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Bakloh Travel Guide: हिमाचल की इस शांत जगह की पूरी जानकारी

Manali

अगर आप हिमाचल प्रदेश की यात्रा पर निकलते हैं, तो ज्यादातर लोगों की पहली पसंद डलहौजी, खजियार, मनाली या शिमला जैसे मशहूर हिल स्टेशन होते हैं। लेकिन हिमाचल में कुछ ऐसी जगहें भी हैं, जहां पहुंचकर आपको न तो पर्यटकों की भारी भीड़ मिलेगी और न ही हर मोड़ पर होटल और दुकानें। ऐसी ही एक शांत और खूबसूरत जगह है Bakloh, जो चंबा जिले की पहाड़ियों में बसा एक पुराना कैंटोनमेंट इलाका है।

देवदार और चीड़ के पेड़ों से घिरा Bakloh अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के साथ-साथ सेना और गोरखा रेजीमेंट से जुड़े इतिहास के लिए भी जाना जाता है। यहां की पुरानी गलियां, शांत बाजार, मंदिर, चर्च, जंगल और आसपास के गांव इसे बाकी हिल स्टेशनों से थोड़ा अलग बनाते हैं। यहां घूमने का मतलब सिर्फ कुछ जगहों पर जाकर तस्वीरें खींचना नहीं है, बल्कि एक ऐसे पहाड़ी कस्बे को महसूस करना है, जिसकी पहचान में प्रकृति और इतिहास दोनों साथ-साथ चलते हैं।

अगर आप 2026 में किसी शांत पहाड़ी जगह की तलाश में हैं, जहां दो-तीन दिन आराम से बिताए जा सकें और साथ में डलहौजी, खजियार, पुरथू और चंबा जैसी जगहों को भी देखा जा सके, तो Bakloh आपके लिए एक अच्छा विकल्प हो सकता है। इस पूरी ट्रैवल गाइड में जानते हैं यहां का इतिहास, मौसम, घूमने की जगहें, गांव का अनुभव, खाने-पीने की चीजें, आसपास के पर्यटन स्थल, पहुंचने का रास्ता और बजट ट्रिप से जुड़ी जरूरी बातें।

Bakloh आखिर है क्या और इसकी खासियत क्या है?

Bakloh हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के भटियात क्षेत्र में स्थित एक छोटा कैंटोनमेंट इलाका है। समुद्र तल से करीब 2,000 मीटर के आसपास की ऊंचाई पर बसा यह इलाका चारों तरफ पहाड़ियों, चीड़ और देवदार के जंगलों से घिरा हुआ है। यहां का वातावरण उन लोगों को खास पसंद आ सकता है जो बड़े और व्यस्त पर्यटन केंद्रों से दूर कुछ शांत देखना चाहते हैं।

Bakloh की सबसे अलग बात इसका सैन्य इतिहास है। यह जगह लंबे समय से भारतीय सेना और गोरखा रेजीमेंट से जुड़ी रही है। इसी वजह से यहां का माहौल सामान्य पर्यटन कस्बों से थोड़ा अलग दिखाई देता है।

Bakloh

पुराने बाजारों और आसपास की इमारतों में आज भी इसके सैन्य अतीत की झलक देखने को मिलती है। यहां का प्राकृतिक वातावरण भी काफी आकर्षक है। सुबह के समय पेड़ों के बीच से आती ठंडी हवा, पहाड़ियों पर छाई हल्की धुंध और दूर तक फैली हरियाली आपको शहर की भागदौड़ से बिल्कुल अलग दुनिया में ले जाती है। अगर आपको शांत जगहों की फोटोग्राफी पसंद है, तो Bakloh में कई ऐसे दृश्य मिल सकते हैं जिन्हें आप अपनी यात्रा की यादों में सहेजना चाहेंगे।

इतिहास के पन्नों में कैसे आया Bakloh?

