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Surajkund International Crafts Mela (Faridabad)

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Surajkund International Crafts Mela (Faridabad): खानपान, संस्कृति और हस्तशिल्प का अनूठा संगम: सूरजकुंडअंतर्राष्ट्रीय शिल्प मेला फरीदाबाद by Pardeep Kumar सूरजकुंड अंतर्राष्ट्रीय शिल्प मेला आज विश्व में अपनी एक अलग पहचान बना चुका है। फरीदाबाद में  खूबसूरत अरावली पहाड़ियों में लगने वाला यह 35वां अंतर्राष्ट्रीय सूरजकुंड हस्तशिल्प मेला है। (Surajkund International Crafts Mela) 19 मार्च से 4 अप्रैल तक होगा आयोजित आपको बता दें कि कोरोना के चलते वर्ष 2021 में इसका आयोजन नहीं हो पाया था आमतौर पर यह मेला फरवरी के महीने में 1 से 14 फरवरी के बीच लगता है लेकिन इस बार इसका आयोजन 19 मार्च से 4 अप्रैल तक किया गया है। खानपान, संस्कृति और हस्तशिल्प का अनूठा संगम सूरजकुंड मेले का प्रथम बार आयोजन सन् 1987 में हुआ था। वर्ष 2009 में पहली बार भारतीय राज्यों के अलावा दूसरे देशों को आमंत्रित करने का प्रचलन शुरू हुआ।  इस कड़ी में सूरजकुंड में शामिल होने वाला पहला देश मिस्र बना था।  तभी से दुनिया भर के हस्तशिल्पकार और अन्य कलाकार इस मेले में आते हैं। जिस कारण मेले में भारत के अलग-अलग राज्यों की संस्कृति तो देखने को मिलती ही है साथ में विदेशी संस्कृति और हस्तशिल्प कला का यहां पर खूब दीदार होता है। विदेशों के मंझे हुए शिल्पकार अपने हाथों से तैयार किए गए सामान का इस मेले में प्रदर्शन करते हैं। (Surajkund International Crafts Mela) कोरोना के कारण  पिछले साल आयोजित न कर पाने के कारण इस बार हरियाणा सरकार ने इस मेले को भव्य बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। टिकट मूल्य और कैसे करें ऑनलाइन टिकटों की बुकिंग इस बार के मेले में लोगों को बेहतरीन सुविधा देने की व्यवस्था की गई है।  काउंटर के अलावा पेटीएम के सहयोग से मेले की टिकटों की बुकिंग की शानदार व्यवस्था की  गई है। आप आसानी से पेटीएम से टिकट्स बुक कर सकते हो। पर्यटकों को  असुविधा न हो इसके लिए प्रत्येक पार्किंग के पास टिकट काउंटर बनाया गया।  मेले की टिकट आम दिनों में ₹120, वहीं शनिवार और रविवार को टिकट की कीमत ₹180 रखी गई है। मेले की टाइमिंग सुबह 10 बजे से लेकर देर शाम तक है।(Surajkund International Crafts Mela) करीब 47 एकड़ में लगने वाले इस मेले में एंट्री करने के लिए पांच गेट बनाए गए हैं जिसमें लोकल सिटीजंस के लिए दो गेट, एक गेट वीआईपी एंट्री के लिए, एक गेट मीडियाकर्मियों की एंट्री के लिए और एक गेट स्टाफ वर्कर्स की एंट्री के लिए बनाया गया है। पूरे मेला स्थल को 18 सेक्टरों में बांटा गया है। फूड कोर्ट मेले के अंदर खाने पीने के लिए अलग फूड कोर्ट की व्यवस्था की गई है जहां आपको अलग-अलग राज्यों के लज़ीज और स्वादिष्ट पकवान खाने को मिलेंगे। जिसमें दिल्ली की मशहूर चाट, गोहाना की मशहूर जलेबी ,राजस्थान की कचोरी, जम्मू कश्मीर का फेमस चिकन और मटन, साउथ के उत्तपम डोसा, छोले भटूरे ,मटर कुल्चा आदि सारी चीजें मिल जायेंगी। युवाओं और बच्चों के लिए यहां पर एडवेंचर जोन की व्यवस्था भी की गई है। जिसमें तरह-तरह के झूले, निशानेबाजी, गुलेल बाजी और भी कई तरह के गेम्स की व्यवस्था की गई है।अगर आप सूरजकुंड मेले में जाए तो एडवेंचर जोन में जाना बिल्कुल भी ना भूले। सेल्फी प्वाइंट     मेले के अंदर कई जगह पर सेल्फी प्वाइंट भी बनाए गए हैं, जहां पर आप पौराणिक और सांस्कृतिक धरोहरों के साथ अपनी पिक्चर क्लिक करवा सकते हैं। पूरे मेले को अलग-अलग राज्यों की पौराणिक धरोहरों के साथ संजोया गया है। मेले के अंदर एक जगह हरियाणा की प्रसिद्ध चौपाल का इंतजाम भी है। जिसमें अलग-अलग राज्यों और बाहरी देशों के कलाकार अपने क्षेत्र के सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए मेले में पहुंचने वाले लोगों का मनोरंजन करते है और उन्हें अपनी सभ्यता और अपनी संस्कृति से रूबरू करवाते हैं। इसके अलावा आपको हर 10 कदम के बाद अलग-अलग राज्यों की झांकियां देखने को मिलेंगी, जिसमें कलाकार अपने लोकगीतों और लोकनृत्य को प्रस्तुत करते हैं और मेले में आने वाले लोगों को मस्ती में झूमने पर मजबूर कर देते हैं। मेले में अनेकों प्रकार के स्टॉल लगाए गए हैं जिसमें अलग-अलग राज्यों और अलग-अलग क्षेत्रों के हस्तशिल्पकारों द्वारा बनाए गए प्रोडक्ट्स जैसे कढ़ाई किए गए दुपट्टे, शॉल, सूट, अलग-अलग प्रकार के कपड़े, हिमाचली टोपी, कश्मीरी कालीन, राजस्थानी मोजड़ी, जूते और भी कई प्रकार की हैंड मेड चीजें आपको मिल जायेंगी। मेले के अंदर कश्मीरी थीम को ध्यान में रखते हुए वहां की परंपरा, वहां की संस्कृति को दर्शाया गया है। मेले में घूमने आए लोग यहां पर खूब फोटोग्राफी करते हैं।  मेले प्रशासन द्वारा जगह-जगह पर साफ पीने योग्य पानी की व्यवस्था भी की गई है जिससे कि मेले में आने वाले यात्रियों को गर्मी में राहत प्रदान हो। छाता या हैट साथ ले जाना बिल्कुल भी ना भूले आपको बता दें कि आजकल चिलचिलाती गर्मी से बचने के लिए आप अपना छाता या हैट अपने साथ अवश्य रखें और पानी की बोतल ले जाना बिल्कुल भी ना भूले। इससे आपको गर्मी से अवश्य राहत मिलेगी। क्योंकि यह मेला देर शाम तक चलता है इसलिए आप अपनी सुविधा और दिन में पड़ने वाली गर्मी से बचने के लिए शाम के समय भी यहाँ आ सकते हैं। (Surajkund International Crafts Mela) Photo Gallery – Surajkund Crafts Fair

