रामनगर से मात्र 30 किलोमीटर दूर हरे-भरे कालाढूंगी गांव में स्थित है एक ऐसा संग्रहालय, जो एक समय पर जिम कॉर्बेट (Jim Corbett) घर हुआ करता था। जी हाँ, वही जिम कॉर्बेट जिसके नाम पर भारत का सबसे पुराना राष्ट्रीय उद्यान बनाया गया है। यह केवल एक संग्रहालय नहीं है, बल्कि उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह एक शिकारी से संरक्षणवादी बने जिम कॉर्बेट के जीवन और उपलब्धियों को श्रद्धांजलि है। इस संग्रहालय को छोटी हल्द्वानी भी कहते हैं। चारों तरफ हरियाली से घिरा यह संग्रहालय अपने आप में ही एक अद्भुत संरचना प्रतीत होती है।

कौन थे जिम कॉर्बेट?
एडवर्ड जेम्स कॉर्बेट, जिन्हें दुनिया जिम कॉर्बेट के नाम से जानती है इनका जन्म 25 जुलाई 1875 को नैनीताल में हुआ था। उन्होंने अपनी शिक्षा नैनीताल से ही ग्रहण की। वे पिता क्रिस्टोफर और माता मेरी जेन की आठवीं संतान थे। वे हमेशा अपनी सर्दियाँ कालाढूंगी में तथा गर्मियाँ नैनीताल में बिताते थे। दो खूबसूरत जगहों पर रहने की वजह से उन्हें वनों और वन्यजीवों से गहरा लगाव हो गया। उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने रेल विभाग में और उसके बाद सेना में कार्य किया। वे प्रकृति प्रेमी होने के साथ-साथ एक अच्छे लेखक, शिकारी और प्रकृतिविद भी थे। माना जाता है कि उन्होंने 40 से अधिक आदमखोर बाघों को मारकर गांव वालों की रक्षा की। गांव वालों द्वारा जिम कॉर्बेट को लिखे गए पत्र आज भी जिम कॉर्बेट संग्रहालय में मौजूद हैं।

उन्होंने विवाह नहीं किया था और उन्होंने अपना ज्यादातर समय अपनी बहन मैरी के साथ बिताया। सन् 1947 में जिम कॉर्बेट ने अपनी बहन के साथ केन्या बसने का निर्णय लिया। जिम कॉर्बेट की अधिकतर किताबें केन्या प्रवास के दौरान ही प्रकाशित हुईं।
जिम कॉर्बेट का प्रकृति प्रेम
जिम कॉर्बेट न केवल शिकारी और लेखक थे बल्कि एक प्रकृति प्रेमी भी थे। उन्होंने नैनीताल नगर पालिका सदस्य के रूप में कार्य किया, जिसके दौरान उन्होंने नैनीताल में एक पक्षी विहार बनाने का प्रस्ताव रखा। साथ ही उन्होंने मछलियों के संरक्षण के लिए भी कार्य किया और कई कानून एवं निर्देश पारित करवाए। यहां तक कि नैनीताल की सार्वजनिक निर्माण समिति की अध्यक्षता करते हुए कॉर्बेट ने वनों की कटाई पर नियंत्रण किया और बकरियों द्वारा चराई के कारण वनों को होने वाली क्षति को भी रोका।
क्या है जिम कॉर्बेट संग्रहालय

संग्रहालय में जाकर आप जिम कॉर्बेट की निजी वस्तुएँ और उनके द्वारा प्रयोग की जाने वाली चीज़ों को देख सकते हैं। इनमें उनकी बंदूक, टोपी, थैला, पत्र, तस्वीरें और पांडुलिपियाँ शामिल हैं। ये वस्तुएँ आपको जिम कॉर्बेट के रहन-सहन, पहनावे और उनके जीवन के बारे में सामान्य जानकारी प्रदान करती हैं। बहुत से लोग यह बात नहीं जानते कि जिम कॉर्बेट ने दोनों विश्वयुद्धों में भाग लिया था। कॉर्बेट संग्रहालय जिम कॉर्बेट के जीवन की प्रमुख घटनाओं से आपको रूबरू कराता है।
जिम कॉर्बेट जाने का सही समय
जिम कॉर्बेट जाने का सबसे अच्छा समय नवंबर से मार्च तक माना जाता है। इस समय मौसम सामान्य रूप से ठंडा, सुहावना और घूमने के लिए बिल्कुल उपयुक्त होता है। सर्दियों के दौरान नमी कम होती है और आसमान साफ रहता है, जिससे जंगल के भीतर दूर तक देखने में आसानी होती है और फोटो खींचने का अनुभव भी बहुत अच्छा होता है। इस समय तापमान कम होने की वजह से आप बिना किसी परेशानी के लंबे समय तक संग्रहालय और आसपास की प्राकृतिक जगहों का आनंद ले सकते हैं।

नवंबर से मार्च का मौसम वन्यजीवों की गतिविधियों को देखने के लिए भी उपयुक्त माना जाता है। इसके अलावा इस समय पर्यटकों की आवाजाही भी संतुलित रहती है, इसलिए आप शांति के साथ यहां की प्रकृति को महसूस कर सकते हैं और संग्रहालय में मौजूद प्रदर्शनों को आराम से देख सकते हैं।
कुछ सुझाव
यहाँ जिम कॉर्बेट संग्रहालय के अलावा और भी कई पर्यटन स्थल हैं। यदि आप जिम कॉर्बेट आने का प्लान कर रहे हैं, तो इन नज़दीकी जगहों पर ज़रूर जाएँ- कॉर्बेट फॉल्स, हनुमान धाम और जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान।
यहाँ कैसे पहुँचें
कॉर्बेट संग्रहालय कालाढूंगी से 3 किमी दूर रामनगर रोड पर स्थित है। रामनगर से कालाढूंगी के लिए नियमित टैक्सी और बसें उपलब्ध हैं। निकटतम रेल संपर्क रामनगर रेलवे स्टेशन (30 किमी) है। पंतनगर हवाई अड्डा या दिल्ली IGI हवाई अड्डे के माध्यम से भी यहाँ आसानी से पहुंचा जा सकता है।
मनोरंजन के लिए क्या-क्या करें?
- प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लें।
- यहाँ जिम कॉर्बेट के जीवन से जुड़ी कई कहानियाँ जान सकते हैं।
- स्थानीय मार्केट में घूम सकते हैं।
- विभिन्न प्रकार के पक्षियों को देख सकते हैं और उनकी तस्वीरें ले सकते हैं।
- साथ ही, आप यहाँ घंटों बैठकर प्रकृति को महसूस कर सकते हैं।









