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काजीरंगा नेशनल पार्क घूमने का है प्लान तो जानिए टूर पैकेजों के इन ऑपशंस के बारे में

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असम के सोनितपुर जिले में स्थित काजीरंगा नेशनल पार्क एक सिंग वाले गैंडे के लिए पूरी दुनिया भर में जाना जाता है। असम का यह काजीरंगा नेशनल पार्क हमेशा से हीं पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता रहा है। यह नेशनल पार्क 430 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है और पूरे भारत में पाए जाने वाले 90% गैंडे काजीरंगा नेशनल पार्क में ही पाए जाते हैं। लेकिन काजीरंगा नेशनल पार्क इन गैंडों के अतिरिक्त अन्य कई जानवरों का आशियाना है। जिनमें मुख्यतः बाघ, हाथी, पैंथर, जंगली भैंसे, भालू और अन्य कई प्रकार की पक्षियाँ शामिल हैं। काजीरंगा नेशनल पार्क में जंगल सफारी (Jungle Safari in Kaziranga National Park) काजीरंगा नेशनल पार्क के चार रेंज हैं। जिनमें सबसे पहला है वेस्टर्न रेंज, जिसे बागरी रेंज के नाम से भी जाना जाता है। सेंट्रल रेंज को कोहरा रेंज कहा जाता है। पूर्वी रेंज को अगरतोली रेंज के नाम से पुकारा जाता है। बुरापहाड़ रेंज का कोई दूसरा उपनाम नहीं है। अगर आप भी काजीरंगा नेशनल पार्क का टूर करना चाहते हैं तो इसके लिए यहां चार तरह के टूर पैकेज उपलब्ध हैं। 1. काजीरंगा फन टूर 1 जीप सफार:- टूर पैकेज 2 दिन और एक रात का है, जिसका टूर प्लानर कुछ इस प्रकार का होगा:- पहला दिन (गुवाहाटी से काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान) यात्रा के पहले दिन आप गुवाहाटी पहुंचेंगे और काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के लिए निकल जाएंगे। जहां पहुंचकर आप जंगल के रिजॉर्ट में चेक इन करेंगे। दोपहर के समय आपको भोजन उपलब्ध करवाया जाएगा। दोपहर का खाना खाकर आप काजीरंगा नेशनल पार्क के वेस्टर्न रेंज यानी बागोरी रेंज और केंद्रीय रेंज यानी कोर रेंज में जीप सफारी के लिए जाएंगे। आपको रात इसी रिसोर्ट में बितानी होगी। दूसरा दिन (काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान से गुवाहाटी) सुबह के समय काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के सेंट्रल रेंज यानी कोहरा रेंज और वेस्टर्न रेंज यानी बागोरी रेंज में हाथी की सफारी के लिए निकल जाएं। एलिफेंट सफारी के बाद आप काजीरंगा ऑर्किड पार्क घूमने के लिए चले जाएंं। यहां आपको ऑर्किड की 500 से भी अधिक अलग-अलग तरह की प्रजातियां देखने को मिलेगी। इसके अलावा भी आप यहां 132 अलग-अलग तरह की पत्तेदार सब्जियों की वैरायटी और बेत की 12 प्रजातियों को एक्सप्लोर कर सकते हैं। इसके बाद आप असम के खूबसूरत चाय के बागानों का दौरा करने जाएंगे। चाय के बागानों में घूमने के बाद आप गुवाहाटी हवाई अड्डा के लिए निकल जाएंगे। इसके बाद आपकी यात्रा समाप्त हो जाएगी। 2. जीप और हाथी सफारी के साथ काजीरानागा मनोरंजन यात्रा:- यह टूर पैकेज तीन दिनों और दो रातों का होगा। पहला दिन (गुवाहाटी से काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान) पहले दिन आप गुवाहाटी हवाई अड्डे या फिर गुवाहाटी रेलवे स्टेशन से काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के लिए निकलेंगे। जहां पहुंचकर आप रिजॉर्ट में चेक इन करेंगे और शाम को इधर-उधर टहलने के बाद रात को रिजॉर्ट में हीं आराम करेंगे। दूसरा दिन (काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान)दूसरे दिन सुबह के समय काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के पश्चिमी और केंद्रीय रेंज में हाथी सफारी के लिए निकल जाएंगे। हाथी सफारी के बाद आप काजीरंगा ऑर्किड पार्क का दौरा करेंगे। जहां आप 500 से भी अधिक प्रकार की ऑर्किड के प्रजातियों का निरीक्षण करेंगे और इसके अलावा खट्टे फलों और पत्तेदार सब्जियों की कई