Hazrat Nizamuddin Dargah: कैसे जाएं, क्या देखें और क्या खाएं
दिल्ली को अगर सिर्फ बड़ी-बड़ी इमारतों, बाजारों और भीड़ के लिए जाना जाए तो इसकी असली तस्वीर अधूरी रह जाएगी। इस शहर की अलग पहचान पुरानी गलियों, दरगाहों, खान-पान और सदियों पुरानी मिली-जुली संस्कृति से भी बनती है।
इन्हीं जगहों में एक नाम है हज़रत निज़ामुद्दीन Dargah। दिल्ली के निज़ामुद्दीन इलाके में मौजूद यह जगह सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि इतिहास, रूहानियत, संगीत और खाने का ऐसा अनुभव देती है जिसे एक बार महसूस करने के बाद लंबे समय तक याद रखा जा सकता है।
अगर आपने अब तक Dargah की तंग गलियों में घूमते हुए वहां की खुशबू महसूस नहीं की, शाम की कव्वाली नहीं सुनी और निज़ामुद्दीन बस्ती के मशहूर कबाब या निहारी का स्वाद नहीं लिया, तो दिल्ली के इस खास रंग से आपकी मुलाकात अभी बाकी है। Dargah में आने वाले लोगों में हर तरह के लोग दिखाई देते हैं। कोई दुआ मांगने आता है, कोई इतिहास देखने, कोई कव्वाली सुनने और कोई इस पूरे माहौल को करीब से महसूस करने।
हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया को समर्पित यह Dargah चिश्ती सिलसिले से जुड़ी हुई है और सदियों से लोगों के लिए आस्था और सुकून की जगह बनी हुई है। यहां की पुरानी वास्तुकला, मेहराबें, जालियां और आसपास की गलियां आपको दिल्ली के पुराने दौर की याद दिलाती हैं। Dargah रोज सुबह 5 बजे से रात 10:30 बजे तक खुली रहती है। यहां प्रवेश निःशुल्क है और सभी धर्मों के लोग आ सकते हैं। गुरुवार की शाम को मग़रिब की नमाज के बाद कव्वाली की महफिल सजती है।
हज़रत निज़ामुद्दीन Dargah का इतिहास
हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया दिल्ली के सबसे प्रसिद्ध सूफी संतों में से एक माने जाते हैं। उनका जीवन 13वीं और 14वीं शताब्दी के दौर से जुड़ा हुआ है। साल 1325 ईस्वी में उनके इंतकाल के बाद यहां उनकी याद में Dargah बनाई गई। समय के साथ यह जगह दिल्ली की महत्वपूर्ण सूफी विरासत का हिस्सा बन गई।
आज जब आप Dargah परिसर में पहुंचते हैं तो वहां की वास्तुकला अपने आप ध्यान खींचती है। संगमरमर का काम, खूबसूरत मेहराबें और जालीदार नक्काशी इसे एक अलग पहचान देते हैं। लेकिन इस जगह की खासियत सिर्फ इसकी इमारत नहीं है। इसके आसपास मौजूद कई ऐतिहासिक मज़ारें भी इस जगह को खास बनाती हैं।
Dargah परिसर में हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के सबसे करीबी शिष्यों में से एक अमीर खुसरो की मज़ार भी है। अमीर खुसरो का नाम भारतीय कविता, संगीत और सूफी परंपरा की दुनिया में बेहद खास है। मुगल राजकुमारी जहांआरा बेगम की मज़ार भी Dargah परिसर में स्थित है। मशहूर शायर मिर्ज़ा ग़ालिब की मज़ार निज़ामुद्दीन इलाके में पास ही स्थित है, लेकिन वह मुख्य Dargah परिसर के अंदर नहीं है।
यही वजह है कि Dargah का माहौल बाकी ऐतिहासिक जगहों से थोड़ा अलग महसूस होता है। यहां इतिहास सिर्फ दीवारों पर दिखाई नहीं देता, बल्कि कव्वाली, दुआ और लोगों की आस्था में भी नजर आता है।
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अमीर खुसरो और Dargah का रिश्ता
अमीर खुसरो का नाम हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के साथ बहुत गहराई से जुड़ा हुआ है। वह सूफी संत के प्रिय शिष्य माने जाते हैं। उनका जन्म 1253 ईस्वी में उत्तर प्रदेश के पटियाली में हुआ था। उन्हें तूतिए-हिंद भी कहा जाता है।
