Teej Utsav Five Colors of Delhi Delhi Latest Travel

Delhi में लगा Teej Utsav, जानिए यहां की Location और Timing

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राजस्थान अपनी रंग-बिरंगी पोशाकों, पारंपरिक गहनों, हस्तशिल्प, लोक संगीत और स्वादिष्ट खान-पान के लिए जाना जाता है। अगर आप राजस्थान की इन परंपराओं को करीब से देखना चाहते हैं, लेकिन इस समय राजस्थान जाने का मौका नहीं मिल पा रहा है, तो दिल्ली में आपके लिए एक अच्छा विकल्प मौजूद है। Teej Utsav 2026 का आयोजन 15 अगस्त से 24 अगस्त 2026 तक दिल्ली के बीकानेर हाउस में किया जा रहा है। इस आयोजन में राजस्थान के अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े कारीगर अपने हस्तशिल्प और पारंपरिक उत्पाद लेकर पहुंचेंगे। यहां आपको खरीदारी के साथ लोक संगीत, नृत्य, मेहंदी, झूले और राजस्थानी व्यंजनों का आनंद लेने का अवसर भी मिलेगा। Teej Utsav इस आयोजन का एक खास उद्देश्य राजस्थान के ग्रामीण कारीगरों को बड़े बाजार तक पहुंचाना और उनके पारंपरिक काम को ग्राहकों तक सीधे पहुंचाना है। ग्रामीण गैर-कृषि विकास एजेंसी यानी आरयूडीए के माध्यम से कारीगरों को अपने उत्पाद प्रदर्शित करने का अवसर मिलता है। अगर आपको हाथ से बनी चीजें खरीदना पसंद है या राजस्थान की संस्कृति में रुचि है, तो अगस्त में बीकानेर हाउस का यह आयोजन आपकी यात्रा सूची में शामिल हो सकता है। Teej Utsav 2026 कब और कहां होगा? इस वर्ष Teej Utsav 15 अगस्त से 24 अगस्त 2026 तक आयोजित किया जाएगा। इसका आयोजन बीकानेर हाउस, नई दिल्ली में होगा। बीकानेर हाउस इंडिया गेट के पास स्थित है और दिल्ली के प्रमुख इलाकों से यहां पहुंचना आसान है। आयोजन में प्रवेश निःशुल्क रखा गया है। यानी केवल उत्सव देखने के लिए आपको कोई प्रवेश शुल्क नहीं देना होगा। हालांकि, अगर आप यहां से कपड़े, गहने, हस्तशिल्प या दूसरी चीजें खरीदते हैं, तो उसका भुगतान अलग से करना होगा। परिवार के साथ घूमने वालों के लिए यह अच्छा विकल्प हो सकता है, क्योंकि यहां खरीदारी के अलावा सांस्कृतिक कार्यक्रम और राजस्थानी भोजन भी देखने और चखने को मिल सकता है। Teej Utsav राजस्थान के कारीगरों से सीधे खरीदारी इस आयोजन में राजस्थान के अलग-अलग इलाकों से कारीगर और उनके समूह अपने उत्पाद लेकर पहुंचेंगे। राजस्थान के कई परिवार पीढ़ियों से हस्तशिल्प का काम करते आ रहे हैं। कोई कपड़ों पर हाथ से छपाई करता है, कोई कढ़ाई करता है, तो कोई मिट्टी, लाख या दूसरी प्राकृतिक सामग्री से वस्तुएं तैयार करता है। यहां खरीदारी करते समय आप कारीगर से सीधे बात कर सकते हैं और उसके काम के बारे में जानकारी ले सकते हैं। किसी सामान को बनाने में कितना समय लगता है, उसमें कौन-सी तकनीक इस्तेमाल होती है और वह किस क्षेत्र की कला से जुड़ा है, यह जानना खरीदारी को और उपयोगी बना सकता है। इस तरह आपको केवल तैयार सामान नहीं मिलता, बल्कि उसके पीछे की मेहनत और कला को समझने का मौका भी मिलता है। ब्लॉक प्रिंट वाले कपड़े राजस्थान की ब्लॉक प्रिंटिंग यहां की प्रसिद्ध पारंपरिक कलाओं में शामिल है। इसमें लकड़ी के बने ब्लॉक पर डिजाइन तैयार किया जाता है। इसके बाद रंग की मदद से उस डिजाइन को कपड़े पर छापा जाता है। फूलों, पत्तियों और पारंपरिक आकृतियों वाले डिजाइन कपड़ों को अलग पहचान देते हैं। Teej Utsav यहां आपको ब्लॉक प्रिंट वाली साड़ियां, दुपट्टे, कुर्ते और दूसरे कपड़े देखने को मिल सकते हैं। अगर आप रोजाना पहनावे में पारंपरिक डिजाइन पसंद करते हैं, तो ऐसे कपड़े आपके लिए अच्छे विकल्प हो सकते हैं। खरीदारी करते समय कपड़े की गुणवत्ता, रंग और छपाई को ध्यान से जरूर देखें। ब्लू पॉटरी भी खरीद सकते हैं राजस्थान की एक और प्रसिद्ध कला ब्लू पॉटरी है। इस कला में नीले रंग और अलग-अलग सजावटी डिजाइनों का इस्तेमाल किया जाता है। इसके तहत सजावटी प्लेट, कटोरे, छोटे बर्तन और घर में रखने वाली दूसरी वस्तुएं बनाई जाती हैं। अगर आप घर की सजावट के लिए कुछ पारंपरिक सामान खरीदना चाहते हैं, तो यहां ब्लू पॉटरी के उत्पादों को जरूर देखें। खरीदते समय वस्तु को ध्यान से जांच लें, ताकि उसमें कोई दरार या टूट-फूट न हो। लाख की चूड़ियों की खरीदारी तीज के त्योहार के साथ पारंपरिक श्रृंगार का खास संबंध है। इसमें चूड़ियां और गहने महिलाओं की खरीदारी का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। राजस्थान की लाख की चूड़ियां अलग-अलग रंगों और डिजाइनों में बनाई जाती हैं। कई चूड़ियों पर हाथ से सजावट की जाती है, जिससे हर डिजाइन थोड़ा अलग दिखाई दे सकता है। अगर आप त्योहार के लिए खरीदारी कर रहे हैं, तो लाख की चूड़ियां आपके लिए अच्छी पसंद हो सकती हैं। खरीदारी से पहले चूड़ियों का आकार और उनकी मजबूती जरूर जांच लें। अगर आप इन्हें लंबे समय तक पहनना चाहते हैं, तो सजावट और रंग की गुणवत्ता पर भी ध्यान दें। Teej Utsav राजस्थानी मोजरी भी देखें राजस्थान की पारंपरिक मोजरी भी यहां की पहचान है। हाथ से तैयार की गई मोजरी कई रंगों और डिजाइनों में मिलती है। इसे पारंपरिक कपड़ों के साथ पहनने के अलावा आजकल सामान्य कुर्ते और दूसरे कपड़ों के साथ भी पहना जाता है। अगर आप अपने पहनावे में राजस्थानी अंदाज जोड़ना चाहते हैं, तो मोजरी खरीद सकते हैं। खरीदारी से पहले मोजरी पहनकर उसका आकार और आराम जरूर जांच लें। मोजरी सुंदर होने के साथ-साथ चलने में आरामदायक भी होनी चाहिए। कशीदाकारी और हाथ से तैयार कपड़े राजस्थान के कई इलाकों में कपड़ों पर हाथ से कढ़ाई और कशीदाकारी की जाती है। धागों और अलग-अलग रंगों की मदद से कपड़े पर छोटे-बड़े डिजाइन तैयार किए जाते हैं। दुपट्टे, कपड़े, सजावटी सामान और घर में इस्तेमाल होने वाली कई वस्तुओं पर यह काम देखने को मिल सकता है। हाथ से की गई कढ़ाई में मशीन से बने सामान की तुलना में अलग डिजाइन और छोटी असमानताएं दिखाई दे सकती हैं। यही असमानताएं कई बार इस बात की पहचान होती हैं कि सामान हाथ से तैयार किया गया है। अगर आपको कोई कढ़ाई वाला उत्पाद पसंद आता है, तो उसे बनाने वाले कारीगर से उसके काम के बारे में जरूर पूछें। Teej Utsav मेहंदी और तीज की परंपरा तीज के अवसर पर मेहंदी लगाने की परंपरा काफी पुरानी है। इसलिए उत्सव में मेहंदी के स्टॉल भी लोगों के आकर्षण का हिस्सा हो सकते हैं। महिलाएं और लड़कियां यहां अलग-अलग डिजाइन की मेहंदी लगवा सकती हैं। अगर आप परिवार के साथ जा रहे

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Delhi में लग चुका है Handicraft Mela 2026