प्रजातियों के बारे में भी जानेंगे और समझेंगे। ऑर्किड पार्क से लौट कर असम के चाय बागानों के दौरे के लिए निकल जाएंगे। इसके बाद आप दोपहर में लौट कर आएंगे और भोजन करके काजीरंगा के केंद्रीय रेंज में जीप सफारी के लिए चले जाएंगे। जीप सफारी के बाद वापस रिजॉर्ट लौट कर वहीं रात को आराम करेंगे। तीसरा दिन (काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान से गुवाहाटी) अगले दिन आप पहले सुबह नाश्ता करने के बाद गुवाहाटी हवाई अड्डा या रेलवे स्टेशन के लिए निकल जाएंगे। इसके बाद आपकी यात्रा समाप्त हो जाएगी। 3. काजीरंगा हॉलिडे टूर:- यह टूर पैकेज तीन रातों और चार दिनों का है। पहला दिन (गुवाहाटी से काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान)यात्रा के पहले दिन आप गुवाहाटी रेलवे स्टेशन या फिर हवाई अड्डा से काजीरंगा नेशनल पार्क के लिए आगे बढ़ेंगे। नेशनल पार्क पहुंचकर आप वहीं के जंगल रिजॉर्ट में चेक इन करेंगे और रात को यहीं आराम करेंगे। दूसरा दिन (काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान)अगले दिन आप सुबह नाश्ता करने के बाद काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के पश्चिमी क्षेत्र यानी बागोरी और केंद्रीय क्षेत्र यानी कोहरा रेंज में हाथी की सफारी का आनंद लेंगे। इस दिन आप भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों को जानने और समझने के लिए काजीरंगा नेशनल पार्क को एक्सप्लोर करेंगे। यहां आप ऑर्किड पार्क के विजिट के लिए भी जा सकते हैं। जहां आपको 500 से अधिक तरह की और किट की प्रजातियां देखने को मिलेगी। इसके अलावा आप काजीरंगा में 132 प्रकार की पत्तेदार सब्जियों की प्रजातियां और 46 प्रकार के बँसो की प्रजातियां को करीब से देखेंगे और उनके बारे में जानेंगे। तीसरा दिन (काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान) सुबह नाश्ता करने के बाद आप काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के पूर्वी रेंज में जीप सफारी के लिए जाएंगे इसके बाद आप काजीरंगा नेशनल पार्क के पास बसे हुए आदिवासी गांव कार्बी का दौरा करेंगे और कार्बी के लोगों की ग्रामीण जीवन शैली के बारे में जानने और समझने का प्रयास करेंगे। कार्बी गांव से लौटकर आप दोपहर का भोजन करेंगे और फिर काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के केंद्रीय रेंज में जीप सफारी के तीसरे दौर के लिए चले जाएंगे। फिर रात में जंगल रिजॉर्ट में आराम करेंगे चौथा दिन (काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान से गुवाहाटी) यह आपके इस सफर का आखिरी दिन होगा। जहां आप सुबह नाश्ता करने के बाद नेशनल पार्क से गुवाहाटी हवाई अड्डा या फिर रेलवे स्टेशन के लिए निकल जाएंगे। आपकी यात्रा यहीं समाप्त हो जाएगी। 4. काजीरंगा शिलांग यात्रा:- यह टूर पैकेज चार रातों और पाँच दोनों का होगा। पहला दिन (गुवाहाटी से काजीरंगा नेशनल पार्क) इस टूर पैकेज का पहला दिन भी बाकी के टूर पैकेज की तरह ही होगा। जिसमें आप गुवाहाटी से काजीरंगा नेशनल पार्क की ओर आएंगे और जंगल रिसॉर्ट में चेकिंग करके वही रात को आराम करेंगे। दूसरा दिन काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान सुबह के समय आप काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के बागोरी और कोहरा रेंज में हाथी के सफारी के लिए जाएंगे। हाथी के सफारी से लौट

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एक ऐसा राष्ट्रीय उद्यान जो भारत और भूटान दोनों देशों में फैला हुआ है