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Red Fort- Delhi

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Red Fort- Delhi: लाल किला – देश की आन बान और शान का प्रतीक by Pardeep Kumar देश की आन बान और शान का प्रतीक लाल किला दिल्ली शहर का सबसे फेमस टूरिस्ट प्लेस है, जो हर साल यहां आने वाले लाखों पर्यटकों को अपनी और खूब आकर्षित करता है। यही वह प्रसिद्ध किला है, जहाँ से हर साल देश के प्रधानमंत्री 15 अगस्त के दिन यहां की प्राचीर से तिरंगा फहराते हैं और देश की जनता को सम्बोधित करते हैं। अगर पर्यटन स्थलों की बात की जाए तो लाल किला दिल्ली का सबसे बड़ा स्मारक भी है।(Red Fort, Delhi) इस ब्लॉग में आज हम आपको बताएंगे इस किले के ऐतिहासिक और राजनैतिक महत्त्व के साथ-साथ इसकी शानदार वास्तुकला और अद्भुत बनावट के बारे में। देश की राजधानी दिल्ली में स्थित यह लाल किला देश की आजादी का प्रतीक माना जाता है। भारतीय और मुगल वास्तुशैली से बने इस भव्य ऐतिहासिक किले का निर्माण पांचवें मुगल शहंशाह शाहजहां ने 1638 ईसवी में करवाया था। जो लगभग 10 साल निर्माण कार्य के बाद 1648 ईसवीं में बन कर तैयार हुआ। यमुना नदी के किनारे स्थित इस किले का अद्भुत सौंदर्य और आकर्षण देखते ही बनता है। (Red fort , Delhi) देश के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक यह ऐतिहासक स्मारक यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स में शामिल है। लाल किले के सौंदर्य, भव्यता और आकर्षण को देखने दुनिया के कोने-कोने से लोग आते हैं और इसकी शाही बनावट और अनूठी वास्तुकला की खूब प्रशंसा भी करते हैं। आपको बता दें यह शाही किला मुगल बादशाहों का न सिर्फ राजनीतिक केन्द्र था, बल्कि यह उनका औपचारिक केन्द्र भी हुआ करता था, जिस पर करीब 200 सालों तक मुगल वंश के विभिन्न शासकों ने राज किया। देश की जंग-ए-आजादी का भी गवाह रहा लाल किला मुगलकालीन वास्तुकला, सृजनात्मकता और सौंदर्य का अनुपम और अनूठा उदाहरण है। आपको बता दें कि शाहजहां, इस किले को उनके द्वारा बनवाए गए सभी किलों में बेहद आकर्षक और सुंदर बनाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने 1638 ईसवी में ही अपनी राजधानी आगरा को दिल्ली शिफ्ट कर लिया था, और फिर तल्लीनता से इस किले के निर्माण में ध्यान देकर इसे भव्य और आर्कषक रुप दिया था। शाहजहां ने आगरा में स्थित ताजमहल को भव्य रुप देने वाले डिजाइनर और मुगल काल के प्रसिद्ध वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी को इस किले की शाही डिजाइन बनाने के लिए चुना था। वहीं उस्ताद अहमद अपने नाम की तरह ही अपनी कल्पना शक्ति से शानदार इमारत बनाने में उस्ताद थे, उन्होंने लाल किले को बनवाने में भी अपनी पूरी विवेकशीलता और कल्पनाशीलता का इस्तेमाल कर इसे अति सुंदर और भव्य रुप दिया था। यही वजह है कि लाल किले के निर्माण के इतने सालों के बाद आज भी इस किले की विशालता और खूबसूरती के लिए विश्व भऱ में जाना जाता है। भारत का राष्ट्रीय गौरव समझे जाने वाले इस किले का इतिहास न केवल बेहद दिलचस्प है बल्कि यह किला अनेक लड़ाइयों का साक्षी भी रहा हैI इसी किले के कारण ही उस समय भारत की राजधानी दिल्ली को शाहजहांनाबाद कहा जाता था। कला प्रेमी, विशेषकर स्थापत्य कला प्रेमी शाहजहां के शासनकाल को मुग़ल शासन का स्वर्ण युग और भारतीय सभ्यता का सबसे समृद्ध काल भी कहा गया है। शाहजहां के बाद उसके बेटे औरंगजेब ने इस किले में मोती-मस्जिद का भी निर्माण करवाया था। लगभग 250 एकड़ में फैला यह शानदार किला मुगलों और अंग्रेजों के संघर्ष की कहानी भी बयां करता हैं। 17वीं सदी में करीब 30 साल तक यह लाल किला बिना शासक के रहा। 18वीं सदी में अंग्रेजों ने लाल किले पर अपना कब्जा जमा लिया और इसे किले में जमकर लूट-पाट की। भारत की आजादी के बाद सबसे पहले देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इस पर तिरंगा फहराकर देश के नाम संदेश दिया था। आजादी के बाद लाल किले का इस्तेमाल सैनिक प्रशिक्षण के लिए किया जाने लगा और बाद में दिसम्बर 2003 में, भारतीय सेना ने इसे भारतीय पर्यटन विभाग को सौंप दिया। इसके सौंदर्य, आर्कषण और भव्यता की वजह से इसे 2007 में वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स में शामिल किया गया था और आज इस ऐतिहासिक किले की खूबसूरती को देखने दुनिया के कोने-कोने से लोग इसे देखने दिल्ली जाते हैं। अपनी ऊँची-ऊँची और मजबूत दीवारों से घिरा यह किला करीब 250 एकड़ में फैला हुआ है। छत्ता चौक या बाजार इस किले के दो मुख्य द्वार है – दिल्ली दरवाज़ा एवं लाहौर दरवाज़ा। लाहौर दरवाज़ा इसका मुख्य प्रवेश द्वार है। इसके अन्दर प्रवेश करते ही आपको एक शानदार और आकर्षक बाजार दिखाई देगा जिसे छत्ता चौक या बाजार कहते हैं, छत्ता मतलब ढका हुआ। आप जैसे ही लाहौरी दरवाजे से किले में अंदर प्रवेश करते हैं तो आपको यह बाजार दिखाई देगा जिसमे दोनों तरफ दो मंजिला मेहराबदार दुकानें बनी हुई हैं जो शाही परिवार की रानियों और महिलाओं के लिए बनवाया गया था ताकि वो आसानी से यहाँ से खरीददारी कर सके। दोनों तरफ 32 कमरें बने हुए हैं जो आज भी दुकानों के रूप में प्रयोग किये जाते हैं। नक्कारखाना लाहौर गेट से छत्ता चौक तक आने वाली सड़क से लगे खुले मैदान के पूर्वी ओर नक्कारखाना बना है। यह संगीतज्ञों के लिए बनाये गए महल का मुख्य दरवाज़ा है। दीवान-ए-आम इस गेट के पार एक और खुला मैदान है, जो कि दीवाने-ए-आम का प्रांगण हुआ करता था। दीवान-ए-आम में बादशाह आम जनता से रूबरू होते थे। एक शानदार सिंहासन का छज्जा दीवाने आम के बीचों बीच बना था। यह बादशाह के लिए बनाया गया था जहाँ बैठ कर बादशाह जनता की फरियाद सुनता था। महल की योजना मूलरूप से इस्लामिक शैली में है, परंतु यहाँ बने मण्डप हिन्दू वास्तुकला को छाप छोड़ते हैं। ज़नाना महल के दो हिस्से महिलाओं हेतु बने हैं, जिन्हें जनाना कहते हैं: मुमताज महल, जो अब संग्रहालय बना हुआ है, एवं रंग महल, जिसमें सुवर्ण मण्डित नक्काशीदार छतें एवं संगमरमर के सरोवर बने हैं, जिसमें नहर-ए-बहिश्त से जल आता था और समस्त महल में पानी की पूर्ति होती थी। खास महल यही दक्षिण में एक और मण्डप है जिसे खास महल कहते हैं। इसमें शाही कमरे बने हैं। इनमें राजसी शयन-कक्ष, प्रार्थना-कक्ष, एक

