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Bakloh Travel Guide: बकलोह में घूमने की जगहें और इतिहास

Bakloh

कभी-कभी पहाड़ों पर जाने का मन सिर्फ इसलिए करता है कि कुछ दिन शहर के शोर से दूर रह सकें। सुबह उठें तो ठंडी हवा मिले, आसपास ऊँचे पेड़ हों और शाम को किसी शांत रास्ते पर टहलते हुए चाय पीने का मन करे। लेकिन जब शिमला, मनाली और डलहौजी जैसी जगहों पर पर्यटकों की भीड़ और गाड़ियों का शोर बढ़ जाता है, तो मन किसी ऐसी जगह को ढूँढने लगता है जहाँ कुछ पल आराम से बिताए जा सकें।

हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में बसा Bakloh ऐसी ही एक जगह है। यह कोई बड़ा टूरिस्ट हिल स्टेशन नहीं, बल्कि एक छोटा-सा कैंटोनमेंट टाउन है, जिसकी पहचान पुराने सैन्य इतिहास, गोरखा संस्कृति, चीड़ के पेड़ों और शांत पहाड़ी रास्तों से जुड़ी है। यहाँ आपको बड़े बाजारों और महंगे कैफे की भीड़ नहीं मिलेगी। इसके बजाय पुरानी इमारतें, छोटी दुकानें, मंदिर और पहाड़ों के खूबसूरत नज़ारे देखने को मिलेंगे।

अगर आप अपनी अगली छुट्टी में किसी ऐसी जगह जाना चाहते हैं जहाँ घूमने के साथ थोड़ा सुकून भी मिले, तो Bakloh Travel Guide आपके काम आएगी। यहाँ जानिए बकलोह का इतिहास, घूमने की जगहें, मौसम, खाने-पीने के विकल्प और वहाँ पहुँचने का पूरा तरीका।

बकलोह कहाँ है और यह जगह इतनी खास क्यों है?

Bakloh हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में स्थित एक छोटा-सा पहाड़ी कस्बा है। यह अपनी सैन्य छावनी और गोरखा राइफल्स से जुड़े इतिहास के लिए जाना जाता है। आसपास चीड़ के पेड़, पहाड़ी ढलान और पुराने रास्ते इस जगह को बाकी लोकप्रिय हिल स्टेशनों से अलग बनाते हैं।

यहाँ घूमने का मज़ा उन लोगों को ज्यादा आएगा जिन्हें शांत माहौल पसंद है। आप सुबह आराम से उठकर आसपास की सड़कों पर टहल सकते हैं, किसी छोटी दुकान पर चाय पी सकते हैं और बिना जल्दबाजी के पहाड़ों को निहार सकते हैं। Bakloh की खूबसूरती किसी बड़े टूरिस्ट स्पॉट जैसी चमक-दमक में नहीं, बल्कि इसके सादे और पुराने पहाड़ी माहौल में है।

यह बात भी ध्यान रखने वाली है कि बकलोह एक सामान्य पर्यटन शहर नहीं, बल्कि सैन्य छावनी वाला इलाका है। इसलिए यहाँ घूमते समय स्थानीय नियमों का ध्यान रखना जरूरी है। कुछ जगहों पर आम लोगों की आवाजाही सीमित हो सकती है। ऐसे में किसी भी मंदिर, मैदान या सैन्य क्षेत्र में जाने से पहले स्थानीय लोगों से जानकारी ले लेना बेहतर रहेगा।

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बकलोह का इतिहास: गोरखा राइफल्स से जुड़ी है इसकी पहचान

Bakloh का इतिहास उन्नीसवीं सदी से जुड़ा है। ब्रिटिश शासन के दौरान इस इलाके को सैन्य छावनी के रूप में विकसित किया गया था। पहाड़ी मौसम और इसकी भौगोलिक स्थिति सेना के लिए उपयोगी मानी गई। बाद में यह जगह चौथी गोरखा राइफल्स से जुड़ी और लंबे समय तक रेजिमेंट का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनी रही।