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असम के मानस नदी के तट पर स्थित मानस नेशनल पार्क भारत और भूटान दोनों हीं देश में फैला हुआ है। मानस नदी भारत और भूटान के बॉर्डर पर बहती है, जिसके दोनों ओर घने जंगल बसे हैं। भारत में इस जंगल के भूभाग को मानस नेशनल पार्क के नाम से जाना जाता हैं। वहीं भूटान में फैले जंगल के क्षेत्र को रॉयल मानस नेशनल पार्क के नाम से जाना जाता है।मानस नेशनल पार्क में वाइल्डलाइफ की बहुत सारी प्रजातियां आपको देखने को मिलेंगी। नॉर्थ ईस्ट में फेवरेबल कंडीशन होने के कारण यहां रिच बायोडायवर्सिटी देखने को मिलती है और यहीं वजह है कि यहां कई सारे नेशनल पार्क्स हैं। असम का यह मानस नेशनल पार्क पर्यटकों के बीच बहुत ज्यादा पॉपुलर नहीं है लेकिन इसे भी यूनेस्को के वर्ल्ड हेरिटेज साइट की सूची में स्थान दिया गया है। यहां आप शहरों से दूर जंगलों के बीच प्रकृति को महसूस करते हुए अपना एक अच्छा सा वीकेंड ट्रिप प्लान कर सकते हैं। लगभग 500 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ यह नेशनल पार्क भारत के पूर्वोत्तर भाग में स्थित असम का प्रमुख नेशनल पार्क है। ब्रह्मपुत्र नदी इस नेशनल पार्क की जीवन दायिनी नदी है। मानस नेशनल पार्क का इतिहास (History of Manas National Park) सबसे पहले मानस नेशनल पार्क को वर्ष 1928 में एक सेंचुरी डिक्लेयर किया गया था। 1973 ई. में इसे बायो रिजर्व क्षेत्र घोषित कर दिया गया। 1990 में इस क्षेत्र को नेशनल पार्क की उपाधि दी गई और इस वन क्षेत्र का नाम मानस नेशनल पार्क पड़ गया। मानस नेशनल पार्क में जंगल सफारी (Jungle safari in manas national park)मानस नेशनल पार्क में अगर आप जंगल सफारी करना चाहते हैं तो यहां जंगल सफारी के दो ऑप्शन उपलब्ध हैं। पहला जीप सफारी और दूसरा एलिफेंट सफारी। जीप सफारी (Jeep Safari)अगर आप भारतीय हैं और बाँसबाड़ी जोन में जंगल सफारी करना चाहते हैं तो इसके लिए आपको 4500 रुपए पर जीप खर्च करना होगा। वहीं भुईयांपाड़ा जॉन के लिए आपको ₹5500 पर जीप पे करना होगा। अगर बात किया जाए विदेशी पर्यटकों की तो विदेशी पर्यटकों को बाँसबाड़ी जोन में जंगल सफारी करने के लिए ₹8000 पर जीप पे करना होता है। वहीं भुईयांपाड़ा जोन में उनकाे ₹9000 पर जीप पे करना होता है। एक जीप को एक बार में पांच आदमी के लिए बुक किया जा सकता है।अगर बात करें जीप सफारी की टाइमिंग की तो यहां हर दिन तीन टाइम जीप सफारी करवाई जाती है। पहला सुबह के 6:30 से 9:30 तक, दूसरा सुबह के 10:00 से दोपहर के 1:00 तक और तीसरा दोपहर के 2:00 से शाम के 5:00 बजे तक। अगर आप यहां जंगल सफारी करने आ रहे हैं तो आप अपने हिसाब से जंगल सफारी की टाइमिंग सेट कर सकते हैं। एलिफेंट सफारी (Elephant Safari) मानस नेशनल पार्क में एलिफेंट सफारी सिर्फ बाँसबाड़ी जोन में करवाई जाती है अगर आप एलिफेंट सफारी करना चाह रहे हैं तो इसके लिए टिकट की प्राइस भारतीय पर्यटकों के लिए 1450 रुपए प्रति व्यक्ति और विदेशियों के लिए ₹3200 प्रति व्यक्ति होता है। एलिफेंट सफारी का यह टिकट 1 घंटे के लिए मान्य होता है। मानस नेशनल पार्क में एलिफेंट सफारी की टाइमिंग सुबह के समय ही होती है। आप यहां सुबह के 6:00 बजे से 7:00 बजे तक और 7:00 बजे से 8:00 बजे तक इस एलिफेंट सफारी का लुफ्त उठा सकते हैं।मानस नेशनल पार्क में चार तरह के टूर पैकेज उपलब्ध करवाए जाते हैं। अगर आप मानस नेशनल पार्क घूमना चाहते हैं तो आप अपनी सुविधा अनुसार इन टूर पैकेज में से किसी एक टूर पैकेज का चयन कर सकते हैं। मानस नेशनल पार्क के टूर पैकेजों के बारे में जानकारी निम्नांकित है : मानस नेशनल पार्क जाने का सबसे सही समय (Best time to visit Manas National Park) अगर आप वाइल्डलाइफ को पसंद करते हैं और वाइल्डलाइफ को एक्सप्लोर करने के लिए अगर आप मानस नेशनल पार्क जा रहे हैं तो मानसून के समय जाने से बचें। क्योंकि मानसून के समय पूर्वोत्तर भारत में बहुत अधिक बारिश होने के कारण बाढ़ की समस्या उत्पन्न हो जाती है। जिसके कारण आपका पूरा का पूरा टूर प्लान खराब हो सकता है। इससे बचने के लिए आप अक्टूबर से मार्च तक के समय का चयन कर सकते हैं। क्योंकि इस समय बारिश की संभावना कम होती है और मौसम भी ठंडा होता है। कैसे पहुंचे मानस नेशनल पार्क (How to reach Manas National Park) मानस नेशनल पार्क पहुंचने के लिए आप सड़क रेल और हवाई तीनों ही मार्गों का उपयोग कर सकते हैं। अगर आप हवाई मार्ग से मानस नेशनल पार्क पहुंचना चाह रहे हैं तो आपको सबसे पहले गुवाहाटी एयरपोर्ट पहुंचना होगा। जो कि असम की राजधानी गुवाहाटी में स्थित है और देश के प्रमुख शहरों से बहुत ही अच्छे तरीके से फ्लाइट से कनेक्टेड है। अगर आपके शहर से यहां की डायरेक्ट फ्लाइट नहीं मिल रही है तो आप कनेक्टिंग फ्लाइट के जरिए अभी यहां पहुंच सकते हैं।