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Tiger Camp Ramnagar

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Tiger Camp Ramnagar – नेचर लवर्स के लिए उम्दा रिजोर्ट ठहरने के लिए आपको रामनगर में बहुत-सी जगह मिल जाएँगी। कॉर्बेट पार्क के आसपास बहुत सारे होटल और रिज़ॉर्ट बजट के अनुसार पर्यटकों के लिए उपलब्ध हैं। लेकिन मैं राय दूंगा अगर आप प्रकृति प्रेमी हैं और दो-तीन दिन दुनिया के शोर शराबे से दूर बेहद इत्मीनान से बिताना चाहते हैं तो आप अच्छा-सा रिवर व्यू रिज़ॉर्ट पहले से बुक कर लें। जहाँ आप बहुत सारे एडवेंचर्स के बाद भी कम्फर्ट महसूस करेंगे। और इसके लिए आपके पास एक बेहतरीन ऑप्शन है -टाइगर कैंप रिज़ॉर्ट जो कि रामनगर और गर्जिया टेम्पल के बीचो बीच स्थित है। पहली नजर में, मैं रिसॉर्ट के ट्रेडिशनल स्टाइल, सुन्दर कॉटेज, बांस के पेड़ों से डेकोरेटेड हरे-भरे, आकर्षक रूप से मंत्रमुग्ध हो गया। टाइगर कैंप रिज़ॉर्ट की जो तस्वीरें मैंने ऑनलाइन देखी थी उसकी तुलना में यह कई गुना सुन्दर लग रहा था। रिज़ॉर्ट के अंदर कदम रखते, मैंने खुद को अब तक के सबसे भव्य नेचुरल इनडोर स्थान में पाया। फर्श और कालीनों से लेकर दीवार पर बेहद आकर्षक ढंग से लगी सुन्दर पेंटिंग्स तक सब कुछ सलीके से डेकोरेट किया गया था। (Tiger Camp Resort Ramnagar) मेरे लिए रिसेप्शन डेस्क पर चेक इन करना एक सुखद अनुभव था। रिसेप्शनिस्ट ने बड़ी संजीदगी और गर्मजोशी से सभी चेक इन से संबंधित औपचारिकतायें पूरी की। पूरी तरह प्रोफेशनल होने के बावजूद बेहद को-ऑपरेटिव। इस रिज़ॉर्ट की सबसे बड़ी खासियत जो यहाँ एक बार आ चुके गेस्ट को बार-बार आने को मजबूर कर देती है वो है यहाँ का लाज़वाब और स्वादिष्ट खाना। रिज़ॉर्ट के बीचों बीच स्थित यहाँ के रेस्तरां में इतनी विविधता है, कि इसे संभालना किसी के लिए लगभग कठिन-सा है। लेकिन यहाँ बड़ी शिद्द्त से सभी तरह की वैरिएशंस का ख्याल रखा जाता है।  यहाँ के व्यंजनों में शामिल हैं: चीनी, भारतीय, इतालवी, आयरिश और पश्चिमी। इतने तरह के व्यंजन होने के बावजूद हर व्यंजन में अद्भुत स्वाद। सच में यहाँ के लाजवाब शेफ को सलाम ! अगर रेस्तरां के स्टाफ की बात करें तो सभी के सभी अपने मृदु व्यवहार से आपका दिल जीत लेते हैं। सीरियसली स्वादिष्ट खाने के अलावा यहाँ के स्टाफ का गेस्ट के प्रति सम्मानजनक रवैया आकर्षित करता है। यहाँ रेस्तरां में हर रोज अलग-अलग व्यंजन बनाये जाते हैं। बुफे बेहद करीने से सजाये जाते हैं। लंच और डिनर में वेज के अलावा नॉन वेज का भी ऑप्शन है। वेटर जो सबको मुस्कुराते हुए खाना परोसते हैं तथा आप चाहे तो वातानुकूलित कमरों/ कॉटेज में भी भोजन कर सकते हैं। इसके लिए आपको उन्हें पहले से सूचित करना पड़ेगा। रिज़ॉर्ट में कैफ़े के साथ में एक छोटा-सा लॉन है जहां रोजाना शाम को सात बजे यहाँ आने वाले गेस्ट के लिए प्रोजेक्टर पर जिम कॉर्बेट की डाक्यूमेंट्री दिखाई जाती है। चारों तरफ सलीके से लगाई गयी कुर्सियों पर बैठ कर आप डॉक्यूमेंट्री का आनंद ले सकते हैं। उसके बाद एक प्रोफेशनल गिटारिस्ट आपकी फरमाइश पर बॉलीवुड के सुन्दर नग्में सुनाता है। ढलती शाम के साथ रोमांटिक गाने आपको यकीनन थिरकने पर मजबूर कर देंगे। म्यूजिक का यह सिलसिला डिनर के साथ रात दस बजे तक चलता है। Tiger Camp Resort Ramnagar रिज़ॉर्ट में स्पोर्ट्स क्लब, हॉस्पिटैलिटी लाउंज और स्विमिंग पूल जैसी अन्य मज़ेदार सुविधाएं और गतिविधियाँ हैं। यहाँ आने वाले हर ऐज ग्रुप के लिए और उन्हें व्यस्त रखने के लिए यहां टेबल टेनिस, बैडमिंटन और कैरम जैसी बेहतरीन सुविधायें है। ख़ूबसूरती से डिज़ाइन किये गए स्विमिंग पूल में छोटे बच्चों से लेकर वयस्क तक नहाने के अलावा वाटर स्पोर्ट्स का भी खूब आनंद ले सकते हैं। Tiger Camp Resort Ramnagar Tiger Camp Resort Ramnagar Tiger Camp Resort Ramnagar बाकी यहाँ के हाउस कीपिंग स्टाफ का काम भी काबिलेतारीफ है। आपको सभी कॉटेज बिल्कुल नीट और क्लीन मिलेंगे। वाशरूम  से लेकर रूम तक सब कुछ हाईजेनिक। हर कॉटेज के बाहर बरामदा है जिसमें सोफे, चेयर और टेबल लगाए गए हैं।  एक तरह से आपके क्वालिटी टाइम के हिसाब से यहाँ सब तरह के कम्फर्ट का ध्यान रखा गया है। साथ में आप सुबह की सैर यहाँ के बड़े-बड़े घास के लॉन में कर सकते हैं। इस रिज़ॉर्ट में पेड़ों की विभिन्न प्रजातियां देखने को मिलेंगी जिसके बीच में से आप पगडंडी के रास्ते होते हुए नदी तक पहुँचते हैं। Tiger Camp Resort Ramnagar Tiger Camp Resort Ramnagar Tiger Camp Resort Ramnagar Tiger Camp Resort Ramnagar इस रिज़ॉर्ट की सबसे बड़ी खासियत जो रामनगर में कुछ ही रिज़ॉर्ट के पास है वो है रिवर व्यू। रिज़ॉर्ट में आप सनराइज के समय कल-कल बहती नदी की धाराओं का इत्मीनान से आनंद ले सकते हैं। नदी के किनारे पानी में अपने पैर डालकर आप यहाँ घंटों गुजार सकते हैं। साथ में सुबह की चाय का मजा इससे बेहतर तो कहीं मिल नहीं सकता। नेचर लवर्स के लिए ये यहाँ का सबसे खूबसूरत पॉइंट है। यह रिज़ॉर्ट इतना सुन्दर और बड़ा है कि आप एक दिन तो आराम से सिर्फ यहीं गुजारना पसंद करेंगे। Tiger Camp Resort Ramnagar Tiger Camp Resort Ramnagar टाइगर कैंप रिज़ॉर्ट के लिए आप ऑनलाइन बुकिंग करवा सकते हैं। वकेशंस और वीकेंड पर रिज़ॉर्ट लगभग फुल रहता है इसलिए कम से कम एक सप्ताह पहले आप अपनी कॉटेज अवश्य बुक कर लें। समय-समय पर रिज़ॉर्ट की तरफ से यहाँ स्टे के लिए आकर्षक ऑफर भी दिए जाते हैं। Review by Five Colors of Travel

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Sukhna Lake-चंडीगढ़

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Sukhna Lake-चंडीगढ़ की मशहूर झील by Pardeep Kumar दोस्तों, आज इस ब्लॉग में हम आपको बताने वाले हैं चंडीगढ़ की मशहूर सुखना झील के बारे में। इससे पहले कि हम आज के सफर में आगे बढ़े, आप यह अवश्य जान लें कि इस शहर की एक नहीं, दो नहीं बल्कि कई खासियते हैं। अक्सर हम इस शहर को हिंदी पंजाबी गानों या फिल्मों में देखते हैं। जितनी खूबसूरत ये सिटी आपको स्क्रीन पर दिखाई जाती है यकीन मानिए यह देखने में उससे भी कहीं ज्यादा खूबसूरत है। बेहद ही तरतीब से बसाया गया यह शहर शांत वातावरण और हरियाली के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। (Sukhna Lake) वहीं शिवालिक रेंज की तलहटी में सुंदर सुखना झील प्रकृति के साथ एक शांत, क्वालिटी टाइम स्पेंड करने और वॉटर राइड्स जैसे एडवेंचर्स के लिए एक बेस्ट डेस्टिनेशन है। सुखना झील एक मानव निर्मित झील है जिसे 1958 में ले कोर्बुसीयर और पी एल वर्मा द्वारा निर्मित किया गया था। कॉर्बूसियर ने सोचा था कि शहर के निवासी इसे ‘शरीर और आत्मा की देखभाल’ के लिए आकर्षित करेंगे। चंडीगढ़ शहर के योजनाकार इस झील से गहराई से जुड़े हुए थे। सुखना झील चंडीगढ़ में 3 वर्ग किलोमीटर में फैली वर्षा आधारित झील है। सन 1958 में शिवालिक पहाड़ियों से नीचे आने वाली मौसमी धारा सुखना चो को बांधकर बनाई गई थी। मूल रूप से मौसमी प्रवाह सीधे झील में प्रवेश करता है जिससे भारी गाद निकलती है। गाद के प्रवाह को रोकने के लिए जलग्रहण क्षेत्र में लगभग 25.42 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण किया गया और 1974 में, चो को मोड़ दिया गया और झील को पूरी तरह से बाय-पास कर दिया गया। जब भी आप अपनी फैमली या फ्रेंड्स के साथ सुखना झील आयेंगे तो झील के किनारे क्वालिटी टाइम स्पेंड कर सकते है। अद्भुद नजारें और वाटर एक्टिविटीज झील में बोट राइड एक्टिविटीज के अलावा आप शिकारा की सवारी भी एन्जॉय कर सकते है। यदि आप डेली की बिजी और थकान भरी लाइफ से दूर कुछ समय अपनी फैमली के साथ रिलेक्स करते हुए स्पेंड करना चाहते हैं तो आपको पूरे एक दिन के लिए सुखना लेक जरूर आना चाहिए। यकीन मानिये सुखना लेक चंडीगढ़ का  शांतिप्रिय वातावरण, अद्भुद नजारें और यहाँ की वाटर एक्टिविटीज आपको तरो ताजा कर देंगी। कैफेटेरिया की सुविधाएं बता दे झील के पास एक फेमस केफे भी है जिसे सिटको  कैफेटेरिया के रूप में जाना जाता है जिसमें इनडोर और आउटडोर दोनों बैठने की जगह है। जहाँ आप अपने फ्रेंड्स के साथ कॉफ़ी, चाय या ब्रेक फ़ास्ट कर सकते है। झील के आसपास के क्षेत्र में भी छोटे क्यूरियस खरीदने के लिए स्मारिका दुकानें हैं यहाँ शोपिंग करके आप अपनी ट्रिप को मेमोरिबल बना सकते है। अगर आप इस झील पर ज्यादा कुछ करना नहीं चाहते’ तो बस एक काम कीजिये इसके किनारे पर बैठकर सूर्यास्त का मज़ा लीजिये। झील के दक्षिण में एक गोल्फ कोर्स और इसके पश्चिम में प्रसिद्ध रॉक गार्डन है। झील के बाहर पर्यटकों को ऊंट की सवारी भी कराई जाती है, यदि आपने अभी तक की ऊंट की सवारी नही की हैं तो आप यहाँ ऊंट की सवारी का अनुभव भी ले सकते है। सबसे महत्वपूर्ण बात यदि आप पूरे 1 दिन की ट्रिप पर हैं तो सूर्यास्त होने तक यहाँ जरूर रुकें क्योंकि सूर्यास्त के अद्भुद और अविस्मरणीय नजारों के साथ अपनी ट्रिप खत्म करने से बेहतर कुछ हो ही नही सकता है। एंट्री शुल्क आपको बता दें कि यहां एंट्री करने का कोई भी शुल्क नहीं है उसके पश्चात आप यदि बोटिंग करना चाहते हैं या कुछ खाना पीना चाहते हैं तो उसके लिए आपको काउंटर पर जाकर एक कार्ड बनवाना होगा जिसका इस्तेमाल आप हर दुकान पर हर चीज के लिए कर सकते हैं। किस समय जाएँ सुखना झील घूमने के लिए आप किसी भी समय जा सकते हैं गर्मियों में ठंडी हवा खाने और सर्दियों में खिली-खिली धूप का आनंद लेने आप यहां पहुंच सकते हैं, यहां जाने का सबसे उचित समय सूर्योदय और सूर्यास्त का है क्योंकि दिन की गर्मी में यहां ज्यादा देर घूम पाना काफी मुश्किल है। सुखना झील कैसे पहुंचे हवाई अड्डा शहर से 11 किमी दूर है। हवाई अड्डे के स्थानांतरण के लिए टैक्सी उपलब्ध हैं। इंडियन एयरलाइंस, जेट एयरवेज और एयर डेक्कन चंडीगढ़ को राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली से जोड़ता है।चंडीगढ़ राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली और अन्य बड़े शहरों से रेल द्वारा जुड़ा हुआ है। चंडीगढ़ रेलवे स्टेशन सेक्टर 17 में शहर के केंद्र से 8 किलोमीटर दूर है। चंडीगढ़ सड़क मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है और लगभग हर बड़े और छोटे शहरों से यहां के लिए बस आती जाती रहती है।