साल 1866 में चंबा के राजा से जमीन लेकर चौथी गोरखा रेजिमेंट को यहाँ स्थानांतरित किया गया था। इसके बाद बकलोह गोरखा सैनिकों और उनके परिवारों के जीवन का अहम हिस्सा बन गया। समय के साथ यहाँ बाजार, धार्मिक स्थल और दूसरी जरूरी सुविधाएँ विकसित हुईं। आज भी इस इलाके की पहचान में गोरखा समुदाय और सेना से जुड़ा इतिहास साफ दिखाई देता है।

बकलोह की पुरानी बस्तियों और बाजारों में घूमते हुए आपको इसके बीते दौर की झलक मिल सकती है। यहाँ के 1/4 बाजार और 2/4 बाजार जैसे नाम भी इसकी रेजिमेंटल पहचान से जुड़े हैं। इन जगहों पर रोजमर्रा की जरूरत का सामान मिलता है और स्थानीय जीवन को करीब से देखने का मौका भी मिलता है।

आजादी के बाद सेना के केंद्र में बदलाव हुए, लेकिन Bakloh में गोरखा समुदाय की मौजूदगी बनी रही। यही वजह है कि यहाँ की संस्कृति, त्योहारों और खान-पान में नेपाली और पहाड़ी परंपराओं की झलक देखने को मिलती है।

बकलोह घूमने का सही समय कौन-सा है?

Bakloh जाने से पहले मौसम का ध्यान रखना जरूरी है। यहाँ गर्मियों में मैदानी इलाकों के मुकाबले मौसम आमतौर पर राहत देने वाला रहता है, जबकि सर्दियों में सुबह और शाम अच्छी ठंड पड़ सकती है। बारिश के मौसम में पहाड़ों की हरियाली बढ़ जाती है, लेकिन सड़क पर सफर करते समय ज्यादा सावधानी रखनी पड़ती है।

मार्च से जून: अगर आप आराम से घूमना चाहते हैं, तो गर्मियों का समय अच्छा विकल्प हो सकता है। इस दौरान आसपास के पहाड़ी रास्तों पर टहलना और दिन में घूमना ज्यादा आसान रहता है। शाम के लिए हल्की जैकेट साथ रखना अच्छा रहेगा।

जुलाई से सितंबर: बारिश के बाद पहाड़ों पर हरियाली और धुंध का खूबसूरत नज़ारा दिखाई देता है। हालांकि, भारी बारिश होने पर रास्तों की स्थिति खराब हो सकती है। इसलिए निकलने से पहले मौसम और सड़क की जानकारी जरूर लें।

अक्टूबर से फरवरी: इन महीनों में मौसम ठंडा हो जाता है। साफ दिन मिलने पर पहाड़ों के नज़ारे अच्छे दिख सकते हैं, लेकिन सुबह और रात के समय गर्म कपड़ों की जरूरत पड़ेगी। बकलोह में हर साल बर्फबारी होने की उम्मीद करके यात्रा न बनाएं, क्योंकि बर्फ पड़ना मौसम पर निर्भर करता है।

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अगर आप पहली बार Bakloh जा रहे हैं, तो अप्रैल से जून या अक्टूबर के आसपास का समय अपनी पसंद के अनुसार चुन सकते हैं। यात्रा की तारीख तय करने से पहले मौसम का ताजा हाल देख लेना बेहतर रहेगा।

बकलोह में घूमने की जगहें, जहाँ कुछ वक्त आराम से बिता सकते हैं

छोटा कस्बा होने के कारण Bakloh में बड़े पर्यटन स्थलों जैसी लंबी सूची नहीं है। फिर भी यहाँ कुछ ऐसी जगहें हैं जहाँ आप स्थानीय इतिहास, धार्मिक परंपराओं और आसपास की खूबसूरती को करीब से देख सकते हैं। ध्यान रहे कि कुछ जगहें सैन्य क्षेत्र के भीतर या उसके पास हो सकती हैं, इसलिए प्रवेश की अनुमति पहले पता कर लें।

चिल्लामा हैलीपैड और बाबा लखदाता मंदिर

चिल्लामा हैलीपैड के आसपास का इलाका खुले मैदान और पहाड़ी नज़ारों के लिए जाना जाता है। स्थानीय लोग यहाँ के आसपास घूमने और धार्मिक अवसरों पर आने की बात करते हैं। पास में बाबा लखदाता जी का मंदिर भी है। यदि आप इस जगह जाने का प्लान बना रहे हैं, तो पहले यह जरूर पता कर लें कि उस दिन आम लोगों को प्रवेश की अनुमति है या नहीं। सैन्य गतिविधियों वाले स्थानों पर बिना अनुमति जाना या तस्वीरें लेना ठीक नहीं है।