Bakloh का इतिहास 19वीं सदी से जुड़ा हुआ है। ब्रिटिश सेना के अधिकारी कैप्टन बेकर ने इस इलाके को सैन्य स्टेशन के लिए उपयुक्त माना था। इसके बाद यहां सैन्य गतिविधियां बढ़ीं और धीरे-धीरे यह एक महत्वपूर्ण मिलिट्री स्टेशन के रूप में विकसित हुआ। वर्ष 1866 में 4वीं गोरखा राइफल्स का केंद्र पिथौरागढ़ से यहां लाया गया था।

इसके बाद करीब एक सदी तक Bakloh 4वीं गोरखा राइफल्स से जुड़े सैन्य ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। इसी वजह से आज भी यहां कई जगहों के नाम गोरखा रेजीमेंट के इतिहास से जुड़े हुए हैं। 1/4 बाजार और 2/4 बाजार जैसे नाम पुराने सैन्य इतिहास की याद दिलाते हैं। समय के साथ प्रशासनिक और सैन्य व्यवस्था में कई बदलाव हुए।

आज यह इलाका कैंटोनमेंट बोर्ड के अंतर्गत आता है। यहां घूमते समय यह समझना जरूरी है कि यह सिर्फ पर्यटन स्थल नहीं बल्कि एक सक्रिय कैंटोनमेंट क्षेत्र भी है। इसलिए हर जगह फोटो खींचना या किसी प्रतिबंधित इलाके में जाना उचित नहीं है।

4वीं गोरखा राइफल्स से जुड़ी है इसकी पहचान

Bakloh का नाम गोरखा रेजीमेंट के इतिहास से अलग करके देखना मुश्किल है। 4वीं गोरखा राइफल्स का यहां लंबे समय तक केंद्र रहने की वजह से इस छोटे से पहाड़ी इलाके ने भारतीय सैन्य इतिहास में अपनी अलग पहचान बनाई। 2/4 गोरखा राइफल्स की स्थापना 22 अप्रैल 1886 को यहां हुई थी। बाद के वर्षों में 3/4 गोरखा राइफल्स और 5/4 गोरखा राइफल्स से जुड़ी सैन्य गतिविधियां भी यहां हुईं।

इस वजह से Bakloh के पुराने बाजार और रास्ते आज भी अपने नामों में इस इतिहास को संभाले हुए हैं। आज भले ही सैन्य प्रशासन और रेजीमेंट की गतिविधियों में समय के साथ बदलाव आया हो, लेकिन स्थानीय लोगों और पुराने ढांचों के बीच इस इतिहास की छाप साफ दिखाई देती है। इतिहास में रुचि रखने वाले यात्रियों के लिए यही चीज Bakloh को बाकी छोटे हिल स्टेशनों से अलग बनाती है।

पंजाब से हिमाचल का हिस्सा बनने तक का सफर

आज Bakloh हिमाचल प्रदेश में है, लेकिन प्रशासनिक इतिहास की बात करें तो हमेशा ऐसा नहीं था। आजादी के बाद भी यह क्षेत्र पंजाब का हिस्सा रहा। वर्ष 1966 में पंजाब के पहाड़ी क्षेत्रों के पुनर्गठन के दौरान बाकलोह और आसपास के क्षेत्र हिमाचल प्रदेश में शामिल किए गए। इस बदलाव के बाद Bakloh का प्रशासनिक संबंध हिमाचल प्रदेश से हो गया और धीरे-धीरे यह चंबा जिले के पहाड़ी क्षेत्र के रूप में जाना जाने लगा।

इसलिए यहां की संस्कृति में आपको हिमाचली और पुराने पंजाब क्षेत्र की कुछ झलकियां एक साथ देखने को मिल सकती हैं। यात्रा के दौरान ऐसी बातें किसी जगह को सिर्फ सुंदर लोकेशन से आगे बढ़ाकर उसके इतिहास से जोड़ती हैं। Bakloh की खासियत भी यही है कि यहां पहाड़ों के साथ एक लंबा ऐतिहासिक सफर भी दिखाई देता है।

Bakloh घूमने का सबसे अच्छा समय कौन-सा है?

अगर मौसम की बात करें तो Bakloh साल के अलग-अलग समय में अलग रूप दिखाता है। अप्रैल से जून तक गर्मियों का मौसम यहां काफी सुहावना रहता है। जब मैदानी इलाकों में गर्मी बढ़ने लगती है, तब पहाड़ों की ठंडी हवा राहत देती है। इसलिए गर्मियों में यहां घूमना काफी आरामदायक हो सकता है। जून से सितंबर के बीच बारिश होती है और इस दौरान आसपास की पहाड़ियां और ज्यादा हरी नजर आती हैं।