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Gorakhnath Temple

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Gorakhnath Temple: गोरखपुर के गोरखनाथ बाबा का प्रसिद्ध मंदिर -जहाँ मिलता हैं हर दिल को सुकून भारत ऋषि-मुनियों और साधु-संतों का देश है। यही कारण है कि भारत को विदेशों में आज विश्व गुरु के नाम से भी जानते हैं। देश योग गुरू बनने की ओर भी अग्रसर है। बाबा रामदेव का नाम आज योग की दुनिया में सबसे पहले लिया जाता है।  फाइव क्लर्स आफ ट्रैवल की टीम आज आपको एक ऐसे योग साधक से रूबरू करवाएगी, जिसका इतिहास 1000 साल से भी ज्यादा पुराना है। ऐसा भी कहा जाता है कि भारत में योग की शुरुआत इन्ही से शुरू हुई थी। (Gorakhpur Temple) गोरखनाथ बाबा के बारे में कौन नहीं जानता है। गोरखनाथ बाबा नाथ संप्रदाय के प्रमुख प्रचारक थे यानी कि नाथ संप्रदाय को जो प्रसिद्धि हासिल हुई थी, उसमें गोरखनाथ बाबा का बहुत बड़ा श्रेय है। नाथ संप्रदाय का सबसे प्रमुख चेहरा गोरखनाथ बाबा को ही माना जाता है। गोरखनाथ मंदिर शहर के बीचो-बीच स्थित है और यह मंदिर लगभग 52 एकड़ जमीन पर फैला हुआ है। गोरखनाथ मंदिर जाने की शुरुआत खिचड़ी (मकर सक्रांति) के दिनों में होती है। यह मेला खिचडी से शुरू होता है और फरवरी के अंत तक रहता है, क्योंकि यहां पर जाने का ज्यादा फायदा इन्हीं दिनों में होता है। खिचड़ी के दिन से ही यहां पर भव्य मेला लगता है। रोज कई हजारों की संख्या में लोग यहां पर घूमने के लिए आते हैं। (Gorakhpur Temple) पार्किंग की सुविधा वैसे तो इस मंदिर के कई गेट हैं। अगर आप साधारण दिनों में आते हैं तो आप अपनी गाड़ी मंदिर के बाहर खड़ी कर सकते हैं। अगर आप मेले के दिनों में आते हैं तो आपको बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि इस तरह गाड़ी मंदिर के बाहर खड़ी करना आपको भारी भी पड़ सकता है। मुख्य द्वार से कुछ दूरी पर ही एक पार्किंग स्थल है। जहाँ आप अपनी गाड़ी पार्क कर बेफिक्र होकर मंदिर में प्रवेश कर सकते हैं। मेले के दिनों में अगर आप मंदिर में एंट्री करना चाहते हैं तो आपको मुख्य द्वार से ही एंट्री करनी होगी है। क्योंकि मेले में लोगों की संख्या और सुरक्षा कारणों को देखते हुए मुख्य द्वार से ही एंट्री दी जाती है। खिचडी चढ़ाने की परंपरा मंदिर में मकर सक्रांति के समय प्रसाद के तोर पर खिचड़ी चढ़ाई जाती है। यूपी, बिहार, नेपाल सहित अन्य राज्य से लाखों भक्त खिचड़ी चढ़ाने आते हैं। गोरखनाथ में पहली खिचड़ी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ चढ़ाते हैं। खिचड़ी चढ़ाने की ये परंपरा काफी पुरानी है। हिंदू मान्यताओं के मुताबिक त्रेता युग में गुरु गोरखनाथ हिमाचल के कांगड़ा में स्थित ज्वाला देवी मंदिर गए थे। यहां देवी ने उन्हें दर्शन देते हुए भोज पर आमंत्रित किया। कई प्रकार के व्यंजन देखकर गोरखनाथ ने ज्वाला देवी से कहा कि वह भिक्षा में मिले दाल चावल ही खाते हैं। इसलिए उनके लिए दाल चावल ही लाएं, तब ज्वाला जी ने गोरखनाथ को खिचड़ी बनाकर खिलाई थी। इसके बाद गोरखनाथ भिक्षाटन करते हुए बाबा गोरखनाथ राप्ती नदी के पास पहुंचे और यहां साधना में लीन हो गए। लोग उनके पात्र में चावल और दाल डालते थे, लेकिन उनका पात्र नहीं भरता था। तब से गुरु गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा है। मेले में लोगों की इतनी अधिक भीड़ रहती है कि वहां पर पैर रखने तक की भी जगह नहीं मिलती। आपको मेले में कई तरह के झूले दिखाई देंगे। झूले का स्वाद लेने के लिए लोगों को पहले से ही लाइन में लगना पड़ता है, क्योंकि- झूले झूलने वालों की संख्या बहुत अधिक रहती है। इसलिए आप सोच सकते हैं कि यह मेला गोरखपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों के लिए कितना ज्यादा मायने रखता है। (Gorakhpur Temple) मंदिर का इतिहास गोरखपुर का गोरखनाथ मंदिर भारत के पुराने मंदिरों में से एक माना जाता है। यह मंदिर नाथपीठ का मुख्यालय भी है। इस समय गोरखनाथ मंदिर के पीठाधीश्वर सीएम योगी आदित्यनाथ हैं। साथ ही यह मंदिर नाथ योगियों का महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां योग साधना और तपस्या सिखाई जाती है। मुगल काल के दौरान मंदिर को कई बार तोड़ा गया था। ऐसा माना जाता है कि मंदिर के वर्तमान ढांचे के निर्माण 19वीं सदी में दिग्विजय नाथ और अवेद्यनाथ ने करवाया था। मंदिर को लेकर ऐसी जनश्रुति है कि ज्वालामुखी के स्थान से परिभ्रमण करते हुए गोरक्षनाथ ने राप्ती के तटवर्ती क्षेत्र में तपस्या की थी और यहां उसी स्थान पर अपनी दिव्य समाधि लगाई थी, जहां वर्तमान में श्री गोरक्षनाथ मंदिर स्थित है। मंदिर के आसपास साज-सज्जा का विशेष ध्यान रखा गया है। आप मंदिर के पास बने तलाब में बोटिंग का भी आनंद ले सकते हैं। बोटिंग का मूल्य बहुत अधिक नहीं है आप आसानी से 30 से 60 रुपए में यहाँ बोट में घूमने  का आनंद ले सकते हैं। तालाब में आपको सफ़ेद बत्तख भी तैरती दिखाई देती हैं जिससे तालाब की सुंदरता और अधिक बढ़ जाती है। मंदिर के पास ही आपको एक छोटा सा और मंदिर मिल जाएगा। प्रवेश करेंगे तो आपको कई सारे योगियों की मूर्ति बने हुए मिल जाएगी। हालांकि यहां पर फोटो खींचने में वहां के कर्मचारियों द्वारा मनाही की जाती है मगर फिर भी चुपके से फोटो ले सकते हैं ऐसे भी मना ही नहीं थी। महंत दिग्विजय नाथ स्मृति भवन बाहर से देखने पर महंत दिग्विजय नाथ स्मृति भवन एक भव्य महल दिखाई देता है। जब आप अंदर प्रवेश करेंगे वहां आपको एक लाइन से सैकड़ों मूर्तियां बनी हुई दिखाई देंगी। इतनी बड़ी संख्या में एक साथ मूर्तियों का होना एक अलग किस्म का ही एहसास दिलाता है। गोरखपुर मंदिर के अंदर साज सज्जा और इसकी सजावट सच में बिल्कुल अद्भुत है। मंदिर के पास  बाजार में आप खरीदारी भी अच्छी कर सकते हैं क्योंकि आमतौर पर यहाँ किफायती रेट पर ही सामान मिलता है। आप बिना तोलमोल किए भी कम रुपए में अच्छा सामान खरीद सकते हैं। कैसे पहुंचे गोरखनाथ मंदिर अगर आप गोरखपुर रेलवे स्टेशन से गोरखनाथ मंदिर जाते हैं तो मात्र 3 किलोमीटर की दूरी तय करनी होगी। आप आसानी से कैब या ऑटो रिक्शा की सहायता से मंदिर पहुंच सकते हैं। अगर आप हवाई यात्रा से गोरखपुर पहुंचते