कालिका माता मंदिर

कालिका माता मंदिर बकलोह के प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। यहाँ आने वाले लोग पूजा करने के साथ आसपास की पहाड़ियों को भी देख सकते हैं। मंदिर तक पहुँचने का रास्ता और प्रवेश की व्यवस्था स्थानीय नियमों के अनुसार बदल सकती है, इसलिए जाने से पहले जानकारी लेना बेहतर रहेगा।

लोकेश्वर मंदिर

लोकेश्वर मंदिर का संबंध बकलोह में रहने वाले गोरखा समुदाय की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा है। इसकी वास्तुकला में नेपाली शैली की झलक देखने को मिलती है। मंदिर को देखने का मौका मिले, तो यहाँ के शांत माहौल और बनावट पर ध्यान दें। यह जगह बताती है कि बकलोह की पहचान सिर्फ सेना से नहीं, बल्कि यहाँ रहने वाले लोगों की परंपराओं से भी बनी है।

गुरु गोरखनाथ बाबा मंदिर

बकलोह में गुरु गोरखनाथ बाबा का मंदिर भी धार्मिक महत्व रखता है। यहाँ विशेष अवसरों पर पूजा और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। अगर आपकी यात्रा किसी स्थानीय उत्सव के आसपास है, तो कार्यक्रम की तारीख और आने-जाने की अनुमति पहले पता कर लें।

सेंट ऑस्वाल्ड चर्च

पुरानी इमारतों और औपनिवेशिक दौर की वास्तुकला में दिलचस्पी रखने वालों के लिए सेंट ऑस्वाल्ड चर्च देखने लायक हो सकता है। इसके पुराने निर्माण और शांत वातावरण की वजह से यह बकलोह के इतिहास से जुड़ी खास जगहों में गिना जाता है। चूँकि यह सैन्य क्षेत्र में स्थित है, इसलिए प्रवेश की अनुमति और फोटोग्राफी के नियमों का पालन करना जरूरी है।

1/4 बाजार और 2/4 बाजार

अगर आप किसी जगह को सिर्फ घूमने के बजाय वहाँ के रोजमर्रा के जीवन को समझना चाहते हैं, तो Bakloh के पुराने बाजारों में थोड़ा समय बिताएं। यहाँ छोटी दुकानें, स्थानीय लोगों की आवाजाही और पहाड़ी कस्बे की सामान्य दिनचर्या देखने को मिलती है। किसी दुकान पर चाय पीते हुए स्थानीय लोगों से बात करने पर आपको इलाके के बारे में ऐसी जानकारी भी मिल सकती है जो आम ट्रैवल गाइड में नहीं मिलती।

त्रिवेणी दर्शिका और आसपास के नज़ारे

बकलोह के आसपास कुछ जगहों से दूर तक फैली पहाड़ियों और मैदानी इलाकों के दृश्य दिखाई देते हैं। त्रिवेणी दर्शिका को भी स्थानीय स्तर पर ऐसे नज़ारों से जोड़ा जाता है। मौसम साफ हो तो दूर की पहाड़ियाँ बेहतर दिखाई दे सकती हैं। हालांकि, किसी खास नदी, दूर के इलाके या सीमा पार के दृश्य दिखाई देने की बात को पक्का मानकर न चलें। वहाँ पहुँचने और देखने की सुविधा स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर कर सकती है।

घटासणी के चीड़ के जंगल

अगर आपको पेड़ों के बीच शांत रास्तों पर घूमना पसंद है, तो घटासणी और आसपास के वन क्षेत्र के बारे में जानकारी ले सकते हैं। यहाँ चीड़ के पेड़ और पहाड़ी वातावरण देखने को मिल सकता है। जंगल में घूमते समय तय रास्तों पर ही रहें और किसी भी वन क्षेत्र में जाने से पहले प्रवेश के नियम पता कर लें। Bakloh

ककीरा बाजार

ककीरा, बकलोह के आसपास का एक महत्वपूर्ण बाजार है। यहाँ रोजमर्रा की जरूरतों की दुकानें और स्थानीय सुविधाएँ मिल सकती हैं। अगर आपको खाने-पीने का सामान लेना हो या आसपास की जगहों के बारे में पूछताछ करनी हो, तो यह उपयोगी पड़ाव हो सकता है।

बकलोह के आसपास कहाँ घूमने जा सकते हैं?

