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उदयपुर घूमने का प्लान है? इन शानदार जगहों को बिल्कुल मिस न करें by Pardeep Kumar उदयपुर की यात्रा के पहले पार्ट में मैंने आपको उदयपुर शहर के सिटी पैलेस, सहेलियों की बाड़ी और पिछौला झील के बारे में विस्तार से बताया था। आज जुड़िये यात्रा के दूसरे दिन से….   Click the Link for first Day of Udaypur Trip https://fivecolorsoftravel.com/2022/07/29/udaipur-city-of-lakes/ दूसरे दिन हमारा उदयपुर के शिल्पग्राम, सज्जन गढ़ किले और फतेहसागर झील का शेड्यूल था। इसलिए सुबह नाश्ता करने के बाद हम निकल पड़े शिल्पग्राम की और। उदयपुर का शिल्पग्राम- राजस्थानी ग्रामीण कल्चर की शानदार झांकी उदयपुर सिटी से लगभग 6 किलोमीटर दूर शिल्पग्राम, जो एक विस्तृत परिसर में बिलकुल गाँव जैसा वातावरण विकसित करके बनाया गया जीवंत संग्रहालय जैसा है। अंदर प्रवेश करते ही आपको एक बार तो ऐसा लगेगा जैसे किसी राजस्थानी गांव में ही प्रवेश कर गए हो। शिल्पग्राम में पारम्परिक संस्कृति को दर्शाती सात झोपडियां बनाई गयी हैं, जो राजस्थान के अलावा गोवा, गुजरात और महाराष्ट्र के पारंपररिक घरों और अलग-अलग आदिवासी समुदाय के प्रतिरूप को परिभाषित करती हैं। कुल मिलाकर आप जितना भी समय यहाँ गुजारोगे आपको उतना ही आनंद की अनुभूति होगी। जिस समय हमनें शिल्पग्राम में प्रवेश किया तब टिकट काउंटर पर बैठे महाशय ने बताया की दो घंटे बाद ओपन एयर थिएटर में सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू होंगे, आप वहां राजस्थानी लोक गायन और नृत्य दोनों का आनंद ले सकते हैं। तब तक आप मजे से पूरे परिसर को घूमिये, देखिये। हमने दो घंटे में वहां बने हुए अलग-अलग तरह के झूले, शिल्प बाज़ार, मृण कला संग्रहालय, मिटटी और शिल्पकला के बेहतरीन नमूने देखे। यहाँ बनी झोपड़ियों में, आप कढ़ाई का काम, लकड़ी का काम, दर्पण और मनका काम और मिटटी के बर्तन देख सकते हैं। घोड़े व ऊँट की सवारी की भी व्यवस्था थी। देखा जाए तो पूरे शिल्प ग्राम में राजस्थानी ग्रामीण कल्चर की शानदार झांकी देखने को मिली। बाजार से थोड़ी खरीददारी की और चल पड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम स्थल की और। ओपन एयर थिएटर में सामने छोटा-सा मंच बना हुआ था जिसमें लोक नृत्यों का रंगा-रंग कार्यक्रम चल रहा था। लगभग एक घंटा हमने जम कर नृत्य और गायन का आनंद लिया। वहां जितनी भी देर रहे ऐसा लगा जैसे थकान को कहीं पीछे ही छोड़ आये हो। आप राजस्थान के किसी भी पर्यटन स्थल पर चले जाएँ वहां आपको राजस्थानी कल्चर के लिए मशहूर चौखी ढाणी मिल ही जाएँगी लेकिन उदयपुर का ये शिल्पग्राम अपनी संजीदगी और अरावली की मनोहर घाटियों के कारण उन सबमें बहुत अलग है। (Udaipur- Shilpgram) हमें शिल्पग्राम में दो बज गए थे। वहां से निकल कर सबसे पहले लंच किया और वहीँ से चल पड़े अगले पड़ाव की और शहर से करीब 8 किलोमीटर दूर एक ऊँची पहाड़ी पर स्थित सज्जनगढ़ का किला देखने जिसे मानसून पैलेस भी कहते हैं। सज्जनगढ़ का किला- मानसून पैलेस ये किला काफी ऊँचाई पर है, उदयपुर सिटी से भी आप इस किले को आसानी से देख सकते हैं। पहाड़ी पर चढ़ते हुए दोनों ओर घने-गहरे जंगल है जिसमें कई बार जंगली जानवर भी दिखाई देते हैं। बरसात के मौसम में बादलों को देखने के लिए मेवाड़ के महाराणा सज्जनसिंह ने यह महल बनवाया था। यह सफ़ेद संगमरमर से बनी सुन्दर इमारत है जो कि उनकी मृत्यु के बाद महाराणा फतहसिंह द्वारा पूरी कराई गयी। ऊपर किले के बिलकुल साथ लगते परिसर में एक शानदार कैफ़े है जहाँ आप कॉफी और स्नैक्स का आनंद ले सकते हैं। यहाँ से सूर्यास्त का दृश्य देखने के लिए पर्यटक शाम ढ़लने का इंतज़ार करते हैं। क्योंकि हमें इसके बाद फ़तेह सागर झील जाना था इसलिए हम तक़रीबन पांच बजे वहां से निकल कर फ़तेह सागर झील पहुंचे। फ़तेह सागर झील क्योंकि फ़तेह सागर झील घूमने और देखने का सबसे उपयुक्त समय शाम का ही रहता है। फतह सागर झील का पुनर्निर्माण महाराणा फतह सिंह द्वारा कराया गया था। यह पिछोला झील से जुडी हुई है और जिसके जल प्रवाह को रोकने के लिए एक छोटा-सा बाँध भी बनाया गया है। हमने वहां जाकर सबसे पहले साइकिल किराये पर ली और चल पड़े एक लम्बी राइडिंग पर बिलकुल झील के किनारे-किनारे। हमारी लगभग तीन किलोमीटर राइडिंग खत्म हुई झील के एक कोने पर बने उस छोटे से बांध पर जाकर, उस जगह से दूर-दूर तक फैली ये झील बेहद शानदार लग रही थी। एक खास बात जो मैंने नोट की वो ये कि फ़तेह सागर झील के आसपास रहने वाले बहुत से लोग शाम की वॉक के लिए यहाँ रोजाना आते हैं। जितनी चहल-पहल सैलानियों की थी, उतनी ही वहां रोजाना वॉक पर आने वालों की भी थी। जैसे-जैसे शाम गहरा रही थी झील की ख़ूबसूरती बढ़ती ही जा रही थी। झील के किनारे आपको बहुत सारे चाय, मैग्गी और समोसे वाले मिल जायेंगे। हमने साइकिलिंग करने के बाद वहीँ झील के किनारे चाय और मैगी का आनंद लिया। यहाँ सूर्यास्त के समय नीले आकाश में आपको बहुत सारे पक्षी भी उड़ते दिखेंगे। ऐसे शानदार दृश्य देखकर आप यहां फोटोग्राफी से अपने आपको रोक ही नहीं पाओगे। एक बात और फतेह सागर झील में बोटिंग करे बिना आपकी यहां की यात्रा पूरी नहीं हो सकती, इसलिए अगर आप इस झील को घूमने के लिए आ रहे हैं तो बोटिंग करते हुए चले जाईये झील के बीचों-बीच बने शानदार उद्यान में। जहाँ सूर्यास्त के समय जाकर आपको ऐसा लगेगा जैसे जन्नत यहीं हैं, यहीं हैं और यहीं हैं। झील के मध्य एक टापू पर बना यह उद्यान अपने शांत वातावरण से यहां आने वाले पर्यटकों को एक अद्भुद शांति का एहसास कराता है। आप जब भी किसी यात्रा पर होते हैं तो यकीनन ऐसी शांति और प्राकृतिक सुंदरता आपकी सारी थकान पल भर में मिटा देती है। यहाँ आकर पहली बार महसूस हुआ क्यों दुनिया भर के शायर अपनी महबूबा की आँखों की ख़ूबसूरती की तुलना झील से करते हैं। सच में ऐसे ही थोड़े उदयपुर को देश के सबसे रोमांटिक शहरों में शुमार किया जाता है। फतेह सागर झील के ऐसे मनमोहक दृश्य आपको लम्बें समय तक अनायास ही याद रहते हैं। क्यों जाएँ उदयपुर? Five Reasons to Visit Udaipur– 1.उदयपुर के शिल्पग्राम में आप पारम्परिक खरीददारी के अलावा राजस्थानी लोक गायन

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Matka Market: Buy Clay Home Decor Items – Delhi