बारिश के बाद पेड़ों और घास का रंग गहरा हो जाता है और मौसम काफी ताजा लगता है। हालांकि पहाड़ी रास्तों पर भूस्खलन या फिसलन की स्थिति बन सकती है, इसलिए इस मौसम में सड़क की स्थिति देखकर ही यात्रा करनी चाहिए।

Bakloh

अक्टूबर से मार्च तक ठंड बढ़ने लगती है। सुबह और रात काफी ठंडी हो सकती हैं। दिसंबर के आखिर से जनवरी के बीच आसपास के ऊंचे इलाकों में बर्फ देखने का मौका कभी-कभी मिल सकता है। अगर आपका उद्देश्य शांत सर्दियों की यात्रा है, तो यह मौसम भी अच्छा अनुभव दे सकता है।

चिल्लामा हैलीपैड पर शाम का सुकून

Bakloh बस स्टैंड से करीब दो किलोमीटर की दूरी पर चिल्लामा हैलीपैड क्षेत्र आता है। आसपास का खुला इलाका और पहाड़ी वातावरण शाम के समय घूमने के लिए अच्छा लग सकता है। यहां लखदाता बाबा से जुड़ा धार्मिक स्थल और बच्चों के लिए पार्क जैसी सुविधाएं भी बताई जाती हैं।

जुलाई के पहले रविवार को यहां चिल्लामा मेले का आयोजन होने की जानकारी मिलती है। उस समय स्थानीय लोगों के साथ आसपास के क्षेत्रों से भी लोग पहुंचते हैं और माहौल सामान्य दिनों के मुकाबले काफी जीवंत हो जाता है।

हालांकि यह क्षेत्र सैन्य व्यवस्था से जुड़ा है, इसलिए यहां घूमते समय स्थानीय नियमों का पालन करना जरूरी है। किसी भी सैन्य वाहन, परिसर या प्रतिबंधित क्षेत्र की फोटो लेने से पहले अनुमति और स्थानीय निर्देशों का ध्यान रखें।

गुरु गोरखनाथ मंदिर में दिखेगा पुराना रिश्ता

चिल्लामा की तरफ जाने वाले रास्ते में गुरु गोरखनाथ बाबा मंदिर भी आता है। यह मंदिर Bakloh के पुराने धार्मिक और सैन्य इतिहास से जुड़ा माना जाता है। बताया जाता है कि इसे गोरखा रेजीमेंट से जुड़े लोगों ने स्वतंत्रता-पूर्व समय में बनवाया था।

हर साल 19 अप्रैल को यहां गुरु गोरखनाथ से जुड़ी यात्रा और मेले का आयोजन किया जाता है। उस समय आसपास के लोगों की अच्छी भागीदारी रहती है। अगर आपकी यात्रा इस तारीख के आसपास हो रही है, तो स्थानीय स्तर पर आयोजन की जानकारी लेकर इसे अपनी योजना में शामिल किया जा सकता है।

कालिका माता मंदिर तक पहुंचने का अनुभव

Bakloh में कालिका माता मंदिर भी धार्मिक और स्थानीय दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। यह ऊंचाई वाले हिस्से में स्थित है और यहां काली माता, दुर्गा माता, भगवान शिव और गुरु गोरखनाथ से जुड़े मंदिर देखने को मिलते हैं।

मंदिर परिसर से आसपास की पहाड़ियों का दृश्य भी आकर्षक हो सकता है। धार्मिक जगहों पर जाते समय स्थानीय रीति-रिवाजों और वहां के नियमों का ध्यान रखना जरूरी है। खासकर कैंटोनमेंट क्षेत्र होने की वजह से किसी भी प्रतिबंधित रास्ते या सैन्य क्षेत्र में जाने से बचना चाहिए।

1/4 और 2/4 बाजार में महसूस करें पुराने Bakloh को

अगर आप Bakloh की स्थानीय पहचान समझना चाहते हैं तो इसके पुराने बाजारों में थोड़ा समय जरूर बिताएं। 1/4 बाजार और 2/4 बाजार के नाम सीधे इसके सैन्य इतिहास की तरफ इशारा करते हैं।

आज इन बाजारों में रोजमर्रा की जरूरत की चीजें मिलती हैं, लेकिन इनके नाम और पुराने ढांचे इस जगह के बीते समय की याद दिलाते हैं। यहां घूमते हुए आपको बड़े पर्यटन बाजारों जैसा दिखावा नहीं मिलेगा।

