Destination Latest Travel

Nilgiri Mountain Railway: ऊटी की ऐतिहासिक टॉय ट्रेन का सफर

Nilgiri Mountain Railway

कभी आपने सोचा है कि ऐसी ट्रेन में सफर करना कैसा होगा, जिसकी रफ्तार इतनी धीमी हो कि आप खिड़की से बाहर दिखने वाले हर नजारे को आराम से देख सकें? जहां एक तरफ घने जंगल हों, दूसरी तरफ गहरी घाटियां और बीच-बीच में चाय के हरे-भरे बागान दिखाई दें। ट्रेन की सीटी पहाड़ों में गूंजे और खिड़की से आती ठंडी हवा सफर को और भी खूबसूरत बना दे।

तमिलनाडु के नीलगिरि पहाड़ों में चलने वाली Nilgiri Mountain Railway कुछ ऐसा ही अनुभव देती है। इसे आमतौर पर ऊटी टॉय ट्रेन के नाम से भी जाना जाता है। यह ट्रेन मैदानी इलाके के मेट्टुपालयम से चलकर पहाड़ों के बीच बसे ऊटी तक जाती है। करीब 46 किलोमीटर का यह सफर पूरा करने में लगभग पांच घंटे लगते हैं। सुनने में यह समय थोड़ा ज्यादा लग सकता है, लेकिन यहां पहुंचना नहीं, बल्कि रास्ते के हर नजारे का मजा लेना असली बात है।

इस ट्रेन की खासियत सिर्फ इसके खूबसूरत नजारे नहीं हैं। इसका इतिहास सौ साल से भी पुराना है और पहाड़ों पर चढ़ने के लिए इसमें ऐसी तकनीक इस्तेमाल की जाती है, जो इसे भारत की दूसरी ट्रेनों से अलग बनाती है। यही वजह है कि इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में भी जगह मिली है।

नीलगिरि की पहाड़ियों में चलती है यह खास टॉय ट्रेन

नीलगिरि का नाम सुनते ही आंखों के सामने ऊंचे पहाड़, चाय के बागान और ठंडे मौसम की तस्वीर आ जाती है। इसी खूबसूरत इलाके में चलती है Nilgiri Mountain Railway, जो मेट्टुपालयम को ऊटी यानी उधगमंडलम से जोड़ती है। Nilgiri Mountain Railway

इसका पूरा रास्ता लगभग 45.88 किलोमीटर लंबा है। ट्रेन समुद्र तल से करीब 326 मीटर की ऊंचाई पर बसे मेट्टुपालयम से शुरू होती है और धीरे-धीरे 2,203 मीटर की ऊंचाई पर स्थित ऊटी तक पहुंचती है। यानी सफर के दौरान ट्रेन को करीब 1,877 मीटर की ऊंचाई चढ़नी पड़ती है।

रास्ते में कई छोटे स्टेशन, सुरंगें, पुल और घुमावदार पहाड़ी रास्ते आते हैं। कहीं ट्रेन घने जंगलों के बीच से गुजरती है, तो कहीं खिड़की से दूर तक फैली घाटियां दिखाई देती हैं। कई जगह ऐसा लगता है जैसे ट्रेन पहाड़ों के बीच किसी पुरानी फिल्म के सीन में चल रही हो।

Nilgiri Mountain Railway की रफ्तार आम ट्रेनों के मुकाबले काफी कम रहती है। यही धीमी रफ्तार इस सफर को खास बनाती है। आपको हर थोड़ी देर में नया नजारा देखने को मिलता है और तस्वीरें लेने के लिए भी काफी समय मिल जाता है।

Nilgiri Mountain Railway

1854 में आया था रेलवे लाइन बनाने का विचार

आज जिस पहाड़ी ट्रेन में बैठकर लोग छुट्टियां मनाने जाते हैं, उसे बनाना कभी इंजीनियरों के लिए बड़ी चुनौती था। नीलगिरि की पहाड़ियां काफी ऊंची और ढलानदार हैं। उस दौर में यहां सड़क से सफर करना भी आसान नहीं था। ऐसे में पहाड़ों तक रेल पहुंचाने का विचार अपने आप में बड़ा काम था।