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Matka Market- मटका मार्किट: डेकोरेटिव और ट्रेडिशनल प्रोडक्ट्स का हब Five Colors of Travel मशीनें हमें परफेक्शन तो दें सकती हैं लेकिन इमोशन्स नहीं, क्योंकि मशीनों के हमारी तरह दिल नहीं धड़कते। इमोशन्स को महसूस करने के लिए हम हस्तशिल्प वस्तुओं के पीछे लगी मेहनत को देख सकते हैं। मिट्टी से बना घड़ा भी किसी कला से कम थोड़ी है? हस्तशिल्प की इसी कला को देखने हम पहुंचे दिल्ली के सरोजनी नगर में बनी मटका मार्किट में। कैसे जाएं मटका मार्किट बड़े बाज़ारों के शोरगुल से दूर मटका मार्किट सरोजनी नगर मेट्रो स्टेशन से 1 किलोमीटर की दूरी पर बनी है। आप मेट्रो या बस किसी भी साधन से आसानी से मटका मार्किट पहुँच सकते हैं। डेकोरेटिव और ट्रेडिशनल प्रोडक्ट्स का हब मार्किट की शुरुवात होती है वैगटाइम शॉप से जो पॉट शॉप और डेकोरेटिव आइटम की दुकान है। दुकान के बाहर बेचने के लिए लगे छोटे-छोटे रंग-बिरंगे गमले दुकान को एक अलग ही लुक दे रहे थे। दुकान की बनावट में इस्तमाल वुडेन वर्क भी खूब अट्रैक्ट कर रहा था। दुकान के अंदर जितना अच्छा सामान था उतनी ही दुकान के बाहरी दीवार पर बनी आर्ट अच्छी लग रही थी, लेकिन इस दुकान पर सारा सामान हस्तशिल्प नहीं था। नई जनरेशन को देखते हुए और डिमांड के हिसाब से यहाँ भी कुछ दुकानदार रेडीमेड प्रोडक्ट रखने लगे हैं। वैगटाइम शॉप के बाद सफर शुरू होता है हाथों से बनी मटका मार्किट का। जहाँ तक नज़र जा रही थी मिट्टी से बना सामान दिख रहा था। आपको बता दें मटका मार्किट में काम करते हुए लोगों को 50 वर्ष से अधिक हो गए हैं। एक दुकान के मालिक ने बताया कि हम पीढ़ी दर पीढ़ी यहीं काम करते आ रहे हैं, पहले हमारे दादा, फिर पिता और अब हम इस काम को आगे बढ़ा रहे हैं। वैसे आम ग्राहकों के लिए भले ही यह सिर्फ एक मार्किट हो लेकिन यहाँ के दुकानदारों के लिए यही उनका घर भी है। यहां काम कर रहे बहुत से लोगों ने बताया की वह रहते भी यहीं हैं। देखने पर मार्किट सड़क के एक छोर से शुरू और दूसरे छोर पर खत्म होती दिखती है लेकिन मिट्टी की उम्दा हस्तशिल्प कला देखते-देखते न ही दुकाने खत्म होंगी और न ही उसमें रखा सामान। आपको हर दुकान पर कु  नया और उम्दा देखने को दिखेगा। यहां न सिर्फ दुकानों में रखा सामान बल्कि दुकानें भी बिल्कुल ऑथेंटिक हैं, कुछ दुकानें बांस और छप्पर से बनी हुई हैं जबकि कुछ बिल्कुल कच्ची हैं। दिवाली फेस्टीवल में होती है दुनिया भर की वैरायटी सुबह के 10 बजे से रात के 10 बजे तक लगने वाली मटका मार्किट में मिट्टी से बने जितने प्रकार की चीज़ो का आप अंदाजा लगा सकते हैं वो सब पलक झपकते ही यहां मिल जाएगा। फिर चाहे वो छोटा-सा दिया हो या किसी प्रकार का, डिज़ाइन का बड़ा गमला। दीवाली पर तो यहाँ की रौनक देखते ही बनती है। अगर आप दिवाली फेस्टीवल के समय यहाँ आएंगे तब आपको दुनिया भर की नई वैरायटी भी देखने को मिल जाएँगी। इस मार्किट में हर तरह का मटका, बुद्ध-गणेश से लेकर शिव-पार्वती और सरस्वती की मूर्तियां, फूलदान, गमले, अचार की बरनी, शो-पीस, विभिन्न प्रकार के जानवर के आकार का समान रखने वाला, सुंदर-सी परी और भी न जाने क्या-क्या यहाँ मिलता है। मटका मार्किट में राजस्थान, मणिपुर, बिहार और न जाने भारत के कितने राज्यों से कच्चा सामान आता है और उस कच्चे समान पर काम करके उसे फिनिशिंग मटका मार्किट में दी जाती है. जयपुर ब्लू पॉटरी’, ‘कागज़ी’ और ‘मणिपुर ब्लैक पॉटरी’ कुछ ऐसा है जिसे देख आप ‘वाह’ कहने पर मजबूर हो जाएंगे। (Matka Market, Sarojini Nagar, Delhi) Matka Market, Sarojini Nagar, New Delhi मटका मार्किट में न सिर्फ लोग घरेलू डेकोरेशन के सामान के लिए आते हैं बल्कि दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों के दुकानदार भी यहीं से समान ले जाते हैं। इस मटका मार्किट में बहुत कम और जायज कीमत पर ही सामान मिलता है। एक छोटा सा शो-पीस 10 रूपय में और एक बड़ी और विशाल मूर्ति 1100-1500 तक में मिल जाती है। किस सामान की क्या कीमत होगी ये मौसम और खरीदने की मात्रा पर भी निर्भर करता है। जितनी ज्यादा मात्रा उतनी कम कीमत। बल्क में सामान लेने का फायदा मिलता है। दिल्ली जैसे शहर में इस तरह की मार्किट आपको कम ही दिखाई देंगी। इसलिए घर के डेकोरेशन को नया लुक देने का या कुछ ट्रेडिशनल खरीदने का दिल करे तो मटका मार्किट से बेहतर कुछ नहीं। Research by Geetu Katyal Edited By Pardeep Kumar

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Mirza Ghalib Ki Haveli

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Mirza Ghalib Ki Haveli- मिर्ज़ा ग़ालिब की हवेली: एक शायर की आखिरी विरासत पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है कोई बतलाओ के हम बतलाएं क्या? वैसे तो पुरानी दिल्ली की संकरी गलियां और लोगो के हुजूम से गुलज़ार चाँदनी चौक का हर कोना पुरानी दिल्ली को नायाब बनाता है, लेकिन इन भीड़भाड़ व शोरगुल भरे बाजारों के ठीक बीचो-बीच एक शांत-सी मनमोहक हवेली भी है जो कभी मशहूर शायर मिर्ज़ा ग़ालिब (Mirza Ghalib)  का घर हुआ करती थी। जिन लोगों को शायरी पसंद है उन सभी के लिए  ग़ालिब की इस हवेली का ज़र्रा-ज़र्रा जैसे मोहब्बत की चाशनी में घुला हुआ शरबत है। Mirza Ghalib Ki Haveli कैसे पहुंचे मिर्ज़ा ग़ालिब की हवेली मिर्ज़ा ग़ालिब की यह हवेली चावड़ी बाजार मेट्रो स्टेशन से महज 1 किलोमीटर दूर स्थित बल्लीमारान गली में है। भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा धरोहर घोषित ये हवेली किसी को भी ग़ालिब का दीवाना बना सकती है क्यूंकि हवेली की पूरी सजावट उनकी लिखी शायरियों से ही की गयी है।  आपको बता दें मिर्ज़ा ग़ालिब का पूरा नाम मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ां ग़ालिब है जिन्हें प्यार से “मिर्जा नीता” नाम से भी जाना जाता है।  उनकी पत्नी का नाम उमराव था, विवाह के समय गालिब 13 वर्ष और उमराव 12 वर्ष की थी। मिर्ज़ा ग़ालिब ने लिए थे यहां अंतिम श्वास उत्तर प्रदेश के आगरा में जन्में मिर्जा ग़ालिब शादी के बाद दिल्ली आ गए थे। आगरा से लौटने के बाद गालिब ने 1860-1869 तक इसी हवेली में शरण ली थी और इसी हवेली में बैठकर ग़ालिब ने ऊर्दू और पारसी में ‘दीवान’ की रचना की थी।  यही वो स्थान है जहाँ उन्होंने अपने अंतिम श्वास लिए थे।  ग़ालिब की मौत के बाद साल 1999 तक इस हवेली में दुकानें बननी और बाजार लगना शुरू हो गया था। जिसके कारण हवेली की चमक फीकी पड़ती चली गई। यही कारण है कि 500 एकड़ में बनी ये हवेली अब बस 150 एकड़ की बची है।(Mirza Ghalib ki Haveli) 1999 में सरकार ने इस हवेली को राष्ट्रीय धरोहर घोषित कर दिया। धरोहर घोषित करने के बाद ग़ालिब की हवेली का पुर्ननिर्माण किया गया, मुगल लखोरी, ब्रिक्स, सैंड स्टोन और लकड़ी के दरवाजों का इस्तेमाल कर हवेली को खूबसूरत लुक दिया गया। मुगल वस्तुकला से बनी हवेली के लकड़ी के बड़े से दरवाजे को देखते ही आप ग़ालिब के समय में लौट जाएंगे। हवेली में अंदर घुसते ही सीधे हाथ पर एक बड़ा-सा कमरा है। कमरे में ग़ालिब का अचकन और उनकी बेगम के वस्त्र फ्रेम करके बेहद संजीदगी से लगाए गए हैं।  बीचो-बीच ग़ालिब का स्टैच्यू दिखेगा जिसके दोनों तरफ गालिब की मोटी-मोटी पोथी रखी हुई हैं। आप जैसे-जैसे हवेली में आगे बढ़ेंगे आपको ग़ालिब द्वारा खेलें जाने वाले खेल चौसर, शतरंज की बिसातें, उनके बर्तन और पुरानी पुस्तकें देखने को मिलेंगी। Mirza Ghalib Ki Haveli यहाँ आपको ग़ालिब के अलावा उनके समकालीन शायरों के चित्र भी दिखाई देंगे। हवेली में एक जगह हुक्के के साथ गालिब का एक बिलकुल जीवंत प्रतीत होता स्टैच्यू भी नजर आएगा जो शायद इस बात का प्रतीक है कि वो हुक्के के बेहद शौक़ीन थे। पूरी हवेली की तमाम दीवारों पर ग़ालिब और उनकी शायरी के पोट्रेट बड़े ही तहज़ीब और करीने से लगाए गए हैं। जिनकों देखकर पढ़कर ग़ालिब के तमाम शेर ज़ेहन में अनायास ही घूम जाते हैं…. “उग रहा दर-ओ-दीवार पे सब्ज़ा ग़ालिब हम बयावां में हैं और घर में बहार आई है” फ्री में एंट्री जबसे ग़ालिब की हवेली को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया गया है तबसे यह हवेली पुरानी दिल्ली का एक प्रमुख आकर्षण  बन चुकी है। सुबह 11 से शाम 6 बजे तक आम दर्शकों के लिए खुलने वाली ये धरोहर हवेली सिर्फ सोमवार के दिन बंद रहती है। आप बिना किसी टिकट के यहाँ फ्री में एंट्री करिये। साथ में आप अपने कैमरे से हवेली की जी भर के तस्वीरें लीजिये। फोटो लेने की यहाँ कोई मनाही नहीं है। ग़ालिब किसी इमारत या चारदीवारी के मोहताज नहीं हैं और न ही उन्हें इन तंग और सौ-डेढ़ सौ एकड़ की हवेलियों में समेटा जा सकता है। लेकिन फिर भी जिनको ग़ालिब से इश्क़ है, शेरो-शायरी पसंद है, जो कवितायेँ लिखते-पढ़ते हैं और जो ग़ालिब को समझना चाहते हैं उनको यहाँ अवश्य आना चाहिए।     क्यों जाएँ मिर्ज़ा ग़ालिब की हवेली ? Five Reasons to Visit Mirza Ghalib ki Haveli-    1.  जिन लोगों को कविताएं -शायरी में दिलचस्पी है उन सभी के लिए  ग़ालिब की यह हवेली एक अच्छा विकल्प है।    2.  मिर्ज़ा ग़ालिब की यह हवेली दिल्ली के चावड़ी बाजार मेट्रो स्टेशन से महज 1 किलोमीटर दूर स्थित बल्लीमारान गली में है, जहाँ आसानी से पहुंचा जा सकता है।    3. राष्ट्रीय धरोहर घोषित इस हवेली में मिर्ज़ा ग़ालिब की जिंदगी से संबंधित काफी पुरानी चीजें हैं, जो ग़ालिब के चाहने वालों के लिए यकीनन किसी तोहफे से कम नहीं।    4. यहाँ आप बिना किसी टिकट के फ्री में एंट्री कर सकते हैं।  5. फोटो लेने की यहाँ कोई मनाही नहीं है। Research by Geetu Katyal Written & Edited by Pardeep Kumar   

