Dhar Bhojshala Travel: हाई कोर्ट के फैसले के बाद खुली भोजशाला, अब कर सकेंगे मां सरस्वती धाम के दर्शन; जानिए कैसे पहुंचें?
Dhar Bhojshala Travel/Travel news today धार/इंदौर । मध्य प्रदेश के पर्यटन मानचित्र पर इतिहास रचते हुए धार नगरी की ऐतिहासिक ‘भोजशाला‘ अब देश-दुनिया के पर्यटकों और सनातनी यात्रियों के लिए एक बड़ा केंद्र बनने जा रही है। सनातन संस्कृति के विराट और विशद वैभव का गुणगान करती धार की भोजशाला सदियों से जिस ऐतिहासिक क्षण की प्रतीक्षा कर रही थी, वह आ ही गया है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद, अब सैलानी और ज्ञान साधक साल के पूरे 365 दिन इस अद्भुत धरोहर का दीदार और दर्शन कर सकेंगे। दरअसल, यह खबर अटक से कटक तक और लद्दाख से लेकर लक्षद्वीप तक फैले उन सभी घुमक्कड़ों और पर्यटकों के लिए बेहद खास है, जो भारत के समृद्ध इतिहास, वास्तुकला और आध्यात्मिक स्थलों को करीब से देखना चाहते हैं। करीब 700 वर्षों के लंबे कालखंड में विधर्मियों के कई आक्रमणों को झेलने वाली यह ज्ञान स्थली अब सैलानियों का स्वागत करने के लिए पूरी तरह तैयार है। Dhar Bhojshala Travel यह भी पढ़ें… Railway News: स्लीपर टिकट पर भी कर सकते हैं AC कोच में सफर! बस मानने होंगे TTE के ये 3 नियम, वरना लगेगा तगड़ा जुर्माना टूरिस्टों के लिए क्यों खास है भोजशाला? जानिए इसका गौरवशाली इतिहास (Dhar Bhojshala Travel) अगर आप मध्य प्रदेश की यात्रा (MP Tourism) की योजना बना रहे हैं, तो धार जिले में स्थित भोजशाला को अपनी ट्रेवल लिस्ट में जरूर शामिल करें। परमार वंश के प्रतापी राजा भोज (जिन्होंने 1010 से 1055 ईस्वी तक शासन किया) स्वयं एक महान विद्वान और कला-संस्कृति के अनन्य उपासक थे। उन्होंने ही 1034 ईस्वी में इस अलौकिक भोजशाला का निर्माण करवाया था। यह कोई साधारण इमारत नहीं है, बल्कि अपने समय का एक भव्य और विशाल संस्कृत विश्वविद्यालय था, जिसकी तुलना प्राचीन नालंदा और तक्षशिला विश्वविद्यालयों से की जाती थी। यहां देश-दुनिया के शोधार्थी, विद्वान और बटुक आकर वेद-उपनिषदों का अध्ययन करते थे। भले ही आक्रांताओं के हमलों के बाद अब इसका मुख्य प्रासाद ही शेष बचा है, लेकिन यहां का कोना-कोना आज भी भारत के स्वर्णिम काल की गवाही देता है। स्थापत्य कला के शौकीनों को मंत्रमुग्ध कर देंगे ये 188 स्तंभ एक पर्यटक के तौर पर जब आप भोजशाला परिसर के भीतर कदम रखेंगे, तो यहां का अनूठा स्थापत्य (Architecture) आपको अचंभित कर देगा। परिसर में खड़े 188 स्तंभ प्राचीन भारतीय वास्तुकला की अद्भुत मिसाल है। हाल ही में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा किए गए 98 दिनों के वैज्ञानिक सर्वे के दौरान जब इन स्तंभों पर जमी सदियों पुरानी धूल साफ हुई, तो परमारकालीन बेजोड़ नक्काशी निखर कर सामने आ गई। इन स्तंभों पर तराशी गई मंदिर की घंटियां, पवित्र शंख और कीर्तिमुख कला के पारखियों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। इसके साथ ही, मुख्य द्वार के भीतर दीवारों पर काले पत्थरों पर प्राकृत और संस्कृत भाषा में लिखे मंत्र और स्तुतियां उत्कीर्ण हैं, जिन्हें देखना किसी भी इतिहास प्रेमी के लिए एक रोमांचक अनुभव है। दीवारों पर राजा भोज द्वारा बनवाए गए कालसर्प यंत्र और