Unique Railway Facts-रेलवे ट्रैक पर गैप क्यों छोड़ा जाता है? Travel Travel News & Information

Unique Railway Facts-रेलवे ट्रैक पर गैप क्यों छोड़ा जाता है?

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Railway Facts- भारत में हर दिन करोड़ों लोग ट्रेन से सफर करते हैं। कोई नौकरी के लिए यात्रा करता है, कोई पढ़ाई के लिए तो कोई परिवार से मिलने के लिए। रेलवे भारत की लाइफलाइन माना जाता है और आज indian railway दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क में शामिल है। वहीं IRCTC ने टिकट बुकिंग से लेकर यात्रा की पूरी प्रक्रिया को डिजिटल और आसान बना दिया है। लेकिन ट्रेन से सफर करते समय एक चीज़ ऐसी होती है जिस पर ज्यादातर लोगों का ध्यान नहीं जाता। आपने कभी गौर किया होगा कि ट्रेन चलते समय पटरी से “ठक-ठक… ठक-ठक” जैसी आवाज़ आती रहती है। कई लोगों को लगता है कि यह आवाज़ सिर्फ पहियों की वजह से होती है, लेकिन असल में इसके पीछे रेलवे ट्रैक की खास इंजीनियरिंग छिपी होती है। (Railway Facts) रेलवे ट्रैक पर जानबूझकर छोटे-छोटे गैप छोड़े जाते हैं। पहली नजर में यह सामान्य लग सकता है, लेकिन अगर ये गैप न हों तो गर्मियों में रेलवे ट्रैक मुड़ सकते हैं और बड़े हादसे तक हो सकते हैं। यह जानकारी कोई अफवाह या सोशल मीडिया मिथक नहीं बल्कि पूरी तरह वैज्ञानिक तथ्य है। दुनिया भर के रेलवे नेटवर्क इसी तकनीक और सिद्धांत पर काम करते हैं। आखिर रेलवे ट्रैक पर गैप क्यों छोड़े जाते हैं? Railway Facts रेलवे ट्रैक मुख्य रूप से स्टील यानी लोहे से बनाए जाते हैं। विज्ञान का एक सामान्य नियम है कि जब किसी धातु पर गर्मी पड़ती है तो वह फैलती है और ठंड पड़ने पर सिकुड़ जाती है। इसे “Thermal Expansion” यानी तापीय प्रसार कहा जाता है। अब सोचिए, भारत जैसे देश में जहां गर्मियों में तापमान कई जगह 45 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, वहां धूप में पड़ी रेलवे पटरियां कितनी गर्म हो जाती होंगी। जब स्टील गर्म होता है तो वह लंबाई में थोड़ा फैलता है। अगर रेलवे ट्रैक पूरी तरह एक-दूसरे से सटे हुए हों और उनमें कोई जगह न छोड़ी जाए, तो फैलने की वजह से ट्रैक पर भारी दबाव बनने लगेगा। यही दबाव पटरियों को टेढ़ा कर सकता है या कई बार उन्हें ऊपर की तरफ उभार भी सकता है। इसलिए इंजीनियर ट्रैक के बीच थोड़ा गैप छोड़ते हैं ताकि गर्मी में फैलने के लिए जगह मिल सके। (Railway Facts) अगर रेलवे ट्रैक पर गैप न छोड़ा जाए तो क्या होगा? विशेषज्ञों के मुताबिक अगर ट्रैक के बीच जगह न छोड़ी जाए तो गर्मियों में रेल की पटरियां “बकल” हो सकती हैं। रेलवे भाषा में इसे “Track Buckling” कहा जाता है। इस स्थिति में पटरी अपनी सीधी लाइन से हटकर मुड़ जाती है। अगर ऐसी पटरी पर तेज रफ्तार ट्रेन गुजर जाए तो उसके पटरी से उतरने का खतरा बढ़ सकता है। (Railway Facts) दुनिया के कई देशों में अत्यधिक गर्मी के दौरान ट्रैक बकलिंग की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। यही वजह है कि रेलवे विभाग तापमान और मौसम के हिसाब से ट्रैक डिजाइन करता है। भारत में भी गर्मियों के मौसम में रेलवे ट्रैक की विशेष निगरानी की जाती है। कई जगह ट्रेन की स्पीड