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Nilgiri Mountain Railway: ऊटी की ऐतिहासिक टॉय ट्रेन का सफर

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कभी आपने सोचा है कि ऐसी ट्रेन में सफर करना कैसा होगा, जिसकी रफ्तार इतनी धीमी हो कि आप खिड़की से बाहर दिखने वाले हर नजारे को आराम से देख सकें? जहां एक तरफ घने जंगल हों, दूसरी तरफ गहरी घाटियां और बीच-बीच में चाय के हरे-भरे बागान दिखाई दें। ट्रेन की सीटी पहाड़ों में गूंजे और खिड़की से आती ठंडी हवा सफर को और भी खूबसूरत बना दे। तमिलनाडु के नीलगिरि पहाड़ों में चलने वाली Nilgiri Mountain Railway कुछ ऐसा ही अनुभव देती है। इसे आमतौर पर ऊटी टॉय ट्रेन के नाम से भी जाना जाता है। यह ट्रेन मैदानी इलाके के मेट्टुपालयम से चलकर पहाड़ों के बीच बसे ऊटी तक जाती है। करीब 46 किलोमीटर का यह सफर पूरा करने में लगभग पांच घंटे लगते हैं। सुनने में यह समय थोड़ा ज्यादा लग सकता है, लेकिन यहां पहुंचना नहीं, बल्कि रास्ते के हर नजारे का मजा लेना असली बात है। इस ट्रेन की खासियत सिर्फ इसके खूबसूरत नजारे नहीं हैं। इसका इतिहास सौ साल से भी पुराना है और पहाड़ों पर चढ़ने के लिए इसमें ऐसी तकनीक इस्तेमाल की जाती है, जो इसे भारत की दूसरी ट्रेनों से अलग बनाती है। यही वजह है कि इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में भी जगह मिली है। नीलगिरि की पहाड़ियों में चलती है यह खास टॉय ट्रेन नीलगिरि का नाम सुनते ही आंखों के सामने ऊंचे पहाड़, चाय के बागान और ठंडे मौसम की तस्वीर आ जाती है। इसी खूबसूरत इलाके में चलती है Nilgiri Mountain Railway, जो मेट्टुपालयम को ऊटी यानी उधगमंडलम से जोड़ती है। Nilgiri Mountain Railway इसका पूरा रास्ता लगभग 45.88 किलोमीटर लंबा है। ट्रेन समुद्र तल से करीब 326 मीटर की ऊंचाई पर बसे मेट्टुपालयम से शुरू होती है और धीरे-धीरे 2,203 मीटर की ऊंचाई पर स्थित ऊटी तक पहुंचती है। यानी सफर के दौरान ट्रेन को करीब 1,877 मीटर की ऊंचाई चढ़नी पड़ती है। रास्ते में कई छोटे स्टेशन, सुरंगें, पुल और घुमावदार पहाड़ी रास्ते आते हैं। कहीं ट्रेन घने जंगलों के बीच से गुजरती है, तो कहीं खिड़की से दूर तक फैली घाटियां दिखाई देती हैं। कई जगह ऐसा लगता है जैसे ट्रेन पहाड़ों के बीच किसी पुरानी फिल्म के सीन में चल रही हो। Nilgiri Mountain Railway की रफ्तार आम ट्रेनों के मुकाबले काफी कम रहती है। यही धीमी रफ्तार इस सफर को खास बनाती है। आपको हर थोड़ी देर में नया नजारा देखने को मिलता है और तस्वीरें लेने के लिए भी काफी समय मिल जाता है। 1854 में आया था रेलवे लाइन बनाने का विचार आज जिस पहाड़ी ट्रेन में बैठकर लोग छुट्टियां मनाने जाते हैं, उसे बनाना कभी इंजीनियरों के लिए बड़ी चुनौती था। नीलगिरि की पहाड़ियां काफी ऊंची और ढलानदार हैं। उस दौर में यहां सड़क से सफर करना भी आसान नहीं था। ऐसे में पहाड़ों तक रेल पहुंचाने का विचार अपने आप में बड़ा काम था। इस रेलवे लाइन को बनाने का प्रस्ताव पहली बार 1854 में रखा गया था। लेकिन पहाड़ी जमीन, खड़ी चढ़ाई और रास्ते की मुश्किलों के कारण इस योजना पर तुरंत काम शुरू नहीं हो सका। कई साल तक अलग-अलग योजनाओं पर विचार होता रहा। आखिरकार 1891 में रेलवे लाइन का निर्माण शुरू हुआ। 