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Delhi की गर्मी के बाद जब मानसून की बारिश शुरू होती है, तो शहर का मौसम और घूमने का अंदाज दोनों बदल जाते हैं। ऐसे मौसम में अगर खरीदारी के साथ कला, संस्कृति और अलग-अलग राज्यों की पारंपरिक चीजें देखने का मौका मिल जाए, तो घूमने का अनुभव और भी अच्छा हो जाता है। इसी वजह से दस्तकार मानसून मेला 2026 इस अगस्त में Delhi घूमने वालों के लिए खास आयोजन बन सकता है। यह मेला उन लोगों के लिए उपयोगी है, जिन्हें हथकरघा, पारंपरिक छपाई, कढ़ाई, हस्तनिर्मित कपड़े और अलग-अलग तरह के हस्तशिल्प पसंद हैं। इस मेले की सबसे अच्छी बात यह है कि यहां आपको केवल तैयार सामान देखने को नहीं मिलता। कई जगहों पर उसे बनाने वाले कारीगरों से सीधे मिलने और उनके काम को समझने का मौका भी मिलता है। यानी जिस कपड़े, बैग, आभूषण या दूसरी हस्तनिर्मित चीज को आप खरीदते हैं, उसके पीछे काम करने वाले कारीगर के बारे में भी जान सकते हैं। अगर आप Delhi में मानसून के दौरान घूमने के लिए कोई अलग जगह तलाश रहे हैं, तो दस्तकार मानसून मेला 2026 को अपनी यात्रा सूची में शामिल कर सकते हैं। दस्तकार क्या है और इसकी शुरुआत कैसे हुई? दस्तकार की शुरुआत साल 1981 में दिल्ली की छह महिलाओं ने की थी। इनमें वर्तमान अध्यक्ष लैला तैयबजी भी शामिल थीं। शुरुआत में दस्तकार केवल करीब 15 शिल्प समूहों के साथ काम करता था, लेकिन धीरे-धीरे इसका काम देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंच गया। आज दस्तकार सैकड़ों शिल्प समूहों से जुड़ा हुआ है। इसका मुख्य उद्देश्य पारंपरिक कारीगरों और उनके उत्पादों को बड़े बाजार तक पहुंचाना है। देश के कई गांवों और छोटे शहरों में आज भी कारीगर पारंपरिक तरीकों से कपड़े, आभूषण, घर की सजावट का सामान और दूसरी चीजें बनाते हैं। लेकिन हर कारीगर के लिए अपने उत्पादों को बड़े शहरों के ग्राहकों तक पहुंचाना आसान नहीं होता। दस्तकार ऐसे कारीगरों को बाजार से जोड़ने का काम करता है। इसके आयोजनों में ग्राहकों को सीधे कारीगरों के उत्पाद खरीदने का अवसर मिलता है। इसी वजह से दस्तकार का मानसून मेला केवल सामान्य खरीदारी का आयोजन नहीं है। यहां खरीदारी के साथ-साथ पारंपरिक हस्तशिल्प को समझने का भी मौका मिलता है। मानसून मेला 2026 कब और कहां है? इस साल का मानसून मेला 6 अगस्त से 17 अगस्त 2026 तक आयोजित किया जा रहा है। मेले से जुड़ी जरूरी जानकारी इस प्रकार है। इसका आयोजन नेचर बाजार, किसान हाट, अंधेरिया मोड़, छतरपुर के पास, नई दिल्ली में किया जा रहा है। मेला सुबह 11 बजे से शाम 7 या 8 बजे तक खुला रह सकता है। इसकी कुल अवधि 12 दिन है। प्रवेश शुल्क से जुड़ी जानकारी आयोजन के अनुसार अलग हो सकती है। अगर आप मेले में जाने का कार्यक्रम बना रहे हैं, तो निकलने से पहले आयोजन की आधिकारिक जानकारी से समय और प्रवेश शुल्क जरूर जांच लें। मानसून के दौरान मौसम अचानक बदल सकता है। इसलिए यात्रा की योजना बनाते समय बारिश और यातायात दोनों को ध्यान में रखें। मेले में क्या देखने को मिलेगा? दस्तकार मानसून मेले में भारत के अलग-अलग हिस्सों से जुड़े कई तरह के पारंपरिक उत्पाद देखने को मिल सकते हैं। यहां हथकरघा, पारंपरिक छपाई, कढ़ाई और हस्तनिर्मित वस्त्र खास आकर्षण हो सकते हैं। इसके अलावा कपड़ों के साथ आभूषण, बैग, जूते-चप्पल, घर की सजावट का सामान और दूसरी हस्तनिर्मित चीजें भी खरीदी जा सकती हैं। यहां आने वाले कई उत्पादों की खासियत यह होती है कि उन्हें बड़े पैमाने पर मशीनों से तैयार करने की बजाय कारीगर अपने हाथों और पारंपरिक तकनीकों से बनाते हैं। अगर आपको एक जैसे दिखने वाले बाजारू उत्पादों से अलग कुछ खरीदना पसंद है, तो यह मेला आपके लिए अच्छा विकल्प हो सकता है। हथकरघा और कपड़ों की खरीदारी अगर आपको पारंपरिक भारतीय वस्त्र पसंद हैं, तो मानसून मेले में सबसे पहले हथकरघा और कपड़ों वाले स्टॉल देखने चाहिए। भारत के अलग-अलग राज्यों की अपनी वस्त्र परंपराएं हैं। कहीं खास तरह की बुनाई देखने को मिलती है, तो कहीं कढ़ाई या छपाई की अलग तकनीक इस्तेमाल की जाती है। यहां आपको ऐसे कपड़े मिल सकते हैं, जिनमें पारंपरिक डिजाइनों के साथ आधुनिक अंदाज भी जोड़ा गया है। महिलाओं के लिए साड़ियों, दुपट्टों और दूसरे पारंपरिक कपड़ों के साथ रोजाना पहनने वाले कपड़ों के विकल्प भी मिल सकते हैं। पुरुषों के लिए सूती कुर्ते, कमीज और दूसरे पारंपरिक तथा सामान्य पहनावे के कपड़े देखे जा सकते हैं। अगर आपको प्राकृतिक कपड़े और हाथ से तैयार किए गए वस्त्र पसंद हैं, तो यहां खरीदारी के लिए काफी विकल्प मिल सकते हैं। पारंपरिक छपाई में क्या खास है? भारतीय कपड़ों में लकड़ी के ठप्पों से की जाने वाली छपाई की अपनी अलग पहचान है। इस तकनीक में लकड़ी के ठप्पे पर डिजाइन तैयार किया जाता है और फिर उसे कपड़े पर इस्तेमाल किया जाता है। हर डिजाइन को तैयार करने में कारीगर को काफी सावधानी रखनी पड़ती है। मानसून मेले में अलग-अलग डिजाइनों और रंगों वाले छपे हुए कपड़े देखने को मिल सकते हैं। अगर आपको फूलों वाले डिजाइन, पारंपरिक आकृतियां और भारतीय रंग पसंद हैं, तो ऐसे स्टॉल पर थोड़ा समय जरूर बिताएं। इनसे बने दुपट्टे, कपड़े और दूसरे उत्पाद रोजाना इस्तेमाल के साथ त्योहारों के लिए भी खरीदे जा सकते हैं। हाथ की कढ़ाई की झलक हाथ की कढ़ाई भारतीय वस्त्र परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। एक छोटे से कपड़े पर भी कढ़ाई का काम पूरा करने में काफी समय लग सकता है। यही वजह है कि हाथ से की गई कढ़ाई वाले उत्पादों में मशीन से बने सामान्य डिजाइनों की तुलना में अलग बारीकी दिखाई देती है। मेले में आपको अलग-अलग तरह की कढ़ाई वाले कपड़े और सामान देखने को मिल सकते हैं। अगर आपको किसी उत्पाद पर किया गया कढ़ाई का काम पसंद आता है, तो उसे बनाने वाले कारीगर से उसके काम और तकनीक के बारे में पूछना भी दिलचस्प रहेगा। यही इस तरह के मेलों की खासियत है कि आप उत्पाद खरीदने के साथ उसके पीछे की मेहनत और तकनीक को भी समझ सकते हैं। कारीगरों से सीधे मिलने का फायदा दस्तकार मानसून मेले में जाने का एक बड़ा फायदा यह है कि

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Delhi में 15 अगस्त को Qutub Minar में होगा Celebration

