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Railway: साबरमती से शुरू हुआ रेलवे का नया दौर

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भारतीय Railway को देश की जीवनरेखा कहा जाता है और इसकी वजह भी साफ है। रोज करोड़ों लोग ट्रेन से एक शहर से दूसरे शहर तक सफर करते हैं, लाखों टन सामान देश के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचता है और हजारों किलोमीटर लंबा रेल नेटवर्क भारत की अर्थव्यवस्था को जोड़कर रखता है। लेकिन अब Railway सिर्फ यात्रियों को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने तक सीमित नहीं रहना चाहता। बदलते समय के साथ रेलवे का ध्यान रफ्तार के साथ-साथ सुरक्षा, ईंधन की बचत और पर्यावरण पर भी है। इसी बदलाव की एक बड़ी तस्वीर गुजरात के साबरमती में दिखाई दी, जहां 1,472 करोड़ रुपये से ज्यादा की विभिन्न रेल परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया गया। इस मौके पर देश की पहली LNG-डीजल डुअल-फ्यूल ट्रेन को भी हरी झंडी दिखाई गई। इसके अलावा 12,000 हॉर्सपावर वाले WAG-12 लोकोमोटिव के लिए आधुनिक लोको शेड, स्वदेशी Kavach सुरक्षा प्रणाली, ऑटोमैटिक सिग्नलिंग और रेलवे लाइन के दोहरीकरण जैसी परियोजनाएं भी चर्चा में रहीं। साबरमती की यह तस्वीर इसलिए भी खास है क्योंकि यहां इतिहास और आधुनिक Railway एक साथ दिखाई देते हैं। यही वह धरती है जहां महात्मा गांधी का साबरमती आश्रम देश के स्वतंत्रता आंदोलन की कई महत्वपूर्ण घटनाओं का गवाह रहा। आज इसी क्षेत्र में Railway की नई तकनीक और आधुनिक ढांचा भारत के बदलते रेल सफर की तस्वीर सामने रख रहा है। साबरमती से Railway के नए दौर की शुरुआत गुजरात के अहमदाबाद स्थित साबरमती में आयोजित कार्यक्रम के दौरान 1,472 करोड़ रुपये से अधिक की रेल परियोजनाओं को आगे बढ़ाया गया। इन परियोजनाओं का उद्देश्य सिर्फ नए ढांचे का निर्माण करना नहीं है, बल्कि Railway को ज्यादा सुरक्षित, तेज और पर्यावरण के लिहाज से बेहतर बनाना भी है। इसी कार्यक्रम में LNG-डीजल डुअल-फ्यूल ट्रेन को रवाना किया गया, जिसने वैकल्पिक ईंधन के क्षेत्र में Railway के नए प्रयोग को सामने रखा। साबरमती आज एक महत्वपूर्ण रेल केंद्र के रूप में विकसित हो रहा है। यहां आधुनिक सुविधाओं के साथ माल और यात्री दोनों तरह की रेल आवाजाही को बेहतर बनाने पर काम हो रहा है। इस पूरे बदलाव को देखें तो समझ आता है कि भारतीय Railway अब सिर्फ नई ट्रेनें चलाने पर नहीं, बल्कि इंजन, ट्रैक, सिग्नलिंग और सुरक्षा व्यवस्था को एक साथ आधुनिक बनाने पर भी ध्यान दे रहा है। भारत की पहली LNG-डीजल डुअल-फ्यूल ट्रेन क्या है? इस परियोजना की सबसे ज्यादा चर्चा देश की पहली LNG-डीजल डुअल-फ्यूल ट्रेन को लेकर हो रही है। उद्घाटन यात्रा के दौरान यह आठ कोच वाली गैर-वातानुकूलित चेयर कार ट्रेन साबरमती से मेहसाणा जंक्शन के बीच चलाई गई। इसकी सबसे खास बात यह है कि यह ट्रेन सिर्फ LNG पर निर्भर नहीं है, बल्कि इसमें डीजल और LNG दोनों का इस्तेमाल किया जा सकता है। Railway के लिए यह तकनीक इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे मौजूदा डीजल इंजन को पूरी तरह बदलने की जरूरत नहीं पड़ती। डीजल के एक हिस्से की जगह LNG का इस्तेमाल