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Hauz Khas Village – Best Tourist Attraction in Delhi

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Hauz Khas- हौज़ ख़ास विलेज: दिल्ली के युवाओं की मनपसंद जगह Five Colors of Travel दिल्ली के कल्चर को अच्छे से जानने के लिए सबसे परफेक्ट है हौज़ ख़ास। यही वो जगह है जहाँ आप दिल्ली वालों के स्वैग और स्टाइल दोनों को करीब से देख सकते हैं। कैसे जाएं हौज़ ख़ास हौज़ ख़ास मेट्रो स्टेशन से लगभग 3 किलोमीटर दूर बना हौज़ ख़ास विलेज(Hauz Khas Village) अपनी बनावट के लिए बहुत फेमस है, जहाँ जाते वक्त रास्ते में सबसे पहले आपकी नज़र छोटी गुमटी की तरफ जाएगी। अब आप कहेंगे ये क्या है? छोटी गुमटी एक गुमत है जो चारो तरफ से घिरी हरियाली के बीचों-बीच बनी है। यहाँ इतनी शांति है कि इस गुमटी में जाकर आप अलग-अलग किस्म के पक्षियों की आवाज़ें और यहाँ तक की अपनी धड़कनों को महसूस कर पाएंगे। अगर आपको शांत जगह खूब भाती हैं तब यह जगह आपके लिए बिलकुल अनुकूल रहेगी।(Hauz Khas)         hauz khas vollage- cafe hub हौज़ ख़ास मार्किट छोटी गुमटी के बाद थोड़ा आगे चलने पर आएगा डियर पार्क और उसके बाद शुरू हो जाएगी हौज़ ख़ास मार्किट, जहाँ आपको चारों तरफ क्लब, कैफ़े और गानों की ध्वनि सुनाई देगी। आपको बता दें हौज़ ख़ास मार्किट कुछ खरीदने से ज्यादा पेट पूजा और एन्जॉय करने के मकसद से बनाई गयी है। यही कारण है कि वहां हर वक़्त युवाओं का जमावड़ा लगा रहता है। चाहे आपको किसी से मिलना हो, डेटिंग करनी हो या बर्थडे सेलिब्रेट करना हो, उसके लिए हौज़ ख़ास परफेक्ट प्लेस है। हौज़ ख़ास मार्किट में से गुजरते वक्त आपको फुल बेस में बजते हुए गाने और युवा लड़के-लड़कियों की टोलीयां नज़र आएंगी और बस यही इस मार्किट की खासियत है। हौज़ ख़ास -महक का छोटा किला हौज़ ख़ास मार्किट के बाद शुरू हो जाता है हौज़ ख़ास विलेज जो दूर तक फैला हुआ है। हौज़ ख़ास को महक का छोटा किला भी कहा जाता है। विलेज में एंट्री के लिए 25 रुपय की टिकट लगती है। टिकट लेते ही आपके सामने होगा हौज़ ख़ास विलेज, उसकी अद्भुत बनावट और चारों और फैली हरियाली ही हरियाली।     hauz khas fort वैसे आपको बता दें उर्दू के शब्द हौज़ का अर्थ है पानी की टंकी और ख़ास का अर्थ है राजसी अथार्त राजसी पानी की टंकी। माना जाता है कि इस बड़ी-सी टंकी का निर्माण अल्लाउद्दीन खिलज़ी द्वारा सिरी फ़ोर्ट के निवासियों के लिए करवाया गया था। इस्लामी वास्तुकला से बना ये हेरिटेज हौज़ खास में आकर्षण का मुख्य केंद्र बिंदु है।(Hauz Khas) हौज़ ख़ास विलेज, विलेज बनने से पहले फिरोज शाह का मदरसा था। फिरोज शाह दिल्ली सल्तनत में तुगलक वंश के तीसरे शासक थे जिन्होंने 37 साल राज किया। फिरोज शाह ने ही हौज़ ख़ास विलेज में मदरसा बनवाया था और यहीं उनका मकबरा भी बनाया गया है। इस मकबरे के गुंबद का शीर्ष पूरे परिसर में सबसे ऊंचा है। यह खड़े अष्टकोणीय और वर्गाकार छतरियों को मकबरे के रूप में बनाया गया था। इस इमारत की मरम्मत बादशाह सिकंदर लोदी ने करवाई थी। कक्ष के बीचों-बीच बनी कब्र फिरोज शाह की है, जबकि वहीँ आसपास संगमरमर की कुछ अन्य कब्रें भी बनी हैं। हौज़ ख़ास विलेज फिरोज शाह के मकबरे के पश्चिम में दूर तक फैला है। ऊपरी मंजिल में खुले स्तंभों युक्त कमरे हैं और निचली मंजिल में मेहराबी कमरे हैं। निचली मंजिल में छोटी अंधेरी कोठरियां भी हैं जो शायद छात्रों के लिए बनी होंगी। जिसके अंदर रोशनी और हवा के लिए तंग रोखे हैं, और सामान रखने के लिए छोटे आले बने हैं। कहा जाता है कोठरियों के सामने मेहराबी कमरे थे जो अब ढह चुके हैं। इस हिस्से के पश्चिमी छोर में एक बड़ा गुम्बदनुमा दो मंजिला भवन है।(Hauz Khas) hauz khas fort पिकनिक स्पॉट हौज़ ख़ाज़ के परिसर में प्रवेश करते ही इतनी उम्दा वास्तुकला दिखती है जिसे देख कोई भी असमंजस में पड़ जाए कि पहले दाएं जाया जाए या बाएं। बनावट कुछ इस प्रकार की है जो गर्मी में धूप से बचाए और बरसात में बारिश से। पूरे विलेज में कही भी खड़े होने पर चारों तरफ विलेज के साथ बने डिअर पार्क की झील दिखती है जो आँखों को ठंडक देती और मन को तृप्त करती है। पूरे विलेज का एक-एक कोना इतना शानदार है कि वहां न सिर्फ दोस्तों के साथ मजे से घूमा जा सकता है बल्कि यह जगह क्वालिटी टाइम बिताने के लिए भी शानदार है। selfie time with friends विलेज के शांत माहौल व सुरक्षा के लिहाज़ से भी देखें तो यह जगह बेहतरीन विकल्प है। हमें अनेक जोड़ें यहाँ इत्मीनान से बैठे दिखाई दिए। साथ ही आप परिवार और दोस्तों के साथ पिकनिक के लिए भी यहाँ आ सकते हैं। हौज़ ख़ास विलेज अपनी खूबसूरती और बनावट दोनों के कारण यहाँ आने वाले हर ऐज ग्रुप को अपनी ओर आकर्षित करता है। दौड़ती-भागती जिंदगी में दो पल सुकून से बिताने के लिए ये जगह बिल्कुल फिट बैठती है, ऐसे ही थोड़ी इसे महक का छोटा किला कहा जाता है।(Hauz Khas) Research – Geetu Katyal Written & Edited by Pardeep Kumar You can visit our YouTube Channel to explore more beautiful destination- Like & Subscribe

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Sunder Nursery – Delhi’s Heritage Park