सिद्धि यंत्र भी आज साफ नजर आते हैं। Dhar Bhojshala Travel गणित और विज्ञान का बेजोड़ नमूना: विशाल हवनकुंड और अकल कूप भोजशाला की यात्रा के दौरान आपको दो चीजें विशेष रूप से देखनी चाहिए, जो हमारे प्राचीन विज्ञान की गवाही देती हैं। गणितीय हवनकुंड: परिसर के ठीक मध्य में स्थित यह हवनकुंड प्राचीन ज्यामिति (Geometry) का सटीक उदाहरण है। इसका निर्माण इस तरह किया गया था कि, आहुतियों की संख्या और यज्ञ के अनुष्ठान के अनुसार ही इसका आकार निर्धारित होता था। इसमें बड़ी मात्रा में घी के प्रवाह के लिए की गई वैज्ञानिक व्यवस्था आज के वास्तुविदों को भी हैरान कर देती है। Dhar Bhojshala Travel सरस्वती कूप (अकल कूप): परिसर के भीतर स्थित इस ऐतिहासिक कुएं के निर्माण में धातु विज्ञान और शिला विशेषज्ञों की मदद ली गई थी। 14 कोणीय संरचनाओं वाले इस अनूठे कूप के पास बैठकर कभी छात्र विद्याध्ययन करते थे। सदियां बीत जाने के बाद भी इस कूप में आज भी पवित्र जलधाराएं निरंतर प्रवाहित होती हैं। यह भी पढ़ें… IRCTC Nepal Tour Package: कम बजट में विदेश यात्रा का मौका! सैलानियों के लिए अब क्या बदला? हाई कोर्ट का बड़ा फैसला… पहले पर्यटकों और आम श्रद्धालुओं के लिए भोजशाला में प्रवेश और दर्शन के नियम काफी सीमित थे। हिंदुओं को केवल मंगलवार और वसंत पंचमी पर पूजा की अनुमति थी, जबकि शुक्रवार को नमाज के लिए परिसर आरक्षित रहता था। लेकिन एएसआई के 98 दिनों के सर्वे और हाई कोर्ट की लंबी सुनवाई के बाद अब कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि, ‘भोजशाला मूल रूप से एक मंदिर ही है’। कोर्ट ने सभी सीमित अधिकारों को समाप्त करते हुए अब पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए वर्षभर निर्बाध दर्शन और नियमित पूजा की अनुमति दे दी है। साथ ही, शुक्रवार को नमाज पढ़ने के पुराने आदेश को भी पूरी तरह निरस्त कर दिया गया है। अब पर्यटक बिना किसी पाबंदी के इस भव्य परिसर का भ्रमण कर सकते हैं। Dhar Bhojshala Travel अब लंदन से ‘वाग्देवी’ की घर वापसी का इंतजार भोजशाला को मां सरस्वती का ‘शारदा सदन’ भी कहा जाता है। यहां आने वाले पर्यटकों को गर्भगृह में उस स्थान को देखने का मौका मिलता है, जहां कभी मां वाग्देवी की अलौकिक प्रतिमा विराजित थी। इतिहास प्रेमियों के लिए यह जानना बेहद दिलचस्प है कि, साल 1875 में अंग्रेज इस बहुमूल्य और दिव्य प्रतिमा को भारत से लंदन ले गए थे, जो वर्तमान में ब्रिटिश म्यूजियम में रखी हुई है। लगभग 250 किलो वजनी और 128.5 सेंटीमीटर ऊंची यह प्रतिमा धार के भग्नावशेषों से ही प्राप्त हुई थी। अब सरकार इसे वापस लाने के प्रयास कर रही है, ताकि इसे भविष्य में बनने वाले भव्य ‘सरस्वती लोक’ के गर्भगृह में दोबारा स्थापित किया जा सके। (भोजशाला) यह भी पढ़ें… Dariba Kalan और Kinari Bazaar- पुरानी दिल्ली के मशहूर बाजार! ट्रेवल गाइड: धार भोजशाला कैसे पहुंचें? (Dhar Bhojshala Travel) यदि आप इस ऐतिहासिक और आध्यात्मिक यात्रा का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो यहां पहुंचने के रास्ते बेहद सुगम हैं। हवाई मार्ग द्वारा (By Air): धार नगरी का सबसे नजदीकी हवाई अड्डा इंदौर का देवी अहिल्याबाई होल्कर एयरपोर्ट (IDR) है, जो धार से लगभग 65 किलोमीटर दूर