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15 अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस के मौके पर Delhi का माहौल हर साल कुछ अलग नजर आता है। शहर के प्रमुख इलाकों में तिरंगे की सजावट, देशभक्ति से जुड़े कार्यक्रम और ऐतिहासिक जगहों पर विशेष आयोजन देखने को मिलते हैं। लाल किले पर होने वाला मुख्य स्वतंत्रता दिवस समारोह देशभर में सबसे ज्यादा चर्चा में रहता है, लेकिन इसके अलावा Delhi के ऐतिहासिक स्मारक भी इस दौरान लोगों के आकर्षण का केंद्र बनते हैं। इन्हीं ऐतिहासिक जगहों में कुतुब मीनार का नाम सबसे ऊपर आता है। महरौली में स्थित यह ऐतिहासिक मीनार Delhi की पहचान से जुड़ी हुई है। करीब 73 मीटर ऊंची कुतुब मीनार अपनी वास्तुकला, इतिहास और आसपास मौजूद पुराने स्मारकों के कारण देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के बीच लोकप्रिय है। स्वतंत्रता दिवस के आसपास कुतुब मीनार को केसरिया, सफेद और हरे रंग की रोशनी से सजाए जाने की जानकारी सामने आती रही है। रात में तिरंगे के रंगों से रोशन कुतुब मीनार का दृश्य सामान्य दिनों से काफी अलग दिखाई दे सकता है। अगर आप 15 अगस्त 2026 को Delhi में घूमने का प्लान बना रहे हैं और कुतुब मीनार को अपनी यात्रा में शामिल करना चाहते हैं, तो केवल इसकी लाइटिंग और खूबसूरती के बारे में जानना काफी नहीं है। आपको टिकट, मेट्रो कनेक्टिविटी, लाइट एंड साउंड शो, फोटोग्राफी का सही समय और सबसे जरूरी बात, उस दिन स्मारक खुला है या नहीं, इन सभी चीजों की जानकारी पहले से होनी चाहिए। स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगे के रंगों में रोशन होगी कुतुब मीनार 15 अगस्त के मौके पर Delhi की कुतुब मीनार को खास रोशनी से सजाए जाने की जानकारी मिलती रही है। इसमें मीनार को भारतीय तिरंगे के तीन रंगों यानी केसरिया, सफेद और हरे रंग की रोशनी से सजाया जाता है। दिन के समय कुतुब मीनार अपने लाल और भूरे रंग के पत्थरों के कारण अलग दिखाई देती है, लेकिन रात में जब इस पर तिरंगे की रोशनी पड़ती है, तो इसका पूरा रूप बदल जाता है। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर इस तरह की लाइटिंग का उद्देश्य ऐतिहासिक स्मारक को राष्ट्रीय पर्व से जोड़ना और लोगों के बीच देशभक्ति का माहौल बनाना होता है। अगर आप Delhi में 15 अगस्त के आसपास घूम रहे हैं, तो रात में कुतुब मीनार की रोशनी देखने का अनुभव अलग हो सकता है। खासकर उन लोगों के लिए, जो ऐतिहासिक जगहों की फोटोग्राफी पसंद करते हैं, यह एक अच्छा अवसर हो सकता है। हालांकि, यहां जाने से पहले यह जरूर देख लें कि उस दिन पर्यटकों के लिए प्रवेश की अनुमति है या नहीं। राष्ट्रीय पर्व पर सुरक्षा व्यवस्था सामान्य दिनों से अलग हो सकती है और ऐतिहासिक स्मारकों के नियमों में बदलाव किया जा सकता है। कुतुब मीनार का लाइट एंड साउंड शो कब होता है? कुतुब मीनार से जुड़ी उपलब्ध जानकारी में लाइट एंड साउंड शो का भी उल्लेख मिलता है। बताया जाता है कि यह शो प्रतिदिन रात 8 बजे से 9 बजे तक चलता है। करीब एक घंटे के इस शो में Delhi के इतिहास को रोशनी, दृश्य प्रभाव और narration के जरिए दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया जाता है। Delhi का इतिहास कई शताब्दियों पुराना है और शहर के अलग-अलग हिस्सों में इसके निशान आज भी दिखाई देते हैं। ऐसे में लाइट एंड साउंड शो के माध्यम से Delhi की विरासत और इतिहास को एक अलग तरीके से समझने का मौका मिल सकता है। अगर आप केवल कुतुब मीनार देखकर वापस आने की बजाय उसके इतिहास और Delhi की संस्कृति को समझना चाहते हैं, तो यह शो आपके लिए उपयोगी हो सकता है। लेकिन 15 अगस्त के दिन कार्यक्रम की timing या availability सुरक्षा व्यवस्था के कारण बदल सकती है। इसलिए अगर आपका मुख्य उद्देश्य लाइट एंड साउंड शो देखना है, तो घर से निकलने से पहले उस दिन के शो की पुष्टि जरूर करें। Golden Hour में कुतुब मीनार की फोटो क्यों अच्छी आती है? अगर आपको फोटोग्राफी का शौक है, तो Delhi की कुतुब मीनार आपके लिए काफी अच्छा फोटो स्पॉट हो सकती है। कुतुब मीनार की तस्वीरें लेने के लिए सूर्यास्त से पहले का समय यानी Golden Hour खास माना जाता है। इस समय सूरज की रोशनी तेज नहीं होती और मीनार पर पड़ने वाली रोशनी धीरे-धीरे बदलती रहती है। इस दौरान कुतुब मीनार के पत्थरों की बनावट, नक्काशी और ऊंचाई को अलग-अलग angle से capture किया जा सकता है। अगर आप 15 अगस्त को यहां जाने की योजना बना रहे हैं और स्मारक उस दिन पर्यटकों के लिए खुला है, तो कोशिश करें कि सूर्यास्त से कुछ समय पहले पहुंच जाएं। इससे आपको पहले स्मारक देखने और फोटोग्राफी करने का समय मिलेगा। बाद में अगर शाम का कोई कार्यक्रम उपलब्ध हो, तो उसमें भी शामिल हो सकते हैं। हालांकि स्वतंत्रता दिवस के दिन भीड़ सामान्य दिनों से ज्यादा हो सकती है। इसलिए फोटोग्राफी के लिए सही जगह बनाने में थोड़ा समय लग सकता है।  कुतुब मीनार की टिकट कितनी है? कुतुब मीनार घूमने के लिए प्रवेश टिकट की आवश्यकता होती है। अलग-अलग प्रकार के Tour और Package के अनुसार इसकी कीमत बदल सकती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, गाइड के साथ प्रवेश टिकट की कीमत लगभग 788 रुपये हो सकती है। अगर आप किसी निजी ऑपरेटर के माध्यम से परिवहन और गाइड सहित विशेष Package लेते हैं, तो इसकी कीमत करीब 2,407 रुपये तक जा सकती है। हालांकि ये कीमतें Package और Operator के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए अगर आप किसी Private Tour Package से कुतुब मीनार देखने जा रहे हैं, तो Booking से पहले यह जरूर देखें कि कीमत में कौन-कौन सी सुविधाएं शामिल हैं। कुछ Package में केवल गाइड शामिल हो सकता है, जबकि किसी दूसरे Package में वाहन, प्रवेश टिकट और दूसरी सुविधाएं भी शामिल हो सकती हैं। अगर आप Delhi में कम बजट में घूमने की योजना बना रहे हैं, तो Private Package लेने से पहले सामान्य प्रवेश टिकट और सार्वजनिक परिवहन के विकल्पों की तुलना कर लेना बेहतर रहेगा। कुतुब मीनार कहां स्थित है? कुतुब मीनार महरौली, नई दिल्ली में स्थित है। यह Delhi के प्रमुख ऐतिहासिक पर्यटन स्थलों में शामिल है। कुतुब मीनार के आसपास भी कई ऐतिहासिक

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भारत में 6 लग्जरी ट्रेन यात्राएं जो जिंदगी में एक बार जरूर अनुभव करनी चाहिए