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Sunder Nursery: सुंदर नर्सरी- इतिहास और कुदरत का सुंदर मिलन Five colors of Travel भागते-दौड़ते शहरों के लोगों को सबसे ज्यादा कमी अगर किसी चीज की खलती है, तो वो है प्राकृतिक सौंदर्य की। अगर आप किसी ऐसी जगह की तलाश में हैं तो समझ लीजिये आपकी तलाश आज मुक्कमल हुई। क्योंकि आज हम आपको रू-ब-रू करवाएंगे ऐसी ही एक बेहद खास जगह- सुंदर नर्सरी से। जिसके बारे में भले ही आपने कम सुना होगा या पढ़ा होगा लेकिन यहाँ आने के बाद आप महसूस करेंगे की ये शानदार जगह किसी जन्नत से कम नहीं।(Sunder Nursery) दुनिया की 100 बेहतरीन जगहों में दिल्ली की सुंदर नर्सरी हुमायूं टॉम्ब के ठीक सामने स्थित ये नर्सरी एक नर्सरी के साथ-साथ बायोडायवर्सिटी पार्क, एक ऐतिहासिक विरासत और गार्डन भी है। आप यहाँ 40 रुपये की टिकट लेकर प्रवेश कर सकते हैं। नाम से समझ आता है ये सिर्फ एक गार्डन भर है पर अंदर जाने पर मालूम हुआ यहां तो बहुत कुछ है। परिवार के साथ क्वालिटी टाइम बिताने और नेचर के करीब जाने के लिए ये जगह बिल्कुल परफेक्ट है। टाइम्स मैगज़ीन ने 2018 के अपने सर्वे में सुंदर नर्सरी (Sunder Nursery) को 100 सर्वश्रेष्ठ घूमने लायक जगहों में शामिल किया है। इस नर्सरी का हर ज़र्रा-ज़र्रा इसके बदलाव की तस्वीरों की गवाही देता है। दरअसल ये जगह लगभग पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी थी। आर्किलोजिकल डिपार्टमेंट के मार्गदर्शन में इस जगह पर पुनर्निर्माण कार्य शुरू किया गया। नतीजा आज ये नर्सरी देखने के लिहाज़ से बेहद खूबसूरत लगती है। मुग़ल आर्किटेचर और बाग-बगीचों से सजी ये नर्सरी लगभग 90 एकड़ में फैली हुई है। एंट्री गेट पर नक्शा देखकर ये तो समझ आ गया था कि आज पैरों की अच्छी-खासी कसरत होने वाली है। आप भी यहां आएं तब ये माइंड सेट करके आएं की खूब सारा पैदल चलना पड़ेगा तभी इसकी नायाब खूबसूरती के दीदार कर पाएंगे।(Sunder Nursery) अंदर घुसते ही सबसे पहले एक मकबरा नजर आया। छानबीन से मालूम हुआ ये सुंदर बुर्ज़ है। इस मकबरे की अंदरूनी खूबसूरती का बखान करना मुश्किल है। 16वीं सदी की इस मुगलकालीन इमारत के अंदरूनी हिस्सें में सफेद चूना पत्थर से सजावट की गई है। पूरा मकबरा कुरान की आयतों से सजा है। इस बेहतरीन मकबरें के दीदार से सफर की शुरुआत कुछ ज्यादा ही रोमांचित लगने लगी। खास बात ये थी जगह-जगह इस पूरी नर्सरी की बदलती तस्वीरों को दिखाया गया था। जो इस खूबसूरत क्षेत्र की हर कहानी को दिखाने के लिए जरूरी भी है। लक्कड़वाड़ा बुर्ज चलते-चलते झील के सुंदर नज़ारे भी आराम से देखने मिल रहे थे। यकीन मानिये आपका मन ऐसी खूबसूरती देख उत्साहित हुए बिना रह ही नहीं सकता। कुदरत की ये बेहतरीन नक्काशी किसी कागज पर उतारना कई बार किसी लेखक के बस में भी नहीं होती। रास्ते में एक और ऐतिहासिक विरासत दिखी। ये था 16वीं सदी का लक्कड़वाड़ा बुर्ज। इस बुर्ज की खासियत ये है कि इसे 2017 में इसकी बनावटी खूबसूरती को देखते हुए विश्व विरासत घोषित किया गया। सामने की ओर से ये पूरा बुर्ज गुलाब बाग से सुसज्जित है। इस नर्सरी में जगह-जगह पेड़ों की कई प्रजातियां मौजूद है। हर पेड़ पर उसका नाम देख कर आप उसकी प्रजाति का पता आसानी से लगा सकते हैं। साथ ही साथ यहां पक्षियों की लगभग 80 प्रजातियां संरक्षित हैं। घूमते हुए रास्ते भर तरह-तरह के पक्षियों की आवाज़ें सुनाई दे रहीं थी। यहां ये फैसला करना थोड़ा मुश्किल हो जाता है कि अगली जगह कौन-सी देखी जाए। शानदार पिकनिक स्पॉट चलते हुए एक और खास जगह दिखाई दी जिससे मन आनंदित हो गया। बांस के पेड़ों की ओंट में ठीक झील के सामने एक कैफ़े दिखा। सोचिए कुदरत की गोद में बैठ कर लंच का मज़ा ही कुछ और होगा। इसके दूसरी तरफ ठीक सामने फूलों से भरी रंगीन नर्सरी थी। ऐसे में प्रेमी जोड़े और उनके खिलखिलाते चेहरे देख कर नजारा और भी हसीन लगने लगा। जगह-जगह बच्चों के लिए प्लेइंग जोन मिल जाएंगे। न केवल युवाओं के लिए बल्कि परिवार और बच्चों के साथ भी यहां आ के आपका दिन बन सकता है।(Sunder Nursery) सुन्दरवाला महल बाहर निकलते हुए एक और महल पर नजर पड़ी। ये था सुन्दरवाला महल। जगह-जगह गार्डन और मकबरों का ऐसा मेल आपको बोरियत का एहसास तो बिल्कुल नहीं होने देगा। इस महल में कब्रगाह के चारों तरफ आठ कमरे बने हैं। जो इसे चौकोर मकबरे का आकार देता है। इस महल की हालत बहुत ज्यादा खराब हो चुकी थी जिसे पुनर्निर्माण के जरिये ठीक किया गया। इसके ठीक सामने एक भूमिगत रंगमंच भी है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजनों में इसका उपयोग किया जाता है। सफर में आगे बढ़ते हुए तरफ-तरह के पक्षियों और फूलों को देखना लुभाता है। रास्ते में छोटे-छोटे कॉफी पॉइंट नजारों को और भी ज्यादा आकर्षक बना देते हैं। अंतिम पड़ाव में एक और ऐतिहासिक इमारत पर नज़र पड़ी। ये था मिर्जा मुजफ्फर हुसैन का मकबरा। बादशाह अकबर के दामाद का ये मकबरा एक दुर्लभ ढांचा है। इसके अंदर कब्र है जिसे आठ कमरों से घेरा हुआ है। महीन सजावट और आयतों से सजा ये मकबरा देखने के लिहाज से बेहद खास है। इसकी सुंदरता मोहित करती है। (Sunder Nursery) क्यों जाएँ सुन्दर नर्सरी?    Five Reasons to Visit This Place – 1.आप चाहें तो यहाँ घंटों व्यतीत कर सकते हैं क्योंकि इस जगह बोर होने का तो सवाल ही नहीं उठता। 2. जिन प्रकृति प्रेमियों को नई-नई जगह देखने का शौक हो उनके लिए सुन्दर नर्सरी एक उम्दा विकल्प है। 3. वैसे आप यहाँ किसी भी समय आ सकते हैं लेकिन फिर भी जब मौसम थोड़ा ठंडा हो तब यहां आना बेहतर रहता है। 4. यहाँ स्थित झील, सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए ओपन एयर थिएटर, भव्य मकबरें और महल आपको प्रकृति और इतिहास दोनों का अहसास कराएंगे। 5. दिल्ली में क्वालिटी टाइम बिताने के लिए यह बेहद शानदार जगह है।  फ़िलहाल हमारा ये सफर तो यहीं खत्म हुआ पर हम फिर मिलेंगे किसी नए सफर पर। Written & Research – Nikki Rai Edited by Pardeep Kumar some glimpse of Sunder Nursery Garden……

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New Tehri – Uttarakhand Tourism

