपान में अव्वल पटना पटना की सड़कें सिर्फ व्यस्त नहीं हैं, उनमें जीवन है। यहां की चाय की दुकानों में बहसें होती हैं, गलियों में हंसी गूंजती है और स्वाद हर मोड़ पर मिलता है। पटना का खाना उसकी आत्मा है। लिट्टी-चोखा तो आपने सुना ही होगा और शायद चखा भी हो! मशहूर भी तो इतना है। खैर इसके अलावा ठेकुआ, खजूर का पुआ, खिचड़ी, सत्तू और मिठाइयां जैसे खाजा, अनरसा और पेडा इस शहर की पहचान हैं। Patna food शब्द अपने आप में स्वाद की पहचान बन चुका है। यहां का खाना सिर्फ भूख नहीं मिटाता, यह दिल को सुकून देता है। यहां की संस्कृति में सादगी और अपनापन है। त्यौहारों के समय पटना रंगों से भर जाता है चाहे छठ पूजा हो, मकर संक्रांति, या दिवाली। हर उत्सव यहां पूरे जोश और उमंग के साथ मनाया जाता है। क्यों आज दोराहे पर खड़ा पटना? पटना के सामने कई चुनौतियां भी हैं। ट्रैफिक की समस्या, प्रदूषण, जल-भराव और स्वच्छता जैसे मुद्दे शहर की गति को धीमा करते हैं। लेकिन इसके बावजूद यह शहर रुकता नहीं। यहां के

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लवाबजा खीर विंध्य की वो भूली मिठास जो अब पूरे भारत को कर रही है दीवाना!

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लवाबजा खीर का चौखा स्वाद चखा है कभी? लवाबजा एक पारंपरिक भारतीय मिठाई है, जो अब फिर से सुर्खियों में है। यह स्वाद, परंपरा और स्वास्थ्य का अद्भुत संगम है। विंध्य क्षेत्र की यह डिश अब पूरे देश में लोकप्रिय हो रही है। इसे “जंगल राइस खीर” या “समा की खीर” भी कहा जाता है। इसका नाम जितना अनोखा है, इसका स्वाद उतना ही निराला है और बेहद खास है । लवाबजा उन व्यंजनों में से एक है जो समय के साथ और भी खास हो जाते हैं। इसकी बनावट नरम और मलाईदार होती है, जो जीभ पर रखते ही घुल जाती है। जिसमें दूध, समा के चावल, मेवे और इलायची की बेहतरीन खुशबू होती है। यह डिश सिर्फ स्वाद नहीं देती बल्कि हर चम्मच के साथ परंपरा और अपनापन भी परोसती है। यही इसकी खासियत है। लवाबजा की यात्रा कैसे बना ये डिश दुनिया के फूड लवर्स की पसंद? लवाबजा का इतिहास प्राचीन काल से जुड़ा है जब लोग उपवास या त्यौहारों में हल्के और पवित्र खाद्य पदार्थ खाते थे। विंध्य प्रदेश और मध्य भारत के ग्रामीण इलाकों में लवाबजा का स्थान बहुत ऊंचा रहा है। यह व्यंजन मुख्यत तब बनाया जाता था जब गेहूं या चावल जैसे भारी अनाज खाने की अनुमति नहीं होती थी। ऐसे में समा के चावल जिन्हें जंगल राइस भी कहा जाता है। का प्रयोग करके यह मीठा बनाया जाता था जो पेट के लिए हल्का और स्वाद में लाजवाब होता था। आज के युग में जब मिलेट्स यानी मोटे अनाज फिर से ट्रेंड में हैं, लवाबजा की लोकप्रियता भी तेजी से बढ़ रही है। यह भारत की परंपरागत खानपान शैली को आधुनिक स्वास्थ्य ट्रेंड्स से जोड़ता है।(लवाबजा एक पारंपरिक भारतीय मिठाई है जो अब फिर से सुर्खियों में है। ) क्यों लवाबजा बना हर फूड ट्रैवलर की बकेट लिस्ट का हिस्सा? लवाबजा बनाने के लिए बहुत ज्यादा सामग्री की जरूरत नहीं होती है। इसे कम चीजों में भी स्वादिष्ट बनाया जा सकता है। समा के चावल इसकी पहली सामग्री है! जो व्रत और उपवास में भी प्रयोग किए जाते हैं। इसके अलावा दूध, घी, चीनी (या गुड़), इलायची पाउडर, केसर और सूखे मेवे इसका स्वाद बढ़ाते हैं। समा के चावल की खासियत यह है कि यह ग्लूटेन-फ्री होता है और आसानी से पच जाता है। यह खीर दूध में पकने के बाद इतनी मुलायम हो जाती है कि मुंह में घुल जाती है। जब इसमें इलायची और केसर की खुशबू मिलती है तो इसका स्वाद दोगुना हो जाता है। यह मिठाई न केवल पेट भरती है