रेल मार्ग से यहां पहुंचने के लिए सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन बरपेटा रेलवे स्टेशन है जो मानस नेशनल पार्क से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां से आप बहुत ही आसानी से मानस नेशनल पार्क पहुँच सकते हैं। बरपेटा रेलवे स्टेशन देश के अन्य राज्यों के रेलवे स्टेशनों से बहुत ही अच्छे तरीके से जुड़ा है।अगर आप मानस नेशनल पार्क जाने के लिए सड़क मार्ग का उपयोग करना चाहते हैं तो आसपास के शहरों से यहां आप आसानी से पहुंच सकते हैं। इसके अलावा दूर के शहरों से भी आप यहां अपनी पर्सनल गाड़ी या कैब का उपयोग करके आ सकते हैं। सिलीगुड़ी गलियारा के द्वारा बड़े ही आसानी से मानस नेशनल पार्क तक पहुंचा जा सकता है।

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भारत के 90% से अधिक एक सींग वाले गैंडों का आशियाना है काजीरंगा नेशनल पार्क

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असम के सोनितपुर जिले में स्थित काजीरंगा नेशनल पार्क एक सिंग वाले गैंडे के लिए पूरी दुनिया भर में जाना जाता है। असम का यह काजीरंगा नेशनल पार्क हमेशा से हीं पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता रहा है। यह नेशनल पार्क 430 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है और पूरे भारत में पाए जाने वाले 90% गैंडे काजीरंगा नेशनल पार्क में ही पाए जाते हैं। लेकिन काजीरंगा नेशनल पार्क इन गैंडों के अतिरिक्त अन्य कई जानवरों का आशियाना है। जिनमें मुख्यतः बाघ, हाथी, पैंथर, जंगली भैंसे, भालू और अन्य कई प्रकार की पक्षियाँ शामिल हैं। काजीरंगा का नेशनल पार्क इतिहास (History of Kaziranga National Park) काजीरंगा नेशनल पार्क की स्थापना 1905 ईस्वी में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन के द्वारा की गई थी। बताया जाता है कि लॉर्ड कर्जन की पत्नी मैरी विक्टोरिया लिटर कर्जन ने गैंडों की घटती संख्या की समस्या से चिंतित होकर अपने पति से उनके संरक्षण के लिए कार्रवाई करने के लिए कहा। इसके बाद लॉर्ड कर्जन द्वारा 1904 में काजीरंगा को एक रिजर्व बनाने का प्रस्ताव रखा गया और यह प्रस्ताव 1905 में पारित हुआ।हजारों जीव जंतुओं का यह आशियाना यूनेस्को के वर्ल्ड हेरिटेज साइट में भी शामिल है। यूनेस्को ने इसे 1985 ईस्वी में वैश्विक धरोहर स्थल के रूप में अपने सूची में स्थान दिया। काजीरंगा नेशनल पार्क कैसे पहुंचे (How to reach Kaziranga National Park) काजीरंगा नेशनल पार्क 430 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है और अगर इसके भौगोलिक परिस्थितियों की बात की जाए तो यह ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे कार्बी की पहाड़ियों तक फैला हुआ है। काजीरंगा नेशनल पार्क पहुंचने के लिए आपको सबसे पहले असम के गुवाहाटी शहर तक पहुंचना होगा। काजीरंगा नेशनल पार्क असम की राजधानी गुवाहाटी से लगभग 194 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। अगर आप यहां फ्लाइट से आना चाहते हैं तो आप गुवाहाटी हवाई अड्डे तक की फ्लाइट ले सकते हैं। जहां देश के मुख्य हवाई अड्डों से आपको डायरेक्ट फ्लाइट की सुविधा मिल जाएगी। अगर आपके निकटतम हवाई अड्डे से डायरेक्ट फ्लाइट की सुविधा न हो तो आप कनेक्टिंग फ्लाइट भी ले सकते