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Tehri Uttarakhand- टिहरी: एक ऐसा शहर जिसे कभी डूबा दिया गया था by Pardeep Kumar धनौल्टी में नेचर व्यू, एडवेंचर स्पॉट्स, ईको पार्क, सुरकंडा देवी मंदिर और स्थानीय गांव और बाजार देखने के बाद शेड्यूल के अनुसार अगले दिन हमारा प्रोग्राम था चम्बा और टिहरी बांध और शहर देखने का। जिसके बारें में हमने काफी सुना था। धनौल्टी से टिहरी टिहरी जाने का खास मकसद था एक ऐसे शहर को देखना, समझना जिसे डूबा कर उस पर बांध बना दिया गया था। सम्भवतः जिसकी गिनती देश के सबसे बड़े बांधों में की जाती है। सुबह नाश्ते में मिक्स वेज परांठे लिए वो भी ताजा मक्खन और गरमा-गर्म चाय के साथ। पहाड़ों की सर्दियों में चाय आपको अवश्य रास आएगी। धनौल्टी से टिहरी लगभग ढाई-तीन घंटे का सफर था। चम्बा शहर के बाजार होते हुए हम तकरीबन एक बजे टिहरी झील पहुंचे। जिसे आज सुमन सागर के नाम से जाना जाता है। जहाँ आज लगभग बयालीस किलोमीटर लम्बी झील दिखाई देती है वहां कभी भरा-पूरा टिहरी शहर था। बताते हैं यह टिहरी शहर दो सौ साल से भी ज्यादा समय तक आबाद रहा। (Tehri, Uttarakhand) आज भी जब गर्मियों में झील के पानी का लेवल कम हो जाता है तब आप आसानी से इस शहर के राजमहल के कुछ हिस्से इस विशाल झील में देख सकते हैं। आज इस पूरे क्षेत्र को एक सुन्दर टूरिस्ट स्पॉट के रूप में डेवेलप किया गया है। झील के किनारे पर बहुत सारे छोटे-छोटे फ़ूड स्टाल बनाये गए हैं जहाँ पर पर्यटक जलपान करते हुए पहाड़ों की तलहटी में दूर-दूर तक फैली झील को निहार सकते हैं, प्राकृतिक दृश्यों का आनंद ले सकते हैं। जब विकास की भेंट चढ़ा एक भरा पूरा आबाद शहर हमने वहां पहुँच कर सबसे पहले मैगी आर्डर की और चाय पीते हुए इत्मीनान से अपनी थकान उतारी। चाय के शौकीन लोगों के लिए इससे बेहतर तो क्या ही होगा। नीला आसमान और सर्द तेज हवाएं बड़े मेट्रो शहर और पहाड़ों के दरमियान जो बड़ा अंतर् है उसे बयान कर रही थी। वही चाय पीते हुए पता चला कि सिर्फ एक बांध बनाने के लिए एक पूरे टिहरी शहर को डूबा दिया गया। एक पूरा शहर विकास की भेंट चढ़कर सदा के लिये पानी में समा गया। बताते हैं इस बांध के निर्माण से यहाँ के लगभग 125 गांवों पर असर पड़ा था। इस दौरान 37 गांव पूरी तरह से डूब गए थे जबकि 88 गांव आंशिक रूप से प्रभावित हुए थे। और फिर नए टिहरी शहर को बनाने के लिए पहाड़ और असंख्य पेड़ों को अपनी कुबानी देनी पड़ी। यह नया टिहरी शहर वहां से लगभग चौदह-पंद्रह किलोमीटर दूर थोड़ी ऊंचाई पर बनाया गया। वाटर स्पोर्ट्स और एक्टिविटीज का हब – टिहरी झील यह बांध और झील जहाँ पर तरह-तरह के वाटर स्पोर्ट्स, जेट स्कीइंग से हॉट एयर बैलून सवारी तक कई अलग-अलग एक्टिविटीज शामिल हैं, और शायद वहां के बहुत सारे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का अवसर भी। टिहरी झील आकर पर्यटक नौका विहार, जेट स्पीड बोट सवारी, वाटर स्कीइंग, जोर्बिंग, बनाना वोट सवारी, बैंडवेगन वोट सवारी, हॉटडॉग सवारी और पैराग्लाइडिंग जैसे स्पोर्ट्स एडवेंचर्स कर सकते हैं। वहीं टिहरी झील के किनारे एक जगह वाटर एक्टिविटीज के लिए टिकट काउंटर था जहाँ से हमने बोटिंग करने के लिए टिकट लिया और खूबसूरत पहाड़ों के बीच दूर तक फैली टिहरी झील का लगभग 4० मिनट जी भर कर आनंद लिया। आप एक लम्बा सफर तय करने के बाद जब इस झील में एक शिकारे टाइप बोट से प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लेते हैं तब ऐसा लगेगा कि इतनी दूरी तय करके यहाँ आना किसी भी तरह घाटे का सौदा नहीं है। झील के पास पहुँचते ही आपका हाथ अपने आप कैमरे या फोन तक जायेगा और आप स्वयं को यहाँ के खूबसूरत लम्हों को कैद करने से बिलकुल भी नहीं रोक पाओगे। मन करेगा यहाँ से सब कुछ समेट ले जाओ। आपको यहाँ अनगिनत नेचुरल सेल्फी पॉइंट मिल जायेंगे जहाँ आप जी भर कर फोटो ले सकते हैं। दरअसल हिल स्टेशन अपने दृश्यों के लिए जाने जाते हैं ऐसे में वहां अगर आपको नेचुरल व्यूज के अलावा झील और एडवेंचर स्पॉट मिल जाये तो समझ लीजिए यात्रा सफल। इसी मनभावन सौदर्यता से परिपूर्ण टिहरी शहर में और इसके आसपास की खूबसूरत जगहों पर बॉलीवुड स्टार शाहीद कपूर और श्रद्धा कपूर की फिल्म बत्ती गुल मीटर चालू की लगभग सारी शूटिंग हुयी है। हमने टिहरी में अच्छा-खासा समय व्यतीत किया। और शाम तक नए टिहरी शहर और चम्बा होते हुए वापिस धनौल्टी अपने रिज़ोर्ट पहुँच गए। अगले दिन वापिसी तय थी और फिर शामिल हो जाना था उसी भीड़ भाड़ और व्यस्तता भरी दुनिया में जहाँ लौटना हमारी मजबूरी थी।  (Tehri, Uttarakhand) Written by Pardeep Kumar some glimpse of Tehri Lake….

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Safdarjung Tomb – History, Facts & Architecture

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Safdarjung Tomb: दिल्ली के किसी बादशाह के नहीं बल्कि प्रधानमंत्री के नाम पर बना है यह मकबरा Five Colors of Travel आपने दिल्ली की जानी-मानी जगहें तो बहुत घूमी होंगी पर अब वक्त है एक अनजान और नए सफर पर ले चलने का। हम निकले हैं दिल्ली की कुछ नायाब इमारतों की खोज में, जिनका महत्व तो बहुत है पर प्रचार और इतिहास में जगह न मिल पाने के कारण आज ये स्थान पर्यटकों की नजरों में या तो नहीं हैं या बहुत कम हैं। लम्बे रिसर्च और ढेरों जानकारियां निकालने के बाद फैसला किया सफदरजंग का मकबरा देखने का। गूगल मैप पर अपनी अन्य खोजों के दौरान कई बार मकबरे के नाम पर नजर पड़ी पर अनजान और अनसुने नाम के कारण कभी गौर नहीं किया था। इस बात की भी कोई जानकारी नहीं थी कि मकबरा हुमायूं के मकबरे जैसी ही सुंदरता समेटे हुए है भले ही वह बहुत विशाल और विस्तृत न हो। गूगल पर कुछ तस्वीरें देखीं और मन बनाया सफदरजंग का मकबरा देखने का। सफर का मकसद दुनिया को दिल्ली की अनछुई, अनदेखी लेकिन खूबसूरत जगहों से रु-ब-रु कराना है। Safdarjung Tomb निकटतम मेट्रो स्टेशन सफदरजंग मकबरे के लिए सबसे निकटतम मेट्रो स्टेशन येलो लाइन पर स्थित जोर बाग है। इस स्टेशन से मकबरा लगभग चार सौ मीटर की दूरी पर है। मेट्रो स्टेशन से मकबरे तक जाने के लिए आप या तो बैटरी रिक्शा किराये पर ले सकते हैं या फिर मकबरे तक आराम से पैदल यात्रा भी कर सकते हैं। मकबरे के मुख्य द्वार पर पहुँच कर लगा जैसे हम किसी राजस्थानी महल के सामने विराजमान हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि मक़बरा बेहद सुन्दर लग रहा था। बिलकुल ऐसे कि बाहर से देखकर कोई भी अंदर खिंचा चला जाए। रुख किया टिकटघर की तरफ 25 रुपये के मामूली दाम का टिकट कटाया और चल पड़े दूर से दिख रहे खूबसूरत से मकबरे की तरफ। मुख्य द्वार (जो एक समय पर मदरसा हुआ करता था) से निकल ही रहे थे कि आवाज़ आई- रुकिए! एंट्री तो कर दीजिए। आवाज़ चौकीदार साहब की थी। एंट्री रजिस्टर देखा तो आश्चर्य से आँखें बड़ी हो गई। केवल 20 लोगों की एंट्री। परिसर में ऐसे तो दूर-दूर तक कोई नहीं दिखा पर थोड़ा आगे चलते ही कुछ प्रेमी परिंदे दिखने लगे तब कुछ राहत मिली। सुनसान और एकांत सा देखकर एक पल थोड़ी घबराहट लाज़िमी है लेकिन थोड़ा आगे बढ़ने पर कुछ ही पलों में यह घबराहट उत्साह में बदल जाती है।(Safdarjung Tomb) सफदरजंग का मकबरा सामने सफदरजंग का मकबरा था और उसके आगे बड़ा-सा फव्वारा जो मकबरे की सुंदरता में स्वर्ग-सा तेज प्रदान कर रहा था। फव्वारे के जल में मकबरे का अक्स और भी खूबसूरत लग रहा था, भला कोई कैसे इसकी तस्वीर अपने कैमरे में कैद किए बिना रह सकता था। मकबरे की स्थापत्य शैली बहुत सहज पर शोभनीय लगी। चार बाग शैली इसे और भी आकर्षक बनाती है। कुतुब मीनार, लाल किला के अपने सफर में हम आपको चार बाग शैली के बारे में बता ही चुके हैं। मुगल कालीन इमारतों में ये शैली बहुत प्रसिद्ध रही है। परिसर में बीचों-बीच सफदरजंग मकबरा है और मकबरे के तीन तरफ एक जैसे दिखने वाले तीन अलग-अलग महल हैं- जंगली महल, बादशाह पसन्द और मोती महल। तीनों महल उत्तर मुगलकालीन वास्तुशैली में बने हैं। मेहराबयुक्त मण्डप जैसे सफेद महल परिसर की सुंदरता बढ़ाते हैं। अब मकबरे के अंदर पहुंचने की जल्दी थी। एक खास बात ये थी बाहर से देखने पर मकबरा चारों तरफ से एक जैसा ही दिखता था। चारों ओर एक ही शैली में फ़व्वारे बने हैं। एक पल को ये मकबरा हुमायूं के मकबरे जैसा ही दिखता है। मकबरे के अंदर की खूबसूरती का क्या ही बखान करें। इसे देखना भर ही इसका जवाब है। चारों ओर से सूर्य की किरणें छनकर मकबरे को रोशन करती हैं। मकबरे के बीचों-बीच सफदरजंग की मजार सूर्य की किरणों से चमकती नजर आती है। मकबरे की पहली मंजिल से परिसर में बने तीनों महल और परिसर की मस्जिद भी साफ नजर आती है। यहाँ आकर एक बात जो साफ़ नज़र आयी वो ये कि भले ही यह मकबरा ताज या हुमायूँ के मकबरे की तरह भव्य और आलीशान  न हो लेकिन इसकी सादगी और बनावट मन को खूब भाती है, वाकई में ऐसा नजारा देखना जन्नत से कम नहीं। न जाने क्यों दुनिया इतनी हसीन और खूबसूरत जगह से वाकिफ़ नहीं है, ये किसी बदनसीबी से कम नहीं।  एक प्रधानमंत्री के नाम पर बना है यह मकबरा अक्सर नाम को लेकर यह भ्रम हो ही जाता है कि सफरदजंग कोई बादशाह था, क्योंकि देश भर में अधिकतर मकबरें तो राजा या किसी बादशाह के ही बने हुए हैं। लेकिन सफदरजंग मकबरे के बारें में यह सोचना गलत है। दरअसल, वह मुगल बादशाह मुहम्मद शाह का प्रधानमंत्री था। 1753-54 में नवाब शुजाउद्दीला ने अपने पिता मिर्जा मुकीम अबुल मंसूर खान जिनकी उपाधि सफदरजंग थी, की स्मृति में सफदरजंग मकबरे का निर्माण करवाया था। सफदरजंग मुगल बादशाह मुहम्मद शाह के शासन काल में अवध के सूबेदार और प्रधानमंत्री रहे। लाल बलुआ पत्थर से बना भव्य मकबरा वाकई सुंदरता की मिसाल है। मकबरे के गार्ड साहब से बात करने पर इसके अलग-अलग महलों की जानकारी हुई। परिसर की पूरी जानकारी उन्होंने एक गाइड की भांति मुझे दी। ऐसे किसी स्मारक स्थल पर लम्बे समय तक रहते-रहते कोई भी कर्मचारी एक समय के बाद गाइड हो ही जाता है। बातचीत में गार्ड साहब ने ये भी कहा- ‘ये जगह बहुत खूबसूरत है पर लोग कम ही आते हैं। आए दिन लोग इसके ऊपर वीडियो बनाने आते हैं ताकि लोग इस जगह को जान सके। जबसे इसका जीर्णोद्धार हुआ है तबसे पहले से कुछ ज्यादा लोग यहाँ आने भी लगे हैं। बाकी हमारा अनुभव शानदार रहा। और हम वहां से यह सोचकर विदा हुए कि जल्द ही सर्दियों में इस मकबरे का दोबारा दीदार हो। यही सुझाव है कि दिल्ली आए तो एक बार सफदरजंग का मकबरा जरूर घूमें और दिल्ली के ही हैं तो एक बार इस खूबसूरती पर भी अपनी निगाहें अवश्य डालें। क्यों देखें सफदरजंग मकबरा ? Five reasons to visit this place- 1. मेट्रो