अमीर खुसरो को कविता, भाषा और संगीत की दुनिया में उनके योगदान के लिए जाना जाता है। कव्वाली की परंपरा से भी उनका नाम गहराई से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि जब अमीर खुसरो कम उम्र के थे, तब वे अपने पिता के साथ हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की खानकाह पहुंचे थे। यहीं से दोनों के बीच एक गहरा रूहानी रिश्ता जुड़ा।
आज भी Dargah में अमीर खुसरो की मज़ार पर आने वाले लोग उस पुराने रिश्ते को महसूस करने की कोशिश करते हैं। गुरुवार की कव्वाली में जब अमीर खुसरो की रचनाएं और सूफी कलाम गूंजते हैं, तो Dargah का माहौल और भी खास हो जाता है।
Dargah जाने का सही समय
वैसे तो Dargah साल भर जाया जा सकता है, लेकिन अगर आप आराम से घूमना चाहते हैं तो मौसम का ध्यान रखना जरूरी है। दिल्ली की गर्मी काफी तेज होती है और मई-जून में तापमान बहुत अधिक हो सकता है। ऐसे में पुरानी गलियों में घूमना और काफी देर तक बाहर रहना थका सकता है।
अक्टूबर से मार्च तक का समय Dargah घूमने के लिए काफी अच्छा माना जा सकता है। इन महीनों में दिल्ली का मौसम ठंडा और सुहावना रहता है। जनवरी में तापमान काफी नीचे जा सकता है, इसलिए अगर सर्दियों में जा रहे हैं तो हल्के गर्म कपड़े साथ रखना बेहतर रहेगा।
अगर आपका मकसद कव्वाली सुनना है तो गुरुवार की शाम को Dargah जाना एक अलग अनुभव देता है। कव्वाली आमतौर पर मग़रिब की नमाज के बाद शुरू होती है और समय मौसम तथा भीड़ के अनुसार बदल सकता है। गुरुवार की शाम Dargah में भीड़ अधिक रहती है। इसलिए अगर आप कव्वाली के लिए जा रहे हैं तो समय से पहले पहुंचना बेहतर रहेगा।
उर्स के दौरान Dargah का माहौल
उर्स के दौरान Dargah की रौनक और भी बढ़ जाती है। हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया का उर्स इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार मनाया जाता है। सूफी परंपरा में उर्स को संत की आत्मा के खुदा से मिलन के रूप में देखा जाता है। इस मौके पर Dargah में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
कव्वाली की महफिलें, लंगर और चादर चढ़ाने की परंपरा इस अवसर को खास बनाती हैं। आसपास की गलियों में भी रौनक बढ़ जाती है। हालांकि उर्स के दिनों में भीड़ काफी ज्यादा हो सकती है। अगर आप शांति से Dargah देखना चाहते हैं तो सामान्य दिन चुनना ज्यादा सुविधाजनक रहेगा। उर्स के समय परिवार के साथ जा रहे हों तो बच्चों और बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखें। भीड़ में एक-दूसरे से अलग न हों और अपने सामान को संभालकर रखें।
Dargah तक कैसे पहुंचें?
दिल्ली में होने की वजह से Dargah तक पहुंचना बहुत मुश्किल नहीं है। मेट्रो, बस, ऑटो और कैब जैसे कई विकल्प मौजूद हैं। मेट्रो से आने वालों के लिए हज़रत निज़ामुद्दीन मेट्रो स्टेशन प्रमुख विकल्प है। यह पिंक लाइन पर स्थित है। जेएलएन स्टेडियम मेट्रो स्टेशन भी एक विकल्प है, लेकिन वहां से Dargah तक पहुंचने के लिए ऑटो या कैब लेना ज्यादा सुविधाजनक हो सकता है।
हज़रत निज़ामुद्दीन मेट्रो स्टेशन से Dargah की गलियों तक पहुंचने के लिए पैदल या ई-रिक्शा का इस्तेमाल किया जा सकता है। पैदल समय रास्ते, मौसम और आपकी चाल के अनुसार अलग हो सकता है। अगर आप ब्लू लाइन से आ रहे हैं तो मयूर विहार फेज-1, आनंद विहार आईएसबीटी या कड़कड़डूमा से पिंक लाइन की तरफ जा सकते हैं।
वायलेट लाइन से आने वाले लोग लाजपत नगर से पिंक लाइन की तरफ बदल सकते हैं। अपने शुरुआती स्थान के अनुसार मेट्रो का सही मार्ग पहले से देख लेना बेहतर रहेगा। कैब या ऑटो से भी सीधे Dargah पहुंच सकते हैं। सड़क से ऑटो लेने पर किराया पहले तय कर लेना अच्छा रहता है।
Dargah जाते समय क्या पहनें?
