Bakloh Travel Guide: हिमाचल की इस शांत जगह की पूरी जानकारी
अगर आप हिमाचल प्रदेश की यात्रा पर निकलते हैं, तो ज्यादातर लोगों की पहली पसंद डलहौजी, खजियार, मनाली या शिमला जैसे मशहूर हिल स्टेशन होते हैं। लेकिन हिमाचल में कुछ ऐसी जगहें भी हैं, जहां पहुंचकर आपको न तो पर्यटकों की भारी भीड़ मिलेगी और न ही हर मोड़ पर होटल और दुकानें। ऐसी ही एक शांत और खूबसूरत जगह है Bakloh, जो चंबा जिले की पहाड़ियों में बसा एक पुराना कैंटोनमेंट इलाका है। देवदार और चीड़ के पेड़ों से घिरा Bakloh अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के साथ-साथ सेना और गोरखा रेजीमेंट से जुड़े इतिहास के लिए भी जाना जाता है। यहां की पुरानी गलियां, शांत बाजार, मंदिर, चर्च, जंगल और आसपास के गांव इसे बाकी हिल स्टेशनों से थोड़ा अलग बनाते हैं। यहां घूमने का मतलब सिर्फ कुछ जगहों पर जाकर तस्वीरें खींचना नहीं है, बल्कि एक ऐसे पहाड़ी कस्बे को महसूस करना है, जिसकी पहचान में प्रकृति और इतिहास दोनों साथ-साथ चलते हैं। अगर आप 2026 में किसी शांत पहाड़ी जगह की तलाश में हैं, जहां दो-तीन दिन आराम से बिताए जा सकें और साथ में डलहौजी, खजियार, पुरथू और चंबा जैसी जगहों को भी देखा जा सके, तो Bakloh आपके लिए एक अच्छा विकल्प हो सकता है। इस पूरी ट्रैवल गाइड में जानते हैं यहां का इतिहास, मौसम, घूमने की जगहें, गांव का अनुभव, खाने-पीने की चीजें, आसपास के पर्यटन स्थल, पहुंचने का रास्ता और बजट ट्रिप से जुड़ी जरूरी बातें। Bakloh आखिर है क्या और इसकी खासियत क्या है? Bakloh हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के भटियात क्षेत्र में स्थित एक छोटा कैंटोनमेंट इलाका है। समुद्र तल से करीब 2,000 मीटर के आसपास की ऊंचाई पर बसा यह इलाका चारों तरफ पहाड़ियों, चीड़ और देवदार के जंगलों से घिरा हुआ है। यहां का वातावरण उन लोगों को खास पसंद आ सकता है जो बड़े और व्यस्त पर्यटन केंद्रों से दूर कुछ शांत देखना चाहते हैं। Bakloh की सबसे अलग बात इसका सैन्य इतिहास है। यह जगह लंबे समय से भारतीय सेना और गोरखा रेजीमेंट से जुड़ी रही है। इसी वजह से यहां का माहौल सामान्य पर्यटन कस्बों से थोड़ा अलग दिखाई देता है। पुराने बाजारों और आसपास की इमारतों में आज भी इसके सैन्य अतीत की झलक देखने को मिलती है। यहां का प्राकृतिक वातावरण भी काफी आकर्षक है। सुबह के समय पेड़ों के बीच से आती ठंडी हवा, पहाड़ियों पर छाई हल्की धुंध और दूर तक फैली हरियाली आपको शहर की भागदौड़ से बिल्कुल अलग दुनिया में ले जाती है। अगर आपको शांत जगहों की फोटोग्राफी पसंद है, तो Bakloh में कई ऐसे दृश्य मिल सकते हैं जिन्हें आप अपनी यात्रा की यादों में सहेजना चाहेंगे। इतिहास के पन्नों में कैसे आया Bakloh? Bakloh का इतिहास 19वीं सदी से जुड़ा हुआ है। ब्रिटिश सेना के अधिकारी कैप्टन बेकर ने इस इलाके को सैन्य स्टेशन के लिए उपयुक्त माना था। इसके बाद यहां सैन्य गतिविधियां बढ़ीं और धीरे-धीरे यह एक महत्वपूर्ण मिलिट्री स्टेशन के रूप में विकसित हुआ। वर्ष 1866 में 4वीं गोरखा राइफल्स का केंद्र पिथौरागढ़ से यहां लाया गया था। इसके बाद करीब एक सदी तक Bakloh 4वीं गोरखा राइफल्स से जुड़े सैन्य ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। इसी वजह से आज भी यहां कई जगहों के नाम गोरखा रेजीमेंट के इतिहास से जुड़े हुए हैं। 