यही सादगी Bakloh को खास बनाती है। अगर आप स्थानीय जीवन को कैमरे में कैद करना चाहते हैं तो लोगों की अनुमति लेकर ही तस्वीरें लें। खासकर कैंटोनमेंट क्षेत्र में फोटोग्राफी को लेकर सावधानी रखना जरूरी है।

सेंट ओसवाल्ड चर्च की पुरानी खूबसूरती

Bakloh में सेंट ओसवाल्ड चर्च भी देखने लायक जगहों में शामिल है। 1884 में बने इस चर्च की पुरानी वास्तुकला और आसपास का शांत वातावरण इसे खास बनाता है। पेड़ों और हरियाली के बीच स्थित यह चर्च पहाड़ी कस्बे के पुराने दौर की याद दिलाता है।

समय और प्राकृतिक घटनाओं के असर के बावजूद इसके मूल ढांचे को सुरक्षित रखने की कोशिश की गई है। अगर आपको पुराने चर्च, औपनिवेशिक दौर की इमारतें और शांत जगहें पसंद हैं, तो इसे अपनी यात्रा में शामिल कर सकते हैं।

ककीरा: Bakloh के पास का जरूरी बाजार

Bakloh के आसपास ककीरा एक महत्वपूर्ण कस्बा है। स्थानीय लोगों के लिए खरीदारी और रोजमर्रा की जरूरतों के लिहाज से यह जगह काफी उपयोगी है। अगर आप लंबे समय के लिए Bakloh में रुक रहे हैं तो कई जरूरी सामान ककीरा से मिल सकता है।

ककीरा के आसपास धार्मिक और स्थानीय महत्व की कुछ जगहें भी हैं। यहां से गांवों की तरफ जाने वाले रास्ते आपको पहाड़ी जीवन के करीब ले जाते हैं। इसी क्षेत्र से नलिनी गांव तक पैदल जाने का विकल्प भी लिया जा सकता है।

घटासानी में जंगलों के बीच एक शांत सुबह

घटासानी चीड़ के जंगलों से घिरा हुआ शांत इलाका है। Bakloh की यात्रा के दौरान अगर आप भीड़ से और दूर जाना चाहते हैं, तो यहां कुछ समय बिताया जा सकता है। सुबह के समय पेड़ों के बीच से आती हवा और पक्षियों की आवाज इस जगह को खास बनाती है।

यहां ज्वाला माता का मंदिर और वन विभाग के रेस्ट हाउस भी बताए जाते हैं। जंगल वाले इलाके में जाते समय मौसम और सड़क की स्थिति का ध्यान रखें और प्लास्टिक या कचरा बिल्कुल न छोड़ें।

लोकेश्वर मंदिर में दिखती है गोरखा संस्कृति की झलक

ककीरा से घटासानी की तरफ जाने वाले रास्ते पर लोकेश्वर मंदिर स्थित है। यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है और इसके साथ भगवान शिव और हनुमान जी के मंदिर भी हैं। लोकेश्वर मंदिर Bakloh और गोरखा समुदाय के सांस्कृतिक संबंधों को समझने का एक अच्छा माध्यम हो सकता है। यहां समय-समय पर मेला, कुश्ती और पारंपरिक भंडारे जैसे आयोजन भी किए जाते हैं।

नलिनी गांव में महसूस करें असली पहाड़ी जीवन

अगर आप Bakloh की यात्रा में सिर्फ पर्यटन स्थल नहीं बल्कि गांव का जीवन भी देखना चाहते हैं, तो नलिनी गांव एक अच्छा अनुभव दे सकता है। ककीरा से पैदल रास्ते के जरिए गांव तक पहुंचने की बात बताई जाती है और रास्ते में स्थानीय पहाड़ी माहौल महसूस किया जा सकता है। यहां आपको बड़े होटल या पर्यटकों के लिए बनाई गई कृत्रिम सजावट नहीं मिलेगी।

गांव के घर, खेत, पहाड़ी रास्ते और स्थानीय परिवार आपको चंबा क्षेत्र के रोजमर्रा के जीवन की एक झलक दे सकते हैं। अगर स्थानीय लोग अनुमति दें तो उनसे बातचीत करना और उनके जीवन के बारे में जानना इस यात्रा को और खास बना सकता है। ग्रामीण इलाकों में जाते समय स्थानीय लोगों की निजता का सम्मान करना उतना ही जरूरी है।

