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इंडिया गेट: जो देश के लिए मिटते हैं, उन्हें कभी भुलाया नहीं जाता- मेरा सफरनामा

india gate

वीरता और देशभक्ती दिखाने की चीज नहीं है , जब हम अपना कर्म करते हैं तो सब दिखता है। जब शहीदों को सम्मान और उनको याद करते हैं, तो उसका प्रतिक इंडिया गेट याद आता है। इंडिया गेट पर शहीदों और वीरों के सम्मान में राष्ट्रीय युद्ध स्मारक और परमवीर चक्र योध्दाओं के लिए परम स्थल बनवाया गया है।

सात जुलाई, सन् 1999 में परमवीर चक्र विजेता कैप्टन विक्रम बत्रा ने अपनी शाहदत दी थी। इस साल, इस दिन सुबह से मेरा मन थोड़ा उठा-उठा सा लग रहा था, मन में बेचैनी आ रही थी कि बस एक बार चलके सभी वीरों के दर्शन कर लूँ। मेरा सबसे ज्यादा लगाव शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा से है। तो बस जैसे ही कॉलेज खत्म हुआ निकल पड़ा इंडिया गेट कि तरफ़ और रास्ते में पापा को कॉल किया की आज इंडिया गेट जाने का प्लान बना है।

केंद्रीय सचिवालय मेट्रो से उतर कर करीब एक किलो मीटर पैदल कर्त्वय पथ पर सफर करते हुए , रास्ते में कुछ भवन देखते हुआ निकला जैसे कि – राष्ट्रपति भवन जो कि इंडिया गेट और कर्तव्य पथ के सामने है। बाकि निर्माण भवन, उद्योग भवन, कृषि भवन इत्यादि।

इंडिया गेट नई दिल्ली के राजपथ पर स्थित एक ऐतिहासिक और भव्य युद्ध स्मारक है, जिसे ब्रिटिश शासन के दौरान प्रथम विश्व युद्ध और तीसरे एंग्लो-अफगान युद्ध में शहीद हुए लगभग 70,000 भारतीय सैनिकों की स्मृति में बनाया गया था। इसकी आधारशिला 10 फरवरी 1921 को ड्यूक ऑफ कनॉट ने रखी थी और इसका निर्माण 1931 में पूरा हुआ।

इस स्मारक का डिज़ाइन प्रसिद्ध ब्रिटिश वास्तुकार सर एडविन लुटियन्स ने तैयार किया। यह स्मारक 42 मीटर ऊँचा है और लाल व पीले बलुआ पत्थरों से निर्मित है। 1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद इसके नीचे ‘अमर जवान ज्योति’ स्थापित की गई, जो शहीद सैनिकों की स्मृति में निरंतर जलती रहती है। हर वर्ष गणतंत्र दिवस की परेड यहीं से शुरू होती है। इंडिया गेट केवल एक स्मारक नहीं, बल्कि राष्ट्र के शौर्य, बलिदान और एकता का प्रतीक है, जो हर भारतीय के दिल में बसता है।

जब हम इंडिया गेट पहुंचे तो सबसे अच्छी चीज दिखी वो थी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की प्रतिमा। बड़े सान से खड़ी उस प्रतिमा को देखके दिल विभोर हो गया। इस प्रतिमा की भी अद्भुत कहानी है, जहाँ पर आज नेताजी की प्रतिमा है वहाँ सन् 1936 में जॉर्ज पंचम की प्रतिमा लगाई गयी थी। 1965 में स्वतंत्रता दिवस से दो दिन पहले कुछ लोगों ने सिपाहियों को बेहोश करके प्रतिमा के नाक और कान को विक्रत कर दिया और शाही मुकुट उतार लिया, फिर वहाँ पर नेताजी की तस्वीर छोर दी।

इंडिया गेट

सन् 1921 में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदीजी ने वहाँ पर नेताजी की प्रतिमा के निर्माण की घोसणा की । 23 जनवरी 2022 को ‘पराक्रम दिवस ‘ के मौके पर पर वहाँ होलोग्राम प्रतिमा का अनावरण किया, सितंबर 2022 में 28 फीट ऊँची और 8 फीट
चौडाई की प्रतिमा का अनावरण किया गया।