Food Haryana Review

Murthal ke Paranthe

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Murthal ke Paranthe: मुरथल के परांठे वाले ढाबे -जहाँ रोजाना लगभग 40-50 हजार से अधिक लोग खाने का लुत्फ उठाते हैं by Pardeep Kumar अगर आप परांठे खाने के शौक़ीन हैं तो आज हम आपको अपने इस ब्लॉग में रू-ब-रू करवाएंगे तकरीबन देश भर में प्रसिद्ध मुरथल के मशहूर परांठों के स्वाद से। वैसे तो मुरथल के परांठे पूरे देश में फेमस हैं लेकिन फिर भी दिल्ली से लगते सात राज्यों में अपने पराठों के स्वाद के लिए प्रसिद्ध मुरथल के ढाबों का कोई सानी नहीं। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, राजस्थान, उत्तराखंड, दिल्ली और उत्तर प्रदेश से भी लोग यहाँ आकर परांठों का लुत्फ़ उठाते हैं। खासकर शनिवार और रविवार को यहां दिल्ली-एनसीआर से परांठों के शौकीनों की भारी भीड़ उमड़ती है। अगर आप दिल्ली से चंडीगढ़ जा रहे हैं तो एन एच 1 पर सोनीपत के नजदीक और दिल्ली से तकरीबन घंटे भर के सफर पर एक छोटे से कस्बे मुरथल में यह ढ़ाबे मौजूद हैं। (Murthal ke Paranthe) किसान आंदोलन और दिल्ली से मुरथल का सफर काफी दिनों से मुरथल का प्लान बनाया जा रहा था। क्योंकि आजकल किसान आंदोलन के कारण दिल्ली से मुरथल पहुंचना थोड़ा मुश्किल हो गया था इसलिए कई बार प्रोग्राम बना और बिगड़ भी गया। लेकिन इस बार वीकेंड पर हमने ठान लिया था कि कैसे भी करके मुरथल के परांठे खाने ही हैं। सो दिल्ली से हमने औचंदी बॉर्डर का रास्ता लिया और अंदर अलग-अलग गांव से होते हुए सोनीपत शहर से गुजरते हुए तकरीबन दोपहर के 3 बजे मुरथल पहुंचे। और जब आप इस तरह का सफर तय करते हैं तब भूख कुछ ज्यादा ही लग जाती है और मैं हमेशा कहता हूँ खाने का असली मजा तब है जब आपको जोर की भूख लगी हो। और ऊपर से मुरथल के विख्यात परांठे हो वो भी ताजा मक्खन के साथ तो बस समझ लीजिये आपका दिन बन गया। वैसे तो मेरा सारा बचपन सोनीपत शहर में ही गुजरा है। 12वीं कक्षा तक मेरी स्कूली एजुकेशन इसी शहर में हुयी और इसी कारण जब भी मेरा और मेरे कुछ दोस्तों का मन करता तब हम सोनीपत से मुरथल आ जाते थे परांठे खाने। सोनीपत से मुरथल यही 6-7 किलोमीटर है और आजकल तो ऐसा लगता है कि मुरथल सोनीपत शहर में ही मिल गया है। वो नब्बें का दशक था। यही 1997-98 का समय। स्कूल टाइम की यादें और मुरथल के परांठे मुझे अच्छे से याद है तब मुरथल बस स्टॉप से पानीपत की तरफ थोड़ा आगे निकल कर गुलशन का ढ़ाबा ही फेमस हुआ करता था और उसके आसपास एक दो ढ़ाबे और थे। तब परांठे का साइज आज के परांठों के साइज से बड़ा होता था। तब मुरथल के ढाबों पर सिर्फ दाल मखनी, परांठे, खूब सारा मक्खन और मीठे में खीर ही मिलती थी लेकिन आज यहां पर हर प्रकार के शाकाहारी स्वादिष्ट व्यंजन मिलते हैं। नब्बे के दशक में हम देखते थे कि पहले सिर्फ ट्रक चालक यहां से गुजरते हुए रुककर खाना खाते थे, या फिर सोनीपत के युवाओं की टोलियां जिनका कभी-कभार बाहर खाने का मन करता। लेकिन आज यहाँ का मंज़र बिलकुल बदल चुका है, अब आपको इन फुली एयर कंडीशंड ढाबों की पार्किंग में सैंकड़ों लक्ज़री कार दिखाई देंगी और कई बार तो भीड़ इतनी बढ़ जाती है कि सैंकड़ों गाड़ियों की पार्किंग की जगह होने के बाद भी यहाँ आपको अपनी कार पार्क करने की जगह नहीं मिलती। Murthal Ke Paranthe आजकल लोग यहां अपने परिवार के साथ पार्टी व अन्य पारिवारिक कार्यक्रम आयोजित करने आते हैं, मैंने आपको पहले ही बताया कि दिल्ली से महज घंटा भर की ड्राइव कर यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। यही बड़ी वजह है कि दिल्ली और एनसीआर के लोग खासकर युवा यहाँ अक्सर देर रात या वीकेंड पर पराठे खाने के लिए आते हैं। बताते हैं मुरथल के ढाबों की शुरुआत 1950-60 के दशक में हुई थी। बेहद परम्परागत ढाबों के तौर पर शुरू हुए यह ढाबे आज अपनी अलग ही क्रेज बना चुके हैं। एक अनुमान के अनुसार रोजाना लगभग 40-50 हजार से अधिक लोग यहां आकर खाने का लुत्फ उठाते हैं। यह वास्तव में एक अद्भुत संख्या है। वैसे तो यहाँ जितने भी ढाबे हैं चाहे काफी पुराना पहलवान ढाबा हो, आहूजा हो या फिर झिलमिल उन सभी में परांठों का स्वाद लाजवाब है लेकिन फिर भी अमरीक सुखदेव का पिछले एक दशक से यहाँ एक तरफा राज है। शायद यही वजह है अगर आप वीकेंड पर यहाँ आएंगे तो हो सकता है लगभग 20-25 मिनट आपको बैठने के लिए सीट भी न मिले। लेकिन कहते हैं न कि इंतज़ार का फल मीठा होता है, बस यहाँ इंतज़ार का फल बेहद स्वादिष्ट मिलेगा। सुपर स्टार धर्मेंद्र का गरम-धरम ढाबा अमरीक सुखदेव के बिलकुल साथ लगता और कुछ साल पहले बना गरम-धरम ढ़ाबा भी है, जोकि अपनी बनावट के कारण लोगों में काफी पॉपुलर भी हो रहा है। इस ढ़ाबे की पूरी थीम बॉलीवुड सुपरस्टार धर्मेंद्र की फिल्मों पर बेस्ड है। पूरे ढ़ाबे को धर्मेंद्र की फिल्मों के अनुसार डिज़ाइन किया गया है। ढ़ाबे के बाहर मेन गेट पर आपको शोले फिल्म की मशहूर पानी की टंकी दिखाई देगी जिस पर चढ़कर धर्मेंद्र फिल्म की नायिका हेमा मालिनी को परपोज करता है। अंदर ढ़ाबे में आप ऑटो रिक्शा, ट्रक और धर्मेंद्र की फिल्मों के पोस्टरों के बीच में इस ढाबे पर बनने वाले फेमस फ्रूट परांठे का स्वाद भी ले सकते हैं। हम अमरीक सुखदेव के परांठे कई बार खा चुके थे इसलिए इस बार हमने गरम-धरम ढ़ाबे के परांठे खाने का निर्णय लिया। एंट्री गेट पर ही गार्ड ने हैंड सेनिटाइज करवाए। अंदर वातानुकूलित हॉल में एक अच्छा-सा कार्नर देखकर हमने आसन जमा लिया। भूख लगी थी इसलिए तुरंत चाय और मिक्स वेज परांठे आर्डर किये। तकरीबन 10 मिनट के इंतज़ार के बाद परांठे की थाली आ चुकी थी। कड़क चाय, दो-तीन तरह का अचार, हरी मिर्च और ताजे मक्खन की भरी कटोरी और गरमा-गर्म परांठे। बिना तले स्वादिष्ट परांठे अगले कुछ लम्हें सब कुछ भूल कर हमने सिर्फ परांठों पर ही फोकस किया। स्वादिष्ट और एकदम फ्रेश। पराठे खाते वक्त हमने देखा कि यहाँ के परांठों की फिलिंग में ज्यादा चीजें