चंबयाली खाने का स्वाद लेना न भूलें

Bakloh की यात्रा सिर्फ पहाड़ और इतिहास तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। चंबा क्षेत्र के स्थानीय खाने का स्वाद लेना भी यात्रा का जरूरी हिस्सा हो सकता है। मिट्टी के चूल्हे पर धीमी आंच पर बना खाना यहां के ग्रामीण जीवन की खास पहचान है। मक्की की रोटी और साग से लेकर चंबयाली धाम तक कई पारंपरिक व्यंजन यहां के स्थानीय स्वाद को समझने का मौका देते हैं।

धाम में राजमा का मदरा, चने का खट्टा, कढ़ी और मीठे चावल जैसे व्यंजन शामिल हो सकते हैं। इसके अलावा लुंगडू की सब्जी, बिछू बूटी का साग और स्थानीय चुक जैसे पारंपरिक स्वाद भी अलग अनुभव दे सकते हैं। अगर आपको लोकल फूड पसंद है तो किसी स्थानीय परिवार या भरोसेमंद जगह से इन व्यंजनों के बारे में पहले जानकारी लें।

पुरथू और अटल सेतु की तरफ बनाएं एक छोटा ट्रिप

Bakloh के आसपास घूमने वालों के लिए पुरथू और अटल सेतु एक अच्छा विकल्प हो सकते हैं। रणजीत सागर बांध के आसपास का इलाका पानी और पहाड़ों के मेल की वजह से काफी खूबसूरत दिखाई देता है।

पुरथू को कई लोग स्थानीय तौर पर मिनी गोवा भी कहते हैं। यहां पानी के आसपास समय बिताने और उपलब्ध गतिविधियों का आनंद लेने का विकल्प मिल सकता है। अटल सेतु भी इस क्षेत्र की एक खास पहचान है।

अगर आप Bakloh में दो-तीन दिन रुक रहे हैं तो इस तरफ का एक दिन का छोटा कार्यक्रम बनाया जा सकता है। हालांकि पानी से जुड़ी गतिविधियों के दौरान स्थानीय सुरक्षा निर्देशों का पालन जरूर करें।

अनेन मंदिर और झरने का शांत अनुभव

नैनीखड्ड के पास अनेन मंदिर और आसपास का झरना प्रकृति पसंद करने वाले लोगों को अच्छा लग सकता है। Bakloh से यह क्षेत्र ज्यादा दूर नहीं माना जाता और सड़क यात्रा के साथ इसे देखा जा सकता है।

झरने के पास पहुंचने पर मौसम और रास्ते की स्थिति का ध्यान रखें, खासकर बारिश के मौसम में। पहाड़ी झरनों के आसपास पानी अचानक बढ़ सकता है, इसलिए सिर्फ तस्वीर के लिए जोखिम लेना बिल्कुल सही नहीं है।

डलहौजी और खजियार को भी जोड़ सकते हैं

Bakloh की सबसे अच्छी बात यह है कि यह चंबा क्षेत्र की कई मशहूर जगहों के आसपास है। डलहौजी यहां से करीब 25 किलोमीटर के आसपास बताया जाता है, जबकि खजियार लगभग 35-40 किलोमीटर की दूरी पर हो सकता है। इसका मतलब यह है कि आप अपनी यात्रा को सिर्फ Bakloh तक सीमित रखने के बजाय डलहौजी और खजियार को भी कार्यक्रम में शामिल कर सकते हैं।

डलहौजी की पुरानी इमारतें और खजियार का बड़ा हरा मैदान आपकी यात्रा में बिल्कुल अलग तरह का अनुभव जोड़ देंगे। अगर आप भीड़ से बचना चाहते हैं तो पहले Bakloh में ठहरकर आसपास की शांत जगहें देखें और फिर एक दिन डलहौजी-खजियार के लिए रखें। इससे यात्रा ज्यादा संतुलित रहेगी।

जोत और चंबा शहर की तरफ भी जा सकते हैं

प्रकृति पसंद करने वालों के लिए जोत एक खूबसूरत घास का मैदान है। यहां का खुला पहाड़ी दृश्य और आसपास की हरियाली शहरों की भागदौड़ से काफी अलग अनुभव देती है। दूसरी तरफ चंबा शहर इतिहास और स्थानीय संस्कृति को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

यहां चौगान, राजा भूरिसिंह संग्रहालय, चंबा रूमाल और चंबा चप्पल जैसी चीजें आपको इस पूरे क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान से जोड़ती हैं। इसलिए अगर आपके पास समय है तो Bakloh के साथ चंबा शहर को भी यात्रा में शामिल करना अच्छा रहेगा। इससे आपको सिर्फ पहाड़ी प्राकृतिक सुंदरता नहीं बल्कि चंबा की कला और संस्कृति भी देखने को मिलेगी।

पठानकोट से Bakloh कैसे पहुंचें?