हैं। गुवाहाटी शहर से काजीरंगा नेशनल पार्क जाने के लिए आप बस या फिर कैब की सुविधा ले सकते हैं। नेशनल हाईवे 37 काजीरंगा नेशनल पार्क के पास से ही गुजरती है। अगर आप रेल मार्ग के द्वारा काजीरंगा नेशनल पार्क पहुंचाना चाहते हैं तो इसके लिए आपको सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन हेलेम रेलवे स्टेशन पड़ेगा, जो काजीरंगा नेशनल पार्क से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। नजदीक के शहरों से आप बस के जरिए भी काजीरंगा नेशनल पार्क पहुंच सकते हैं। काजीरंगा नेशनल पार्क में जंगल सफारी (Jungle Safari in Kaziranga National Park) काजीरंगा नेशनल पार्क के चार रेंज हैं। जिनमें सबसे पहला है वेस्टर्न रेंज, जिसे बागरी रेंज के नाम से भी जाना जाता है। सेंट्रल रेंज को कोहरा रेंज कहा जाता है। पूर्वी रेंज को अगरतोली रेंज के नाम से पुकारा जाता है। बुरापहाड़ रेंज का कोई दूसरा उपनाम नहीं है। अगर आप यहां जंगल सफारी करना चाहते हैं तो जंगल सफारी में अलग-अलग रेंज के लिए अलग-अलग चार्ज लगते हैं।काजीरंगा नेशनल पार्क में जंगल सफारी के दो ऑप्शंस देखने को मिलते हैं। पहला जीप सफारी और दूसरा एलिफेंट सफारी! जीप सफारी की सुविधा तो लगभग सभी नेशनल पार्क में अवेलेबल हो जाती है, लेकिन एलिफेंट सफारी की सुविधा कहीं-कहीं उपलब्ध है। काजीरंगा के नेशनल पार्क में भी आप एलिफेंट सफारी कर सकते हैं। एलिफेंट सफारी के लिए उपयोग में ले जाने वाले हाथी वाइल्ड एलिफेंट से काफी अलग होते हैं। बड़े से गजराज पर बैठकर जंगल की सैर करते समय आपको बिल्कुल राजा महाराजाओं वाली फीलिंग आएगी। अगर आप कुछ अलग ट्राई करना चाहते हैं तो आप जंगल सफारी के लिए एलिफेंट सफारी का उपयोग कर सकते हैं। यह सच में एडवेंचरस होता है। काजीरंगा नेशनल पार्क में जंगल सफारी के खर्च (Charges of Jungle Safari in Kaziranga National Park) जीप सफारी (Jeep Safari) सेंट्रल यानी कोहरा रेंज के जंगल सफारी के टिकट की कीमत भारतीयों के लिए ₹3700 और विदेशियों के लिए ₹6800 है। वेस्टर्न रेंज जिसे बागोरी रेंज भी कहा जाता है, में जंगल सफारी के टिकट की कीमत ₹3800 भारतीयों के लिए और ₹6900 विदेशियों के लिए है। पूर्वी रेंज यानी अगरतोली रेंज में जंगल सफारी के लिए विदेशियों को ₹10,300 की टिकट लेना पड़ता है, वहीं भारतीयों के लिए इस टिकट की कीमत ₹4400 होती है। अगर बात करें बुरापहाड़ रेंज के सफारी के टिकट की तो इसके लिए विदेशियों को ₹10,800 की टिकट लेनी होती है। वहीं भारतीयों को ₹4900 की टिकट लेना होता है। एलिफेंट सफारी (Elephant Safari) काजीरंगा में एलिफेंट सफारी की सुविधा वेस्टर्न यानी बागोरी रेंज और सेंट्रल यानी कोहरा रेंज में उपलब्ध है। वेस्टर्न रेंज की एलिफेंट सफारी सिर्फ भारतीय पर्यटकों के लिए उपलब्ध है। जिसके टिकट की कीमत ‘₹900 प्लस सर्विस चार्ज’ प्रति व्यक्ति है।वहीं सेंट्रल रेंज की एलिफेंट सफारी सिर्फ विदेशी पर्यटकों के लिए उपलब्ध है। जिसके टिकट की कीमत ₹3500 पर पर्सन है।

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भारतीय इतिहास का गढ़ है ग्वालियर शहर

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मंदिरों और किले के लिए मशहूर शहर ग्वालियर मध्य प्रदेश के सबसे प्रतिष्ठित शहरों में से एक है। इस शहर का भारतीय इतिहास में भी बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रहा है। आज के इस ब्लॉग में हम आपको ग्वालियर के बेस्ट विजिटिंग प्लेस के बारे में बताने वाले हैं। तो आईए जानते हैं ग्वालियर के टूरिस्ट प्लेस के बारे में! ग्वालियर का किला भारत के इतिहास को प्रदर्शित करने वाला यह किला ग्वालियर के सबसे प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है। इस किले के टॉप पॉइंट से आप पूरे ग्वालियर शहर का नजारा देख सकते हैं। इस किले में एक म्यूजियम भी है जो इतिहास में रुचि रखने वाले लोगों