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Kurukshetra – शेख चिल्ली का मकबरा

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Kurukshetra – शेख चिल्ली का मकबरा: हरियाणा का ताज महल कुरुक्षेत्र को कौन नहीं जानता। मगर कुरुक्षेत्र को लोग जानते भी हैं तो केवल महाभारत के युद्ध की वजह से। शायद ही कोई जानता होगा कि यहां पर मिनी ताजमहल भी है। अब आप सोच रहे होंगे कि ताज महल तो आगरा में है फिर कुरुक्षेत्र में कहां से आ गया। इतना सोचने की जरूरत नहीं है इसे केवल हरियाणा का मिनी ताजमहल कहा जाता है। अपने नए सफर में फाइव कलर्स ऑफ ट्रैवल की टीम आज आपको ऐसी ही जगह का दीदार करवाएगी जो देखने में सैंकड़ों सालों बाद भी आगरा के ताज महल की तरह आकर्षक दिखता है। (Sheikh Chilli Tomb, Kurukshetra) पवित्र गीता की जन्मस्थली कुरुक्षेत्र सिर्फ महाभारत, शक्तिपीठों ओर दूसरे हिंदू धर्म स्थलों के लिए ही नहीं, शेख चिल्ली के मकबरे के लिए भी प्रसिद्ध है। यही कारण है कि शेख चिल्ली के मकबरे को देश के प्रमुख राष्ट्रीय स्मारकों में शुमार हरियाणा का ताजमहल भी कहा जाता है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि राजधानी दिल्ली से अमृतसर के बीच इसके अलावा कोई भी ऐसा स्मारक नहीं है जिसमें शाहजहां के समकालीन संगमरमर का प्रयोग किया गया हो। शेख चिल्ली के कार्टून और चुटकुले तो बचपन में बहुत सुने थे। मगर मकबरे के बारे में पहली बार सुना था। शेख चिल्ली के मकबरे का नाम सुनते ही वहां पर जाने को लेकर मन में खलबली मचना स्वाभाविक है।  शेख चिल्ली का मकबरा कुरुक्षेत्र के थानेसर में स्थित है। शेख चिल्ली के मकबरे तक पहुंचने के लिए आपको कड़ी मशक्कत करने की जरूरत नहीं है। किसी भी ऑटो चालक से बात करके वहां पर आसानी से पहुंच सकते हैं। बाहर से देखने पर मकबरा महल लग रहा था। क्योंकि मकबरे की दीवारें बहुत बड़ी-बड़ी थी, लग ही नही रहा था कि यहां पर किसी सूफी संत का मकबरा है। पार्किंग की सुविधा की बात करें तो वहां पर पार्किंग की सुविधा बहुत अच्छी है। गेट के अंदर प्रवेश होते ही सबसे पहले टिकट लेनी होती है। आप टिकट कैश से भी प्राप्त कर सकते हैं और ऑनलाइन पेमेंट के माध्यम से भी टिकट ले सकते हैं। टिकट का मूल्य ज्यादा नहीं है, मात्र 25 रूपये ही टिकट का मूल्य है। हालांकि विदेशी पर्यटकों  के लिए 100 रुपए इसका मूल्य रखा गया है।  आप टिकट लेकर जैसे ही अंदर प्रवेश करेंगे सामने ही खूबसूरत सा पार्क और वहां का मनमोहक वातावरण एक बार तो आपके दिल को छू लेगा। हालांकि शेख चिल्ली का मकबरा अंदर से बहुत ज्यादा बड़ा नहीं था, मगर फिर भी  दिल को सुकून दे रहा था। शेख चिल्ली का इतिहास दारा शिकोह अपने अध्यात्मिक गुरु शेखचिल्ली का बहुत सम्मान करते थे। उनके सम्मान में यह मकबरा बनवाया गया था। सूफी संत शेख चिल्ली का असली नाम सूफी अब्द उर रज्जाक था। वह शेख चिल्ली के नाम से अधिक लोकप्रिय थे। वह अपनी बुद्धिमत्ता और उदारता के लिए जाने जाते थे। शेख चिल्ली मुगल राजकुमार दारा शिकोह  के गुरु थे। शाहजहाँ खुद उनका बहुत सम्मान करते थे। कहा जाता है कि मुगल बादशाह शाहजहां के बेटे शिकोह शेख चिल्ली के बहुत बड़े प्रशसंक थे। उनसे उन्होंने कई महत्वपूर्ण बातें सीखीं। उन्हें अब्द उर रहीम, अलैस अब्द उई करीम, अलैस अब्द उर रज्जाक के नाम से भी जाना जाता था। उस समय के लोगों का मानना था कि वह एक महान दरवेश था। ऐसा माना जाता है कि शेख चिल्ली का जन्म बलूचिस्तान की एक खानाबदोश जनजाति में हुआ था। यही घुमक्कड़ पन उन्हे भारत ले आया। वैसे शेख चिल्ली ऐसी कहानियों के नायक हैं, जो बार-बार आम लोक जीवन के संघर्षों पर विजय प्राप्त करती हैं। मकबरे को देखने के लिए  आम तौर पर बहुत ज्यादा भीड़ नहीं होती, लेकिन फिर भी देखने वालों की संख्या बहुत कम भी नहीं कह सकते। यहाँ पर असली नजारा तो ऊपर की ओर जाने के बाद मिलता है। महान संत की कब्र मकबरे के निचले सदन में बिल्कुल केंद्र में स्थित है। इस मकबरे के ठीक बगल में संत की पत्नी की भी कब्र है। मकबरे के प्रत्येक ओर प्रवेश द्वार के भांति मेहराब बना है जो संगमरमर निर्मित जालियों से सुसज्जित है। मकबरे की चारों दिशाओं में बाहर की और छतरिया बनी है जिसके गुंबद पर हरे, पीले, नीले ओर जामुनी रंग की चमकदार टाइल्स से निर्मित विभिन्न प्रकार की ज्यामिति आकृतियां देखी जा सकती हैं। मकबरे के पीछे नजर घुमाने के बाद  एक बड़ा सा हरा भरा ग्राउंड खूबसूरती का एक अलग ही नज़ारा पेश कर अपनी और आकर्षित करता है। अभी मकबरे के अंदर बने म्यूजियम में घूमना बाकी था। (Sheikh Chilli Tomb) अगर आप इतिहास के प्रेमी हैं और प्राचीन चीजों को देखने में दिलचस्पी रखते हैं तो आपके लिए यह मकबरा सोने पर सुहागा है, क्योंकि इस मकबरे के म्यूजियम के अंदर आपको पहली शताब्दी से लेकर 19वीं शताब्दी तक की काफी पुरानी चीजें देखने को मिलेंगी। (Sheikh Chilli Tomb) राहत वाली बात यह है कि म्यूजियम के अंदर जाने के लिए किसी भी तरह की टिकट नहीं लगती है। आप म्यूजियम के अंदर जितना चाहे उतना समय बिता सकते हैं। मगर म्यूजियम के अंदर की चीजों को आप बिल्कुल भी छू कर नहीं देख सकते। चारों तरफ गार्ड का पहरा होता है। गार्ड आप पर नजर गड़ाय रहते हैं ताकि कोई किसी भी तरह का नुकसान ना पहुंचा सके। आप चाहो तो कैमरे में सभी खूबसूरत नजारों को कैद कर सकते हैं। म्यूजियम के अंदर आपको कुषाण,  गुप्त,  उत्तर गुप्त या वर्धन, राजपूत, सल्तनत और मुगल काल की प्राचीन वस्तुएं देखने को मिलेंगी। मात्र 25 रूपये में प्राचीन चीजों को देखना साथ में मकबरे में घूमना, किसी सपने से कम नहीं। राजा हर्ष का टीला आपको बिल्कुल मकबरे के साथ ही राजा हर्ष का टीला भी देखने को मिलेगा। हालांकि राजा हर्ष के टीले में अंदर जाने की अनुमति नहीं है। मगर आप शेख चिल्ली के मकबरे के ऊपर से ही राजा हर्ष के टीले का नजारा देख सकते हैं। अगर आप कुरुक्षेत्र के 200  किलोमीटर के दायरे में हैं  तो आप एक दिन में आना जाना कर सकते हैं। यदि आप 200 किलोमीटर के दायरे से बाहर हैं