15 जून 1899 को मेट्टुपालयम से कूनूर तक ट्रेन सेवा शुरू कर दी गई। इसके बाद कूनूर से आगे ऊटी तक लाइन बढ़ाने का काम किया गया और 1908 में पूरा रास्ता यात्रियों के लिए खुल गया। इस तरह Nilgiri Mountain Railway को तैयार होने में कई दशक लग गए। उस समय पहाड़ों पर रेल लाइन बिछाना आसान नहीं था। रास्ते में आने वाली चट्टानों को काटना, पुल बनाना और तीखी ढलानों पर ट्रेन चलाने का इंतजाम करना अपने आप में बड़ी इंजीनियरिंग उपलब्धि थी। यूनेस्को ने क्यों दी इसे विश्व धरोहर की पहचान? कुछ जगहें अपनी खूबसूरती के लिए मशहूर होती हैं और कुछ अपने इतिहास के लिए। नीलगिरि की यह ट्रेन दोनों वजहों से खास है। इसकी पुरानी बनावट, पहाड़ों पर चलने की तकनीक और सौ साल से ज्यादा पुराना इतिहास इसे दुनिया की खास पहाड़ी रेल लाइनों में शामिल करता है। जुलाई 2005 में Nilgiri Mountain Railway को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया। यह अकेली रेलवे लाइन नहीं है, बल्कि इसे भारत की तीन ऐतिहासिक पहाड़ी रेल लाइनों के समूह ‘Mountain Railways of India’ का हिस्सा बनाया गया है। इस समूह में दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे और कालका-शिमला रेलवे भी शामिल हैं। इन तीनों रेल लाइनों को पहाड़ी इलाकों में रेल चलाने की अनोखी इंजीनियरिंग और ऐतिहासिक महत्व के लिए पहचान मिली है। इसकी एक और खास बात यह है कि यह केवल किसी पुराने जमाने की बंद पड़ी रेल लाइन का हिस्सा नहीं है। यहां आज भी यात्री ट्रेन से सफर कर सकते हैं। यानी आप उस तकनीक और रास्ते को अपनी आंखों से देख सकते हैं, जिसे सौ साल से भी पहले तैयार किया गया था। Nilgiri Mountain Railway रैक एंड पिनियन तकनीक क्या है, जो ट्रेन को पहाड़ों पर चढ़ाती है? Nilgiri Mountain Railway की सबसे खास बात इसकी रैक एंड पिनियन तकनीक है। आमतौर पर ट्रेन के पहिए पटरियों पर घूमते हैं और पहियों तथा पटरियों के बीच घर्षण की मदद से ट्रेन आगे बढ़ती है। लेकिन बहुत ज्यादा ढलान पर साधारण पहियों के लिए ट्रेन को ऊपर चढ़ाना मुश्किल हो सकता है। इसी समस्या को दूर करने के लिए कल्लार से कूनूर के बीच एक खास व्यवस्था बनाई गई है। यहां सामान्य पटरियों के बीच एक तीसरी दांतेदार पटरी लगाई गई है। इसे रैक रेल कहा जाता है। ट्रेन के खास इंजन में भी दांतों वाले गियर लगे होते हैं, जिन्हें पिनियन कहा जाता है। जब ट्रेन इस हिस्से पर पहुंचती है, तो इंजन के गियर बीच वाली दांतेदार पटरी के साथ जुड़ जाते हैं। इससे ट्रेन को पहाड़ी चढ़ाई पर आगे बढ़ने और उतरते समय नियंत्रण बनाए रखने में मदद मिलती है। इस तकनीक को एब्त रैक सिस्टम कहा जाता है। इसकी मदद से ट्रेन कुछ हिस्सों में 1:12 की तीखी ढलान पर भी चल सकती है। इसका मतलब है कि हर 12 मीटर की दूरी पर रास्ते की ऊंचाई में करीब एक मीटर का बदलाव