बल्कि आत्मा को भी संतुष्ट करती है। लवाबजा डिश की कहानी जो जीभ से दिल तक पहुंची लवाबजा बनाने की विधि बेहद आसान और घरेलू है। सबसे पहले समा के चावल को साफ पानी में भिगोया जाता है ताकि वह मुलायम हो जाएं। फिर दूध को उबालकर उसमें ये चावल डाले जाते हैं। धीरे-धीरे चलाते हुए जब चावल दूध में पक जाते हैं तो उसमें घी, चीनी या गुड़ और इलायची पाउडर डाला जाता है। ऊपर से केसर और मेवे सजाकर पकवान तैयार कर लिया जाता है। इसे गरम या ठंडा दोनों तरह से खाया जा सकता है। विंध्य क्षेत्र में इसे पूजा या उपवास के बाद भगवान को भोग लगाकर परिवार के साथ बांटा जाता है। यह मिठाई सादगी में स्वाद का अद्भुत उदाहरण है। एक बार ही सही पर लवाबजा आपके घर में बनना चाहिए। लवाबजा डिश एक रेसिपी नहीं, बल्कि संस्कृतियों को जोड़ने वाला स्वाद है लवाबजा न सिर्फ स्वादिष्ट है बल्कि पौष्टिकता से भी भरपूर है। इसमें दूध से प्रोटीन और कैल्शियम मिलता है, मेवों से विटामिन और खनिज मिलते हैं, और समा के चावल से फाइबर व ऊर्जा मिलती है। यह पेट के लिए हल्का और ग्लूटेन-फ्री विकल्प है, जिससे यह व्रत या डाइट करने वालों के लिए बेहतरीन डिश बन जाती है। इसमें न तो कोई कृत्रिम स्वाद होता है और न ही कोई प्रोसेस्ड सामग्री। अगर आप गुड़ का प्रयोग करते हैं तो यह और भी हेल्दी हो जाती है क्योंकि गुड़ में आयरन और मिनरल्स प्रचुर मात्रा में होते हैं। इस वजह से लवाबजा को हेल्दी स्वीट डिश भी कहा जाता है। लवाबजा डिश का स्वाद एक, और एहसास हज़ार लवाबजा उन मिठाइयों में से है जो हर व्रत या त्यौहार की शान बढ़ा देती हैं। चाहे नवरात्रि हो, महाशिवरात्रि, या सावन के सोमवार यह मिठाई हर अवसर के लिए उपयुक्त है। यह हल्की, सात्विक और स्वाद से भरपूर होती है। विंध्य क्षेत्र में अब भी कई परिवार व्रत के दौरान इसे बनाते हैं क्योंकि यह शरीर को ऊर्जा देती है और भूख शांत करती है। आधुनिक समय में भी लोग इसे इंस्टाग्राम या यूट्यूब पर फेस्टिव स्वीट डिश, लवाबजा रेसिपी, व व्रत स्वीट डिश जैसे टैग्स के साथ साझा करते रहते हैं। यह मिठाई न केवल पारंपरिकता का प्रतीक है बल्कि आज के युग की ट्रेंडिंग रेसिपी भी बन चुकी है। जहां परंपरा और नवाचार एक साथ परोसे जाते हैं लवाबजा को अब आधुनिक अंदाज में भी प्रस्तुत किया जा रहा है। इसे क्ले पॉट्स, ग्लास कप्स और छोटे सर्विंग बाउल्स में सजाकर परोसा जाता है। ऊपर से कटे हुए पिस्ते, बादाम, और केसर डालने से यह दिखने में बेहद आकर्षक लगती है। आजकल लोग इसे “मिलेट डेज़र्ट” या “इंडियन फिटनेस स्वीट” के नाम से भी पहचानते हैं। इससे यह साफ पता चलता है कि लवाबजा अब सिर्फ एक पारंपरिक मिठाई नहीं, बल्कि भारतीय फूड कल्चर का ग्लोबल ट्रेंड बन चुकी है। लवाबजा पहचान संस्कृति की कहूं तो क्या बुरा? लवाबजा भारत की उन दुर्लभ पारंपरिक मिठाइयों में से है जो समय के साथ और भी कीमती होती गई हैं। यह मिठाई न केवल स्वाद में अद्वितीय है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, परंपरा और स्वास्थ्य का सुंदर संगम भी है। हर बार जब आप इसे बनाते हैं, तो यह सिर्फ एक डिश नहीं रहती, बल्कि बचपन, व्रत, और परिवार की यादों का स्वाद बन जाती है। अगर आपने अभी तक इसे नहीं चखा, तो अगली बार किसी त्यौहार या उपवास पर लवाबजा जरूर बनाइए क्योंकि एक बार इसे खाने के बाद, इसका स्वाद बार-बार याद आएगा। “जानिए समा चावल कहां मिलते हैं और क्यों हैं इतने खास!” समा चावल,

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सर्दियां आते ही क्यों हरेक की जुबान पर कश्मीरी पश्मीना का नाम होता है? क्या है इसकी खासियत?