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Jama Masjid Best Non Veg Street Food Places

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Jama Masjid Street Food: जामा मस्जिद के सामने बरसों पुरानी गली के इन प्रसिद्ध लज़ीज व्यंजनों का जायका कभी नहीं भूल पाएंगे by Pardeep Kumar दिल्ली ज़ायकों का शहर है।  दिल्ली के हर कोने में आपको खाने के शौक़ीन लोगों के लिए कोई न कोई ज़ायका ऐसा जरूर मिल जाएगा जो मुद्दतों  से यहां के लोगों के ज़ेहन में अवश्य बसा होगा।(Jama Masjid Street Food) मुकम्मल तहज़ीब की सबसे खास जगह लगभग 3000 साल पुरानी दिल्ली की पेचीदा तारीखों में गोते लगाने के बजाए ग़ालिब के दौर से दिल्ली को समझने की कोशिश करते हैं। दरअसल यही वह दौर था जिसकी निशानियां दिल्ली के मिज़ाज की छोटी-मोटी गवाहियां देती आज भी दिखाई देती हैं और इन्हीं  झरोखों से देखते हैं,  बरसों  से फलते फूलते आ रहे बाजार जामा मस्जिद को। जी हां, दिल्ली का सबसे मोहब्बत भरा बाजार। हम बात कर रहे हैं जामा मस्जिद के गेट न. एक के सामने बने पुराने बाजार की जो सिर्फ एक बाजार नहीं बल्कि मुकम्मल तहज़ीब की सबसे खास जगह है।  जहां का ज़ायका सैकड़ों सालों से खाने के शौकीन लोगो के जेहन में मिठास घोल रहा है।(Jama Masjid Strrt Food) इस ब्लॉग में हम आपको बताएंगे अपने नए डेस्टीनेशन जामा मस्जिद के बिल्कुल सामने बने इसी बाजार के बारे में। जहां की पुरानी और तंग गलियों में तबीयत को खुश कर देने वाला मुगलाई ज़ायका पैदा होता है। और यह ज़ायका किसी त्यौहार या विशेष दिनों में नहीं बल्कि सारा साल आपको जश्न में डुबोए रखता है। खाने के शौकीन लोग यहां तमाम तरह की बिरयानी, कबाब, कोरमा, शिरमा, जर्दा, और रोटियों का लुत्फ उठा सकते हैं। तो चलिए अपने फूड ब्लॉग की शुरुआत करते हैं और निकलते हैं एक ऐसे सफर पर जहां आपको रूबरू करवाएंगे कुछ ऐसे ही मशहूर पुश्तैनी और लजीज जायकों से। दोस्तों अगर खाने में ज़ायके की बात करें और वो भी दिल वालों के दिल्ली की, तो चांदनी चौक और जामा मस्जिद का नाम सबसे पहले लिया जाता है। चांदनी चौक में जहां अधिकतर आपको शाकाहारी खाना दिखाई देगा, तो वही जामा मस्जिद के सामने पुरानी गली में आपको अधिकतर नॉन वेज फ़ूड दिखाए देगा जो दुनिया भर में मशहूर है। आज हम आपको लेकर आए हैं देश की सबसे बड़ी और सबसे प्रसिद्ध मस्जिदों में से एक जामा मस्जिद के सामने सदियों से अपने स्वाद के लिए मशहूर बाजार में। और किस्मत से इस बार हमारा सफर पूरा हुआ रमजान के पाक महीने में, जब सारा जामा मस्जिद एरिया खूबसूरती से सजा हुआ दिखाई दिया। दिल्ली के स्वाद की बात जामा मस्जिद एरिया के बगैर अधूरी है। स्ट्रीट फूड और खास करके चिकन- मटन के शौकीन हो तो आप एक बार यहां जरूर आइए। जामा मस्जिद के पास में नॉन वेज की कुछ ऐसी दुकानें हैं जो अपने लजीज व्यंजनो के लिए खूब जानी जाती है। जामा मस्जिद के गेट नंबर दो के बिल्कुल सामने सैंकड़ों बरसों  से लग रहे मीना बाजार के शोरगुल और भीड़-भाड़ वाले माहौल से गुजरते हुए हमारे कदम बढ़ चले थे उस बेहद खास गली की तरफ जहां खाने के मुरीदों  के चेहरों पर एक अलग ही रौनक दिखाई देती है। कैसे पहुंचे आप यहां मेट्रो, बस या कैब से भी आ सकते हैं। लाल किले के बिल्कुल सामने आपको जायकों का यह ठिकाना आसानी से मिल जाएगा। एमसीडी  की पार्किंग में आप अपनी कार को पार्क कीजिए और पैदल ही निकल पड़िए पुरानी दिल्ली की गलियों का आनंद लेते हुए। जामा मस्जिद के गेट नंबर 1 के सामने बरसों से अपने मुगलाई ज़ायकों के लिए मशहूर यह गली बाहें फैलाए आपका इस्तकबाल करती है।  और अगर किस्मत से रमजान का पाक महीना हो तो समझ लीजिए आप जन्नत में हैं। सबसे पहले गली में एंट्री करते ही हमें दिखाई दिया मोहब्बत का शरबत। मोहब्बत का शरबत अमूल प्योर दूध में गुलाब जल, रूह अफ़ज़ा और तरबूज के बारीक-बारीक पीस मिलाकर बना यह शरबत सच में आपको मोहब्बत का रूहानी एहसास करा देगा। जामा मस्जिद का दीदार करने आने वाले यहां आकर मोहब्बत का शरबत अवश्य चखते हैं। तरबूज के बारीक पीस शरबत को जायकेदार बनाने का बाखूबी काम करते हैं। मजहब चाहे कोई भी हो हर किसी को यहां का यह मोहब्बत का शरबत अपना मुरीद बना ही लेता है। जामा मस्जिद एरिया की शान- शाही टुकड़ा आप इसी गली में एक दो दुकानें छोड़कर आगे बढ़ेंगे तो आपका दशकों से जामा मस्जिद एरिया की शान- शाही टुकड़ा भी दिखाई देगा। हमें एक बेहद तरतीब और स्वच्छता से अपनी ओर खींचती दुकान दिखाई दी और हमारे कदम बढ़ चले शाही टुकडे की ओर। वहां जो शख्स दिखाई दिए उन्होंने अपना नाम तशनीन  बताया। उन्हीं से बातचीत के सिलसिले में हमें पता चला शाही टुकडे की बनावट के बारे में। प्योर दूध, खोए और ड्राई फ्रूट से बना यह स्पेशल फूड सही मायने में शाही कहलाने लायक लगा। उन्होंने हमसे ₹60 लिए और बड़ी ही मोहब्बत के साथ शाही टुकडे की एक प्लेट हमें दी। साथ में शाही टुकडे के साथ रबड़ी भी जायके को और स्वादिष्ट बनाने के लिए अपनी ओर से कंप्लीमेंट्री तौर पर ऑफर की।  रबड़ी के साथ शाही टुकडे का स्वाद लाज़वाब लगा। रमजान के महीने में यह शाही टुकड़ा खाने दूर-दूर से लोग यहां आते हैं, वैसे यह गली मशहूर है अपने नॉनवेज फूड के लिए, अगर आप नॉनवेज खाने के शौकीन हैं तो समझ लीजिए आप बिल्कुल मुकम्मल जगह पर हैं। जैसे-जैसे आप इस गली में आगे बढ़ेंगे आपको हर दूसरी दुकान पर कुछ पुराना और नायाब दिखाई देगा। कहीं लॉन्ग चुरी के शाकाहारी पकोड़े तो कहीं मुगलई चिकन आपको दिखाई देगा।  क्योंकि यह रमजान का महीना है इसलिए आपको यहां पर बहुत सारी दुकानों पर फेनी खरीदते हुए भी लोग दिखाई देंगे। असलम का बटर चिकन शाम का समय हो रहा था इसलिए गली में भीड़ भी लगातार बढ़ रही थी।  इसी भीड़ में हम अपने अगले पड़ाव पर पहुंचे, जो था असलम चिकन। दुकान के बाहर बार-बी- क्यू  की खुशबू फैली हुई थी, जहां कबाब के साथ चिकन भी रोस्ट हो रहा था।  असलम चिकन की शोहरत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की बीसीयों किलो चिकन हमारे