इस रेलवे लाइन को बनाने का प्रस्ताव पहली बार 1854 में रखा गया था। लेकिन पहाड़ी जमीन, खड़ी चढ़ाई और रास्ते की मुश्किलों के कारण इस योजना पर तुरंत काम शुरू नहीं हो सका। कई साल तक अलग-अलग योजनाओं पर विचार होता रहा।

आखिरकार 1891 में रेलवे लाइन का निर्माण शुरू हुआ। 15 जून 1899 को मेट्टुपालयम से कूनूर तक ट्रेन सेवा शुरू कर दी गई। इसके बाद कूनूर से आगे ऊटी तक लाइन बढ़ाने का काम किया गया और 1908 में पूरा रास्ता यात्रियों के लिए खुल गया।

इस तरह Nilgiri Mountain Railway को तैयार होने में कई दशक लग गए। उस समय पहाड़ों पर रेल लाइन बिछाना आसान नहीं था। रास्ते में आने वाली चट्टानों को काटना, पुल बनाना और तीखी ढलानों पर ट्रेन चलाने का इंतजाम करना अपने आप में बड़ी इंजीनियरिंग उपलब्धि थी।

यूनेस्को ने क्यों दी इसे विश्व धरोहर की पहचान?

कुछ जगहें अपनी खूबसूरती के लिए मशहूर होती हैं और कुछ अपने इतिहास के लिए। नीलगिरि की यह ट्रेन दोनों वजहों से खास है। इसकी पुरानी बनावट, पहाड़ों पर चलने की तकनीक और सौ साल से ज्यादा पुराना इतिहास इसे दुनिया की खास पहाड़ी रेल लाइनों में शामिल करता है।

जुलाई 2005 में Nilgiri Mountain Railway को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया। यह अकेली रेलवे लाइन नहीं है, बल्कि इसे भारत की तीन ऐतिहासिक पहाड़ी रेल लाइनों के समूह ‘Mountain Railways of India’ का हिस्सा बनाया गया है।

इस समूह में दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे और कालका-शिमला रेलवे भी शामिल हैं। इन तीनों रेल लाइनों को पहाड़ी इलाकों में रेल चलाने की अनोखी इंजीनियरिंग और ऐतिहासिक महत्व के लिए पहचान मिली है।

इसकी एक और खास बात यह है कि यह केवल किसी पुराने जमाने की बंद पड़ी रेल लाइन का हिस्सा नहीं है। यहां आज भी यात्री ट्रेन से सफर कर सकते हैं। यानी आप उस तकनीक और रास्ते को अपनी आंखों से देख सकते हैं, जिसे सौ साल से भी पहले तैयार किया गया था। Nilgiri Mountain Railway

रैक एंड पिनियन तकनीक क्या है, जो ट्रेन को पहाड़ों पर चढ़ाती है?

Nilgiri Mountain Railway की सबसे खास बात इसकी रैक एंड पिनियन तकनीक है। आमतौर पर ट्रेन के पहिए पटरियों पर घूमते हैं और पहियों तथा पटरियों के बीच घर्षण की मदद से ट्रेन आगे बढ़ती है। लेकिन बहुत ज्यादा ढलान पर साधारण पहियों के लिए ट्रेन को ऊपर चढ़ाना मुश्किल हो सकता है।

इसी समस्या को दूर करने के लिए कल्लार से कूनूर के बीच एक खास व्यवस्था बनाई गई है। यहां सामान्य पटरियों के बीच एक तीसरी दांतेदार पटरी लगाई गई है। इसे रैक रेल कहा जाता है।

Nilgiri Mountain Railway

ट्रेन के खास इंजन में भी दांतों वाले गियर लगे होते हैं, जिन्हें पिनियन कहा जाता है। जब ट्रेन इस हिस्से पर पहुंचती है, तो इंजन के गियर बीच वाली दांतेदार पटरी के साथ जुड़ जाते हैं। इससे ट्रेन को पहाड़ी चढ़ाई पर आगे बढ़ने और उतरते समय नियंत्रण बनाए रखने में मदद मिलती है।

इस तकनीक को एब्त रैक सिस्टम कहा जाता है। इसकी मदद से ट्रेन कुछ हिस्सों में 1:12 की तीखी ढलान पर भी चल सकती है। इसका मतलब है कि हर 12 मीटर की दूरी पर रास्ते की ऊंचाई में करीब एक मीटर का बदलाव होता है। Nilgiri Mountain Railway