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कश्मीर की पश्मीना, बर्फ़ में बुनी गरमाहट की अनमोल दास्तान कश्मीर की वादियों में जब पहली बर्फ़ गिरती है, तो लगता है जैसे धरती ने सफ़ेद चादर ओढ़ ली हो। इसी ठंडी धरती की गोद में जन्म लेती है पश्मीना, दुनिया की सबसे महीन, सबसे नर्म और सबसे शुद्ध ऊन। इसे ‘फाइबर ऑफ़ हेवन’ भी कहा जाता है, क्योंकि यह ऊन सीधे हिमालय की गोद से आती है। कश्मीर के ऊंचे पहाड़ी इलाक़ों में रहने वाली एक विशेष बकरी होती है चांगथांगी बकरी। यह बकरी लेह और लद्दाख के बेहद ठंडे इलाक़ों में पलती है, जहां का तापमान कई बार -30°C तक चला जाता है। इसी कठोर सर्दी से बचने के लिए यह बकरी अपनी त्वचा के नीचे एक बेहद महीन और गर्म ऊन विकसित करती है जिसे हम “पश्मीना” कहते हैं। पश्मीना शब्द फारसी भाषा के शब्द “पश्म” से बना है, जिसका अर्थ होता है “कोमल ऊन”। यह ऊन इतनी महीन होती है कि एक बाल से भी पतली होती है, और फिर भी इतनी मजबूत कि सालों तक अपनी चमक और गरमाहट बनाए रखे। कश्मीरी लोग इसे सदियों से ‘गौरव’ की तरह संभालते आए हैं। हर धागे में मेहनत, हर रेशे में दास्तां और हर शॉल में एक विरासत सांस लेती है। इतिहास की तहों में लिपटी नर्मी कश्मीर की पश्मीना का इतिहास उतना ही पुराना है जितनी पुरानी उसकी बर्फ़ीली चोटियां। माना जाता है कि 15वीं सदी में यह कला तैमूरलंग के शासनकाल में पर्शिया यानी ईरान से भारत आई थी। लेकिन कश्मीर ने इस कला को नया जीवन दिया है। यहां के कारीगरों ने पश्मीना को सिर्फ एक कपड़ा नहीं रहने दिया उन्होंने इसे एक भाव बना दिया है। कहा जाता है की मुगल बादशाह अकबर को पश्मीना शॉल बेहद प्रिय थी। ऐसा भी माना जाता है कि उनके दरबार में यह शॉल शाही पहचान का प्रतीक बन गई थी। अकबर ने कश्मीर में पश्मीना उद्योग को संरक्षण दिया और यहीं से इसका स्वर्ण युग शुरू हुआ। वह समय था जब हर रेशे में कारीगर की आत्मा बसती थी। पश्मीना शॉलें इतनी महीन होती थीं कि उन्हें अंगूठी में से पार किया जा सकता था। यही कारण था कि इसे “रिंग शॉल” भी कहा गया। अंग्रेज़ काल में जब यूरोप में कश्मीरी पश्मीना पहुंची, तो वहां के कुलीन वर्ग ने इसे राजसी फैशन का हिस्सा बना लिया। यहां तक की फ्रांस, इंग्लैंड और रूस तक में कश्मीर की पश्मीना ‘लक्ज़री’ का पर्याय बन गई थी। चांगथांगी बकरियों से कश्मीरी करघे तक की यात्रा पश्मीना का असली जादू उसकी यात्रा में छिपा है लद्दाख की ऊंचाईयों से लेकर श्रीनगर के करघों तक की लंबी, मेहनती और भावनात्मक यात्रा। हर पश्मीना शॉल कई हाथों से होकर गुजरती है। सबसे पहले, बकरियों के ऊन को सर्दी के बाद बड़े ध्यान से निकाला जाता है, जिसे “कांघी” कहा जाता है। फिर उस ऊन को साफ़ कर, कंघी कर महीन धागों में काता जाता है। यह काम हाथ से होता है बिना किसी मशीन के। जब यह धागा तैयार हो जाता है, तो उसे करघों तक भेजा जाता है। वहां, कारीगर घंटों नहीं, बल्कि हफ़्तों तक एक ही शॉल पर मेहनत करता है। हर धागे को ध्यान से बुनना, रंगना और पैटर्न में पिरोना यही कला की असली पहचान है। कश्मीरी करघे सिर्फ लकड़ी के नहीं होते, वे भावनाओं से बने होते हैं। उन पर झुककर काम करते कारीगर के चेहरे पर जो सुकून होता है, वास्तव में वही पश्मीना की आत्मा है।