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गांवों के मेले -परंपराओं की पगडंडी पर जीवित लोक संस्कृति

तुम कह रहे हो, वैसे गाँवों में क्या रखा है! -मनु वैशाली

मनु वैशाली की ये पंक्तियां गांव का एक मार्मिक चित्रण करती हैं, और हम यह सोचने लगते हैं कि गांवों में कितना कुछ रखा है।

गांव में रखे हैं, खेल-खिलौने, यादें-बातें और मेले-ठेले जो गांवों की मिट्टी का एहसास दिलाते हैं। ये मेले ठेले तो गांवों की संस्कृति का एक अभिन्न अंग हैं।

मेले तो आपने बहुत जगह देखे होंगे और कुछ लोकप्रिय मेलों के नाम तो आपने जरूर सुने होंगे। भारत के गांवों में लगने वाले कुछ ऐसे ख़ास मेले सांस्कृतिक धरोहर को भी प्रतिबिंबित करते हैं।

गांवों के मेले

मेलों की अपनी प्रासंगिगता होती है, रंग-बिरंगे मेले जहाँ खेल-खिलौनों से कपड़ों तक सब मिल जाता है। आज हम जानेंगे, भारतीय गांवों में लगने वाले कुछ ऐसे ही खास मेलों के बारे में जो अपने आप में ग्रामीण संस्कृति को खूबसूरती समेटे हुए हैं।

भारत में कुम्भ का मेला एक बेहद लोकप्रिय और प्रचलित मेला है। जो दशकों से भारतीय विरासत का हिस्सा बना हुआ है। ये मेला 12 साल के अंतराल पर लगता है। कुम्भ का अर्थ होता है कलश, और इस मेले का नाम भी अमृत कलश की पौराणिक हिन्दू कथा से जुड़ा है। भारत के चार भिन्न स्थानों में लगने वाला ये मेला सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से बहुत विशाल होता है। जब ये मेला चल रहा होता है, उस वक्त ये सभी देशवासियों के लिए आकर्षण का केंद्र बन जाता है।

गांवों के मेले

ये मेला 12 वर्षों में 4 भिन्न स्थानों पर लगता है, प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन, और नासिक। जिसमें प्रयागराज के मेला सर्वाधिक विशाल होता है। कुम्भ मेला आस्था, आध्यात्म और संस्कृति के संगम का सजीव उदाहरण पेश करता है।

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में त्रिवेणी संगम(गंगा, यमुना, सरस्वती), उत्तराखंड के हरिद्वार में गंगा नदी, मध्य प्रदेश के उज्जैन में क्षिप्रा नदी और महाराष्ट्र के नासिक में गोदावरी नदी पर इस मेले के दौरान अनेक श्रद्धालु आते हैं और एक साथ इस मेले में एकजुटता को सत्यापित करते हैं।

गांवों के मेले

मध्य प्रदेश के मंदसौर में लगने वाला पशुपतिनाथ मेला कला और संस्कृति के संगम की सुंदर झलकी पेश करता है। ये तीन दिवसीय मेला कार्तिक कृष्ण पक्ष में आयोजित किया जाता है जिसमें श्री पशुपतिनाथ महादेव की पूजा अर्चना की जाती है। मेले के दौरान प्रदर्शनियाँ लगती हैं कलाकारों की प्रस्तुतियाँ होती हैं और शिवना नदी के तट पर अलग अलग दुकाने भी लगती हैं।   

गांवों के मेले

पशुधन व्यापार के संदर्भ में मनाया जाने वाला ये सोनपुर मेला बिहार के हरिहर क्षेत्र में आयोजित किया जाता है जो कि महीने भर चलता है। ये मेला सोनपुर में दो नदियों गंगा और गंडक के संगम पर आयोजित किया जाता है। ये मेला नवंबर के महीने की कार्तिक पूर्णिमा से प्रारंभ होता है जो लगभग एक महीने तक चलता है। इसे ‘हरिहर क्षेत्र मेला’ के नाम से भी जाना जाता है। पशुयों के व्यापार पर आधारित ये मेला आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व के साथ साथ ऐतिहासिक महत्व भी रखता है।  

गांवों के मेले

भारत की भूमि कृषि की भूमि है। उत्तर भारत, विशेषकर पंजाब हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में बैसाखी मेला धूमधाम से मनाया जाता है। ये एक धार्मिक त्योहार तो है ही लेकिन कृषि के महत्व को और अधिक सजग रूप से प्रतिबिंबित करता है।

जब सरसों के फूल चमकते हैं और ढोलक की थपकी पर दिल और पैर झूम उठते हैं तो समझ जाइए ये बैसाखी मेले का मौसम है। बैसाखी मेले में सांस्कृतिक नृत्य और गतिविधियां आयोजित की जाती हैं जो परंपराओं और संस्कृति की सुंदर झलकी पेश करती हैं।