अगर आप Bakloh में दो या तीन दिन रुकने की योजना बना रहे हैं, तो आसपास की कुछ मशहूर जगहों को भी अपनी यात्रा में शामिल कर सकते हैं। हालांकि, दूरी और सफर का समय आपके चुने हुए रास्ते, सड़क की स्थिति और मौसम के हिसाब से बदल सकता है।

डलहौजी

डलहौजी अपने पुराने भवनों, चर्चों, पहाड़ी सड़कों और ठंडे मौसम के लिए जाना जाता है। बकलोह की शांत गलियों से निकलकर आप डलहौजी की लोकप्रिय जगहों पर घूम सकते हैं। यहाँ बाजार में खरीदारी करने, स्थानीय खाना खाने और पहाड़ी नज़ारों के बीच समय बिताने के विकल्प मिलते हैं। निकलने से पहले सड़क की स्थिति और यात्रा का समय जरूर जांच लें।

खज्जियार

खज्जियार अपनी हरी-भरी खुली जमीन और आसपास के देवदार के पेड़ों के लिए मशहूर है। यहाँ परिवार और दोस्तों के साथ कुछ घंटे बिताए जा सकते हैं। मौसम अच्छा हो तो आसपास के नज़ारे बहुत खूबसूरत लगते हैं। अगर आप Bakloh की यात्रा के साथ खज्जियार भी देखना चाहते हैं, तो इसके लिए अलग से पर्याप्त समय रखें।

पुर्थू और चमेरा झील

चमेरा झील के आसपास का इलाका प्रकृति पसंद करने वालों को आकर्षित करता है। पुर्थू को भी स्थानीय स्तर पर घूमने और पिकनिक के लिए जाना जाता है। यहाँ जाने से पहले यह पता कर लें कि आपकी यात्रा के समय कौन-सी गतिविधियाँ उपलब्ध हैं और पानी के पास सुरक्षा के क्या नियम लागू हैं।

चंबा शहर

चंबा शहर अपने पुराने मंदिरों, बाजारों और स्थानीय संस्कृति के लिए जाना जाता है। यहाँ की यात्रा में आप पहाड़ी शहर की रोजमर्रा की जिंदगी को करीब से देख सकते हैं। अगर इतिहास और स्थानीय वास्तुकला में आपकी दिलचस्पी है, तो चंबा को अपनी योजना में शामिल करना अच्छा रहेगा।

जोत और भलेई माता मंदिर

जोत के आसपास पहाड़ी नज़ारे देखने को मिलते हैं, जबकि भलेई माता मंदिर धार्मिक महत्व रखता है। इन जगहों पर जाने से पहले सड़क, मौसम और यात्रा में लगने वाले समय की जानकारी जरूर लें। एक ही दिन में बहुत सारी जगहें देखने की जल्दबाजी करने के बजाय अपनी सुविधा के हिसाब से योजना बनाएं।

बकलोह की संस्कृति और यहाँ का खाना

Bakloh की खास बात यहाँ की गोरखा संस्कृति और पहाड़ी जीवनशैली है। लंबे समय से गोरखा समुदाय का इस इलाके से जुड़ाव रहा है। स्थानीय त्योहारों, धार्मिक कार्यक्रमों और रोजमर्रा की बातचीत में इसकी झलक देखने को मिलती है। यहाँ घूमते समय लोगों से सम्मान के साथ बात करें और उनकी निजी जिंदगी या धार्मिक आयोजनों की तस्वीर लेने से पहले अनुमति जरूर मांगें।

खाने-पीने के मामले में बकलोह किसी बड़े फूड डेस्टिनेशन जैसा नहीं है। यहाँ आपको छोटे बाजारों में चाय की दुकानें और साधारण खाने-पीने के विकल्प मिल सकते हैं। मोमोज, नूडल्स और चाय जैसे आम विकल्प स्थानीय दुकानों पर मिल सकते हैं, लेकिन हर जगह एक जैसी चीजें मिलने की गारंटी नहीं है। इसलिए अगर आप किसी खास खाने को चखना चाहते हैं, तो पहले स्थानीय लोगों से पूछ लें।