Dargah एक पवित्र जगह है, इसलिए कपड़ों का ध्यान रखना जरूरी है। यहां फैशन से ज्यादा आराम और शालीनता को प्राथमिकता देना बेहतर रहेगा। पुरुष साधारण कुर्ता-पायजामा, पूरी बांह की सूती शर्ट और ट्राउजर पहन सकते हैं। बहुत छोटे कपड़े, हाफ पैंट और बिना बांह वाली टी-शर्ट से बचना बेहतर रहेगा।
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महिलाएं सूती सलवार-सूट, लंबी कुर्ती, कुर्ती-प्लाजो या साड़ी पहन सकती हैं। Dargah में सिर ढकना सम्मानजनक परंपरा मानी जाती है। इसलिए दुपट्टा, स्टोल, स्कार्फ या रुमाल साथ रखना अच्छा रहेगा। पुरुषों को भी सिर ढकने के लिए रुमाल या टोपी रखने की जरूरत पड़ सकती है। Dargah परिसर में प्रवेश से पहले जूते बाहर उतारने होते हैं। इसलिए ऐसे जूते या चप्पल पहनना बेहतर है जिन्हें आसानी से उतारा और पहना जा सके।
Dargah में क्या करें और क्या न करें?
Dargah में जाने से पहले वहां की परंपराओं और माहौल का सम्मान करना जरूरी है। यह सिर्फ घूमने की जगह नहीं है। परिसर में धीरे बोलें और धार्मिक गतिविधियों के दौरान शोर या धक्का-मुक्की करने से बचें। चादर, फूल या इत्र चढ़ाना आपकी इच्छा पर निर्भर है, लेकिन किसी के दबाव में आकर कुछ खरीदने की जरूरत नहीं है।
मुख्य मज़ार के अंदर या संवेदनशील धार्मिक स्थानों पर फोटो और वीडियो बनाने से बचें। जहां फोटोग्राफी की अनुमति हो, वहां भी लोगों की निजता और प्रार्थना का सम्मान रखें। भीड़ वाले समय में मोबाइल, पर्स और जरूरी सामान को सुरक्षित रखें। अपरिचित लोगों को अपना सामान न दें। Dargah की गलियों में कई दुकानें हैं। खरीदारी करते समय कीमत पहले जरूर पूछ लें और जल्दबाजी में ज्यादा सामान खरीदने से बचें।
निज़ामुद्दीन में खाने का क्या मिलेगा?
Dargah की यात्रा खाने के बिना शायद अधूरी लगे। आसपास की गलियों में कई ऐसी जगहें हैं जहां पुराना दिल्ली वाला स्वाद आज भी देखने को मिलता है। अगर आपको कबाब पसंद हैं तो यहां सीख कबाब, शामी कबाब, मटन टिक्का और तंदूरी चीजों के कई विकल्प मिल सकते हैं।
निहारी पसंद करने वालों को गर्म निहारी, अदरक, हरी मिर्च और खमीरी रोटी का मेल जरूर पसंद आ सकता है। बिरयानी के शौकीनों के लिए मुरादाबादी बिरयानी और दूसरी उत्तर भारतीय बिरयानी के विकल्प भी आसपास मिल जाते हैं। अगर आप बैठकर आराम से खाना चाहते हैं तो स्थानीय रेस्तरां में चिकन कोरमा, कढ़ाई चिकन, तंदूरी चिकन और दूसरे मुगलई व्यंजन आजमा सकते हैं।
शाकाहारी खाने वालों के लिए भी कुछ दुकानें हरा-भरा कबाब, सोया कबाब, दाल, रोटी और वेज बिरयानी जैसे विकल्प देती हैं। खाने के बाद इमरती, कुल्हड़ वाली खीर या दूसरी पारंपरिक मिठाइयां आजमाई जा सकती हैं। Dargah के आसपास खाना चुनते समय भीड़ देखकर ही फैसला न करें। दुकान की सफाई, ताजा खाना और अपनी पसंद का ध्यान रखना जरूरी है।
Dargah के आसपास और क्या देख सकते हैं?