राजस्थान में प्रचलित गोगाजी मेला आध्यात्मिक और धार्मिक दृष्टिकोण से महत्व रखता है। गोगा जी जिन्हें जाहरवीर गोगाजी या गोगा वीर के नाम से भी जाना जाता है, राजस्थान में प्रचलित एक लोक देवता हैं और सांपों के रक्षक के रूप में पूजे जाते हैं। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की नवमी को राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले के गोगामेड़ी गांव में हर साल गोगा जी का यह सबसे बड़ा मेला आयोजित किया जाता है। मेले के दौरान एक ध्वज यात्रा होती है जिसमें भक्तजन पीले ध्वज, जिसे निशान कहा जाता है उसे लेकर गोगामेड़ी तक पैदल यात्रा करते हुए पहुंचते हैं और गोगा जी महाराज के जयकारे लगाते हैं। मेले के दौरान लोक नृत्य और लोकगीतों का गायन होता है जिसमें पारंपरिक यंत्रों जैसे ढोल और मंजीरा का इस्तेमाल किया जाता है। राजस्थान का ये गोगाजी मेला आस्था और धर्म का सुंदर संगम है।

भारत के पहाड़ी राज्यों की लोक संस्कृति, देवी-देवताओं के प्रति आस्था और ग्रामीण एकता को दर्शाता है कोट पूजा मेला

भारत के सीमावर्ती पहाड़ी इलाकों जैसे उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और नेपाल के कुछ क्षेत्रों में एक पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान मनाया जाता है, जिसे कोट पूजा कहते हैं।

उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्र में, हिमाचल प्रदेश और नेपाल के कुछ गांवों में इस को पूजा की लोक परंपरा देखी जाती है।  जिसमें स्थानीय देवी-देवताओं की डोली फूलों, घंटियों और कपड़ों से सजाई जाती हैं। यह मेला पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही परंपराओं की पुष्टि करता है और सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ने का एक बेहतरीन तरीका है।

तमिलनाडु के कोयंबटूर जिले में स्थित, एक हरा भरा और समृद्ध कृषि क्षेत्र है पोल्लाची। संथई एक तमिल शब्द है, जिसका अर्थ होता है स्थानीय हाट या स्थानीय बाजार। आधुनिकता के दौर में शॉपिंग मॉल और सुपरमार्केट की अपेक्षा यह बाजार एक जीवंत परंपरा है। जहां किसान, व्यापारी और स्थानीय लोग अपने उत्पादों का आदान-प्रदान करते हैं। इस बाजार में आज भी लोक परंपराएं और संस्कृति उस ही मूल के साथ जीवित हैं, जो मेट्रो सिटीज़ में लगभग खत्म हो चुकी है।

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित एक ऐसा ऐतिहासिक नगर जो अपनी प्राचीन मंदिरों की मूर्ति कला और स्थापत्य कला के लिए जाना जाता है- खजुराहो।

खजुराहो मेला संस्कृति और कला का उत्सव है, जो साल की शुरुआत में फरवरी या मार्च के महीने में आयोजित किया जाता है। इसे खजुराहो डांस फेस्टिवल के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इसमें भारत के विभिन्न भागों से कलाकार अपने शास्त्रीय और लोकनृत्य कलाओं की प्रस्तुति करते हैं। जो भारतीय परंपरा के सांस्कृतिक प्रदर्शन पारंपरिक और आधुनिक संगम है। खजुराहो एक ऐसा क्षेत्र है जो अपने मंदिरों के लिए विशेष रूप से जाना जाता है और खजुराहो में लगने वाला यह मेला हमें एहसास दिलाता है कि ये मंदिर सिर्फ स्थापत्य कला के उदाहरण नहीं है बल्कि खजुराहो और भारतीय संस्कृति के जीवंत प्रतीक भी हैं।

गांवों के मेले

बरेली से मथुरा तक, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में मनाया जाने वाला एक ऐसा मेला जिसके बारे में शायद आपने पहले कभी नहीं सुना होगा। बासौड़ा, एक ऐसा मेला है जिसमें बासी खाने से शीतला माता की पूजा- अर्चना की जाती है। होली के बाद आने वाली शीतला अष्टमी को यह मेला मनाया जाता है जिसमें बच्चों के स्वास्थ्य की मंगलकामना के लिए महिलाएं इस त्यौहार पर शीतला माता की पूजा करती हैं। इसमें एक दिन पहले बासी खीकड़ी और पुए बनाए जाते हैं और अगले दिन प्रातः काल मेले में जाकर इससे पूजा की जाती है। इस मेले की ये परंपरा है कि मेले से लौटते हुए मिट्टी के खिलौने अथवा चने-मुरमुरे खरीद कर लाए जाते हैं।

भारतीय मेले न सिर्फ बाज़ार हाट तक सीमित होते हैं बल्कि इनका सांस्कृतिक महत्व भी उतना ही प्रासंगिक है। भारतीय संस्कृति में गाँवों की पहचान जब भी होगी उनमें मेलों का ज़िक्र ज़रूर होगा।

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