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भारत में ट्रेन सिर्फ एक जगह से दूसरी जगह पहुंचने का साधन नहीं बल्कि लोगों की जिंदगी का हिस्सा है। हर दिन करोड़ों लोग Indian railway के जरिए सफर करते हैं और IRCTC ने टिकट बुकिंग से लेकर रेलवे पर्यटन तक पूरे सिस्टम को आसान बना दिया है। लेकिन भारतीय रेलवे की दुनिया सिर्फ सामान्य ट्रेनों तक सीमित नहीं है। भारत में कुछ ऐसी Luxury Trains भी चलती हैं जिनका नाम दुनिया की सबसे शानदार ट्रेन यात्राओं में लिया जाता है। इन ट्रेनों में सफर करना किसी फाइव स्टार होटल में रहने जैसा अनुभव माना जाता है। यहां सिर्फ सीट और बर्थ नहीं मिलती, बल्कि राजसी कमरे, निजी बटलर, महंगे इंटीरियर, शानदार डाइनिंग, सांस्कृतिक कार्यक्रम, जंगल सफारी, ऐतिहासिक किलों की सैर और शाही मेहमाननवाजी का अनुभव मिलता है। दिलचस्प बात यह है कि इन ट्रेनों में सफर करने के लिए दुनिया भर से पर्यटक भारत आते हैं। कई अंतरराष्ट्रीय ट्रैवल मैगज़ीन और अवॉर्ड शो भारत की Luxury Trains को दुनिया की सबसे शानदार रेल यात्राओं में शामिल कर चुके हैं। अगर आप भी जिंदगी में एक बार कुछ अलग और यादगार अनुभव लेना चाहते हैं, तो भारत की ये 6 Luxury Trains यात्राएं जरूर आपकी लिस्ट में होनी चाहिए। Maharajas Express – भारत की सबसे आलीशान ट्रेन अगर भारत की सबसे Luxury Train की बात हो तो Maharajas Express का नाम सबसे ऊपर आता है। इसे अक्सर “चलता-फिरता सात सितारा होटल” कहा जाता है। इस ट्रेन की शुरुआत भारतीय रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कॉर्पोरेशन यानी IRCTC से जुड़े पर्यटन मॉडल को बढ़ावा देने के लिए की गई थी। आज यह ट्रेन दुनिया की सबसे महंगी और शानदार ट्रेन यात्राओं में गिनी जाती है। ट्रेन के अंदर प्रेसिडेंशियल सुइट, आलीशान केबिन, लकड़ी की नक्काशी, महंगे झूमर, क्लासिक फर्नीचर और राजसी इंटीरियर दिखाई देता है। कई लोगों को इसका माहौल पुराने भारतीय महलों जैसा महसूस होता है। अंदर की सुविधाएं कैसी हैं? महाराजाज एक्सप्रेस में दो शानदार रेस्टोरेंट — Rang Mahal और Mayur Mahal — मौजूद हैं। यहां भारतीय और विदेशी दोनों तरह के व्यंजन परोसे जाते हैं।  इसके अलावा ट्रेन में बार, लाउंज, निजी बटलर सेवा और शानदार बाथरूम जैसी सुविधाएं भी मिलती हैं। कई विदेशी ट्रैवल रिपोर्ट्स में इसे “दुनिया की सबसे बेहतरीन लग्जरी ट्रेन” का दर्जा मिल चुका है। (Luxury Trains) कौन-कौन सी जगहों पर जाती है? यह ट्रेन दिल्ली, आगरा, जयपुर, रणथंभौर, वाराणसी, खजुराहो और उदयपुर जैसे ऐतिहासिक शहरों तक जाती है। ताजमहल देखने से लेकर जंगल सफारी और शाही महलों की यात्रा तक — यह ट्रेन पूरे सफर को किसी फिल्मी अनुभव जैसा बना देती है। Palace on Wheels – पहियों पर चलता राजस्थानी महल 1982 में शुरू हुई Palace on Wheels भारत की सबसे प्रसिद्ध Luxury Trains में से एक है। इसका नाम ही इसकी पहचान है — सचमुच पहियों पर चलता हुआ महल। इस ट्रेन को खासतौर पर राजस्थान की शाही संस्कृति को दुनिया के सामने दिखाने के लिए तैयार किया गया था। ट्रेन के हर कोच का नाम पुराने राजपूताना राज्यों के नाम पर रखा गया है। अंदर की सजावट राजस्थानी महलों, झरोखों और पारंपरिक कला से प्रेरित दिखाई देती है। सफर के दौरान क्या खास मिलता है? यह ट्रेन दिल्ली से शुरू होकर जयपुर, जैसलमेर, जोधपुर, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, रणथंभौर और आगरा तक जाती है। यात्रियों को किलों की सैर, रेगिस्तान में ऊंट सफारी, लोक संगीत और राजस्थानी भोजन का अनुभव मिलता है। क्यों लोग इसे इतना पसंद करते हैं? कई यात्रियों के मुताबिक Palace on Wheels में सफर करना किसी राजा-महाराजा की जिंदगी जीने जैसा लगता है। यह ट्रेन खासतौर पर विदेशी पर्यटकों के बीच काफी लोकप्रिय है क्योंकि यहां उन्हें भारतीय इतिहास और शाही संस्कृति करीब से देखने को मिलती है। Deccan Odyssey – भारत की ब्लू लग्जरी ट्रेन Deccan Odyssey को अक्सर भारत की “ब्लू लग्जरी ट्रेन” कहा जाता है। इसकी शुरुआत महाराष्ट्र पर्यटन और रेलवे ने मिलकर की थी। यह ट्रेन उन लोगों के लिए खास मानी जाती है जो आरामदायक और शांत सफर पसंद करते हैं। ट्रेन के अंदर क्या-क्या सुविधाएं हैं? इस ट्रेन में लग्जरी केबिन, कॉन्फ्रेंस कार, स्पा, जिम, बार और शानदार डाइनिंग एरिया मौजूद हैं। अंदर का डिजाइन किसी महंगे होटल जैसा दिखाई देता है। कौन-कौन से रूट कवर करती है? यह ट्रेन मुंबई, गोवा, गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र के कई हिस्सों में अलग-अलग थीम बेस्ड यात्राएं कराती है। कुछ यात्राएं जंगल सफारी पर फोकस करती हैं तो कुछ ऐतिहासिक शहरों और यूनेस्को हेरिटेज साइट्स पर। The Golden Chariot – दक्षिण भारत की शानदार शाही ट्रेन अगर कोई दक्षिण भारत को लग्जरी अंदाज में एक्सप्लोर करना चाहता है तो Golden Chariot सबसे बेहतरीन विकल्पों में से एक मानी जाती है। इस ट्रेन का डिजाइन दक्षिण भारत के पुराने मंदिरों और राजवंशों से प्रेरित है। अंदर की सजावट बेहद क्लासिक और शाही दिखाई देती है। यह ट्रेन किन जगहों तक जाती है? Golden Chariot कर्नाटक, गोवा, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों की यात्रा कराती है। यात्रियों को मंदिर, समुद्र तट, जंगल, ऐतिहासिक स्थल और सांस्कृतिक कार्यक्रम देखने का मौका मिलता है। (Luxury Trains) ट्रेन के अंदर क्या खास है? इस ट्रेन में आयुर्वेदिक स्पा, जिम, रेस्टोरेंट, बार और लग्जरी केबिन मौजूद हैं। दक्षिण भारतीय भोजन और सांस्कृतिक अनुभव इसे बाकी ट्रेनों से अलग बनाते हैं। (Luxury Trains) Royal Rajasthan on Wheels – राजस्थान का और भी प्रीमियम अनुभव Royal Rajasthan on Wheels को Palace on Wheels का प्रीमियम संस्करण माना जाता है। यह ट्रेन राजस्थान की शाही विरासत को और ज्यादा भव्य तरीके से दिखाती है। अंदर महंगे इंटीरियर, शानदार सुइट्स और निजी सेवाएं यात्रियों को खास अनुभव देती हैं। सफर में कौन-कौन सी जगहें शामिल हैं? यह ट्रेन जयपुर, उदयपुर, जोधपुर, खजुराहो, वाराणसी और चित्तौड़गढ़ जैसे शहरों तक जाती है। सफर के दौरान महलों की सैर, सांस्कृतिक कार्यक्रम और शाही डिनर यात्रियों को बेहद अलग अनुभव देते हैं। (Luxury Trains) विदेशी पर्यटकों के बीच क्यों लोकप्रिय है? विदेशों में राजस्थान की शाही संस्कृति हमेशा से आकर्षण का केंद्र रही है। यही वजह है कि यह ट्रेन अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों के बीच काफी प्रसिद्ध है। Fairy Queen – इतिहास से जुड़ी अनोखी ट्रेन यात्रा Fairy Queen बाकी Luxury Trains से थोड़ी अलग है। यह सिर्फ लक्जरी नहीं

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Delhi After Dark: An Electric View into Delhi’s Nightlife, From Soho to Social and Beyond

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Welcome to Delhi After Dark: where the city doesn’t sleep, it slays. With the sun dipping beyond the smoggy horizon, Delhi is reborn as a neon exposition of music, cocktails, and manicured mayhem. Clubbing is no longer just fun and frolic but a culture, a statement, a vibe. And at the helm of this revolution stand Soho Delhi, Social, and a bunch of other night time havens remolding nightlife for the urban millennial and Gen-Z crowd. Soho Delhi – The Spot Where Class Clashes with Chaos Poised right at the heart of the capital’s vibrant nightlife hub, Soho is posh, pulsating, and oh-so-Instagram-worthy. The interiors consist of velvet antique couches, dim lighting from chandeliers, cocktails garnished with edible flowers, and a crowd of impeccably dressed party lovers. Vibe Check: Global house, commercial beats, deep tech on Sundays. Signature Sip: Smoked Old Fashioned and the Insta-famous Cotton Candy Martini. Trend Theme: Neo-Luxe Nightlife – Luxury with a rebel heart. From sundowner soirées to 2 AM dance-offs, it is Soho where Delhi’s night royalty holds sway. SOCIAL – The Culture Chameleon From Hauz Khas to Cyber Hub, Social is more than just a café and not simply a club; it has indeed become a phenomenon. It ushered in an era where parties and co-working spaces in the city started to merge. Considered the melting pot for Delhi’s creative spirit, it boasts rustic-industrial areas, an eccentric menu, and handpicked events. What’s Hot: Hip-hop Thursdays, Techno Saturdays, Drag Brunches. Aesthetic: Graffiti walls, old Bollywood posters, neon quotes. Trendy Theme: Work by Day, Woke by Night Biryanis and Wi-Fi bring you in; DJs and dancing make you stay. Beyond the Usual : Underrated Yet Unmissable Dear Donna – Luxurious jungle bar hidden underground with EDM underneath. Toy Room Delhi – London import, filled with madness and models. Keya – First garden-lounge party setting in South Delhi. MNKY Houz – For those seeking techno tribes & sonic delight. Places where sounds get reinvented and nights get immortalized. Hottest Nightlife Trends in 2025Silent Discos – Dance quietly, be loud in your own world. Lounge Reels – Fancy nooks designed for viral Instagram reels. DIY Bar-Nights: Making cocktailry with a hint of mixing expertise. Themed Events: Y2K events, cosplay nights, and even Bridgerton balls. Micro-Clubbing Culture: Small-scale and immersive venues with a closed guest list and private shows. The word “clubbing” in Delhi is in the throes of being transformed, digitized, and individualizing for its nightlife. The ‘Nightfluencer’ Era Gone are days of DJ and celebrity swag; now, it’s the Nightfluencers: the TikTok stars, Instagram influencers, party hostesses, or kin, who sow the city’s energy next. Your Friday reel can become next Saturday’s crowd. Last Word: Delhi is the New After-Dark CapitalFor partying, views, swaying, or mere soaking in the madness—there happens to be something in Delhi for all kinds of tribes. From slick lounges to noisy rooftops, from disco to dirty tech; city is a 24-hour mixtape of energy. So next time when one is looking for a place to go for a night, just chuck the so-called famous ones and blindly follow where the night is alive. Delhi clubs are not mere party joints; they are playgrounds of identity, creativity, and happy go new beats. Pro Tip : Dress to impress. Book early. Have that power bank ready. When it comes to Delhi’s club scene, if you didn’t post it, did it happen?