का ध्यान अपनी और खींचता है। अगर आप ग्वालियर फोर्ट घूमना चाहते हैं तो इसके लिए आपको ऑनलाइन टिकट लेना होगा। इसके बाद आप ग्वालियर फोर्ट में इंटर कर सकते हैं। ग्वालियर फोर्ट बहुत हीं बड़ा और विशाल है। अगर आप ग्वालियर आना चाहते हैं और ग्वालियर फोर्ट घूमना चाहते हैं तो हमारा यह सुझाव रहेगा कि आप गर्मी में यहां जाने से बचें। अगर बात करें ग्वालियर फोर्ट के इतिहास की तो इसका निर्माण राजा मानसिंह तोमर ने करवाया था। उनके बाद कई अन्य राजाओं ने भी इस किले पर राज किया। ग्वालियर के किले तक पहुंचने के दो रास्ते हैं। पहला उर्वै गेट का और दूसरा गुजारी महल का। किले तक पहुंचने के लिए हमारी ओर से आपको एक सुझाव यह रहेगा कि आप उर्वै गेट से जाएं। क्योंकि अगर आप उर्वै गेट से जाएंगे तो आपको रिक्शा सीधे फोर्ट के पास जाकर उतारेगी। वहीं अगर आप गुजारी महल गेट से जाएंगे तो रिक्शा आपको गेट पर हीं उतार देगी वहां से आपको पैदल चलकर किले तक पहुंचना होगा। सास बहु टेंपल ग्वालियर फोर्ट के ही नजदीक स्थित है सास बहु टेंपल। यह सुनने में थोड़ा अजीब है लेकिन सच है कि ग्वालियर में एक सास बहू नाम का टेंपल भी है। सास बहु टेंपल को सहस्रबाहु टेंपल भी कहा जाता है। इस मंदिर के दीवारों पर पत्थरों को तराश कर की गई नकाशी बहुत ही सुंदर है। साथ ही इस मंदिर का प्रांगण भी बहुत खूबसूरत है। आप इस मंदिर से पूरे ग्वालियर सिटी का एक बेहतरीन बर्ड व्यू ले सकते हैं। इस मंदिर से आपको ग्वालियर के फोर्ट का व्यू भी दिख जाएगा। गुरुद्वारा श्री दाता बंदी छोड़ साहिब (Gurdwara Shri Data Bandi Chhor Sahib) ग्वालियर में श्री दाता बंदी छोड़ साहिब गुरुद्वारा भी है जो सिखों के छठे गुरु हरगोविंद साहब को समर्पित है। इस गुरुद्वारा का इतिहास मुगल इतिहास से जुड़ा हुआ है। यह गुरुद्वारा बहुत ही बड़ा और खूबसूरत है। अगर आप ग्वालियर जा रहे हैं तो आपको इस जगह पर जरूर जाना चाहिए। बटेश्वर ग्वालियर के सबसे खूबसूरत जगहों में से एक है, जहां आपको कई सारे छोटे-छोटे मंदिरों के समूह देखने को मिलेंगे। इन मंदिरों के बारे में बताया जाता है कि इनका निर्माण भूतों द्वारा करवाया गया है। इन छोटे-छोटे मंदिरों के भीतर शिवजी की प्रतिमा है वही मंदिर के बाहर नंदी विराजमान हैं। यहां आपको एक हीं तरह के दिखने वाले कई सारे मंदिर देखेंगे। जिनकी नक्काशियाँ भी बिल्कुल एक जैसी हीं हैं। इस जगह पर आकर आपको ऐसी वाइब आएगी कि आप किसी प्रॉपर हिस्टोरिकल प्लेस को देख रहे हैं। गढ़ी पढ़ावली एक किला है जो ग्वालियर के हिस्टोरिकल प्लेसेस में से एक है। गढ़ी पढ़ावली के दीवारों पर की गई नक्काशियों को देखकर आप यह सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि आज से हजारों साल पहले बिना उन्नत तकनीक के कैसे लोग इस तरह की नक्काशी कर लिया करते थे। गढ़ी पढ़ावली ग्वालियर का एक प्रसिद्ध मंदिर है। जिसका निर्माण 10वीं शताब्दी में करवाया गया था। अगर आप ग्वालियर आ रहे हैं तो इस जगह को विजिट करना ना भूलें। मितावली यह ग्वालियर का वह स्थान है जिस पर ग्वालियर हमेशा से हीं गर्व करता आया है। मितावली में मंदिरों का एक समूह है जिसका कंस्ट्रक्शन बिल्कुल हमारे पुराने संसद भवन की तरह है। या फिर यूं कहे कि हमारे पुराने संसद भवन को मितावली के मंदिरों के समूह के तर्ज पर ही बनवाया गया था। यहां के मंदिरों में बहुत से देवी देवताओं के प्रतिमाओं को उकेरा गया है और यहां के हर मंदिर के भीतर शिवलिंग स्थापित है। यहां की गई सुंदर नक्काशिययाँ किसी भी पर्यटक के मन को मोह लेने में सक्षम हैं। मितावली के बारे में बताया जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 1323 ईस्वी में महाराजा देवपाल ने करवाया था। इस मंदिर के नीचे से बहुत सेआभूषण और मूर्तियां खुदाई में प्राप्त हुए। जिन्हें अब ग्वालियर फोर्ट के म्यूजियम में रखा गया है। इसके साथ हीं मितावली के टॉप पॉइंट