(पश्मीना शब्द फारसी भाषा के शब्द “पश्म” से बना है, जिसका अर्थ होता है “कोमल ऊन”।) कारीगरी का करिश्मा हर धागे की एक अलग दास्तान कश्मीर की पश्मीना सिर्फ ऊन नहीं, बल्कि कला की एक जीवंत तस्वीर है। हर शॉल में एक कहानी छिपी होती है कभी कारीगर की बेटी के सपनों की, कभी उसकी मां के हाथों की दुआओं की। जब कारीगर ‘कनी वर्क’ या ‘सोज़नी’ करता है, तो यह मानिए की वह धागे नहीं, भावनाएं बुनता है। ‘कनी’ शॉल में लकड़ी की छोटी-छोटी सुइयों से पैटर्न बनाए जाते हैं, जबकि ‘सोज़नी’ एम्ब्रॉयडरी में महीन सुई और रंगीन धागों से फूल, बेलें और मुग़ल शैली के डिज़ाइन उकेरे जाते हैं। इन शॉलों की पहचान उनकी “सौम्यता” है न बहुत चमकीली, न बहुत फीकी, बस एक नर्मी जो देखने वाले को छू जाए। यही कारण है कि असली पश्मीना की पहचान उसके एहसास से होती है, न कि उसके टैग से। आज भी कई कारीगर उसी पारंपरिक तकनीक से शॉल बनाते हैं जो उनके पूर्वजों ने सिखाई थी। हर पीढ़ी इस कला को आगे बढ़ाती है जैसे कोई विरासत नहीं, बल्कि इबादत हो। कश्मीर की आत्मा, पश्मीना की नर्मी एक शॉल जो दिल छू ले समय के साथ जब दुनिया तेज़ हुई, तो पश्मीना का बाज़ार भी मशीनों और नकली ऊन से भर गया। बाज़ार में मिलने वाली “पश्मीना” शॉलों में से ज़्यादातर वास्तव में असली नहीं होतीं थी। असली पश्मीना को पहचानना आसान नहीं है। वह हल्की होती है, सांस लेने योग्य होती है और स्पर्श में रेशमी नहीं बल्कि बादलों जैसी लगती है। असली पश्मीना में किसी भी तरह का सिंथेटिक चमक नहीं होती। कश्मीरी कारीगरों के लिए यह सबसे बड़ा संकट है उनकी मेहनत को सस्ती नकली चीज़ों से तुलना करना उनके दिल पर चोट करता है। लेकिन असली प्रेमी अभी भी जानते हैं कि असली पश्मीना सिर्फ कपड़ा नहीं एक अनुभव है। यही कारण है कि आज भी विदेशी पर्यटक जब श्रीनगर के पुराने बाज़ारों में जाते हैं, तो असली पश्मीना की तलाश में घंटों दुकान-दुकान घूमते हैं। वहां जब एक बुजुर्ग कारीगर शॉल को हाथ में लेकर कहता है, “यह गरमाहट बकरियों से नहीं, दिल से आती है”, तो सुनने वाला मुस्कुरा देता है। दुनिया के फ़ैशन रैंप से दिलों की अलमारी तक कभी सिर्फ राजघरानों की पहचान रही पश्मीना, आज दुनिया के हर कोने में फैशन का प्रतीक बन चुकी है। पेरिस, लंदन और मिलान जैसे फैशन शहरों में जब मॉडल्स पश्मीना ओढ़कर रैंप पर उतरती हैं, तो दर्शकों को कश्मीर की वादियां याद आती हैं। डिजाइनर्स इसे हर मौसम में प्रयोग करते हैं कभी जैकेट्स में, कभी स्कार्फ़ में, तो कभी गाउन में। लेकिन जो बात पश्मीना को सबसे अलग बनाती

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क्या सूटकेस का रंग बिगाड़ सकता है आपकी यात्रा की योजना? जानिए कौन-सा बैग कलर है सबसे सुरक्षित!