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Brahma Sarovar Kurukshetra – Best Place to Visit in Haryana 

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कुरुक्षेत्र का ब्रह्मसरोवर – एशिया का सबसे बड़ा मानव निर्मित सरोवर हमारे देश में बहुत-सी ऐसी जगह हैं जिनका जिक्र हमारे धार्मिक ग्रंथों में भी किया गया है। और यह स्थान कई हजार साल पुराने हैं। यही कारण है कि लोग उन जगहों पर घूमना बहुत पसंद करते हैं,जो बहुत प्राचीन हैं और हमारी आस्था के साथ भी जुड़े हुए हैं। महाभारत के युध्द को कौन नहीं जानता, महाभारत के सभी मुख्य किरदार आज भी हमारे दिलों दिमाग में बैठे हुए हैं। महाभारत का युद्ध कुरुक्षेत्र में हुआ था यह बात तो सभी जानते हैं, मगर बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो कुरुक्षेत्र से ज्यादा दूरी होने की वजह से वहां पर नहीं जा पाते हैं। और कुरुक्षेत्र में कौन-सी जगह क्यों प्रसिद्ध है, इसकी भी जानकारी उन्हें नहीं है। अगर आप  कुरुक्षेत्र जाने की प्लानिंग कर रहे हैं  तो यह ब्लॉग आपके लिए बहुत फायदेमंद हो सकता है। स्टेशन से ब्रह्मसरोवर आप जैसे ही कुरुक्षेत्र रेलवे स्टेशन के बाहर निकलेंगे तो आपको यह रेलवे स्टेशन किसी राजमहल से कम नहीं लगेगा। आप स्टेशन की डेकोरेशन देखकर ही अनुमान लगा लेंगे कि जरूर इस शहर में कोई ना कोई खास बात है। स्टेशन के बाहर कई ऑटो वाले खड़े होते हैं आप चाहे तो ऑटो स्पेशल रिजर्व करा कर भी जा सकते हैं या सवारी के हिसाब से भी सफर कर सकते हैं। ब्रह्मसरोवर जाने का किराया प्रति सवारी मात्र 20 रुपये है। स्टेशन से ब्रह्मसरोवर की दूरी 3.5 किलोमीटर की है। ब्रह्मसरोवर की ओर जाते  हुए छठी पातशाही गुरुद्वारा, सन्निहित सरोवर, पैनारोमा एवं विज्ञान केंद्र, श्री कृष्ण संग्रहालय इसी मार्ग में मिलेंगे। लेकिन आज इस ब्लॉग में हम आपको रूबरू करवाएंगे कुरुक्षेत्र के प्रसिद्ध ब्रह्म सरोवर से। जानिए ब्रह्मसरोवर का इतिहास सबसे पहले समझते हैं ब्रह्म सरोवर के इतिहास को, यह जगह क्यों फेमस है और क्यों यहाँ देश के दक्षिणी राज्यों केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटका तक से श्रद्धालु आते हैं। जिन लोगों की धर्म में अटूट आस्था है वो साल भर यहाँ बड़े श्रद्धा भाव से आते हैं। बाकी बहुत से लोग विशेष अवसरों पर जैसे सोमवती अमावस्या, सूर्य ग्रहण पर यहाँ आते हैं। दरअसल ब्रह्मसरोवर का संबंध सृष्टिकर्ता ब्रह्मा से माना गया है। भगवान विष्णु के अवतार भगवान परशुराम का इस सरोवर से विशेष संम्बंध रहा है। पौराणिक अध्ययनों के अनुसार इस सरोवर की सर्वप्रथम खुदाई राजा कुरु ने करवाई थी इन्ही के नाम पर इस स्थान का नाम कुरुक्षेत्र पड़ा। इसी स्थल पर प्रजापति ब्रह्मा ने सबसे पहले युद्ध किया था। द्रोपदी कूप सूर्य ग्रहण के अवसर पर ब्रह्म सरोवर में लाखों की संख्या में श्रद्धालु स्नान कर पुण्य अर्जित करते हैं। पौने चार किलोमीटर में फैला यह प्राचीन सरोवर भारत के मानव निर्मित सरोवरों में से सबसे बड़ा सरोवर है। इसी स्थान पर सरोवर के मध्य भाग में प्राचीन द्रोपदी कूप भी है जिसे चंद्रकूप कहा जाता है। ब्रह्म सरोवर आने वाले श्रृद्धालु सरोवर में स्नान करने के उपरांत इस कूप के दर्शन अवश्य करते है, जिसे बहुत शुभ माना जाता है। इस सरोवर की विशालता को देखते हुए अकबर के कवि अबुल फजल ने इसे लघु समुद्र की संज्ञा दी थी। इस सरोवर में स्नान करना हजारों अश्वमेध यज्ञ करने के बराबर माना जाता है। महाभारत का युद्ध जीतने के बाद युधिष्ठिर ने इस के मध्य भाग में विजय स्तंभ निर्माण करवाया। महाभारत में भी ब्रह्म सरोवर का जिक्र है कि महाभारत युद्ध के अंतिम दिन, युद्ध में हार जाने के बाद, दुर्योधन इसी सरोवर में आकर छुप गया था। आप को ब्रह्मसरोवर के मुख्य द्वार के सामने, बाहर की और कई तरह की दुकानें दिखाई देंगी, जहाँ आपको हर तरह के सजावट और वुडेन क्राफ्ट का सामान मिल जायेगा। यहाँ से आप हल्की फुलकी शॉपिंग कर सकते हैं। बाहर काफी सारे भोजनालय भी आपको आसानी से मिल जायेंगे लेकिन यहाँ खाने से पहले थोड़ा क्वालिटी रिसर्च कर लें तो बेहतर होगा।  यहां पर रविवार के दिन काफी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ देखने को मिलती है। बाकी सप्ताह में भीड़ इतनी ज्यादा नहीं होती। हां, अगर कोई पर्व या त्यौहार हो तो यहां पर अच्छी खासी भक्तों की भीड़ देखने को मिल सकती है। ब्रह्मसरोवर में प्रवेश करते ही आपको शानदार नजारा देखने को मिलता है जो सामान्यतः किसी सरोवर को देखने पर नहीं मिलता। एकबारगी यह सरोवर किसी लघु समुंदर से कम नही लगता। इसकी विशालता और भव्यता को देखकर आप मनमोहित हो जाओगे। सरोवर के बीचोबीच पुल बना हुआ है जहाँ खड़े होकर आप सरोवर की ख़ूबसूरती का आनंद ले सकते हैं। साथ ही यहां पर आप प्राचीन ऐतिहासिक और हस्तशिल्प की कलाओं से परिचित होंगे। सरोवर के पास बनी दीवारों पर आपको कई तरह के चित्र देखने को मिलेंगे। सरोवर के चारो और अलग अलग पौराणिक दैवीय पात्रों के नाम पर स्नान घाट बने हुए हैं जो सूर्यास्त के समय या संध्या के समय एक अलग ही छटा बिखेरते हैं। इन घाट पर बैठकर आप आसानी से योग, अध्यात्म और ध्यान कर सकते हैं। सुबह शाम यहाँ आपको मंदिर की आरती और घंटियों की आवाज़ सुनाई देती है। ऐतिहासिक शिव महादेव मंदिर श्रीकृष्ण की अर्जुन को उपदेश देते हुए  विराट प्रतिमा सरोवर के बीच में ऐतिहासिक शिव महादेव मंदिर भी है जहाँ काफी संख्या में श्रद्धालु आते हैं और वहीँ मंदिर के किनारे सीढ़ियों पर बैठकर मछलियों को आटा दाना खिलाते हैं। कहते हैं यहाँ मछलियों को भोजन कराने से पुण्य की प्राप्ति होती है। यह मंदिर एक छोटे से पुल द्वारा सरोवर के किनारे से जुडा हुआ है।  नवंबर दिसंबर के महीने में गीता जयंती के अवसर पर देश भर से श्रद्धालु ब्रह्म सरोवर में स्नान करने आते हैं।  साथ ही गीता जयंती के उपलक्ष्य में हरियाणा सरकार द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मेले का भव्य आयोजन किया जाता है जिसमें देश विदेश से कलाकार भाग लेते हैं। ब्रह्म सरोवर में श्रीकृष्ण की अर्जुन को उपदेश देते हुए  विराट प्रतिमा भी विशेष आकर्षण का केंद्र है। अगर आप श्रद्धा और आस्था के अलावा परिवार या दोस्तों के साथ क्वालिटी टाइम बिताना चाहते हैं तो भी यह बेस्ट डेस्टिनेशन है। अगर आप इस  सरोवर को पूरा और अच्छे से घूमना चाहते हैं तो उसके लिए आपको थोड़े