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क़ुली खान का मकबरा– अंग्रेजों के ज़माने का पसंदीदा हनीमून डेस्टिनेशन

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पिछले साल अक्टूबर,2023 में दिल्ली के उपराज्यपाल वी.के. सक्सेना ने महरौली पुरातत्व पार्क के अंदर स्थित छह इमारतों  का जीर्णोद्धार के बाद उद्घाटन किया। इनमें से एक था कुली खान का मकबरा। दिल्ली के दक्षिण में स्थित महरौली पुरातत्विक उद्यान, क़ुतुब मीनार के पास फैला हुआ है। जैसे ही आप इसके अंदर प्रवेश करते हैं, दाईं ओर गुलाबों का एक बेहद खूबसूरत बगीचा नजर आता है और बाईं ओर हरे-भरे विशाल वृक्षों की हरियाली फैली रहती है। यह बगीचा ब्रिटिश काल में बनाया गया था। यहाँ बेहद खूबसूरत झील नजर आती है जिसे देखते ही सचमुच दिल बहुत प्रसन्न हो जाता है। शांतचित माहौल में पक्षियों की मधुर ध्वनि और झील में पानी पर पड़ती आसमान की परछाई को देखकर एकबार तो ऐसा लगेगा कि मानो जैसे आप जन्नत में आ गये हों। इस जगह को ‘बोट हाउस’ के नाम से भी जाना जाता है। कैफ़े स्टोन महरौली पार्क में आगे बढ़ते हुए, लगभग चार सौ मीटर चलने के बाद और कुछ सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद सबसे पहले बेहद खूबसूरत तरीके से डिजाईन किया गया कैफ़े स्टोन दिखाई देता है. यह गोलाकार स्मारक के रूप में बना हुआ है,  जो शाम के समय रंग बिरंगी लाइट्स में और भी सुंदर दिखाई देता है। इस कैफ़े में आप दो जगहों पर बैठकर प्रकृति और इतिहास दोनों का खूब आनंद ले सकते हैं- एक कैफ़े के अंदर और दूसरा बाहर लॉन में पेड़ों के नीचे। कहा जाता है कि इस कैफ़े को किसी जमाने में मेहमानों के लिए डाइनिंग हॉल के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था। यहां आपको हर तरह का लज़ीज़ खाना मिल जायेगा. यहाँ आप अपने दोस्तों और परिवार के साथ क्वालिटी टाइम बिता सकते हैं. दिल्ली में आपको इतनी शांत, एतिहासिक और हरियाली से संपन्न जगह शायद ही कहीं मिलें…. क़ुली ख़ाँ का मकबरा इस कैफ़े के सामने ही आपको क़ुली ख़ाँ का मकबरा दिखाई देगा. सफेद संगमरमर से बना यह मकबरा अपनी एक अनोखी पहचान रखता है। वैसे तो देश की राजधानी दिल्ली में बहुत से मशहूर और पुराने मकबरे हैं, इनमें से हम कुछ मकबरों के नाम से वाकिफ हैं, जो वक्त से साथ-साथ पर्यटकों के पसंदीदा स्थल भी बन गए हैं। और कुछ मकबरों के बारे में बहुत ही कम लोग जानते हैं. क़ुली ख़ाँ का मकबरा भी कोई बहुत ज्यादा फेमस नहीं है. शायद इसीलिए यहाँ आपको पर्यटकों की भीड़ दिखाई नहीं देगी. लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि मुगलों द्वारा बनवाए गए मकबरे होते ही खास है, जिसकी खूबसूरती से कोई इंकार नहीं कर सकता। इस मकबरे का अंतिम मुगल शासक बहादुर शाह के शासन काल में पुनर्निर्माण करवाया गया था। यह वो दौर था जब देश में ब्रिटिश हुकूमत थी, उस वक्त यहां के गवर्नर जनरल थॉमस मेटकॉफ थे। दिलकुशा मतलब दिल की ख़ुशी कुली खान के लिए मकबरे का निर्माण 17वीं सदी की शुरुआत में किया गया था। कुली खान अधम खान के भाई थे, जो मुगल सम्राट अकबर की आया महम अंगा के बेटे थे। मुख्यतः इस मकबरे को प्लास्टर से सजाया गया था। बाद में मेटकाफ ने लगभग 1853 में इसे एक रेजीडेंसी एरिया में बदल दिया था। इस पर गर्मियों के विश्राम स्थल में बदलने के लिए विक्टोरियन काल में मेटकॉफ ने बहुत ही विस्तृत रूप से काम करवाया था. मकबरे के चारों ओर के घेरे को छतों, जलकुंडों(झीलों) और मंडपों के साथ एक बगीचे में बदल दिया,  और नाम रखा गया था “दिलकुशा” या “हार्ट्स डिलाइट”- जिसका मतलब था दिल की खुशी। एक शिलालेख (गैलरी में पट्टिका की तस्वीर) से पता चलता है कि मेटकाफ ने इस घर को हनीमून मनाने वाले जोड़ों को किराए पर दिया था। क्योंकि यहाँ से कुतुबमीनार के विहंगम दृश्य दिखाई देते हैं. मकबरे की वास्तुकला कुली खान का यह मकबरा एक ऊंचे चबूतरे पर बनाया गया है, जो बाहर से त्रिकोण के शेप में है। मकबरे के मुख्यद्वार पर फारसी में कुरान की आयतें लिखीं हुई थीं, जो वक़्त के साथ लगभग अब धूमिल हो गई हैं। चबूतरे का व्यास लगभग 32.5 मीटर है और इसमें पाँच सीढ़ियाँ शामिल हैं, हालाँकि यह स्पष्ट नहीं है कि संरचना में कौन सी सीढ़ियाँ वास्तविक समय की हैं। क्योंकि मकबरे पर बाद में निर्माण कार्य किया गया. मकबरा खुद भी अष्टकोणीय है, जिसकी चौड़ाई 14 मीटर से थोड़ी ज़्यादा है, जिसमें प्रत्येक तरफ़ लगभग 6.3 मीटर का एक केंद्रीय चौकोर कक्ष है। यह संरचना अष्टकोणीय है। मकबरे की बाहरी दीवारों पर गचकारी प्लास्टर के डिजाइन बने हैं, जो कि फारसी आर्ट है। इसमें बारीकी से किया गया काम देखने लायक है। इसे बनाने के लिए नीले, हरे और पीले रंगों के चमकदार टाइल्स लगाए गए। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि यह मकबरा मुग़ल वास्तुकला का एक बेहतरीन नमूना है। सबसे शानदार और बारीक़ सजावट आंतरिक भाग के चार मेहराबदार प्रवेश द्वारों के आसपास की गई। प्रत्येक मेहराब के किनारे बेहद बारीक़ सुलेखित पट्टियाँ थीं, और मेहराबों और उनके आयताकार फ्रेम के बीच के रिक्त स्थान, ज्यामितीय पैटर्न या अरबी शिलालेखों वाले गोलाकार पदकों से सजाए गए थे। बाहरी आयताकार पट्टियों के चारों ओर विभिन्न रंगों में ज्यामितीय टाइलें लगी हुई थीं, दुर्भाग्य से, इनमें से अधिकांश टाइलें टूट गई हैं, और जो कुछ बची हैं वे बहुत घिस गई हैं, जिनमें से अब अधिकांश को फिर से उसी अंदाज़ में डेकोरेट किया गया है. आप जब इस मकबरे में जायेंगे तो आपको दिखेगा कि उसी जटिल कलाकारी को उम्दा तरीके से पुनर्जीवित किया गया है. अपने अनुभव के आधार पर हम कह सकते हैं की यह स्थान अपने आप में उन लोगों के लिए सच में अद्भुत है जो इतिहास के साथ-साथ प्रकृति प्रेमी भी हैं। आपको यहाँ से क़ुतुब मीनार भी नजर आएगा। यहाँ एक बड़ा लॉन भी बना हुआ है, जहाँ आप घंटों बिना किसी शोर-शराबे के बैठ सकते हैं। बेहद इत्मिनान से हरी घास पर बैठकर खुद को कुछ समय देना ऐसा लगता है जैसे पूरी दुनिया की थकान मिट गई हो। लेखको के लिए यह जगह ज़न्नत से कम नहीं. अगर आप इस स्थान का पूरा आनंद लेना चाहते हैं, तो हमारी सलाह होगी कि आप हमेशा आरामदायक जूते या चप्पल पहनकर आएं, ताकि बिना किसी असुविधा के यहाँ का आनंद