यह तकनीक Nilgiri Mountain Railway को खास बनाती है। ट्रेन जब इस हिस्से से गुजरती है, तो पटरी के बीच लगे दांतों और इंजन के गियर की आवाज भी सुनाई दे सकती है। यह नजारा उन लोगों के लिए काफी दिलचस्प होता है जिन्हें पुरानी मशीनों और रेलवे की तकनीक में रुचि है।

भाप का इंजन और ट्रेन को पीछे से धक्का देने का तरीका

इस ट्रेन की पहचान इसके पुराने भाप वाले इंजन से भी जुड़ी हुई है। खासकर मेट्टुपालयम से कूनूर के बीच पहाड़ी चढ़ाई पर एक्स-क्लास भाप इंजन इस्तेमाल किए जाते हैं। इन इंजनों को खास तौर पर रैक सिस्टम वाले रास्ते पर चलने के लिए तैयार किया गया है।

इन इंजनों की एक दिलचस्प बात यह है कि पहाड़ी चढ़ाई के दौरान इंजन कई बार ट्रेन के डिब्बों के पीछे लगाया जाता है। यानी यह आगे से डिब्बों को खींचने के बजाय पीछे से धक्का देकर ऊपर चढ़ाता है। इसे पुश-पुल व्यवस्था कहा जाता है। इस तरीके के पीछे सुरक्षा और रैक सिस्टम की जरूरतें जुड़ी हुई हैं।

इन एक्स-क्लास इंजनों का पुराना रिश्ता स्विट्जरलैंड से भी है। शुरुआती इंजन वहां की कंपनी स्विस लोकोमोटिव एंड मशीन वर्क्स ने बनाए थे। बाद में भारत में भी इनकी मरम्मत और नए इंजनों के निर्माण का काम किया गया।

कूनूर पहुंचने के बाद रैक वाला हिस्सा खत्म हो जाता है। आगे ऊटी तक का रास्ता अपेक्षाकृत कम ढलानदार है। इस हिस्से में ट्रेन के साथ डीजल इंजन लगाया जा सकता है। हालांकि, इंजन और संचालन की व्यवस्था उस दिन की रेलवे सेवा के हिसाब से बदल सकती है।

Nilgiri Mountain Railway में सफर करते समय भाप के इंजन की सीटी, धुआं और पहियों की आवाज पुराने जमाने की रेल यात्रा की याद दिलाते हैं। यही अनुभव इस ट्रेन को देखने और इसमें सफर करने की इच्छा और बढ़ा देता है। Nilgiri Mountain Railway

मेट्टुपालयम से ऊटी तक का सफर: रास्ते में कौन-कौन से स्टेशन आते हैं?

इस यात्रा की शुरुआत मेट्टुपालयम स्टेशन से होती है। यहां से ट्रेन धीरे-धीरे पहाड़ों की ओर बढ़ती है। रास्ते में छोटे-छोटे स्टेशन आते हैं, जिनमें से हर एक का अपना अलग माहौल है।