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Jim Corbett National Park – The First Tiger Reserve of India

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Jim Corbett National Park Ramnagar- जंगल सफारी और प्रकृति प्रेमियों के लिए बेस्ट डेस्टिनेशन by Pardeep Kumar वन्य जीव प्रेमियों के लिए स्वर्ग समझा जाने वाला और देश का सबसे पुराना राष्ट्रीय उद्यान जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क उत्तराखंड के रामनगर में स्थित है। जहाँ दिल्ली से आप आराम से पांच से छह घंटे का सफर तय करके पहुंच सकते हैं। थोड़ा अतिरिक्त  समय लगता भी है तो सिर्फ मुरादाबाद से काशीपुर तक जहाँ सड़क थोड़ी जर्जर हालत में है। इसके अलावा पूरा रास्ता दिल्ली-लखनऊ हाईवे-24 ही है। हम सुबह तकरीबन 5 बजे दिल्ली से निकले थे और ग्यारह-साढ़े ग्यारह तक रामनगर पहुंच गए थे। रास्ते में गढ़ मुक्तेश्वर से थोड़ा आगे निकल कर आपको कुछ बेहतरीन ढाबे और मेक्डोनाल्ड, बर्गर किंग, बीकानेरवाला, केएफसी और स्टारबक्स आदि  मिल जायेंगे जहाँ रूक कर आप ब्रेकफास्ट लंच या चाय वगैरह ले सकते हैं। Jim Corbett National Park होटल और रिज़ॉर्ट ठहरने के लिए आपको रामनगर में बहुत-सी जगह मिल जाएँगी। कॉर्बेट पार्क के आसपास बहुत सारे होटल और रिज़ॉर्ट बजट के अनुसार पर्यटकों के लिए उपलब्ध हैं। लेकिन मैं राय दूंगा अगर आप प्रकृति प्रेमी हैं और दो-तीन दिन दुनिया के शोर शराबे से दूर बेहद इत्मीनान से बिताना चाहते हैं तो आप कोई अच्छा-सा रिवर व्यू रिज़ॉर्ट पहले से बुक कर लें। जहाँ आप बहुत सारे एडवेंचर्स के बाद भी कम्फर्ट महसूस करेंगे।  इसके अलावा जंगल में भी रात्रि ठहराव के लिए रेस्ट हाउस बनाये गए हैं जिनकी ऑनलाइन बुकिंग आपको काफी पहले से करनी पड़ती है। इसके लिए और अधिक जानकारी के लिए आप उत्तराखंड टूरिज्म की वेबसाइट पर सर्च कर सकते हैं। नेशनल पार्क का इतिहास और नामकरण आपकी जानकारी के लिए बता दूं 1936 में ब्रिटिश शासन के दौरान संयुक्त प्रांत के गवर्नर मैल्कम हेली के नाम पर इस पार्क का नाम हेली नेशनल पार्क रखा गया था। देश के आज़ाद होने के बाद इस पार्क का नाम बदलकर रामगंगा नेशनल पार्क रख दिया गया। सके बाद 1957 में एक बार फिर इस पार्क का नाम जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क कर दिया गया था। जिम कॉर्बेट एक प्रसिद्ध ब्रिटिश शिकारी, प्रकृतिवादी और फोटोग्राफर था। बताते हैं जिम कॉर्बेट ने उस बाघ का शिकार किया था जिसने कथित तौर पर बेहरमी से 400 लोगों की जान ले ली थी। साल 1907 से 1929 के वर्षों के दौरान कार्बेट ने अनेक नरभक्षियों को मारा जिनसे स्थानीय निवासी बेहद ख़ौफ़ज़दा थे। कार्बेट भारत से बहुत प्यार करते थे और उन्होंने इस पर काफी किताबें भी लिखी। कार्बेट ने यहीं पर रहकर मानवाधिकारों के लिए भी आवाज़ उठाई और संरक्षित जीवों के लिए आंदोलन आरम्भ किया। कार्बेट ने अपने करियर के आखिरी दौर में नैनीताल जिले के कालाढूंगी में रहना शुरू किया, यहाँ छोटी हल्द्वानी गांव से उन्हें वन्य जीवों की समझ हुई जिसे अब पर्यटन गांव के रूप में बनाया गया है। यहाँ कार्बेट की छवि ब्रिटिश शोषकों की बजाय स्थानीय निवासियों के हितैषी, मानवीय मूल्यों से ओतप्रोत और प्रकृतिविद के रुप में स्थापित है। बताते हैं जब वो देश छोड़ कर गए तब उन्होंने अपनी सैंकड़ों एकड़ जमीन छोटे हल्द्वानी के ग्रामीणों को दान स्वरुप दे दी थी। प्रकृति प्रेमियों के लिए जन्नत दरअसल यह कॉर्बेट पार्क उन सभी लोगों के लिए जन्नत है जो प्रकृति की गोद में थोड़ा क्वालिटी टाइम बिताना चाहते हैं। इस पार्क में बंगाल टाइगर, तेंदुए, हाथी, जंगली सुअर, बारहसिंगा, हिरण और मगरमच्छ जैसे अनेक जानवर हैं। हमनें एक सप्ताह पहले ही थोड़ा रिसर्च करके एक अच्छा-सा रिज़ॉर्ट बुक कर लिया था, इसलिए रिज़ॉर्ट पहुँचते ही सबसे पहले तरो ताज़ा हुए, चाय पी, उसके बाद थोड़ा आराम किया। मुख्य सेंटर पॉइंट- जंगल सफारी क्योंकि जंगल सफारी के लिए जीप पहले से ही बुक थी और उसे दो बजे के करीब रिज़ॉर्ट से हमें पिक करना था इसलिए हमनें डेढ़ बजे के करीब लंच कर लिया था और हम तैयार थे जंगल सफारी के लिए। मेरे लिए यह जंगल सफारी का पहला अवसर था इसलिए रोमांच का चर्म पर होना स्वाभाविक था। तय समय पर हमें जिप्सी के ड्राइवर वसीम ने रिज़ॉर्ट से पिक किया और हम बढ़ चले ढेला जोन की तरफ जो हमारे रिज़ॉर्ट से लगभग 16 किलोमीटर दूर था। एक बात का ध्यान रहे कि जिम कॉर्बेट में सिर्फ जिप्सी सफारी ही वो मुख्य सेंटर पॉइंट है जो आपकी पूरी यात्रा को हमेशा के लिए यादगार बना सकता है। इसलिए अगर कॉर्बेट पार्क जा रहे हैं तो जिप्सी सफारी भूल कर भी मिस न करें। वैसे इन दिनों एक जिप्सी का किराया 4200 रुपए है जिसमें से  700 रुपए गाइड के होते हैं। हर जिप्सी में प्रशासन के आदेशानुसार एक गाइड का होना जरूरी है। आप ये जिप्सी सफारी ऑनलाइन बुक करवा सकते हैं या फिर आप जो भी होटल या रिज़ॉर्ट बुक करें वो भी आपके लिए जिप्सी सफारी बुक कर देंगे। हाँ, किराया जरूर थोड़ा ऊपर नीचे हो सकता है। बस ध्यान रखिये कि मध्य जून से सितम्बर  के बीच कॉर्बेट भ्रमण की योजना न बनायें तो बेहतर होगा, क्योंकि बरसात में  पर्यटकों के लिए यह बन्द रहता है। यह कॉर्बेट पार्क जंगल सफारी के लिए एक दिन में दो बार खुलता है। सुबह 6 बजे से लेकर 11 बजे तक और दोपहर में 2.30 से लेकर 5.30 बजे तक। हालाँकि मौसम के अनुसार समय में बदलाव होता रहता है। यह नेशनल पार्क जंगल सफारी के लिए पांच जोन में बांटा गया है – ढिकाला, झिरना, ढेला, बिजरानी और दुर्गा देवी। अभी कोरोना गाइड लाइन के कारण ढेला और झिरना ज़ोन ही खुले थे। बाकि 15 नवंबर के आसपास खुलते हैं ऐसा हमें हमारे जंगल सफारी के गाइड महेंद्र प्रताप ने बताया। लेकिन फिर भी सुंदरता में आपको हर ज़ोन में लैंडस्केप और वाइल्ड लाइफ के अद्भुत दृश्य दिखाई देंगे। तकरीबन ढाई बजे के करीब हमने गेट पर सभी औपचारिकता पूरी करके ढेला ज़ोन में एंट्री की। मैं पहली बार किसी जंगल सफारी का अनुभव कर रहा था इसलिए रोमांच सातवें आसमान पर था साथ ही एक अजनबी सा डर भी। प्राकृतिक ख़ूबसूरती यहाँ एक बात और आपसे शेयर करना जरूरी है वो ये कि जब भी आप कॉर्बेट पार्क  घूमने की योजना बनायें तो टाइगर देखने की लालसा या इच्छा