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Garh Mukteshwar

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Garh Mukteshwar – गढ़मुक्तेश्वर: जहाँ कौरवों और पांडवों का पिंडदान हुआ था By Pardeep Kumar नमस्कार, आदाब, सत श्री अकाल दोस्तों आपका स्वागत है आज के नए ब्लॉग में, फाइव कलर्स ऑफ ट्रेवल की टीम पहुंची है एक ऐसी डेस्टिनेशन को एक्सप्लोर करने जो पिकनिक स्पॉट होने से पहले एक मशहूर धार्मिक स्थल भी है। जी हां, दोस्तों हम बात कर रहे हैं दिल्ली के नज़दीक उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले में स्थित गढ़मुक्तेश्वर की। (Garh Mukteshwar) हिन्दुओं के लिए प्राचीन तीर्थ स्थल गढ़मुक्तेश्वर हिन्दुओं के लिए प्राचीन तीर्थ स्थल है। इस स्थान को गढ़मुक्तेश्वर इसलिए कहा जाता है क्योंकि कहते हैं यहीं भगवान शिव के गणों को पिशाच योनि से मुक्ति मिली थी। ग्रह मुक्तेश्वर गंगा नदी के किनारे स्थित है। यह स्थान हिन्दुओं के लिए संास्कृतिक व धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्त्वपूर्ण है। आपको बता दे गढ़मुक्तेश्वर आम तौर पर पितरों के पिंडदान के लिए प्रसिद्ध है। यहीं गढ़मुक्तेश्वर में कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर गंगा स्नान पर्व उत्तर भारत का सबसे बड़ा धार्मिक मेला आयोजित किया जाता है। दिल्‍ली मुरादाबाद नेशनल हाईवे 24 पर हापुड से लगभग 35 कि0मी0 की दूरी पर प्रसिद्ध तीर्थ स्थल गढमुक्‍तेश्‍वर से 05 किमी दूरी पर गंगा नदी के किनारे बृजघाट स्‍थल स्थित है। आपको बता दें पिछले कई सालों से गढ़ मुक्तेश्वर को एक नए तीर्थ स्‍थल के रूप में बहुत तेजी से डेवेलोप करने के प्रयास किये जा रहे हैं। कैसे पहुंचे यह जगह दिल्ली से लगभग 119 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। हम सुबह 8 बजे दिल्ली से गढ़मुक्तेश्वर की ओर रवाना हुए। अभी एक दिन पहले ही बारिश हुई थी इसलिए मौसम ज्यादा गर्म नहीं था। इसलिए दो ढाई घंटे के सफर में कोई थकावट महसूस नहीं हुई। लेकिन फिर भी हम हापुड़ से निकलकर एक जगह चाय के लिए रुके। जब भी आप दिल्ली से हापुड़-मेरठ की तरफ जाते हैं तो हाईवे पर आपको शिवा ढाबा नाम से कई सारे ढाबे दिखाई देते हैं हमने भी एक ऐसे ही ढाबे पर रुक  गर्मा गरम अदरक वाली चाय और ग्रिल्ड सेंडविच का आनंद लिया। कुछ भी हो सफर में चाय मिल जाये तो यात्रा वसूल सी हो जाती है।(Garh Mukteshwar) सरकंडों से बने मूढ़े और फर्नीचर आइटम गढ़मुक्तेश्वर से थोड़ा पहले ही  सड़क के  दोनों और काफी संख्या में मूढ़े और सरकंडों से बने ऐसे ही अलग-अलग फर्नीचर आइटम दिखाई दिए। अगर आप  परम्परागत चीजों के शौक़ीन हैं तो आपको यहाँ घर के लिए खूब सारे वैरायटी में मूढ़े मिल जायेंगे। कीमत पांच सौ से शुरू होकर तीन चार हज़ार तक। आप थोड़ी बार्गेनिंग करेंगे तो आसानी से सही दाम में भी खरीद सकते हैं। आम के बाग और मुक़म्मल सफर वहीँ  थोड़ा आगे चलने पर  हमें आम के बाग दिखाई दिए। सैंकड़ों आम हमारे सामने पेड़ों पर लदे हुए थे, मन कर रहा था कि बस इन सुंदर रसीले आमो को तोड़ कर खा ले। सफर में जब अचानक इस तरह की चीजे मिल जाएँ तो समझ लीजिये आपका सफर मुकम्मल। हमने बाग में बहुत सारे फोटोज क्लिक करवाएं और वीडियो भी बनाई। इसके बाद हम अपने सफ़र पर वापस निकल पड़े। कार पार्किंग लगभग 3 घंटे सफर के बाद हम गढ़मुक्तेश्वर पहुंचे। उससे थोड़ी दूर पहले ही हमने अपनी कार पार्क की। यहा कार पार्किंग का चार्ज 60 रुपए था। अमृत परिसर धर्मशाला थोड़ा पैदल चलते ही हम पहुंचे अपनी डेएस्टिनेशन पर। जहा सबसे पहले हमें दिखाई दी अमृत परिसर धर्मशाला। आपको बता दें कि यह गढ़मुक्तेश्वर की एकमात्र धर्मशाला है और इसे धर्मशाला ना कहकर एक अच्छा होटल कहे तो भी बेहतर होगा। क्योंकि यहां के संचालक से  बात करने पर पता चला कि यहां नॉर्मल रूम्स के अलावा ए सी रूम भी शामिल हैं जिनका किराया ₹1400 है। हमने यहां के संचालक से बात की और बातचीत में उन्होंने हमें कर गढ़मुक्तेश्वर के इतिहास ,उसकी पुरानी स्थिति और वहां के सौंदर्यीकरण के बारे में बताया। इसी धर्मशाला के ठीक दाहिनी ओर स्थित है गढ़ मुक्तेश्वर के सबसे पुराने मंदिरों में से एक अमृत परिसर मंदिर। अगर आप यहाँ आते हैं तो यह मंदिर अवश्य देखिये, तीन मंजिला इस मंदिर में आप धार्मिकता और पौराणिकता दोनों के दर्शन कर लेंगे। हमने वहां के पुजारी से भी बात की और उन्होंने हमें मंदिर के इतिहास के बारे में विस्तार से बताया। ब्रजघाट प्रसाद लेने के बाद हम निकले ब्रिज घाट की ओर। गढ़मुक्तेश्वर का सबसे प्रसिद्ध घाट है- ब्रजघाट। ब्रजघाट घाट हिन्दू धर्म में उतना ही पवित्र माना जाता है जितना कि हरिद्वार में हर की पौड़ी, वाराणसी के घाट, प्रयागराज के घाट, अयोध्या और ऋषिकेश के घाटआदि। इसलिए गढ़मुक्तेश्वर का नाम हिन्दू धर्म के प्रसिद्ध तीर्थ स्थलों में आता है। आपको बता दे की गढ़मुक्तेश्वर के सौंदर्यीकरण का कार्य काफी अच्छी तरह से चल रहा है गढ़मुक्तेश्वर को हरिद्वार जैसा रूप देने की कोशिश की जा रही है और इसी को देखते हुए यहां घाट पर एक घंटा घर भी बनाया गया है जो कि देखने में हूबहू हरिद्वार में बने घंटाघर के जैसा दिखाई देता है। गढ़मुक्तेश्वर अधिक प्रसिद्ध नहीं है उसके बावजूद भी यहां हमें काफी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ दिखाई दी। कोई पिंडदान करने, कोई गंगा माता का आशीर्वाद लेने तो कोई अपने पाप धुलने यहां बड़ी श्रद्धा के साथ पहुंचा हुआ था। बोटिंग करने की सुविधा यहां नदी में बोटिंग करने की सुविधा भी है आप नाव में बैठकर नदी के बीच में बने टापू पर जा सकते हैं। और वहां चाय कॉफी या कोल्ड ड्रिंक पीते हुए नदी के मनोहर दृश्य का आनंद ले सकते हैं। वास्तव में गंगा नदी के एक छोर से दूसरे छोर तक नाव में जाना हमारे लिए बिलकुल खास अनुभव था। शांत बहती गंगा नदी और आसमान में छाए हल्के नीले बादल आपको एकबारगी ऐसा फील करवाएंगे जैसे कि आप  जन्नत में आ गए हो। हमारी नाव  ब्रिज के नीचे एक सेल्फी प्वाइंट पर रुकी और हमने वहां पर कई सारी फोटोस और वीडियो ली। वहीँ बहुत सारे बच्चे ब्रिज के ऊपर से नदी में छलांग मार रहे थे। छोटे-छोटे बच्चों का यह करतब वाकई में अद्भुत था। गढ़मुक्तेश्वर का विवरण हिन्दुओं के पुराणों जैसे भागवत पुराण, शिवपुराण और महाभारत जैसे ग्रथों