करके ईंधन की खपत कम करने की कोशिश की जा रही है। यानी पुरानी व्यवस्था को पूरी तरह हटाने की बजाय उसमें नई तकनीक जोड़कर उसे ज्यादा किफायती और पर्यावरण के अनुकूल बनाने का रास्ता अपनाया गया है। LNG ट्रेन में डुअल-फ्यूल तकनीक कैसे काम करती है? साबरमती इंटीग्रेटेड कोचिंग डिपो में 1,400 हॉर्सपावर की क्षमता वाले दो ड्राइविंग पावर कार को डुअल-फ्यूल तकनीक में बदला गया है। इस व्यवस्था में ट्रेन जरूरत के हिसाब से LNG और डीजल दोनों का इस्तेमाल कर सकती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस तकनीक से ट्रेन के संचालन में इस्तेमाल होने वाले डीजल का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा LNG से बदला जा सकता है। इस बदलाव से Railway को एक ऐसा विकल्प मिलता है जिसमें मौजूदा डीजल इंजन के ढांचे का इस्तेमाल करते हुए वैकल्पिक ईंधन की तरफ बढ़ा जा सकता है। ट्रेन को पटरी पर उतारने से पहले 2,000 किलोमीटर से ज्यादा का फील्ड ट्रायल भी किया गया। इतने लंबे परीक्षण का उद्देश्य तकनीक की विश्वसनीयता और सुरक्षा को जांचना था। LNG टैंक और लंबी दूरी की क्षमता डुअल-फ्यूल ट्रेन की पावर कार में बड़े LNG टैंक लगाए गए हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार हर पावर कार में करीब 2,200 लीटर क्षमता वाला LNG टैंक लगाया गया है, जिसमें लगभग 850 से 1,000 किलोग्राम तक उपयोग योग्य LNG रखी जा सकती है। ईंधन की उपलब्धता और संचालन की परिस्थितियों के आधार पर ट्रेन की दूरी तय करने की क्षमता भी अलग हो सकती है। इस व्यवस्था की एक खास बात यह है कि अगर किसी रास्ते में LNG उपलब्ध नहीं है तो ट्रेन डीजल पर भी चल सकती है। इससे Railway के लिए संचालन में लचीलापन बना रहता है। यानी नई तकनीक अपनाने के बावजूद ट्रेन किसी एक ईंधन पर पूरी तरह निर्भर नहीं हो जाती। पर्यावरण के लिए क्यों महत्वपूर्ण है LNG ट्रेन? डीजल इंजन से निकलने वाले धुएं और प्रदूषक तत्वों को कम करना Railway के सामने लंबे समय से एक महत्वपूर्ण चुनौती रही है। LNG के इस्तेमाल से कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर जैसे उत्सर्जन को कम करने की संभावना होती है। इसी वजह से डुअल-फ्यूल तकनीक को पर्यावरण की दिशा में एक कदम माना जा रहा है। हालांकि LNG को पूरी तरह प्रदूषण-मुक्त ईंधन नहीं कहा जा सकता, लेकिन डीजल के मुकाबले उत्सर्जन कम करने की क्षमता इसे एक वैकल्पिक विकल्प बनाती है। Railway में ऐसे प्रयोगों का उद्देश्य धीरे-धीरे ईंधन की खपत और उससे जुड़े पर्यावरणीय प्रभाव को कम करना है। Railway को ईंधन में कितनी बचत हो सकती है? LNG तकनीक का एक फायदा आर्थिक बचत भी है। दिए गए आधिकारिक परीक्षण आंकड़ों के अनुसार एक डुअल-फ्यूल पावर कार से सालाना लगभग 11.9 लाख रुपये के ईंधन की बचत का अनुमान लगाया गया है। आठ कोच वाले पूरे रेक से सालाना करीब 23.9 लाख रुपये की सीधी ईंधन बचत का अनुमान बताया गया है। अगर इस तकनीक को आगे ज्यादा ट्रेनों में इस्तेमाल किया जाता है तो लंबे समय में Railway के ईंधन खर्च पर इसका असर पड़ सकता है। हालांकि वास्तविक बचत ट्रेन के संचालन, ईंधन की कीमत, रूट और LNG की उपलब्धता जैसी कई चीजों पर निर्भर करेगी। हाइड्रोजन से LNG तक Railway के प्रयोग वैकल्पिक