Bakloh पहुंचने के लिए पठानकोट एक सुविधाजनक शुरुआती बिंदु हो सकता है। ट्रेन से आने वाले यात्रियों के लिए पठानकोट कैंट रेलवे स्टेशन एक प्रमुख विकल्प है। वहां से टैक्सी लेकर सीधे बाकलोह जाया जा सकता है।

अगर आप बजट में यात्रा कर रहे हैं तो पठानकोट से चंबा या डलहौजी की तरफ जाने वाली बस लेकर तुन्नुहट्टी या ककीरा के आसपास उतरने का विकल्प देखा जा सकता है। इसके बाद स्थानीय टैक्सी या उपलब्ध वाहन से आगे जाना पड़ सकता है।

बस से यात्रा करते समय टिकट लेने से पहले चालक या परिचालक से यह जरूर पूछ लें कि बस ककीरा होकर जा रही है या तुन्नुहट्टी की तरफ। इससे गलत जगह उतरने की परेशानी कम होगी।

हवाई जहाज से आने वालों के लिए क्या विकल्प हैं?

हवाई यात्रा करने वाले यात्रियों के लिए पठानकोट का एयरपोर्ट एक विकल्प हो सकता है। इसके अलावा कांगड़ा का गग्गल एयरपोर्ट भी क्षेत्रीय यात्रा में इस्तेमाल किया जा सकता है। अमृतसर एयरपोर्ट से भी सड़क मार्ग के जरिए इस क्षेत्र की यात्रा की जा सकती है।

अगर आप हवाई जहाज से Bakloh जा रहे हैं तो एयरपोर्ट से आगे की सड़क यात्रा पहले से तय करना बेहतर रहेगा। पहाड़ी इलाकों में टैक्सी की कीमत मैदानी शहरों से अलग हो सकती है, इसलिए वाहन बुक करने से पहले किराया और रूट साफ कर लें।

Bakloh में कहां रुकें?

Bakloh में बड़े पर्यटन केंद्रों जैसी होटल की लंबी कतार नहीं मिलेगी। यही इसकी खूबसूरती भी है और थोड़ी चुनौती भी। अगर आप यहां रात रुकना चाहते हैं तो पहले से उपलब्ध होमस्टे या सरकारी रेस्ट हाउस की जानकारी लेना बेहतर रहेगा। ककीरा और आसपास के इलाकों में कुछ होमस्टे विकल्प मिल सकते हैं।

स्थानीय होमस्टे में रुकने का फायदा यह है कि आपको आसपास के गांव, स्थानीय भोजन और पहाड़ी जीवन को समझने का मौका ज्यादा मिल सकता है। रेस्ट हाउस में रुकने की योजना बना रहे हैं तो बुकिंग और उपलब्धता पहले से जांचें। कैंटोनमेंट और सरकारी क्षेत्रों में प्रवेश या ठहरने के अपने नियम हो सकते हैं, इसलिए सिर्फ इंटरनेट पर मिली पुरानी जानकारी के आधार पर योजना न बनाएं।

Bakloh जाते समय किन बातों का ध्यान रखें?

Bakloh एक सामान्य कमर्शियल टूरिस्ट डेस्टिनेशन नहीं है। यहां की पहचान एक कैंटोनमेंट क्षेत्र के रूप में भी है, इसलिए सेना से जुड़े स्थानों, कार्यालयों, वाहनों और प्रतिबंधित इलाकों की फोटो लेने से बचें। जहां फोटोग्राफी की अनुमति न हो, वहां कैमरा या मोबाइल इस्तेमाल न करें। इसके अलावा पहाड़ों में यात्रा करते समय मौसम का ध्यान रखें।

Bakloh

बारिश में सड़क फिसलन वाली हो सकती है और सर्दियों में तापमान काफी नीचे जा सकता है। इसलिए मौसम के हिसाब से कपड़े, जूते और जरूरी सामान साथ रखें। सबसे जरूरी बात, Bakloh को घूमते समय इसे एक शांत स्थानीय क्षेत्र की तरह देखें। तेज संगीत, कचरा फैलाना या स्थानीय लोगों की निजता में दखल देना आपकी यात्रा के अनुभव को भी खराब कर सकता है और स्थानीय माहौल को भी।

कितने दिन का प्लान बनाएं?