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ऐतिहासिक एवं सामरिक दृष्टिकोण से कुतुब मीनार

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“ऐसा क्या है जो दिल्ली शहर को खास बनाता है? वह कौन सी खासियत है जिसके कारण दिल्ली देश के बाकी राज्यों से अलग है? ऐसा क्या है दिल्ली शहर में जिसके कारण यह शहर देश की राजधानी है? इन सारे सवालों का जवाब है यहां का गौरवशाली इतिहास और उसकी गवाही देते यहां के बेहतरीन ऐतिहासिक इमारतें। इस शहर में दुनिया की सबसे अतरंगी और अद्भुत कलाकृतियां देखने को मिलती हैं। यह भारत का एकमात्र ऐसा शहर है जहां आपको एक या दो नहीं बल्कि हजार से भी अधिक ऐतिहासिक इमारतें देखने को मिलेंगी।”और दिल्ली के इन्हीं ऐतिहासिक इमारतों में से सबसे खास इमारत है महरौली स्थित कुतुब मीनार!(Qutub Minar) कुतुब मीनार (Qutub Minar) सुनहरें लफ़्ज़ों का इतिहासआज भी तेरे हर पत्थर, तेरी हर दीवार पर हैजो ख़ूबसूरती उस ज़माने में थीवही क़ातिलाना अदा आज क़ुतुब मीनार पर है। एक ऐसी मीनार जो ईट से बनी दुनिया की सबसे ऊंची मीनार है। एक ऐसा भव्य आकर्षण जिसे देखने के बाद आश्चर्य होना लाजमी है। एक ऐसी खूबसूरत इमारत जिसकी दीवारों पर कुरान पाक की आयतें गढ़ी गईं हैं और अंत में एक ऐसा साक्षी जो मुगल साम्राज्य के भारत में प्रसार का प्रत्यक्षदर्शी है। वैसे तो पूरी दिल्ली ही देखने के लिहाज़ से बहुत खास है पर इसकी कुछ नायाब इमारतों को देखे बिना दिल्ली दर्शन अधूरा है। क़ुतुब मीनार इन्हीं खास और नायाब जगहों में से एक है। इस बात में कोई शक नहीं कि मुगलों ने दिल्ली को खूबसूरत बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। शायद इसी का परिणाम है दिल्ली चारों दिशाओं से बेहद खूबसूरत मुगल इमारतों से सजी हुई है।  कुतुब मीनार का इतिहास (The History of Qutub Minar) दुनिया के सबसे विशालतम मीनारो में शामिल इस मीनार का इतिहास भी उतना हीं विशाल है। यह बात उस समय की है जब भारत में अफगानी आक्रमणकारियों का आगमन हुआ था। सबसे पहले मोहम्मद गोरी ने यहां अपनी हुकूमत स्थापित की। लेकिन गोरी नहीं यहां लंबे समय तक शासन नहीं किया। वह अपने सबसे विश्वासनीय गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक की हाथ में सत्ता की बागडोर देकर वह वापस लौट गया। तब तक भारत में दिल्ली सल्तनत की स्थापना नहीं हुई थी। भारत छोटे-छोटे रियासतों में बंटा हुआ था। वर्ष 1199 कुतुबुद्दीन ऐबक ने इस मीनार की नींव रखी। लेकिन यह मीनार एक ही बार में बनकर तैयार नहीं हुआ, बल्कि इसे किश्तों में अलग-अलग मुगल शासकों द्वारा बनवाया गया था।कुतुबुद्दीन ऐबक इस मीनार की पहली मंजिल का ही निर्माण करवा पाया। उसकी मौत के बाद उसके दामाद इल्तुतमिश ने कुतुब मीनार की दूसरी तीसरी और चौथी मंजिलों का निर्माण करवाया। इस मीनार की अंतिम मंजिल के निर्माण का श्रेय फिरोज शाह तुगलक को दिया जाता है। अब क्योंकि यह मीनार किश्तों में बनकर तैयार हुआ था इसलिए आप इस मीनार पर 12वीं सदी से 14वीं सदी तक मुगलकालीन स्थापत्य कला में आए बदलावों को भी साफ-साफ देख सकते है। कुतुब मीनार की संरचना (The Structure Of Qutub Minar) इस मीनार की सबसे पहली मंजिल के दीवारों को 12 गोल तथा 12 टिकों ने पिलरों से बनवाया गया है तथा इसके ऊपर पट्टियों में नक्काशियां की गई हैं। जब आप इन नक्काशीयों को गौर से देखेंगे आपको इनमें ज्यामितीय संरचनाओं, फूलों, अल्लाह के नामों तथा कुरान की आयतों के अंश देखने को मिलेंगे। इतना हीं नहीं, कुतुबुद्दीन ऐबक ने इनमें मोहम्मद गोरी का भी गुणगान किया है। ऐबक ने इन नकाशियों में अपने बारे में भी बहुत कुछ लिखवाया है। कुतुबुद्दीन ऐबक के बाद इल्तुतमिश के द्वारा बनवाए गए अगले तीन मंजिलों में से दूसरी मंजिल की दीवार को गोल पिलर से किया गया है। इल्तुतमिश ने तीसरी मंजिल के दीवार को तिकोने पिलरों के सहायता से बनवाया गया है, जबकि चौथी मंजिल की दीवार सपाट गोल है। इल्तुतमिश ने अपने द्वारा बनवाई गई तीनों मंजिलों की दीवारों पर बनी पट्टियों में अपने बारे में खुदवाने के साथ-साथ कुरान पाक की आयत और फूल बेलों की नक्काशियां भी करवाई है।कहा जाता है कि 13वीं और 14वीं शताब्दी में आए भूकंप और बिजली गिरने के कारण इस मीनार के ऊपरी महलों को काफी क्षति पहुंची थी। जिनकी मरम्मत करवाते हुए फिरोज शाह तुगलक ने 1368 ईस्वी में इस मीनार के अंतिम महले का निर्माण करवाया था। अगर कुल मिलाकर कुतुब मीनार के लंबाई तथा चौड़ाई की बात की जाए तो इस पांच मंजिली भव्य इमारत की लंबाई 72.5 मीटर है। इस विशाल मीनार के आधार का विकास 14.3 मीटर तथा ऊपरी सिरे का व्यास 2.75 मीटर है।कुतुब मीनार के सभी मंजिलों पर दरवाजे बनवाए गए हैं जिनसे मीनार के छज्जे पर जाया जा सकता है। इन सभी दरवाजों को एक सीध में बनवाया गया है तथा इन सभी दरवाजों तक पहुंचाने के लिए कुतुब मीनार में पूरे 379 सीढ़ियां हैं। पूरा कुतुब मीनार परिसर 13 अलग-अलग व्यूपोइंट्स में बंटा हुआ है। हम में से ज्यादातर लोग मुख्य कुतुब मीनार और लौह स्तम्भ से ही वाकिफ़ हैं पर और भी बहुत कुछ है अपनी नक़्क़ाशी के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध क़ुतुबमीनार के इस परिसर में। परिसर में घुसते ही सबसे पहले नजर आती है काली गुबंद वाली मस्जिद। अंदर आते ही सबसे पहले इस मस्जिद पर ही नजर पड़ती है। आगे बढ़ने पर विशिष्ट मुगल शैली के बगीचें दिखाई देते हैं  जो कि मुगलों की प्रसिद्ध चार बाग की शैली में बने हैं। ये चार बाग शैली किसी भी इमारत में जान डाल देती है। प्रसिद्ध मुगल इमारतों में बागों की इसी शैली का प्रयोग किया जाना आम बात है। मीनार के पास मण्डप जैसी दिखने वाली संरचना को कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद कहा जाता है। ये जानकारी पास लगे सूचना बोर्ड से ही मिली अन्यथा हम तो इसे एक सामान्य मण्डप भर समझ रहे थे। इस मस्जिद की स्थापना कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1190 के दशक में की थी। इस मस्जिद की खासियत इसकी स्थापत्य कला है। इंडो इस्लामिक शैली से बनी ये मस्जिद और इसकी नक्काशी एक बार तो आपको दीवाना ही बना देगी। नक्काशीदार स्तंभो पर खड़ी यह मस्जिद बनावट के मामले में बेहतरीन है। अगर यूं कहें कि कुतुब मीनार परिसर की शोभा बढ़ाने में इस मस्जिद का भी अमूल्य योगदान है, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। कुतुब मीनार

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रक्श से लेकर राज तक,विवादों से भरा था कुदसिया बाग की बेगम कुदसिया का सफर