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यात्रा की तैयारी जब भी हम करते हैं, तो टिकट, होटल बुकिंग, कपड़े और ज़रूरी सामान पर खूब ध्यान देते हैं, लेकिन बहुत कम लोग अपने सूटकेस के रंग पर गौर करते हैं। ट्रैवल एक्सपर्ट्स का कहना है कि सूटकेस का रंग भी आपकी यात्रा सुरक्षा और लगेज पहचान में अहम भूमिका निभाता है। अक्सर एयरपोर्ट्स पर देखा गया है कि ज़्यादातर लोग काले रंग के सूटकेस का इस्तेमाल करते हैं। देखने में तो यह प्रोफेशनल लगता है, लेकिन यही रंग सबसे ज़्यादा खोए हुए बैग (लॉस्ट लगेज) और गलत पहचान (बैगेज मिक्स-अप) की वजह बनता है। एक जैसे काले सूटकेस बेल्ट पर घूमते रहते हैं और यात्री घंटों अपने बैग को पहचानने में परेशान होते हैं। कई बार लोग गलती से किसी और का बैग उठा लेते हैं, जिससे पूरी ट्रैवल प्लानिंग गड़बड़ा जाती है। एयरपोर्ट सुरक्षा रिपोर्ट्स के अनुसार, डार्क रंग के लगेज जैसे ब्लैक, ग्रे या नेवी ब्लू बैग पर अगर खरोंच या टूट-फूट हो जाए तो वह तुरंत नजर नहीं आती। इससे न केवल बैग को नुकसान होता है बल्कि एयरपोर्ट हैंडलिंग स्टाफ के लिए भी पहचानना मुश्किल हो जाता है। ट्रैवल एजेंसियों का सुझाव है कि अगर आप चाहते हैं कि आपका सामान आसानी से पहचाना जा सके और सुरक्षित रहे, तो हमेशा ब्राइट कलर सूटकेस चुनें। जैसे लाल, पीला, हरा या नारंगी रंग का बैग बेल्ट पर दूर से ही दिख जाता है और चोरी या गलती से उठाए जाने की संभावना बहुत कम होती है।( कई बार लोग गलती से किसी और का बैग उठा लेते हैं) आजकल कई ब्रांड जैसे Samsonite, Skybags और American Tourister ऐसे स्मार्ट लगेज बना रहे हैं जिनमें GPS ट्रैकर और डिजिटल लॉक सिस्टम होते हैं। इससे आप अपने मोबाइल फोन पर ही अपने बैग की लोकेशन ट्रैक कर सकते हैं। यह सुविधा खासकर इंटरनेशनल ट्रैवल करने वालों के लिए बहुत फायदेमंद है। यात्रा के दौरान बैग पर कोई यूनिक टैग, रंगीन रिबन, या स्टिकर लगाना भी एक समझदारी भरा कदम है। यह आपके लगेज को दूसरों से अलग बनाता है और बोर्डिंग बेल्ट पर पहचानना आसान कर देता है। ट्रैवल विशेषज्ञों का कहना है कि सूटकेस का रंग अब केवल फैशन नहीं, बल्कि सुरक्षा का प्रतीक बन गया है। इसलिए अगली बार जब आप किसी हॉलिडे ट्रिप, एयर ट्रैवल या विदेश यात्रा की तैयारी करें, तो सिर्फ कपड़ों का नहीं, बल्कि अपने ट्रैवल बैग के रंग का भी सही चुनाव करें। यह छोटा-सा निर्णय आपकी यात्रा को आरामदायक, सुरक्षित और तनावमुक्त बना सकता है।

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क्यों कहते हैं इस जगह को दिल्ली की रूह? चावड़ी बाज़ार की गलियों में छिपे हैं कई अनकहे राज़!

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पहली झलक में चावड़ी बाज़ार चावड़ी बाज़ार एक मात्र ऐसा बाजार है जिसकी पहचान बस आवाजों से की जा सकती है, जैसे ही मैं मेट्रो स्टेशन से बाहर निकलता हूं, कानों में एक साथ सैकड़ों ध्वनियां घुल जाती हैं, घंटियों की टन-टन, रिक्शे की बेल, दुकानदारों की पुकार और खरीदारों की चहल पहल। हवा में घुली हुई चाय और जलेबी की मिठास मन को उसी पल से अपनी गिरफ्त में ले लेती है। यहां कदम रखते ही ऐसा लगता है जैसे दिल्ली की रगों में बहती पुरानी नब्ज़ को आप महसूस कर रहे हों। गलियां तंग हैं, लेकिन हर गली में ज़िंदगी का जश्न आप यहां देख सकते हैं। दुकानों के ऊपर लटकते बिजली के तार किसी पुराने नाटक के मंच जैसे लगते हैं, जहां हर किरदार अपनी-अपनी भूमिका निभा रहा है। एक घुमक्कड़ के लिए यह जगह सिर्फ बाज़ार नहीं, एक म्यूज़ियम है जहां हर दीवार, हर मोड़ और हर गली एक कहानी सुनाती है। यहां कोई जल्दी में नहीं होता, क्योंकि हर कोई जानता है कि चावड़ी बाज़ार की रफ्तार अपने हिसाब से चलती है।