  • मेट्टुपालयम: यह ट्रेन का शुरुआती स्टेशन है। यहीं से पहाड़ी सफर की शुरुआत होती है। स्टेशन पर ट्रेन के पुराने डिब्बे और इंजन देखकर ही यात्रियों में उत्साह बढ़ने लगता है।
  • कल्लार: मेट्टुपालयम से आगे कल्लार आता है। यहीं से पहाड़ी चढ़ाई का असली हिस्सा शुरू होता है और रैक एंड पिनियन सिस्टम काम करना शुरू करता है। यहां से ट्रेन की रफ्तार और भी धीमी हो जाती है।
  • एडरली और हिलग्रोव: आगे ट्रेन जंगलों और पहाड़ी रास्तों से गुजरते हुए एडरली और हिलग्रोव की तरफ बढ़ती है। हिलग्रोव एक जाना-पहचाना पड़ाव है। यहां ट्रेन रुकती है और यात्रियों को आसपास का माहौल देखने का मौका मिलता है। इस इलाके में चाय और हल्के नाश्ते की सुविधा मिल सकती है, लेकिन इसे हमेशा उपलब्ध मानकर न चलें।
  • रनेमीड और काटेरी रोड: इन स्टेशनों के आसपास पहाड़ी हरियाली और जंगलों का नजारा देखने को मिलता है। ट्रेन धीरे-धीरे ऊंचाई की ओर बढ़ती रहती है। रास्ते में छोटे पुल और घुमावदार मोड़ सफर को और दिलचस्प बनाते हैं।
  • कूनूर: यह इस रास्ते का एक महत्वपूर्ण स्टेशन है। कूनूर चाय के बागानों और खूबसूरत पहाड़ियों के लिए मशहूर है। यहां रैक वाला पहाड़ी हिस्सा खत्म होता है और आगे ऊटी की ओर ट्रेन का सफर जारी रहता है। Nilgiri Mountain Railway
  • वेलिंगटन और अरवनकाडू: कूनूर के बाद ट्रेन इन स्टेशनों से गुजरती है। वेलिंगटन में सैन्य क्षेत्र है और आसपास का इलाका काफी व्यवस्थित दिखाई देता है।
  • केट्टी: इस स्टेशन के आसपास केट्टी घाटी के खूबसूरत नजारे देखने को मिलते हैं। पहाड़ों के बीच फैली घाटी और हरियाली इस हिस्से को खास बनाती है।
  • लवडेल: ऊटी से पहले आने वाला यह शांत स्टेशन अपने पुराने माहौल और आसपास की हरियाली के लिए जाना जाता है। यहां से ट्रेन धीरे-धीरे अपनी अंतिम मंजिल की तरफ बढ़ती है।
  • उधगमंडलम यानी ऊटी: आखिर में ट्रेन ऊटी पहुंचती है। यहां स्टेशन पर उतरते ही यात्रियों का सफर पूरा हो जाता है। अब आप ऊटी के बाजार, झील, बगीचे और आसपास के पर्यटन स्थलों को घूमने की योजना बना सकते हैं।

इन सभी स्टेशनों के नाम और रास्ते की जानकारी Nilgiri Mountain Railway की यात्रा को समझने में मदद करती है। हालांकि, हर ट्रेन हर स्टेशन पर एक जैसे समय के लिए रुके, यह जरूरी नहीं है।

सुरंगें, पुल और 208 घुमावदार मोड़

इस रेलवे लाइन को बनाते समय पहाड़ों की बनावट के हिसाब से रास्ता तैयार करना पड़ा था। कहीं चट्टानों को काटकर पटरी बिछाई गई, तो कहीं गहरी घाटियों के ऊपर पुल बनाए गए। इसी वजह से सफर के दौरान बार-बार नए नजारे दिखाई देते हैं।

यूनेस्को के ऐतिहासिक दस्तावेजों के मुताबिक, रैक वाले कूनूर सेक्शन में 208 घुमावदार मोड़ और 13 सुरंगें हैं। कुछ हिस्सों में ट्रेन पहाड़ के अंदर से गुजरती है, जहां कुछ पल के लिए बाहर की रोशनी गायब हो जाती है। सुरंग से बाहर निकलते ही फिर से हरियाली और पहाड़ दिखाई देने लगते हैं।

इस रास्ते पर बने पुल भी इंजीनियरिंग का अच्छा उदाहरण हैं। ये पुल गहरी ढलानों और नालों के ऊपर से ट्रेन को सुरक्षित रास्ता देते हैं। ट्रेन जब धीरे-धीरे इन पुलों से गुजरती है, तो खिड़की से नीचे दिखाई देने वाली घाटियां सफर को और रोमांचक बना देती हैं।

Nilgiri Mountain Railway की खूबसूरती का एक बड़ा कारण यही है कि यहां सफर के दौरान सिर्फ मंजिल नहीं, बल्कि रास्ते की बनावट भी देखने लायक है।

‘छैया छैया’ गाने ने इस ट्रेन को बॉलीवुड में भी बनाया मशहूर

अगर आपने शाहरुख खान और मलाइका अरोड़ा का मशहूर गाना ‘छैया छैया’ देखा है, तो आपको चलती ट्रेन की छत पर फिल्माया गया वह यादगार दृश्य जरूर याद होगा। यह गाना 1998 में आई फिल्म ‘दिल से’ का हिस्सा था और आज भी बॉलीवुड के सबसे चर्चित गानों में गिना जाता है। Nilgiri Mountain Railway