से दिखने वाला भी बहुत ही खूबसूरत होता है। जहां दूर-दूर तक आपको ग्वालियर शहर के साथ-साथ ग्रीनरी ही ग्रीनरी देखने को मिलेगी। कैसे पहुंचे ग्वालियर (How to visit Gwalior) अगर आप ग्वालियर आना चाहते हैं तो यहां आने के लिए हर तरह के यातायात साधन उपलब्ध हैं। आप परिवहन के तीनों माध्यमों का उपयोग करके ग्वालियर पहुंच सकते हैं। अगर आप बाय रोड ग्वालियर जाना चाहते हैं तो आप बहुत ही आसानी से ग्वालियर जा सकते हैं। क्योंकि ग्वालियर सड़क मार्ग द्वारा देश के अन्य शहरों से काफी अच्छे तरीके से जुड़ा हुआ है। आसपास के शहरों से आप बाय बस भी ग्वालियर आसानी से आ सकते हैं। अगर बात करें रेलवे स्टेशन की तो ग्वालियर का अपना एक रेलवे स्टेशन है जहां भारत के कोने-कोने से ट्रेन आती और जाती हैं। ग्वालियर में एक एयरपोर्ट भी है। लेकिन वर्तमान समय में यहां कुछ ही शहरों से फ्लाइट आती जाती हैं। अगर आपके शहर से ग्वालियर की डायरेक्ट फ्लाइट नहीं है तो आप कनेक्टिंग फ्लाइट के जरिए ग्वालियर आ सकते हैं।

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दुनिया भर से पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती हैं एलोरा की ये गुफाएं

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चट्टानों पर की गई शिल्पकलाओं के जरिए विश्व विरासत स्थल में अपना स्थान बनाने वाले महाराष्ट्र के एलोरा की गुफाओं की खूबसूरती देखने लायक है। भारतीय इतिहास के उत्कृष्ट कलाकारी को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने वाली ये गुफाएं आज से लगभग हजारों साल पुरानी हैं। लेकिन आज भी इन गुफाओं में चट्टानों पर की गई नक्काशियों में वहीं फिनिशिंग देखने को मिलती है जो नए नक्काशियों में मिलते हैं।सह्याद्री पर्वत श्रृंखलाओं को काट कर बनाए गए इस गुफा की श्रृंखलाओं में मानव द्वारा की गई बेहतरीन शिल्पकारी और नक्काशी की कला देखने को मिलती है। एलोरा का गौरवशाली इतिहास (Glorious History of Ellora) इतिहासकारों के मुताबिक इन गुफाओं का निर्माण 600 ई. से 1000 ई. के बीच करवाया गया था। एलोरा की गुफाओं की श्रृंखला में कुल 34 गुफाओं का निर्माण करवाया गया था। जिनमें 17 गुफाएं ब्राह्मणों से संबंधित थीं, 12 गुफाएं बौद्ध धर्म से संबंध रखती थीं और पांच गुफाओं का जैन धर्म से जुड़ाव था। इन गुफाओं का निर्माण पैठन से उज्जैन जाने वाले व्यापारिक मार्गों के पास करवाया गया था।एलोरा की गुफाओं में कई हिंदू और बौद्ध गुफाओं का ताल्लुकात राष्ट्रकूट वंश के काल से है। वहीं जैन गुफाओं का निर्माण बाद में करवाया गया था। बताया जाता है कि जैन गुफाओं का निर्माण चालुक्य और देवगिरी के यादव शासकों के समय में हुआ था। इन गुफाओं में हिंदू बौद्ध और जैन तीनों धर्मों का उल्लेख देखने को मिलता है। अतः कहा जा सकता है कि एलोरा धार्मिक संगम का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करता है। यह उदाहरण है धार्मिक सहिष्णुता और एकता की जो अलग-अलग धर्म के बीच सामंजस्य स्थापित करने का कार्य करता है। एलोरा कैसे पहुंचे (How to visit Ellora Caves)? एलोरा की गुफ़ाएँ महाराष्ट्र के संभाजी नगर अर्थात औरंगाबाद जिले में स्थित है। अगर आप एलोरा की गुफाओं को घूमना चाहते हैं तो इसके लिए आपको सबसे पहले औरंगाबाद आना पड़ेगा। औरंगाबाद से एलोरा की गुफाओं की दूरी लगभग 30 किलोमीटर है। जहां आप कैब बुक करके या फिर अपनी गाड़ी से आसानी से पहुंच सकते हैं। अगर आप फ्लाइट से एलोरा की गुफाओं तक पहुंचाना चाहते हैं तो एलोरा की गुफाओं से निकटतम हवाई अड्डा जलगांव एयरपोर्ट है। लेकिन यहां भारत के कुछ ही शहरों से फ्लाइट की व्यवस्था है। एलोरा की गुफाओं तक बाय रोड और बाय रेलवे भी पहुंचा जा सकता है। क्योंकि औरंगाबाद में बस स्टॉप और रेलवे स्टेशन दोनों हीं उपलब्ध हैं। आप औरंगाबाद रेलवे स्टेशन से एलोरा पहुंचने के लिए लोकल बस की सुविधा भी ले सकते