(चावड़ी बाज़ार एक मात्र ऐसा बाजार है जिसकी पहचान बस आवाजों से की जा सकती है,) इतिहास की गलियों में चावड़ी बाज़ार दिल्ली का इतिहास जितना पुराना है, उतनी ही पुरानी ये गलियां हैं। चावड़ी शब्द की जड़ें मराठी से आती हैं जिसका मतलब होता है पब्लिक हॉल या “सामुदायिक सभा स्थल। पुराने ज़माने में यहां सरकारी ऐलान होते थे, अदालतें लगती थीं, और व्यापारी अपने सौदे तय करते थे। मुगल काल में चावड़ी बाज़ार सिर्फ व्यापार का ठिकाना नहीं था, बल्कि यह सामाजिक जीवन का केंद्र भी था। यहां से लेकर जामा मस्जिद तक का इलाका तब भी दिल्ली की रौनक कहलाता था। अंग्रेज़ी राज में यही बाज़ार दिल्ली के कई ब्रिटिश ऑफिसर क्वार्टर्स से जुड़ा हुआ था। आज भी जब आप इन गलियों में चलते हैं, तो पुराने हवेलियों की झरोखों से झांकती लकड़ी की जालियां और दीवारों की उखड़ी पपड़ी उस बीते वक्त की गवाही देती हैं। इतिहास के बीच से गुजरते हुए ऐसा लगता है जैसे आप किसी टाइम मशीन में बैठ गए हों हर कदम आपको दिल्ली के किसी और दौर में ले जाता है। कैसे पहुंचें दिल्ली की नब्ज़ चावड़ी बाज़ार चावड़ी बाज़ार तक पहुंचना उतना ही आसान है जितना दिल्ली में किले खोज लेना। अगर आप दिल्ली मेट्रो से आ रहे हैं, तो ब्लू लाइन या येलो लाइन से कनेक्ट होकर सीधे चावड़ी बाज़ार मेट्रो स्टेशन पर उतरिए। जैसे ही एस्कलेटर से ऊपर आएंगे, हवा का एक झोंका और दुकानों की चमक आपको बता देगी कि आप सही जगह पहुंचे हैं। जो लोग पुरानी दिल्ली की गलियों के दीवाने हैं, वे चाहें तो रिक्शा राइड लेकर यहां तक पहुंच सकते हैं। रिक्शा चलाने वाले अंकल अक्सर आपको रास्ते में वो कहानियां सुना देंगे जो किसी किताब में नहीं मिलतीं। अगर आप थोड़े घुमक्कड़ हैं, तो चावड़ी बाज़ार तक पैदल आना सबसे अच्छा अनुभव देगा जामा मस्जिद, दरियागंज और कुचामन गली जैसे इलाकों से गुजरते हुए आपको असली पुरानी दिल्ली का स्वाद मिलेगा। यहां का हर मोड़, हर गली किसी रोमांच से कम नहीं है मानो दिल्ली की नब्ज़ यहीं धड़कती हो। सुगंध और स्वाद का ठिकाना क्या खाएं चावड़ी बाज़ार में अगर आप फूडी हैं तो चावड़ी बाज़ार आपके लिए टेस्ट का पैराडाइज़ है। यहां हर 10 कदम पर कोई न कोई खुशबू आपको खींच ले जाएगी। सुबह की शुरुआत करें परांठे वाली गली से जहां आलू, गोभी, पनीर, और यहां तक कि मीठे परांठे तक मिलते हैं। एक कौर लेते ही मक्खन का स्वाद ज़ुबान पर पिघल जाता है और आप सोच में पड़ जाते हैं कि क्या यही है दिल्ली की असली पहचान? थोड़ा आगे चलें तो जलेबी वाला आपको गरमागरम जलेबियां देगा, जो देसी घी में तली हुई होती हैं। लस्सी की कुल्हड़ पकड़े किसी दुकान के बाहर खड़े होकर पीना, गर्मी में ठंडक का सबसे प्यारा एहसास देता है खैर अब तो सर्दी का मौसम आ गया है तो आप चाय या गरम कॉफी का मजा ले साकेत हैं। यहां की गलियों में छोटे ठेलों पर मिलने वाले छोले-भटूरे, मटर-कुल्चे और आलू टिक्की न सिर्फ पेट भरते हैं बल्कि दिल भी खुश कर देते हैं। रात को जब बाज़ार की रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ती है, तो कुल्हड़ चाय की दुकानें जाग जाती हैं। वहां बैठकर अगर आप चाय की चुस्की लेते हुए लोगों को गुजरते देखें, तो महसूस होगा कि यह बाज़ार रात में भी सोता नहीं, बस धीरे-धीरे सपने देखता है। इस रंगों के मेले से क्या खरीदें? चावड़ी बाज़ार खरीददारों के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं। यहां की दुकानों में जो विविधता है, वो शायद ही किसी और जगह मिले। शादी के कार्ड्स से लेकर सजावट की झिलमिल लाइट्स तक, हर चीज़ में एक पुरानी दिल्ली वाली आत्मा बसती है। अगर आप शादी या त्यौहार की तैयारी कर रहे हैं, तो यहां के कार्ड प्रिंटिंग शॉप्स, गिफ्ट रैप पेपर, और सजावट की दुकानों में आपको हर रंग, हर डिज़ाइन मिलेगा।