हिमाचली खाने में मदरा, दालें और चने से बनी कई पारंपरिक चीजें लोकप्रिय हैं। खास मौकों पर धाम भी परोसी जाती है। हालांकि, बकलोह में किसी खास दिन पारंपरिक भोजन मिलेगा या नहीं, यह स्थानीय आयोजन और उपलब्धता पर निर्भर करता है।

यहाँ की यात्रा का एक अच्छा तरीका है कि आप किसी छोटी दुकान पर बैठकर चाय पिएं, आसपास के लोगों से इलाके के बारे में पूछें और स्थानीय जीवन को समझने की कोशिश करें। Bakloh को जानने का मज़ा सिर्फ जगहें देखने में नहीं, बल्कि वहाँ के माहौल को महसूस करने में भी है।

बकलोह कैसे पहुँचें?

Bakloh पहुँचने के लिए आप ट्रेन, सड़क या हवाई यात्रा का विकल्प चुन सकते हैं। आपके लिए कौन-सा तरीका सही रहेगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप कहाँ से निकल रहे हैं और कितना समय देना चाहते हैं। Bakloh

ट्रेन से

पठानकोट एक उपयोगी रेल पड़ाव है, जहाँ से बकलोह की ओर सड़क मार्ग से आगे बढ़ा जा सकता है। स्टेशन से आगे जाने के लिए बस या टैक्सी का विकल्प देख सकते हैं। टिकट बुक करने से पहले अपने ट्रेन स्टेशन का सही नाम, आगमन का समय और आगे की बस या टैक्सी की सुविधा जांच लें।

सड़क मार्ग से

दिल्ली, चंडीगढ़ और पठानकोट जैसे शहरों से चंबा या डलहौजी की ओर जाने वाली बसों के विकल्प मिल सकते हैं। लेकिन हर बस बकलोह के अंदर तक नहीं जाती। इसलिए टिकट लेते समय चालक या बस ऑपरेटर से उतरने की सही जगह पूछ लें। तुन्नुहट्टी या ककीरा की ओर उतरने का विकल्प आपके रूट के हिसाब से उपयोगी हो सकता है, लेकिन वहाँ से आगे के स्थानीय साधन पहले पता करना बेहतर रहेगा।

अगर आप अपनी गाड़ी से जा रहे हैं, तो पहाड़ी सड़कों पर आराम से चलें और रात में अपरिचित रास्तों पर ड्राइव करने से बचें। बारिश के दिनों में निकलने से पहले सड़क की स्थिति जरूर जांच लें।

हवाई मार्ग से

पठानकोट और कांगड़ा के गग्गल एयरपोर्ट जैसे विकल्पों के बारे में जानकारी ली जा सकती है। वहाँ से आगे सड़क मार्ग से बकलोह पहुँचना होगा। उड़ानों की उपलब्धता और दूरी को देखते हुए टिकट बुक करने से पहले यह तय करें कि एयरपोर्ट से आगे का सफर आपके लिए कितना सुविधाजनक रहेगा।

बकलोह में कहाँ ठहरें?

Bakloh एक सैन्य छावनी वाला कस्बा है, इसलिए यहाँ बड़े पर्यटन शहरों जैसी होटल सुविधाएँ मिलने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। ठहरने की जगह चुनते समय यह देखना जरूरी है कि वह आम यात्रियों के लिए खुली है या नहीं और वहाँ पहले से बुकिंग करानी पड़ती है या नहीं।

घटासणी के आसपास वन विभाग के विश्राम गृहों के बारे में जानकारी ली जा सकती है। लेकिन सरकारी रेस्ट हाउस में ठहरने की सुविधा अनुमति, उपलब्धता और बुकिंग के नियमों पर निर्भर करती है। केवल इंटरनेट पर नाम देखकर वहाँ पहुँचने की योजना न बनाएं। Bakloh

ककीरा और आसपास के इलाकों में उपलब्ध गेस्ट हाउस या होमस्टे के विकल्प भी तलाश सकते हैं। बुकिंग से पहले कमरा, भोजन, गर्म पानी, पार्किंग और आने-जाने की सुविधा के बारे में पूछ लें। अगर आप परिवार के साथ जा रहे हैं, तो रहने की जगह से घूमने वाले स्थानों तक की दूरी भी देख लें।

Bakloh

मेरी सलाह है कि Bakloh जाने से पहले ठहरने की व्यवस्था पक्की कर लें। यह कोई ऐसा बड़ा पर्यटन केंद्र नहीं है जहाँ पहुँचते ही हर बजट में ढेरों होटल मिल जाएँ। पहले से योजना बनाने से यात्रा ज्यादा आरामदायक रहेगी।

बकलोह घूमने के लिए कितने दिन काफी हैं?