अगर आप Dargah घूमने के बाद सीधे घर लौटने के बजाय आसपास थोड़ा और घूमना चाहते हैं, तो कई ऐतिहासिक और हरी-भरी जगहें आपकी यात्रा में शामिल हो सकती हैं। हुमायूं का मकबरा Dargah से थोड़ी दूरी पर है। यह मुगल वास्तुकला का शानदार उदाहरण और विश्व धरोहर स्थल है।
इसके बाद सुंदर नर्सरी जाया जा सकता है। यहां पेड़ों, हरियाली और पुराने स्मारकों के बीच कुछ समय शांति से बिताया जा सकता है। अगर आपके पास थोड़ा और समय है तो लोधी गार्डन भी जा सकते हैं। सुबह या शाम की सैर के लिए यह जगह अच्छी रहती है।
इस तरह एक ही दिन में Dargah, हुमायूं का मकबरा और सुंदर नर्सरी को अपने कार्यक्रम में शामिल किया जा सकता है। अगर आप सुबह हुमायूं का मकबरा और सुंदर नर्सरी घूम लें, तो शाम को Dargah पहुंचकर कव्वाली सुनना एक अच्छा दिनभर का प्लान हो सकता है।
Dargah जाने से पहले इन बातों का ध्यान रखें
Dargah जाते समय सबसे जरूरी बात यही है कि आप वहां की परंपराओं और माहौल का सम्मान करें। जूते आसानी से उतारने वाले रखें, सिर ढकने के लिए कपड़ा साथ रखें और कपड़े शालीन रखें। अगर गुरुवार की कव्वाली सुनने जा रहे हैं तो थोड़ा समय पहले पहुंचना बेहतर रहेगा क्योंकि उस समय भीड़ बढ़ सकती है।
गुरुवार की शाम को Dargah की गलियों में आवाजाही भी ज्यादा रहती है। इसलिए बुजुर्गों या छोटे बच्चों के साथ हों तो आराम से चलें और परिवार के लोगों को साथ रखें। उर्स के दौरान Dargah में बहुत ज्यादा भीड़ हो सकती है। अगर आपका मकसद आराम से घूमना और आसपास का खाना चखना है तो सामान्य दिनों का चुनाव ज्यादा सुविधाजनक हो सकता है।
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सबसे बड़ी बात, Dargah को सिर्फ फोटो खींचने वाली जगह की तरह न देखें। यहां का इतिहास, संगीत, लोगों की आस्था और आसपास की पुरानी बस्ती मिलकर इसे दिल्ली की खास पहचान बनाते हैं।
Five Colors of Travel की ओर से 5 छोटे सुझाव
- ट्रैफिक और पार्किंग की परेशानी से बचने के लिए मेट्रो को प्राथमिकता दें।
- Dargah में जाने के लिए दुपट्टा, स्टोल, टोपी या रुमाल साथ रखें।
- गलियों में पैदल चलना और जूते उतारना आसान रहे, इसलिए स्लिप-ऑन या फ्लैट चप्पल बेहतर हैं।
- Dargah के आसपास निहारी, कबाब, बिरयानी और मिठाइयों का स्वाद जरूर लें।
- अगर कव्वाली सुननी है तो गुरुवार की शाम का समय चुनें, लेकिन भीड़ के लिए तैयार रहें।
अगर आप दिल्ली में रहते हैं या दिल्ली घूमने आए हैं, तो अगली बार अपनी घूमने की सूची में हज़रत निज़ामुद्दीन Dargah को जरूर शामिल करें। यहां इतिहास भी है, संगीत भी है, पुरानी दिल्ली का स्वाद भी है और एक ऐसा माहौल भी है जिसे सिर्फ पढ़कर नहीं, बल्कि वहां जाकर ही महसूस किया जा सकता है।
एक तरफ अमीर खुसरो और हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की सदियों पुरानी कहानी है, दूसरी तरफ गलियों में उठती कबाब और निहारी की खुशबू। कहीं कव्वाली की आवाज सुनाई देती है तो कहीं लोग चुपचाप दुआ करते नजर आते हैं। यही सब मिलकर हज़रत निज़ामुद्दीन Dargah को दिल्ली की उन जगहों में शामिल करता है जहां एक बार जाना अपने आप में एक पूरा अनुभव बन जाता है।