थोड़ा आगे बढ़ें तो पीतल और तांबे के बर्तन, पुराने ग्रैमोफोन रिकॉर्ड्स, और घंटियों की आवाज़ वाली दुकानें मिलेंगी। बातचीत करते वक्त दुकानदार की क्या चाहिए बाबूजी? वाली आवाज़ आपको साठ-सत्तर के दशक में ले जाती है। यहां बार्गेनिंग भी एक कला है अगर आपने थोड़ा धैर्य दिखाया, तो दाम आधा भी हो सकता है। दुकानदारों की बोली, ले जाइए साब, आख़िरी भाव! सुनकर मुस्कुराना बनता है यदि आप चाहें तो। रात की रौनक, जब बाज़ार पर चांद की नजर होती है! दिनभर की भीड़-भाड़ के बाद जैसे ही सूरज पश्चिम में ढलने लगता है, चावड़ी बाज़ार का रूप बदल जाता है। दुकानों के शटर गिरते हैं, लेकिन गलियों की हवा अब भी गर्म रहती है  खुशबू, धूल और यादों से भरी हुई। कुछ दुकानों के बाहर बैठे लोग चाय पीते हैं, दिनभर की बिक्री गिनते हैं और अपने घरों की तरफ लौटने की तैयारी करते हैं। दीवारों पर लटके बल्ब अब झिलमिलाते हैं, जैसे बाज़ार खुद को रात के लिए सजा रहा हो। उस पल चावड़ी बाज़ार किसी बूढ़े दादा की तरह लगता है, जो दिनभर की मेहनत के बाद अपनी पुरानी कुर्सी पर बैठा है, लेकिन आंखों में

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गोवर्धन की 21 किलो मीटर की यात्रा आपको थकाती नहीं है बल्कि जीवन के सारे पापों से मुक्त कर देती है!

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गोवर्धन – ज़िंदगी की भागदौड़ के बीच जब कभी मन थक जाता है, तो आत्मा को एक ठहराव चाहिए होता है। मुझे भी वही ठहराव मिला गोवर्धन में। मथुरा की धरती पर बसा यह पवित्र स्थान केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक जिंदगी का एहसास, एक मन की यात्रा, और एक जन्नत का टुकड़ा है। यहां आकर लगता है जैसे खुद भगवान श्री कृष्ण की बांसुरी की मधुर धुन कानों में गूंज रही हो। गोवर्धन की मिट्टी में वो सुगंध है जो सीधा दिल में उतर जाती है। यहां के लोग, यहां की बोली, यहां की चहल पहल सब मिलकर एक ऐसा माहौल बना देते हैं जो यादों में बस जाता है। गोवर्धन की राह सफर की पहली दस्तक का अनुभव सुनिए दिल्ली से निकला तो सुबह के 6 बज रहे थे। कार की खिड़की से बाहर झाँका तो धूप हल्की-हल्की उतर रही थी। मन में एक अजीब-सी एक्साइटमेंट थी। सड़कों पर गाड़ियां दौड़ रही थीं, पर मेरा मन पहले से ही ब्रज की गलियों में पहुंच चुका था। दिल्ली पार करते ही शहर की हस्ल-बस्ल खत्म होने लगी। अब सामने थे हरे-भरे खेत, मिट्टी की सोंधी खुशबू और गायों की रंभाहट। हर कुछ किलोमीटर पर कोई न कोई ढाबा, जहां तवे से उठती पराठों की भाप हवा में मिल रही थी।(मथुरा की धरती पर बसा यह पवित्र स्थान केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक जिंदगी का एहसास, एक मन की यात्रा, और एक जन्नत का टुकड़ा है। ) मथुरा पहुंचने से पहले ही कार के भीतर कोई भजन बजा “गोवर्धन धरन गोकुल तरन…और उस पल लगा जैसे सफर का मकसद अब बस एक ही है गोवर्धन की परिक्रमा। कार से उतरते ही सामने गोवर्धन पर्वत की झलक मिली। लोगों की भीड़, माथे पर चंदन, और चारों तरफ़ जयकारों की आवाज़ “जय गोवर्धन धारी!” और राधे-राधे हवा में भक्ति थी और ज़मीन पर श्रद्धा का संसार। इतना मनोरम दृश्य आप कहीं और नहीं देख सकते। परिक्रमा का परमानंद गोवर्धन की सबसे प्रसिद्ध परंपरा है उसकी परिक्रमा। करीब 21 किलोमीटर लंबी यह परिक्रमा हर यात्री के धैर्य और श्रद्धा की परीक्षा लेती है। सुबह-सुबह मैंने और मेरे दो