अगर आपका उद्देश्य सिर्फ बकलोह की गलियाँ, बाजार और आसपास के धार्मिक स्थल देखना है, तो एक से दो दिन में आप आराम से घूम सकते हैं। लेकिन अगर आप डलहौजी, खज्जियार या चंबा को भी यात्रा में शामिल करना चाहते हैं, तो दो से तीन दिन या उससे ज्यादा समय रखना बेहतर रहेगा।

पहले दिन आप बकलोह के पुराने बाजारों और स्थानीय दर्शनीय स्थलों के बारे में जानकारी लेकर घूम सकते हैं। दूसरे दिन आसपास की किसी एक जगह, जैसे डलहौजी या चमेरा झील, की योजना बना सकते हैं। तीसरे दिन चंबा या खज्जियार जाने का विकल्प रख सकते हैं। यह केवल एक सामान्य योजना है; असल समय सड़क और मौसम पर निर्भर करेगा। Bakloh की यात्रा में हर घंटे की योजना बनाने की जरूरत नहीं है। यहाँ का आनंद धीरे-धीरे घूमने, आराम से चाय पीने और पहाड़ी माहौल का मज़ा लेने में है।

Five Colors of Travel की ओर से खास सुझाव

  • मौसम देखकर कपड़े रखें। गर्मियों में भी शाम ठंडी हो सकती है। हल्की जैकेट और आरामदायक जूते साथ रखें। सर्दियों में गर्म कपड़े जरूर ले जाएं।
  • सैन्य नियमों का पालन करें। बकलोह छावनी वाला इलाका है। किसी प्रतिबंधित जगह में जाने की कोशिश न करें और सैन्य इमारतों, वाहनों या गतिविधियों की तस्वीर लेने से पहले नियम समझ लें।
  • ठहरने की जगह पहले तय करें। यहाँ होटल और होमस्टे के विकल्प सीमित हो सकते हैं। बुकिंग और आम यात्रियों के लिए प्रवेश की सुविधा पहले से पक्की कर लें। Bakloh
  • थोड़ा नकद साथ रखें। छोटे बाजारों में हर दुकान पर डिजिटल भुगतान की सुविधा हो, यह जरूरी नहीं। इसलिए कुछ नकद रखना समझदारी होगी।
  • यात्रा में जल्दबाजी न करें। बकलोह को सिर्फ घूमने की जगहों की सूची पूरी करने के लिए न देखें। आसपास टहलें, स्थानीय लोगों से बात करें और पहाड़ों के शांत माहौल का आनंद लें।

अगर आप शिमला और मनाली जैसी लोकप्रिय जगहों से हटकर हिमाचल के किसी शांत कस्बे को देखना चाहते हैं, तो Bakloh आपकी यात्रा की सूची में जगह बना सकता है। यहाँ बड़े पर्यटन केंद्रों जैसी रौनक नहीं है, लेकिन पुराना इतिहास, गोरखा संस्कृति, छोटे बाजार और पहाड़ी माहौल इसे अलग पहचान देते हैं।

बस एक बात याद रखें—बकलोह को पूरी तरह खुला पर्यटन स्थल समझकर न जाएं। यहाँ सैन्य क्षेत्र और प्रवेश से जुड़े नियम हैं, इसलिए घूमने की जगहों और ठहरने की सुविधा के बारे में पहले जानकारी लेना जरूरी है।

थोड़ी तैयारी के साथ आप Bakloh में एक सादा, आरामदायक और यादगार सफर बिता सकते हैं। कभी-कभी छुट्टी का असली मज़ा ज्यादा जगहें देखने में नहीं, बल्कि किसी शांत जगह पर रुककर खुद के लिए थोड़ा समय निकालने में होता है। Bakloh

Shivani Pal

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