अमर जवान ज्योति, या अमर सैनिक की लौ, एक संरचना है जिसमें काले संगमरमर का चबूतरा है, जिसमें उलटी राइफल है, युद्ध हेलमेट से ढका हुआ है, चार कलशों से बंधा है, प्रत्येक में संपीड़ित प्राकृतिक गैस की लपटों से स्थायी प्रकाश ( ज्योति ) है, जिसे दिसंबर 1971 में बांग्लादेश की मुक्ति के युद्ध में शहीद हुए भारतीय सैनिकों की स्मृति में इंडिया गेट के नीचे बनाया गया था। इसका उद्घाटन तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने 26 जनवरी 1972 को, तेईसवें भारतीय गणतंत्र दिवस पर किया था।

इंडिया गेट

21 जनवरी 2022 को इंडिया गेट पर अमर जवान ज्योति को राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर अमर जवान ज्योति के साथ मिला दिया गया। जहाँ पर चार सैनिक प्रति छे: घंटे ज्योति की रखवाली करते हैं।

राष्ट्रीय युद्ध स्मारक आजादी के बाद, चीन और पाकिस्तान के साथ संघर्ष और बाकी किसी मुठभेड़ में शहीद हुए सैनीकों की याद में बनवाया गया है। जहां पर अभी अखंड जवान ज्योति और कई युद्धों का वरडन किया गया है, जैसे कि लोंगेवाला की लडाई, रजांग ला की लडाई इत्यादि।

आजादी के बाद जितने भी युद्धों में शहीद हुए सैनिक है उनकी याद में उनके नाम पर एक प्लेट अंकित की गयी है जहाँ उनके परिवार व अन्य लोग फूल अर्पण करके श्रधांजलि देते है। ये राष्ट्रीय युद्ध स्मारक के चारों और अंकित है, साथ ही साथ कुछ टी. वी भी लगा दी गयी हैं जिससे आप अपने मोबाइल नंबर से श्रदांजलि दे सकते हैं।

जब हम थोड़ा चलते हैं तो एक गुफ़ा सी दिखती है उससे हम पहुँचते हैं एक संग्रहालय में पहुँचते हैं, जहाँ पर हमको सैनिकों के उपर कुछ किताबें दिखती है जो हम खरीद भी सकते हैं। वहाँ पर युद्धों के और भी वरडन दिखाये गए, वहाँ से सीधा रास्ता जाता है परम योध्दा स्थल की तरफ।

ये वो जगह है जहाँ मुझे सबसे ज्यादा शांती मिलती है, क्योंकि यहाँ बहुत ही कम लोग जाते हैं। पता नही क्यों शायद उनको इस जगह का ज्ञान नही है, या फिर उनको चलने मे दिक्कत होती है। यहाँ पर कुल 21 परम वीर चक्र विजेताओं की मूर्तियाँ बनी है, जिनमें से सिर्फ एक वायु सेना की तरफ से है शहीद नवजोत सिंह सेखो जिन्होंने अपना बलिदान 1971 ki जंग में दिया।

इंडिया गेट

जब हम योध्दा स्थल में बढ़ते हैं सबसे पहले एक नक्शा दिखता है, उसमें सभी प्रतिमाओं के पास जाने का रास्ता दिखता है । जब हम आँगे बढ़ते हैं सबसे पहली प्रतिमा कैप्टन विक्रम बत्रा की है , जिन्होंने 1999 कारगिल के युद्ध में अपना बलिदान दिया। उनके बाद उनके साथियों कि उसके बाद जब में सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेतरपाल को देखा तो सिन्ना गर्व से भर गया।

इंडिया गेट के लिए कई मेट्रो से आप आ सकते हैं जैसे की – केंद्रीय सचिवालय, उद्योग भवन, सुप्रीम कोर्ट, इत्यादि।
बस से भी आप इंडिया गेट आ सकते हैं (डी.टी.सी) क्योंकि कई बसें यहाँ तक आती हैं।

इंडिया गेट 24 घंटे खुला रहता है, सप्ताह के सातों दिन। हालांकि, शाम 7:00 बजे से 9:30 बजे के बीच इंडिया गेट पर लाइट शो होता है, और यह समय घूमने के लिए सबसे अच्छा माना जाता है।

यदि आप इंडिया गेट घूमने की योजना बना रहे हैं, तो शाम का समय सबसे अच्छा है, खासकर जब लाइट शो चल रहा हो

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