साथियों ने इ-रिक्शा में बैठकर परिक्रमा शुरू की। शुरू में लगा “अरे, इतना तो आराम से कर लेंगे,” पर कुछ ही दूर चलने पर महसूस हुआ कि यह सिर्फ यात्रा नहीं है, बल्कि आत्मा की परीक्षा भी है। रास्ते में मिट्टी उड़ी हुई थी, थक चुके थे, लेकिन हर मोड़ पर कोई-न-कोई जय श्रीकृष्ण और राधे-राधे बोलता मिला और मन फिर ताज़ा हो गया। बुजुर्ग महिलाएं सिर पर कलश रखकर चल रही थीं, बच्चे भजन गा रहे थे, और परिंदे अपने ही ताल में झूम रहे थे। बीच में एक छोटे से ढाबे पर रुका। एक प्याला लस्सी ली इतनी ठंडी और गाढ़ी कि जैसे आत्मा तक ठंडक पहुंच गई हो। दुकानदार बोला भैया, परिक्रमा का असली मज़ा तो इसी मिट्टी में है, थकान तो बस तन की होती है, मन तो गोवर्धन में रम जाता है। वो बात सुनकर सच में लगा यहां हर कदम भक्ति की ओर जाता है। यात्रा से इतर अन्नकूट महोत्सव यदि आप गोवर्धन में अन्नकूट के दिन पहुंचें तो मान लीजिए ब्रज की असली जन्नत देख ली है आपने। दीपावली के अगले दिन मनाया जाने वाला यह पर्व गोवर्धन पूजा से जुड़ा हुआ है। मंदिरों में हजारों दीपक जलते हैं और तरह-तरह के व्यंजन पर्वत के रूप में सजाए जाते हैं। मैं जब दीवाली के पहले पहुंचा, तो भीड़ में एक अद्भुत एनर्जी थी। चारों तरफ़ खुशबू कहीं पूरी तल रही थी, कहीं हलवा बन रहा था। हर कोई प्रसाद चढ़ाने में व्यस्त था। मंदिर के भीतर जब प्रवेश किया, तो सामने देखा भोग की थालियां पर्वत की तरह सजी हुईं थी। चावल, दाल, सब्जियां, मिठाई, और फल सब कुछ भक्ति का रूप बन चुका था। वहां बैठे एक पुजारी ने कहा बाबूजी, ये पर्वत भोजन का नहीं, भावना का प्रतीक है। प्रसाद का पहला कौर लिया तो लगा जैसे भीतर तक संतोष उतर आया हो। ये किसी फाइव-स्टार डिनर जैसा स्वाद नहीं था, ये तो भक्ति का स्वाद था मीठा, सच्चा और आत्मा को तृप्त करने वाला। राधा कुंड और श्याम कुंड का रोमांच गोवर्धन की यात्रा तब तक अधूरी है जब तक आप राधा कुंड और श्याम कुंड नहीं देख लेते। यह दोनों कुंड जैसे दो आत्माएं हैं एक प्रेम की, दूसरा भक्ति की। कहते हैं राधा कुंड का जल सबसे पवित्र है। वहां पहुंचा तो देखा सैकड़ों भक्त जल में स्नान कर रहे थे, कुछ लोग मौन साधे बैठे ध्यान कर रहे थे। एक वृद्धा ने बताया यहां  का पानी तन नहीं, मन धो देता है। पानी में डूबते सूरज की किरणें ऐसी लग रही थीं जैसे कोई गोल्डन मिरर चमक रहा हो। किनारे बैठे साधु तुलसी की माला फेरते हुए गा रहे थे – राधे-राधे बोलना पड़ेगा, वरना मन नहीं डोलेगा। उनकी आवाज़ में एक अजीब खिंचाव था। उस पल मुझे लगा कि गोवर्धन का हर कण राधा-कृष्ण के प्रेम की गवाही देता है। दीपों की रौशनी में सुकून का एहसास शाम ढलते ही गोवर्धन का रूप बिल्कुल बदल जाता है। दिन की चहल पहल धीरे-धीरे शांत होती है, पर माहौल में एक दिव्य ऊर्जा भर जाती है। हर गली में दीपक जलते हैं, मंदिरों से भजन की मधुर ध्वनि आती है और हवा में अगरबत्ती की खुशबू तैरती है। मैं एक छोटी सी चाय की दुकान पर बैठा था। मिट्टी के कुल्हड़ में गरम चाय, सामने दीपों की पंक्तियां और पीछे बजता “हरे रामा हरे कृष्णा”। कुछ विदेशी श्रद्धालु भी थे, जो ‘हरे कृष्ण मूवमेंट’ से जुड़े थे। वे नाच रहे थे, गा रहे थे और हर चेहरे पर असीम शांति थी। पास बैठे एक ब्रजवासी ने बोला गोवर्धन की रात तो सोल थेरेपी है। तन थक सकता है, पर मन यहां कभी नहीं थकता। उसने सही कहा था। रात की वह निस्तब्धता, दीपों की वह मद्धम रोशनी, और हवा में घुली भक्ति — यह सब मिलकर एक ऐसा माहौल बना देते हैं जिसे शब्दों में बांधा नहीं जा सकता। ठिकाना और लोगों की सादगी में छिपा अपनापन गोवर्धन में ठहरने के लिए बहुत से धर्मशाला, आश्रम और छोटे