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जानिए GT टैग वाली भारतीय साड़ियों के बारे में, दुनिया भर में हैं मशहूर

जब भी हम भारत में महिलाओं के पहनावे के बारे में बात करते हैं, तो सबसे पहले जिसका ज़िक्र हमारे जेहन में आता है वो है साड़ी। साड़ी सिर्फ़ भारतीय होने का एहसास नहीं दिलाती, बल्कि साड़ी एक ऐसा फ़ैशन रहा है जो कभी भी आउट ऑफ़ फ़ैशन नहीं हुआ। चाहे 90s का दौर रहा हो या 2025, साड़ी हमेशा ट्रेंडिंग रहीं, क्योंकि साड़ी पुराने समय में भी जिस शौक और स्टाइल से पहनी जाती थी, आज भी उसी स्टाइल और उस ही शौक से लोग इसे पहनना पसंद करते हैं। और इसी को देखते हुए आज हम बताएँगे दुनिया भर में मशहूर GT टैग वाली साड़ियों के बारे में जिनकी खूबसूरती ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।

तो आइए जानते है वो कौन सी साड़ीयां है जिन्होंने पूरी दुनिया में जादू फैला दिया है!?

पटोला साड़ी जो पूरे देश में सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली साड़ियों में से एक है। पटोला साड़ी गुजरात के पाटन की एक मशहूर हाथ से बनी साड़ी है, जिसे डबल इक्कत बुनाई टेक्निक से बनाया जाता है। यह साड़ी रेशम के धागों से हाथ से बना कर तैयार की जाती है, जिसमें इसके अंदर बहुत ही ट्रिकी डिजाइन और रंगों का उपयोग किया जाता है। पटोला साड़ी की बुनाई के प्रोसेस में बहुत टाइम लगता है और एक साड़ी बनाने में महीनों लग जाते हैं। और इसी खासियत के कारण 2013 में इसे GT टैग दिया गया।

GT टैग

बनारसी साड़ी के बारे में तो सबने ही सुना है क्योंकि भारत की शान बनारसी साड़ियों को ही माना जाता है। बनारसी सिल्क साड़ी भारत की सबसे फेमस साड़ियों में से एक है और यह यूपी के वाराणसी में हाथ से बनाई जाती है। इसमें जरी यानी सोने-चांदी की धागों का उपयोग करके इसकी बुनाई की जाती है। बनारसी साड़ियों में आपको मुगल और भारतीय डिजाइनों का एक अनोखा मिक्सर देखने को मिलता है। यहां के लोगों की मेहनत और साड़ियों की ऑथेंटिसिटी को देखते हुए 2009 में सरकार ने बनारसी सिल्क साड़ियों को GT टैग दिया, जिससे यह सुनिश्चित हुआ कि केवल बनारसी क्षेत्र में बनी साड़ियां ही बनारसी सिल्क साड़ी कहलाएंगी

अगर कभी बिहार की बात आए और बिहार की तसर सिल्क साड़ी की बात न हो तो बात कुछ अधूरी लगती है, क्योंकि यही वह साड़ी है जो नेचुरल सिल्क से बनी होती है। इसमें जंगली रेशम के कीड़ों का प्रयोग होता है और यह साड़ी झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल के आदिवासी इलाकों में ही बनाई जाती है। इस साड़ी को नॉन-वॉयलेंट सिल्क भी कहा जाता है क्योंकि इसे बनाने के लिए रेशम के कीड़े को मारना नहीं पड़ता। तसर सिल्क साड़ियां नेचुरल रंग और मोटी बनावट के लिए जानी जाती हैं, और इसे भी 2009 में GT टैग मिला, जिससे इसका संरक्षण सुनिश्चित हुआ।

 तंगेल साड़ी, जो कि पिछले ही साल GT टैग में शामिल हुई है, पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद और नदिया जिले में बुनी जाती है। जी हां, यह साड़ी आम साड़ी की तरह नहीं बल्कि बुनकरों द्वारा खास तरीके से तैयार की जाती है। इसे बनाने के लिए हथकरघा (हैंडलूम) का प्रयोग किया जाता है, जिन पर हाथ से बनी बुट्टियां बनाई जाती हैं। इन पर बहुत ट्रिकी डिजाइन, वाइब्रेंट रंग और मजबूत बनावट इन साड़ियों को बेहद खास बनाते हैं

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