इस गाने की शूटिंग नीलगिरि की पहाड़ियों में चलने वाली इसी ऐतिहासिक ट्रेन पर की गई थी। निर्देशक मणिरत्नम और सिनेमैटोग्राफर संतोष सिवन को इस ट्रेन और आसपास के पहाड़ी नजारों में वह माहौल मिला, जिसकी उन्हें तलाश थी। गाने में शाहरुख खान और मलाइका अरोड़ा चलती ट्रेन के ऊपर डांस करते नजर आते हैं।

गाने की शूटिंग के लिए ट्रेन को खास तौर पर तैयार किया गया था और कुछ हिस्सों की शूटिंग के लिए अलग व्यवस्था की गई थी। यह शूट आसान नहीं था, क्योंकि चलती ट्रेन पर कैमरा और कलाकारों के साथ काम करना अपने आप में चुनौती भरा था।

इस गाने के बाद Nilgiri Mountain Railway को बॉलीवुड के दर्शकों के बीच भी खास पहचान मिली। आज भी कई लोग इस ट्रेन के बारे में सुनते ही ‘छैया छैया’ का वही दृश्य याद करते हैं।

टॉय ट्रेन की टिकट बुकिंग कैसे करें?

अगर आप इस ट्रेन में सफर करना चाहते हैं, तो टिकट की योजना पहले से बना लेना बेहतर है। इसकी सीटें सीमित होती हैं और छुट्टियों या गर्मियों के मौसम में मांग काफी बढ़ सकती है। Nilgiri Mountain Railway

  • ऑनलाइन बुकिंग: आप भारतीय रेलवे की आधिकारिक वेबसाइट IRCTC पर टिकट देख और बुक कर सकते हैं। मेट्टुपालयम का स्टेशन कोड MTP और ऊटी यानी उधगमंडलम का स्टेशन कोड UAM है। टिकट बुक करते समय सही स्टेशन और यात्रा की तारीख जरूर जांचें।
  • कितने दिन पहले बुक करें: सामान्य आरक्षण के लिए भारतीय रेलवे की अग्रिम बुकिंग अवधि फिलहाल 60 दिन है, हालांकि कुछ ट्रेनों के नियम अलग हो सकते हैं। इसलिए अपनी यात्रा की तारीख के अनुसार IRCTC पर उपलब्धता और बुकिंग की तारीख देख लें। गर्मियों की छुट्टियों और लंबे वीकेंड पर टिकट जल्दी भर सकते हैं।
  • कौन-सी क्लास चुनें: ट्रेन में फर्स्ट क्लास और सेकेंड क्लास जैसी श्रेणियां उपलब्ध हो सकती हैं। फर्स्ट क्लास में सीटें अपेक्षाकृत आरामदायक होती हैं, जबकि सेकेंड क्लास बजट में सफर करने वालों के लिए अच्छा विकल्प हो सकता है। सीटों की बनावट और उपलब्धता ट्रेन के हिसाब से देखनी चाहिए।

टिकट का किराया यात्रा के हिस्से, क्लास और रेलवे के मौजूदा नियमों के अनुसार बदल सकता है। इसलिए पुराने किराये के आधार पर बजट न बनाएं। बुकिंग से पहले IRCTC पर ताजा किराया और सीटों की उपलब्धता जरूर देख लें।

अगर मेट्टुपालयम से ऊटी तक की पूरी यात्रा का टिकट नहीं मिलता, तो कूनूर से ऊटी के बीच चलने वाली ट्रेन की उपलब्धता भी देख सकते हैं। यह छोटा सफर भी पहाड़ी नजारों का अच्छा अनुभव देता है।

सफर के लिए सही समय और जरूरी तैयारी

Nilgiri Mountain Railway में सफर साल के अलग-अलग मौसम में किया जा सकता है, लेकिन हर मौसम का अपना अलग अनुभव होता है। अक्टूबर से मार्च के बीच मौसम आमतौर पर ठंडा और सुहावना रहता है। इस दौरान पहाड़ियों पर हरियाली और साफ मौसम देखने को मिल सकता है।

अप्रैल और मई में गर्मियों की छुट्टियों के कारण पर्यटकों की संख्या बढ़ जाती है। अगर आप इसी समय जाने की योजना बना रहे हैं, तो टिकट पहले से बुक करना बेहतर होगा।