अगर आपका उद्देश्य सिर्फ Bakloh देखना है तो दो दिन काफी हो सकते हैं। पहले दिन कस्बे के पुराने बाजार, मंदिर, चर्च और आसपास के शांत इलाकों को देखा जा सकता है। दूसरे दिन ककीरा, नलिनी गांव और आसपास की प्राकृतिक जगहों के लिए समय रखा जा सकता है। अगर आपके पास तीन दिन हैं तो पुरथू, अटल सेतु या डलहौजी-खजियार को भी जोड़ा जा सकता है।

चार या उससे ज्यादा दिन हों तो चंबा शहर, जोत और दूसरे आसपास के स्थानों को भी आराम से देखा जा सकता है। यहां की यात्रा का असली मजा जल्दबाजी में ज्यादा जगहें देखने के बजाय कम जगहों पर थोड़ा ज्यादा समय बिताने में है। आखिर Bakloh चुनने की सबसे बड़ी वजह ही इसकी शांति है।

आखिर क्यों जाना चाहिए Bakloh?

Bakloh उन यात्रियों के लिए खास जगह हो सकती है जो हर बार किसी बड़े और भीड़भाड़ वाले हिल स्टेशन की तलाश नहीं करते। यहां आपको पहाड़ों की ठंडी हवा, देवदार और चीड़ के जंगल, पुराना सैन्य इतिहास, स्थानीय बाजार, मंदिर, चर्च और गांव का जीवन एक ही यात्रा में देखने को मिल सकता है।

यहां का माहौल आपको बताता है कि हिमाचल सिर्फ बड़े पर्यटन केंद्रों तक सीमित नहीं है। चंबा की पहाड़ियों में आज भी ऐसी कई जगहें हैं जहां प्रकृति और स्थानीय जीवन बिना किसी ज्यादा दिखावे के अपनी असली शक्ल में नजर आते हैं।

अगर आपकी अगली हिमाचल यात्रा में थोड़ा सुकून, थोड़ा इतिहास और थोड़ा लोकल अनुभव चाहिए, तो Bakloh को अपनी सूची में शामिल किया जा सकता है। और अगर आपके पास दो-तीन दिन का समय है, तो इसके साथ डलहौजी, खजियार, पुरथू और चंबा को जोड़कर एक शानदार छोटा पहाड़ी सफर बनाया जा सकता है।

Five Colors of Travel की ओर से खास सुझाव

  • कैंटोनमेंट के नियमों का सम्मान करें। Bakloh में कई सैन्य क्षेत्र हैं। जहां फोटोग्राफी या प्रवेश की अनुमति न हो, वहां जाने या तस्वीर लेने की कोशिश बिल्कुल न करें।
  • पहले से ठहरने की व्यवस्था करें। यहां बड़े पर्यटन शहरों जैसी होटल की भरमार नहीं है। होमस्टे, रेस्ट हाउस या आसपास के ठहरने के विकल्प पहले से जांच लेना बेहतर रहेगा।
  • ककीरा और नलिनी गांव जरूर जोड़ें। सिर्फ मुख्य बाजार देखकर वापस न लौटें। स्थानीय गांव की तरफ जाकर पहाड़ी जीवन और स्थानीय खान-पान को समझने का मौका लें।
  • चंबयाली खाना जरूर आजमाएं। मौका मिले तो मक्की की रोटी-साग, मदरा, चने का खट्टा और स्थानीय पारंपरिक व्यंजन जरूर चखें। इससे यात्रा में स्थानीय स्वाद भी जुड़ जाएगा।
  • कम से कम 2-3 दिन रखें। Bakloh को जल्दबाजी में देखने के बजाय आसपास के पुरथू, अटल सेतु, डलहौजी, खजियार या चंबा को भी यात्रा में शामिल करें। इससे आपकी पूरी ट्रिप ज्यादा आरामदायक और यादगार बनेगी।
Shivani Pal

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