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क्या कहता है इतिहास?(What is the history of Qudsia Bagh?)इतिहासकारों और दिल्ली सरकार के डिपार्मेंट ऑफ़ आर्कियोलॉजी (Department of archaeology) के हिसाब से इस बगीचे का निर्माण 1748 में करवाया गया था। बताया जाता है कि कुदसिया बेगम एक नर्तकी थीं जो मुगल बादशाह (Mughal Emperror) मोहम्मद शाह के दरबार में रक्श पेश किया करती थीं। उनकी खूबसूरती और नृत्य कला से मुगल बादशाह इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कुदसिया बेगम से निकाह कर लिया। बताया जाता है कि कुदसिया बेगम लाल किले के चहल पहल वाली जिंदगी से दूर सुकून से रहना चाहती थीं और उनकी इसी इच्छा को ध्यान में रखते हुए उनके बेटे अहमद शाह ने इस बाग का निर्माण करवाया था। यह बाग कश्मीरी गेट के पास सिविल लाइंस के इलाके में पड़ता है। जहां उस समय यमुना नदी की धारा बहती थी। इस बगीचे में एक प्रवेश द्वार, एक मस्जिद और एक बावड़ी के अतिरिक्त कई सारी मेहराबें हैं। इतिहासकारों के मुताबिक यहां कई सारी इमारतें थी जिन्हें स्वतंत्रता संग्राम के समय अंग्रेजों द्वारा ध्वस्त किया कर दिया गया था। यहां के मस्जिदों में आज भी नियमित तौर पर नमाज अदा किया जाता है। अब इस पार्क का नाम बदल कर महाराणा प्रताप वाटिका(Maharana Pratap Vatiika) रख दिया गया है। कुदसिया बेगम का व्यक्तिगत जीवन : अगर बात करें कुदसिया बेगम के व्यक्तिगत जीवन के बारे में तो बताया जाता है कि उनका जन्म मूल रूप से एक हिंदू परिवार में हुआ था और उनका नाम उधम बाई था। कुदसिया बेगम को अपने जीवन काल में बाई-जू साहिबा, नवाब कुदसिया, साहिबा-उज़-ज़मानी और मुमताज महल जैसे कई प्रकार के उपनामों से भी नवाजा गया था। हालांकि कुदसिया बेगम का जीवन बहुत विवादित माना जाता है, क्योंकि बताया जाता है कि उनका संबंध उन्हीं के हरम के प्रबंधक जावेद खान नवाब बहादुर के साथ था जो एक किन्नर था। उनके इस संबंध के बारे में यह भी कहा जाता है कि जब 1752 में जावेद खान नवाब बहादुर को सफदर जंग ने मार दिया तो कुदसिया बेगम ने उनकी हत्या पर न सिर्फ शोक जताया बल्कि अपने गहनों को भी त्याग दिया और सफेद वस्त्र को धारण कर लिया।कुदसिया बेगम बहुत हीं खर्चीली और उदार किस्म की व्यक्ति थीं। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब महल में सैनिकों के तनख्वाह के बकाया को भुगतान करने के लिए दो लाख रुपए भी इकट्ठा नहीं किए जा सके, तब उन्होंने सिर्फ अपना जन्मदिन मनाने के लिए दो करोड़ रुपए खर्च कर दिए। 26 मई 1754 को मल्हार राव होल्कर ने अहमद शाह बहादुर को हरा दिया था। इसके बाद कुदसिया बेगम सिकंदराबाद छोड़कर दिल्ली भाग कर आ गईं। लेकिन मल्हार राव होलकर ने दिल्ली तक उनका पीछा किया और अहमद शाह बहादुर के साथ-साथ कुदसिया बेगम की भी आंखें निकलवा दी। क्या है इस बाग की खासियत?(What is the specialty of this garden?) अगर बात करें इस बाग के खासियतों के बारे में तो आपको इस बाग में न सिर्फ मुगल इतिहास देखने को मिलेगा, बल्कि पारसी स्थापत्य कला के नमूने भी देखने को मिल जाएंगे। इस बाग में एक बारहद्वार वाला महल है जो इसका सबसे मुख्य आकर्षण माना जाता है। इसके अतिरिक्त इस बाग में एक मस्जिद भी है जहां प्रतिदिन नियमित तौर पर नमाज अदा किया जाता है। यहां के मस्जिद में नमाज की टाइम टेबल भी लगाई गई है। हालांकि अंग्रेजी सरकार के बमबारियों के कारण इस मस्जिद का काफी नुकसान हो चुका है, लेकिन अभी भी आप यहां उस समय के स्थापत्य कला के नमूने देख सकते हैं। यहां की मेहराबों पर की गई महीन नक्काशियां लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में सक्षम हैं।इस बाग के दरवाजे इतने बड़े-बड़े हैं कि उनमें से हाथी भी गुजर सकते हैं। बताया जाता है कि इन दरवाजों को हाथियों के गुजरने के लिए हीं बनाया गया था। आपको इस बाग में एक ऐसा स्थान भी देखने को मिलेगा, जहां पर हाथियों को बांधा जाता था।इस बाग में एक ओपन जिम भी है। जहां पर आप एक्सरसाइज कर सकते हैं। साथ हीं इस बाग में बच्चों के लिए एक छोटे से पार्क की व्यवस्था भी है। जहां बहुत से अलग-अलग प्रकार के झूले लगाए गए हैं। यहां बैठने की भी बहुत ही अच्छी व्यवस्था की गई है और इस पार्क के साफ-सफाई का भी बहुत हीं अच्छे से ध्यान रखा जाता है। क्या है कुदसिया बाग की टाइमिंग?(What is the timing of Qudsiya Bagh?) जहां अधिकतर हॉन्टेड जगहों की टाइमिंग फिक्स होती है और वहां 5:00 के बाद लोगों को जाने नहीं दिया जाता है, वहीं कुदसिया बाग उन सभी हॉन्टेड जगहों से थोड़ा अलग है।अगर बात करें कुदसिया बाग के टाइमिंग (Qudsia Bagh timings) की तो यह चौबीसो घंटे खुला रहता है। यानी कि यहां पर आप कभी भी आ जा सकते हैं। इस बाग में आने जाने की कोई पाबंदी नहीं है और ना हीं आपको इस बाग में आने के लिए किसी भी प्रकार के टिकट (Qudsia Bagh ticket price) की आवश्यकता होगी। कैसे पहुंचे कुदसिया बाग?(How to reach Qudsia Bagh?)अगर आप कुदसिया बाग आना चाहते हैं तो इसके लिए आपको सबसे पहले कश्मीरी गेट पहुंचना होगा। आप अपनी इच्छा अनुसार बस या फिर मेट्रो से कश्मीरी गेट (Which metro station is near to Qudsiya Bagh) पहुंच सकते हैं। कश्मीरी गेट पहुंचने के बाद आप वहां से 700 मीटर पैदल चलकर इस बाग तक पहुंच जाएंगे। आप चाहे तो कश्मीरी गेट से ई-रिक्शा भी ले सकते हैं। आपको इस बाग में अपनी गाड़ी से भी आ सकते हैं। यहां पार्किंग की बहुत अच्छी व्यवस्था की गई है। जब हमने इस बाग को एक्सप्लोर किया और पूरी तरह से छानबीन की तो हमें इस बाग में ऐसा कुछ हाउंटेड नहीं दिखा। बल्कि हमें इस बाग में आकर बहुत हीं सुकून का अनुभव हुआ और हमारे हिसाब से आप भी बिना डरे इस बाग में घूमने जा सकते हैं। यकीनन आपको भी यहां पर बहुत हीं अच्छा महसूस होगा।

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रंग-बिरंगे फूलों से सजा डीयू का नॉर्थ कैंपस, जानिए इस बार के फ्लावर शो की खास बातें

