Travel News: पेड़ों को बच्चों की तरह पालते हैं यहां के लोग, इको विलेज की कहानी जानने पहुंच रहे दुनिया भर के सैलानी
Travel News/Dhudmaras Eco Village Bastar Travel Guide नई दिल्ली । अगर आप भी वही घिसे-पिटे पहाड़ों और भीड़भाड़ वाले टूरिस्ट स्पॉट्स से दूर भारत की असली और अछूती संस्कृति को महसूस करना चाहते हैं, तो छत्तीसगढ़ का बस्तर आपका अगला ट्रेवल डेस्टिनेशन होना चाहिए। बस्तर की खूबसूरत कांगेर घाटी (Kanger Valley) में कांगेर नदी के किनारे बसा ‘धुड़मारास’ गांव इस समय देश-दुनिया के घुमक्कड़ों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। Dhudmaras Eco Village Bastar Travel Guide
यह कोई आम गांव नहीं है, बल्कि परंपरा और प्रकृति के अनूठे तालमेल की एक ऐसी जीती-जागती मिसाल है, जिसने संयुक्त राष्ट्र (UN) तक का ध्यान अपनी ओर खींचा है। यहां रहने वाले ‘धुरवा आदिवासी‘ पेड़ों को काटते नहीं बल्कि उन्हें अपनी संतान की तरह पालते हैं। आइए चलते हैं इस अनोखे ‘इको विलेज’ की एक जादुई वर्चुअल सैर पर।
जब पेड़ बड़े हो जाएं, तो प्रकृति को घर सौंपकर निकल जाते हैं लोग!
धुड़मारास गांव की सबसे हैरान और भावुक कर देने वाली परंपरा यहां के आदिवासियों का प्रकृति के प्रति अटूट प्रेम है। धुरवा जनजाति में पीढ़ियों से यह अनूठी परंपरा चली आ रही है कि, जब आंगन या घर के आसपास लगाए गए पेड़ बहुत बड़े हो जाते हैं, तो ये लोग उस घर को वैसे ही छोड़कर दूसरी जगह नया आशियाना बना लेते हैं।
गांव के स्थानीय निवासी ईश्वर बघेल अपने दादा का एक पुराना टूटा हुआ घर दिखाते हुए गर्व से बताते हैं, “जब आंगन के पेड़ बड़े हुए तो मेरे पिता ने वह घर छोड़ दिया और दूसरी जगह घर बनाया। अब वहां भी पेड़ बड़े हो गए हैं, इसलिए मैंने अपने लिए अलग घर बना लिया है।” पूर्वजों के इसी महान त्याग का परिणाम है कि आज पूरा गांव एक घने और खूबसूरत जंगल जैसा नजर आता है, जिसे देखने के लिए दुनिया तरसती है।
थाली-कटोरी का कोई काम नहीं, आज भी दोना-पत्तल में ही होता है भोजन
यदि आप इस गांव की यात्रा करते हैं, तो आपको आधुनिकता की चकाचौंध से दूर एक बिल्कुल शुद्ध और सात्विक जीवन शैली देखने को मिलेगी। यहां के धुरवा आदिवासी आज भी अपने हाथों से बनाए गए दोना-पत्तल में ही खाना खाते हैं।
गांव के घरों में जाने पर आपको जमीन पर बैठकर भोजन करने का पारंपरिक अनुभव मिलेगा। यहां की ग्रामीण मंगलदई बघेल बताती हैं कि, उनके घरों में स्टील या कांच की थाली-कटोरी नहीं होती। बड़े और गहरे दोने में भात (चावल), छोटे दोने में कटहल की लजीज सब्जी और बस्तर का प्रसिद्ध आम पना पर्यटकों को परोसा जाता है। यहां तक कि सुबह की गर्मागर्म चाय भी पत्तों से बने दोने में ही पिलाई जाती है।
बंबू राफ्टिंग और विदेशी पर्यटकों का जमावड़ा: संयुक्त राष्ट्र तक पहुंची गूंज
धुड़मारास गांव अब वैश्विक पर्यटन मानचित्र (Global Tourism Map) पर चमक रहा है। गांव के ही एक स्थानीय युवक मानसिंह बघेल ने यहां पर्यटकों के लिए रोमांचक ‘बंबू राफ्टिंग’ (Bamboo Rafting – बांस की नाव) की शुरुआत की थी, जो आज यहां का मुख्य आकर्षण बन चुकी है। कांगेर नदी के शांत पानी में बांस के बने फ्लोट पर तैरना सैलानियों को एक अलग ही दुनिया में ले जाता है।
आंकड़े बयां करते हैं सफलता की कहानी…
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ग्राम सभा के रिकॉर्ड के अनुसार, पिछले दो-तीन सालों में ही 80 से 90 हजार देशी-विदेशी पर्यटक इस छोटे से गांव की संस्कृति को देखने आ चुके हैं।
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यहां ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, ब्राजील, ईरान, नेपाल, जर्मनी और बेल्जियम जैसे देशों से सैलानी आकर हफ्तों रुकते हैं। विदेशी पर्यटक यहां के आदिवासियों की रसोई में खुद चूल्हे पर खाना बनाना सीखते हैं।
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UNWT0 का सम्मान: इस अनोखे विजन के कारण साल 2022 में धुड़मारास को ‘इको विलेज’ का दर्जा मिला। वहीं सितंबर 2023 में संयुक्त राष्ट्र विश्व पर्यटन संगठन (UNWTO) ने इसे अपने ‘बेस्ट टूरिज्म विलेज अपग्रेड प्रोग्राम’ के लिए चुना। यह दुनिया के 60 देशों में से चुने गए टॉप 20 गांवों में शामिल है।
ट्रेवल गाइड: धुड़मारास ‘इको विलेज’ कैसे पहुंचें? (How to Reach)
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हवाई मार्ग द्वारा (By Air): सबसे नजदीकी हवाई अड्डा जगदलपुर एयरपोर्ट है, जो बस्तर का मुख्य केंद्र है और रायपुर व हैदराबाद से सीधे जुड़ा है। रायपुर का स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट (RPR) भी एक अच्छा विकल्प है।
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रेल मार्ग द्वारा (By Train): जगदलपुर रेलवे स्टेशन सबसे पास है। विशाखापत्तनम और किरंदुल के बीच चलने वाली विस्टाडोम (Vistadome) ट्रेन के जरिए आप खूबसूरत घाटियों को देखते हुए यहां पहुंच सकते हैं।
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सड़क मार्ग द्वारा (By Road): जगदलपुर शहर से कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान (Kanger Valley National Park) के रास्ते धुड़मारास गांव के लिए टैक्सियां और लोकल ट्रांसपोर्ट आसानी से मिल जाते हैं।
ट्रेवल टिप: धुड़मारास घूमने जाएं तो यहां के होमस्टे में रुकें। इसके अलावा पास में ही स्थित एशिया की सबसे गहरी गुफाओं में से एक ‘कोटमसर गुफा’ और भारत का नियाग्रा कहलाने वाला भव्य ‘चित्रकोट जलप्रपात’ देखना बिल्कुल न भूलें।