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Chail- Amazing places to visit in Chail

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चंडीगढ़ से महज 110 किमी की दूरी पर है खूबसूरत चैल हिल स्टेशन by Pardeep Kumar मैं प्रदीप कुमार फाइव कलर्स ऑफ ट्रैवल के इस नए ब्लॉग में आप सभी का स्वागत करता हूं। इस ब्लॉग में मैं आपको हिमाचल प्रदेश के शिमला के पास ही स्थित एक बेहद खूबसूरत हिल स्टेशन चैल की हाल ही की यात्रा के बारे में बताऊंगा। You can also watch our vlog- Delhi to chail with all information. dont forget to subscribe the channel ठंडी हवाओं को ख़ुद में समेटे चैल की मीठी सुबह ने जैसे हमारे मिज़ाज को तरोताज़ा कर दिया। जून के महीने में भी चैल का मौसम बेहद सुहाना लग रहा था, और ऐसे सुहाने मौसम में जो कि हिल स्टेशन के लिए पीक का समय माना जाता है एक अच्छा रिसाॅर्ट मिलना हमारे लिए क़ाफ़ी क़िफ़ायती साबित हुआ। (Chail, Solan) बलखाती नागिन जैसी सड़कों पर जब हिचकोले लेती हमारी गाड़ी दौड़ रही थी तो एक अलग ही रोमांच का एहसास हो रहा था। चायल में एंट्री के दौरान हमें महादेव के दर्शन हुए मानो जैसे भगवान का आशीर्वाद भी हमें मिल गया हो। दरअसल चायल (चैल) में प्रवेश करते समय हमें भगवान शिव का मंदिर दिखाई दिया, यहाँ हम थोड़ी देर रुके और फिर आगे चल पड़े अपने रिज़ॉर्ट की और। एक तरफ़ पहाड़ और दूसरी ओर गहरी खाई से जबरदस्त रोमांच में जैसे डर का हल्का तड़का लग गया हो। यक़ीनन अब सफ़र और भी ज़्यादा हसीं और दिलचस्प होने वाला है। होटल्स, रिजोर्ट्स और होम स्टे दोस्तों, आप जब पहाड़ों में घूमने आते हैं तो आपको ठहरने के लिए दो से तीन अच्छे विकल्प मिल जाते हैं जैसे होटल्स, रिजोर्ट्स और होम स्टे, तीनों में अच्छा ख़ासा फ़र्क़ होता है जो आपकी सहूलियत और बजट पर असर डाल सकता है। जैसे होटल्स की बात की जाए तो वो आपको नार्मल दिनों में 1500/- तक में मिल जाते हैं वहीं पीक टाइम में इन्हीं होटलों के रेट तीन गुणा बढ़ जाते हैं। होम स्टे की बात करें तो नार्मल दिनों में 1000/- तक और पीक टाइम में 2000-2500/- तक रेट बढ़ जाते हैं। लेकिन होम स्टे के कुछ फायदे भी हैं जनाब अगर आप घर से दूर रहकर भी घर जैसा माहौल चाहते हैं तो होम स्टे को आजमा सकते हैं । रिजोर्ट्स की जहाँ तक बात आती है तो रिज़ॉर्ट में आपको ढेरों विकल्प मिल जाते हैं थ्री स्टार से लेकर फाइव स्टार तक या इससे भी ऊपर जो पूरी तरह से आप पर निर्भर करता है क्योंकि इनके शुरूआती रेट  2500/- से लेकर ज़्यादा से ज्यादा कितने भी हो सकते हैं। ये सब जानकारी देने का मक़सद बस इतना है कि ट्रिप प्लान करते समय आप अपना बजट सही तरीक़े से मैनेज कर सकें। पर एक बात का ज़रूर ध्यान रखें कि बुकिंग आप एडवांस में ही करें क्यूँकि ऑन द  स्पॉट बुकिंग करने पर आपका वक्त ज़ाया होने की संभावना बढ़ जाती है, ज़ाहिर है पहाड़ों और वादियों के ख़ूबसूरत ट्रिप की शुरुआत आप ऐसे तो नहीं करना चाहेंगे। खै़र हमने भी अपना रिज़ॉर्ट एडवांस में बुक कर लिया था। जिससे जून के महीने में बेवजह की भागा दौड़ी से बच गए। यह समर वेकेशन का वो टाइम होता है जहाँ किसी भी हिल स्टेशन में पैर रखने की भी जगह नहीं होती। अगर आप अच्छा क्वालिटी टाइम बिताना चाहते हैं तो होटल या रिज़ॉर्ट थोड़ा सा रिसर्च करके ही बुक करें। मद्धम धूप में सराबोर देवदार के पेड़ों की चादर ओढ़े ये ऊँची-ऊँची पहाडियाँ ग़ज़ब लग रही हैं। बहरहाल, हम सुबह दस बजे के क़रीब अपने रिज़ॉर्ट में दाख़िल हुए, जो मुख्य सड़क से थोड़ी ढ़लान पर बना हुआ था, बिल्कुल हिमालय की गोद में, जिसकी बदौलत हमने हर तरफ़ पहाड़ों के शानदार नज़ारों का खूब आनंद लिया। नाश्ता करने के बाद हम घंटों तक पहाड़ों में खोए रहे, उसके बाद हमने थोड़ा आराम किया जो उस वक़्त एनर्जी और रोमांच को बरक़रार रखने के लिये बेहद ज़रूरी था। अब तक़रीबन साढ़े बारह बजे हमने चैल की नई जगहों को एक्स्प्लोर करने का प्लान बनाया और बस फिर क्या अगले ही पल हमने ख़ुद को उन्हीं नागिन सी बलखाती सड़कों पर पाया। घुमावदार रास्तों से होते हुए हम अपनी धुन में खोए ही थे कि चैल के मेन बाज़ार ने हमारा ध्यान अपनी ओर खींचा,  चैल बाज़ार और चैल पैलेस पहाड़ी जगह पर बने बाज़ार को घूमने का अपना ही मजा है क्योंकि यहां पर ज़रूरत की हर चीज़ मौजूद है। बाज़ार में हमने थोड़ा ही समय बिताया क्योंकि हमारा मुख्य लक्ष्य था उस जगह घूमना जहाँ के बारे में लोग इतना अवगत नहीं है। इसके अलावा आप चैल में सेल्फी पॉइंट, काली का टिब्बा मंदिर और चैल पैलेस भी घूम सकते हैं। बताते हैं लोर्ड़ किच्नर के आदेशानुसार पटियाला के राजा भूपिंदर सिंह को शिमला से निकाल दिया गया था, इसका बदला लेने के लिए उन्होंने शिमला के पास ही खूबसूरत चैल को अपनी गीष्मकालीन राजधानी बना कर यहाँ सुंदर चैल पैलेस का निर्माण करवाया। चैल पैलेस को 1891 में बनवाया गया था और यह चैल की शाही वीरासत मानी जाती है जिसे आज एक शानदार होटल में बदल दिया गया है। यहाँ पर्यटकों को घूमने के लिए सौ रुपए का टिकट लेना पड़ता है।  टूरिस्ट चाहे तो यहाँ रूम बुक करके भी रह सकते हैं। जिसके रूम की सुविधाओं के हिसाब से अलग-अलग चार्ज हैं। यहाँ से आप चैल के पहाड़ों और वादियों के शानदार नज़ारों का आनंद ले सकते हैं। अश्विनी खड़ अच्छा ख़ासा रास्ता तय करके हम अपनी डेस्टिनेशन पर आख़िरकार पहुँच ही गए। हिमाचल प्रदेश एक ऐसी जगह है जो हमें कभी निराश नहीं करती और हमेशा कुछ न कुछ नए और खूबसूरत मंजर देखने पर मजबूर करती है, एक ऐसी जगह जहां बहुत सारी अनछुई या यूँ कह लीजिये कि बहुत सारे छिपे हुए रत्न हैं।  इन्हीं हिडेन जेम्स में से एक जगह है अश्विनी खड़। चायल से तकरीबन 33 km दूर अश्वनी खड़ में है पहाड़ों के बीच छिपा बहुत सुंदर वाटरफॉल, जहां आप ठंडे पानी में पैर रखके तरोताजा हो सकते हैं, लेकिन हमने समय बिताया नदी के पानी में जो झरने से होते हुए इस विशाल