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अगर कोई आपसे पूछे कि, वो कौन सा मौसम है, जिस मौसम में आपका दिल जी भर के जीने को करता है तो, आप में से अधिकतर लोगों का जवाब होगा वसंत! और यह जवाब लाजमी भी है। जिस तरह मनुष्य के जीवन का सबसे खूबसूरत पड़ाव यौवन होता है उसी तरह वसंत ऋतु प्रकृति का यौवन है। यह वह समय होता है जब प्रकृति खूबसूरत फूलों की चादर ओढ़ लेती है। यह वह खूबसूरत मौसम होता है जब चारों ओर फूल हीं फूल देखने को मिलते हैं। इस साल भी वसंत का आगमन हो चुका है और पूरे भारत वर्ष में वसंत के आगमन पर अलग-अलग त्यौहार मनाए जा रहे हैं, ऐसे में हमारी राजधानी दिल्ली कैसे पीछे रह सकती है? राजधानी दिल्ली में भी वसंत ऋतु के आते हीं कई जगह फ्लावर एग्जिबिशंस लगने शुरू हो जाते हैं। और ऐसी ही एक प्रदर्शनी होती है दिल्ली यूनिवर्सिटी का फ्लावर शो (Flower Show of Delhi University)! आज के फाइव कलर्स ऑफ ट्रेवल के इस ब्लॉग में हम दिल्ली यूनिवर्सिटी के इस फ्लावर एग्जिबिशन को एक्सप्लोर करेंगे और आपको दिखाएंगे इस फ्लावर एग्जिबिशन के कुछ खूबसूरत नजारे! यकीनन आप इन खूबसूरत तस्वीरों को इग्नोर तो बिल्कुल भी नहीं कर पायेंगे। क्या है दिल्ली यूनिवर्सिटी का फ्लावर शो (What is the flower show of Delhi University)? हर साल दिल्ली विश्वविद्यालय में वसंत के आगमन पर इस फ्लावर शो का आयोजन किया जाता है, जो यूनिवर्सिटी के बच्चों के लिए काफी एक्साइटिंग होता है। इस साल यह फ्लावर एग्जिबिशन 1 मार्च से लग रहा है और इस साल के दिल्ली यूनिवर्सिटी के फ्लावर शो की थीम है Women Nurturing Nature – A Celebration of Synergy and Sustainability इस फ्लावर एग्जिबिशन में आपको डेकोरेटिव प्लांट्स और फूलों की 100 से भी अधिक वैराइटीज देखने को मिलेंगी। डियू के नॉर्थ केंपस के बुद्धा गार्डन में लगने वाला यह फ्लावर एग्जिबिशन हर साल हजारों की संख्या में विजिटर्स को अपनी ओर आकर्षित करता है। क्या है इन फ्लावर्स की खासियत (What is the specialty of these flowers)? यहां की सबसे खास बात यह है कि इन प्लांट्स को दिल्ली यूनिवर्सिटी के विभिन्न विभागों और कॉलेजो द्वारा हीं उगाया जाता है। इस फ्लावर शो के जरिए अलग-अलग कॉलेज को प्लेटफार्म दिया जाता है जहां वह अपने गार्डनिंग के स्किल्स को दिखाकर बेस्ट गार्डनिंग का खिताब जीत सकते हैं। क्या है इस फ्लावर शो का मकसद (What is the purpose of this flower show)? इस फ्लावर शो के जरिए दिल्ली यूनिवर्सिटी विद्यार्थियों के भीतर पर्यावरण के प्रति प्रेम और संरक्षण का भाव जगाने का प्रयास करती है। इस फ्लावर शो की सबसे अच्छी बात यह है कि आप इन प्लांट्स को खरीद भी सकते हैं। यहां आपको बहुत हीं सस्ते में डेकोरेटिव प्लांट्स और फ्लोरल प्लांट्स मिल जाएंगे। विजिटर्स के लिए है ढे़रों ऑप्शंस (There are many options for visitors) इस फ्लावर एग्जिबिशन में प्लांट्स के अतिरिक्त होम डेकोर के भी स्टॉल्स लगाए जाते हैं, जहां से आप अलग-अलग डेकोरेटिव आइटम्स भी खरीद सकते हैं।अगर इस खूबसूरत से गार्डन में घूमते घूमते आपको भूख लग जाए तो उसके लिए भी आपको चिंता करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि यहां आने वाले विजिटर्स के लिए फूड स्टॉल्स की भी व्यवस्था की जाती है। हमने यहां लगे ऐसे ही एक स्टॉल की ऑनर से भी बातें की और उनसे उनके इस एग्जीबिशन के अनुभव के बारे में जाना। कई तरह के प्रतियोगिताओं का होता है आयोजन (Many types of competitions are organized) इस फ्लावर एग्जिबिशन में पोस्टर मेकिंग, फोटोग्राफी, श्लोगन लेखन जैसे और भी कई तरह के कंपटीशंस आयोजित करवाए जाते हैं। अगर आप भी दिल्ली एनसीआर के आसपास रह रहे हैं तो आप भी इस फ्लावर शो को एक बार एक्सप्लोरर जरूर कीजिए। यह फ्लावर शो बहुत ही खूबसूरत और मनभावन है। आपको यहां आकर जरूर हीं बहुत अच्छा लगेगा।

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पर्यटकों को खूब लुभाता है ये दिल्ली का मीना बाजार

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आई हो कहाँ से गोरी आंखों में प्यार लेके,दिल्ली शहर का पूरा मीना बाजार लेके,,,,, इस गाने के बोलने जिस तरह से दिल्ली शहर के मीना बाजार का जिक्र किया गया है वह अपने आप में हीं दिल्ली के मीना बाजार को मुकम्मल तरीके से कहानी के रूप में बयां करता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है यह जो दिल्ली शहर का मीना बाजार है वह आखिर दिखता कैसा है और इसे कब और क्यों बसाया गया था? दिल्ली वासियों के लिए तो यह आम बात है, लेकिन दिल्ली से बाहर रहने वाले लोग इस बात को लेकर जरूर उत्सुक होते होंगे कि आखिर दिल्ली शहर का यह मीना बाजार दिखता कैसा है? तो आज के फाइव कलर्स ऑफ ट्रैवल के इस ब्लॉग में हम आपको दिल्ली शहर के मीना बाजार के बारे में बताएंगे। लाल किला के सामने लगने वाला यह बाजार हर तरह के शॉपिंग करने वाले लोगों के लिए एक अच्छा ऑप्शन होता है। क्योंकि यहां हर तरह के समान आपको मिल जाएंगे। चाहे फिर इलेक्ट्रॉनिक्स की बात हो या फिर डेकोरेटिव आइटम्स की, हर तरह के खरीदारी के लिए यह मीना बाजार परफेक्ट है। इस बाजार को छाता बाजार भी कहा जाता है। चलिए इस बाजार के बारे में जानते हैं और जानते हैं कि यहां से आप किस तरह की शॉपिंग कर सकते हैं। दूर से हीं दिखने लगते हैं गहनों के दुकान : इस मीना बाजार को बसाने का उद्देश्य हीं मुगल राजकुमारियों का मनोरंजन था। इसलिए इस मीना बाजार में हर तरह के गहने और साथ सजावट के समान मिलते थे और आज भी आपको मीना बाजार में यह सारे सामान देखने को मिल जाएंगे। यहां आपको हर वैरायटी की चूड़ियां झुमके बालियां और गहने खरीदने को मिल जाएंगे। यहां गहनों की इतनी वैरायटी है कि उन्हें देखकर आप खुद हीं यह डिसाइड नहीं कर पाएंगे कि कौन सा लेना है? क्लासी लेडीज पर्स (Classy Ladies Purse in Chhata Bazaar) यहां आपको बहुत ही बढ़िया क्वालिटी के जरी और मोती के वर्क वाले पर्स देखने को मिल जाएंगे जो किसी भी लूक में चार चांद लगाने का काम करते हैं। ऐसे में आप यहाँ से बहुत अच्छे-अच्छे और यूनिक क्वालिटी के पर्स को परचेस कर सकते हैं। आपको भी तरह-तरह के क्लच रखने का शौक है तो यहां क्लच के मामले में भी बहुत सारी वैराइटीज उपलब्ध है। जो यहां आने वाले महिला पर्यटकों के लिए खास आकर्षण बनते हैं एंटीक कलेक्शन (Antique Collection of Chhata Bazaar) अगर आपको भी अपने घरों को पुराने और एंटीक चीजों से सजाने का शौक है और आप भी बहुत सारे रंग-बिरंगे शोपीसेज से अपने आशियाने को और भी खूबसूरत बनाना चाहते हैं तो इस बाजार में आपको ऐसे कई सारे एंटीक ऑब्जेक्ट्स मिल जाएंगे जिन्हें आप अपने घर में सजा सकते हैं और घर की खूबसूरती को बढ़ा सकते हैं। अगर आप किसी के लिए एक परफेक्ट गिफ्ट की तलाश कर रहे हैं तो यहां मिलने वाले एंटीक पीस आपके लिए एक बेहतरीन गिफ्ट बन सकते हैं। क्लासिक शॉल (Classic Shawl in Chhata Bazaar) अगर आप भी अपने फैशन के साथ एक्सपेरिमेंट करना पसंद करते हैं तो आपके वार्डरोब में शॉल की उपस्थिति अनिवार्य हो जाती है। मीना बाजार में आपको बहुत सारे ऐसे दुकान मिल जाएंगे जहां आपको हर तरह के शॉल देखने को मिल जाएंगे। सर्दियों का मौसम शुरू होने वाला है ऐसे में शॉल फैशन ट्रेंड में आने वाले हैं। इस समय शॉल लेना आपके लिए दोहरे फायदे का काम हो सकता है और मीना बाजार में आपको बहुत ही अच्छी क्वालिटी के शॉल देखने को मिल जाएंगे। बच्चों के खिलौने (Children’s Toys in Chhata Bazaar) अब किसी बाजार का जिक्र हो और वहां बच्चों के खिलौने ना हो तो वह बाजार, बाजार नहीं हो सकता। अगर आप भी लाल किला आ रहे हैं और आपके साथ बच्चे भी हैं तो, आप उनके लिए भी बहुत अच्छी खरीदारी कर सकते हैं। यहां आपके बच्चों के बहुत सारे खिलौने जैसे रुबिक्स क्यूब्स, पजल्स और भी अतरंगे खिलौने देखने को मिल जाएंगे। यहां से आप अपने बच्चों के लिए गिफ्ट के तौर पर खिलौने भी ले जा सकते हैं।