1/4 बाजार और 2/4 बाजार जैसे नाम पुराने सैन्य इतिहास की याद दिलाते हैं। समय के साथ प्रशासनिक और सैन्य व्यवस्था में कई बदलाव हुए। आज यह इलाका कैंटोनमेंट बोर्ड के अंतर्गत आता है। यहां घूमते समय यह समझना जरूरी है कि यह सिर्फ पर्यटन स्थल नहीं बल्कि एक सक्रिय कैंटोनमेंट क्षेत्र भी है। इसलिए हर जगह फोटो खींचना या किसी प्रतिबंधित इलाके में जाना उचित नहीं है। 4वीं गोरखा राइफल्स से जुड़ी है इसकी पहचान Bakloh का नाम गोरखा रेजीमेंट के इतिहास से अलग करके देखना मुश्किल है। 4वीं गोरखा राइफल्स का यहां लंबे समय तक केंद्र रहने की वजह से इस छोटे से पहाड़ी इलाके ने भारतीय सैन्य इतिहास में अपनी अलग पहचान बनाई। 2/4 गोरखा राइफल्स की स्थापना 22 अप्रैल 1886 को यहां हुई थी। बाद के वर्षों में 3/4 गोरखा राइफल्स और 5/4 गोरखा राइफल्स से जुड़ी सैन्य गतिविधियां भी यहां हुईं। इस वजह से Bakloh के पुराने बाजार और रास्ते आज भी अपने नामों में इस इतिहास को संभाले हुए हैं। आज भले ही सैन्य प्रशासन और रेजीमेंट की गतिविधियों में समय के साथ बदलाव आया हो, लेकिन स्थानीय लोगों और पुराने ढांचों के बीच इस इतिहास की छाप साफ दिखाई देती है। इतिहास में रुचि रखने वाले यात्रियों के लिए यही चीज Bakloh को बाकी छोटे हिल स्टेशनों से अलग बनाती है। पंजाब से हिमाचल का हिस्सा बनने तक का सफर आज Bakloh हिमाचल प्रदेश में है, लेकिन प्रशासनिक इतिहास की बात करें तो हमेशा ऐसा नहीं था। आजादी के बाद भी यह क्षेत्र पंजाब का हिस्सा रहा। वर्ष 1966 में पंजाब के पहाड़ी क्षेत्रों के पुनर्गठन के दौरान बाकलोह और आसपास के क्षेत्र हिमाचल प्रदेश में शामिल किए गए। इस बदलाव के बाद Bakloh का प्रशासनिक संबंध हिमाचल प्रदेश से हो गया और धीरे-धीरे यह चंबा जिले के पहाड़ी क्षेत्र के रूप में जाना जाने लगा। इसलिए यहां की संस्कृति में आपको हिमाचली और पुराने पंजाब क्षेत्र की कुछ झलकियां एक साथ देखने को मिल सकती हैं। यात्रा के दौरान ऐसी बातें किसी जगह को सिर्फ सुंदर लोकेशन से आगे बढ़ाकर उसके इतिहास से जोड़ती हैं। Bakloh की खासियत भी यही है कि यहां पहाड़ों के साथ एक लंबा ऐतिहासिक सफर भी दिखाई देता है। Bakloh घूमने का सबसे अच्छा समय कौन-सा है? अगर मौसम की बात करें तो Bakloh साल के अलग-अलग समय में अलग रूप दिखाता है। अप्रैल से जून तक गर्मियों का मौसम यहां काफी सुहावना रहता है। जब मैदानी इलाकों में गर्मी बढ़ने लगती है, तब पहाड़ों की ठंडी हवा राहत देती है। इसलिए गर्मियों में यहां घूमना काफी आरामदायक हो सकता है। जून से सितंबर के बीच बारिश होती है और इस दौरान आसपास की पहाड़ियां और ज्यादा हरी नजर आती हैं। बारिश के बाद पेड़ों और घास का रंग गहरा हो जाता है और मौसम काफी ताजा लगता है। हालांकि पहाड़ी रास्तों पर भूस्खलन या