बिछिया निकला ट्रेडिशन से आगे, बन रहा है फैशन स्टेटमेंट!
जब भी हम भारतीय शादियों की बात करते हैं, तो उसमें सुहाग की निशानियों को एक अहम भूमिका होती है। इन्हीं में से एक है बिछिया, जिसे शादीशुदा महिला के शृंगार का बहुत खास हिस्सा माना जाता है। यह सिर्फ गहना नहीं, बल्कि पवित्रता, और जिम्मेदारी का प्रतीक होता है। राजस्थान और उत्तर प्रदेश में शादी के फेरे पूरे होने के बाद दूल्हा-दुल्हन को बिछिया पहनाता है।
सुहाग की निशानी..
माना जाता है कि यह सिर्फ शादीशुदा जीवन के रिश्ते को नहीं, बल्कि उसे निभाने की जिम्मेदारी को भी दर्शाता है। गांवों में आज भी ट्रेडिशनल डिज़ाइन की बिछिया काफी पसंद की जाती है और नई पीढ़ी की ब्राइड्स भी इन्हें बड़े शोक के साथ पहनती हैं, और इसी महत्व को देखते हुए फाइव कलर्स ऑफ ट्रैवल आपके लिए लाया है बिछिया से जुड़ी ऐसी जानकारी, जिसे पढ़ने के बाद शायद आप भी इसे रोज़ पहनने का मन बना लें।

सोलह शृंगार का अहम हिस्सा
राजस्थान, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में बिछिया को सोलह शृंगार का एक ज़रूरी हिस्सा माना जाता है। शादी के समय जब दुल्हन सोलह शृंगार से सजी होती है, तो उसकी ब्यूटी और तेज और भी निखर जाता है। पुरानी परंपराओं के हिसाब से बिछिया पहनने से न सिर्फ सुहाग की रक्षा होती है, बल्कि यह उन निशानियों में से एक है जिससे पता चलता है कि महिला शादीशुदा है।
चांदी की बिछिया और वैज्ञानिक लाभ
हमारे कल्चर में इसे पति-पत्नी के बीच प्रेम और विश्वास का प्रतीक भी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ अगर साइंस की बात करें, तो चांदी की बिछिया पहनना महिलाओं के लिए फायदेमंद माना जाता है। पैरों की दूसरी उंगली में चांदी की बिछिया पहनने से हार्मोन बैलेंस पर पॉजिटिव असर पड़ता है और सेहत बेहतर रहती है। यही वजह है कि बिछिया हमेशा चांदी की ही पहनने की परंपरा रही है।

फिर लौटा बिछिया का ट्रेंड
एक समय ऐसा भी आया था जब महिलाओं ने बिछिया पहनना कम कर दिया था, लेकिन अब यह फिर से ट्रेंड में लौट आई है। आज की महिलाएं इसे शौक से पहनती हैं और कई तो इसे कभी उतारती भी नहीं हैं। माना जाता है कि शादी में पहली बार बिछिया पहनने के बाद महिलाएं इसे पूरी तरह कभी नहीं उतारतीं, चाहे एक उंगली से निकालें या दूसरी में पहन लें, लेकिन बिछिया को अपने पैरों से अलग नहीं करतीं।