Nilgiri Mountain Railway

मानसून के दौरान नीलगिरि में अच्छी बारिश होती है। इससे पहाड़ और भी हरे-भरे दिखाई देते हैं, लेकिन भारी बारिश के कारण रेल सेवाएं प्रभावित भी हो सकती हैं। कभी-कभी भूस्खलन या पटरियों पर पेड़ गिरने जैसी स्थिति में ट्रेन रद्द या देर से चल सकती है। इसलिए यात्रा से पहले रेलवे की ताजा सूचना जरूर देख लें।

सफर के लिए कुछ जरूरी चीजें साथ रखना अच्छा रहेगा। पानी की बोतल, हल्का नाश्ता, कैमरा या मोबाइल, एक हल्की जैकेट और जरूरी दवाइयां अपने बैग में रख लें। पहाड़ों में मौसम जल्दी बदल सकता है, इसलिए गर्म कपड़े रखना भी फायदेमंद है। Nilgiri Mountain Railway

Five Colors of Travel की ओर से खास सुझाव

  • टिकट पहले से बुक करें। गर्मियों की छुट्टियों और त्योहारों के समय सीटें जल्दी भर सकती हैं। IRCTC पर बुकिंग खुलते ही उपलब्धता जांचें और अपनी सीट पक्की करने की कोशिश करें।
  • खिड़की वाली सीट चुनें। इस सफर में बाहर के नजारे सबसे बड़ा आकर्षण हैं। टिकट बुक करते समय खिड़की के पास वाली सीट चुनने की कोशिश करें, हालांकि सीट की जगह की गारंटी रेलवे की उपलब्धता पर निर्भर करेगी।
  • पानी और नाश्ता साथ रखें। पूरी यात्रा में खाने-पीने की सुविधा हर समय उपलब्ध हो, यह जरूरी नहीं। इसलिए पानी और हल्का सूखा नाश्ता अपने साथ रखें।
  • गर्म कपड़े जरूर रखें। मेट्टुपालयम से ऊटी तक जाते हुए मौसम में काफी बदलाव महसूस हो सकता है। हल्की जैकेट या शॉल साथ रखना अच्छा रहेगा।
  • सुरक्षा और सफाई का ध्यान रखें। चलती ट्रेन से बाहर न झुकें और न ही पटरियों या जंगलों में कचरा फेंकें। यह एक ऐतिहासिक धरोहर है, इसलिए इसे साफ और सुरक्षित रखना हम सभी की जिम्मेदारी है।

आज जब ज्यादातर लोग अपनी मंजिल तक जल्दी पहुंचना चाहते हैं, तब नीलगिरि की यह पुरानी ट्रेन हमें सफर का असली मजा लेना सिखाती है। यहां पांच घंटे का समय सिर्फ एक जगह से दूसरी जगह पहुंचने में नहीं गुजरता, बल्कि हर मोड़, हर सुरंग और हर स्टेशन के साथ एक नई याद जुड़ती जाती है।

Nilgiri Mountain Railway की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि यह आपको पहाड़ों को देखने का एक अलग नजरिया देती है। खिड़की के बाहर फैली हरियाली, भाप के इंजन की आवाज और धीरे-धीरे ऊपर चढ़ती ट्रेन का अनुभव लंबे समय तक याद रहता है।

अगर आप कभी ऊटी घूमने जाएं, तो अपनी यात्रा में इस टॉय ट्रेन को जरूर शामिल करें। हो सकता है कि सफर खत्म होने के बाद आपको लगे कि असली मजा तो ऊटी पहुंचने में नहीं, बल्कि मेट्टुपालयम से यहां तक आने वाले उस खूबसूरत रास्ते में था। Nilgiri Mountain Railway

Shivani Pal

Shivani Pal

About Author

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may also like

Culture Himachal Pradesh Travel

Chail- Amazing places to visit in Chail

चंडीगढ़ से महज 110 किमी की दूरी पर है खूबसूरत चैल हिल स्टेशन by Pardeep Kumar मैं प्रदीप कुमार फाइव
Culture Destination Lifestyle Uttar Pradesh

Garh Mukteshwar

Garh Mukteshwar – गढ़मुक्तेश्वर: जहाँ कौरवों और पांडवों का पिंडदान हुआ था By Pardeep Kumar नमस्कार, आदाब, सत श्री अकाल