कम की जाती है ताकि ट्रैक पर अतिरिक्त दबाव न पड़े। ट्रेन चलने पर “ठक-ठक” की आवाज़ क्यों आती है? अगर आपने कभी ट्रेन की खिड़की के पास बैठकर सफर किया हो तो आपने लगातार “ठक-ठक” की आवाज़ जरूर सुनी होगी। असल में यह आवाज़ ट्रेन के पहियों के एक ट्रैक सेक्शन से दूसरे सेक्शन पर जाने के दौरान पैदा होती है। जहां दो पटरियां मिलती हैं वहां हल्का सा गैप होता है। जब पहिया उस हिस्से से गुजरता है तो झटका महसूस होता है और वही आवाज़ सुनाई देती है। पुराने समय में रेलवे ट्रैक छोटे-छोटे हिस्सों में जुड़े होते थे, इसलिए यह आवाज़ ज्यादा आती थी। आज कई जगह आधुनिक ट्रैक लगाए जा चुके हैं, इसलिए यह आवाज़ पहले के मुकाबले कम हो गई है। (Railway Facts) क्या आज भी हर रेलवे ट्रैक में गैप छोड़े जाते हैं? आज की रेलवे तकनीक पहले जैसी नहीं रही। अब कई देशों में “Continuous Welded Rail” यानी लंबी वेल्डेड पटरियों का इस्तेमाल किया जाता है। इन ट्रैक्स में पारंपरिक गैप बहुत कम दिखाई देते हैं क्योंकि पूरी पटरी लंबी लाइन के रूप में जोड़ी जाती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तापीय प्रसार की समस्या खत्म हो गई। आधुनिक रेलवे इंजीनियरिंग में विशेष क्लिप्स, मजबूत फास्टनिंग सिस्टम और कंक्रीट स्लीपर का इस्तेमाल किया जाता है ताकि फैलने और सिकुड़ने के बावजूद ट्रैक सुरक्षित रहे। indian railway भी अब कई हाई-स्पीड और व्यस्त रूट्स पर इसी आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है। (Railway Facts) Indian Railway ट्रैक की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित करता है? भारतीय रेलवे के लिए ट्रैक सुरक्षा सबसे बड़ी जिम्मेदारियों में से एक है क्योंकि देश में हर दिन हजारों ट्रेनें चलती हैं। रेलवे कर्मचारी लगातार ट्रैक की जांच करते हैं। गर्मियों में विशेष पेट्रोलिंग की जाती है ताकि कहीं पटरी पर ज्यादा दबाव या टेढ़ापन दिखाई दे तो तुरंत मरम्मत की जा सके। कई जगहों पर तापमान मापने वाले उपकरण भी लगाए जाते हैं। अत्यधिक गर्मी होने पर रेलवे ट्रेन की स्पीड अस्थायी रूप से कम कर देता है। इसके अलावा ट्रैक के नीचे मजबूत कंक्रीट स्लीपर और आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है ताकि ट्रैक स्थिर बना रहे। (Railway Facts) रेलवे ट्रैक के नीचे पत्थर क्यों बिछाए जाते हैं? रेलवे ट्रैक के नीचे जो छोटे-छोटे पत्थर दिखाई देते हैं उन्हें “बैलेस्ट” कहा जाता है। इन पत्थरों का काम सिर्फ ट्रैक को सहारा देना नहीं बल्कि कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाना होता है। जब भारी ट्रेन तेज रफ्तार से गुजरती है तो ट्रैक पर बहुत ज्यादा कंपन और दबाव पड़ता है। बैलेस्ट इस दबाव को बराबर तरीके से जमीन तक पहुंचाने में मदद करता है। इसके अलावा ये पत्थर बारिश का पानी निकालने, ट्रैक को स्थिर रखने और घास-पौधों को बढ़ने से रोकने में भी मदद करते हैं। (Railway Facts) क्या सर्दियों में रेलवे ट्रैक सिकुड़ते भी हैं? जी हां। जैसे गर्मी में धातु फैलती है वैसे ही ठंड में सिकुड़ती भी है। इसी वजह से रेलवे इंजीनियर ट्रैक डिजाइन करते समय पूरे साल के तापमान को ध्यान में रखते हैं। अगर ट्रैक में संतुलन न रखा जाए तो