हैं। एलोरा ने यात्रियों, व्यापारियों, जनसाधारणों और यहां तक की राजा महाराजाओं को भी अपनी ओर आकर्षित किया। यहां की सुंदर कलाकृतियों के चर्चे काफी दूर-दूर तक फैले हुए थे। अगर बात करें एलोरा की गुफाओं के निर्माण के बारे में तो सबसे पहले गुफा नंबर 29 जिसे डुमर लीना गुफा भी कहते हैं, का निर्माण छठी शताब्दी में शुरू हुआ। इसके बाद गुफा नंबर 10 यानी विश्वकर्मा गुफा, गुफा नंबर 11 धो ताल गुफा और गुफा नंबर 12 तीन ताल गुफा का निर्माण चालुक्य शासन वंश के समय में किया गया था। वहीं अगर गुफा नंबर 15 की बात की जाए तो इनका निर्माण आठवीं शताब्दी के अंत में राष्ट्रकूटों के समय में किया गया था। यह गुफा शिलालेख गुफा के नाम से जानी जाती है। एलोरा की गुफा आने का सबसे सही समय (Best time to visit Ellora) अगर आप एलोरा की गुफाओं को घूमना चाहते हैं तो इसके लिए सबसे सही समय ठंड के महीनों में होता है। इस समय तापमान कम होने के कारण आप सहजता से सभी गुफाओं को घूम पाएंगे और उनके बारे में जान पाएंगे। इसीलिए अगर आप एलोरा की गुफाओं को घूमने आ रहे हैं तो आप नवंबर से मार्च तक के समय में आएं। महाराष्ट्र आने का यह सबसे सही समय होता है। अगर आप इस समय यहां आएंगे तो आप महाराष्ट्र के अन्य खूबसूरत पर्यटन स्थलों पर भी घूमने जा सकते हैं। खास करके सहयाद्री के पर्वत श्रृंखला में बसे हुए वॉटरफॉल्स और ट्रेक्स इस समय सामान्य दिनों से और भी ज्यादा खूबसूरत दिखते हैं।

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भारतीय शिल्पकला को दर्शाती हैं सदियों पुरानी अजंता की गुफाएं

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महाराष्ट्र का संभाजी नगर जिसे पहले औरंगाबाद कहा जाता था वह अजंता और एलोरा की गुफाओं के लिए मशहूर है। आज के इस ब्लॉग में हम आपको बताएंगे अजंता की गुफाओं के इतिहास के बारे में, यहां की कलाकृतियों के बारे में, और यहां कैसे पहुंचे इसके बारे में। संभाजी नगर के पहाड़ियों को खोदकर बनाई गई यह गुफाएं और उनके अंदर उकेरी गई कलाकृतियां भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया से पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इतिहास में रुचि रखने वाले लोगों के लिए अजंता कई वर्षों से शोध का एक महत्वपूर्ण स्थान बना हुआ है। अजंता की गुफाएं बौद्ध धर्म के उपासकों के लिए किसी तीर्थ स्थल से कम नहीं है। इन गुफाओं में भगवान बुद्ध के हजारों मूर्तियों को उकेरा गया है। इतिहास (History of Ajanta caves) अगर इतिहास की बात करें तो अजंता की गुफाओं का निर्माण कई सौ सालों के मेहनत की परिणिति है। इतिहासकारों का मानना है कि गुफा नंबर 9 और 10 को बनाने में 400 सालों का वक्त लगा था और इनका निर्माण 200 ईसा पूर्व से 200 ई के बीच करवाया गया था। गुफा नंबर 9 और 10 को अजंता की सबसे पुरानी गुफा के रूप में जाना जाता है। वहीं गुफा नंबर 4, 6, 11, 15, 16 और 17 के निर्माण के बारे में बताया जाता है कि इनका निर्माण 350 ई से 500 ई तक के बीच में हुआ।अजंता की गुफाएं दो भागों में विभाजित थीं। जिनमें एक भाग का उपयोग विहार के रूप में किया जाता था, वहीं दूसरे भाग का उपयोग आराधना के लिए किया जाता था। इस स्थान को चैत्य महाकक्ष कहा जाता था। अद्भुत है यहां की वास्तुकला (Amazing architecture) सहयाद्री पर्वत के चट्टानों को काटकर यहां लगभग 29 गुफाओं का निर्माण करवाया गया है। यह गुफाएं भारत के समृद्ध इतिहास और भारतीय स्थापत्य कला के उत्कृष्टता को बहुत ही बेहतरीन तरीके से दुनिया के सामने रखने की कोशिश करते हैं। यहाँ के वास्तु कला के कलाकार इतने कुशल थे कि यहां के कुछ गुफाओं को 100 फीट तक खोदकर बनाया गया है। विहार का भाग बहुत ही सीधा-साधा और सरल वास्तुकला का क्षेत्र था, वहीं चैत्य महाकक्ष में दीवारों पर कई प्रकार के मूर्तियों को बनवाया गया था। यह कक्ष भगवान बुद्ध को समर्पित था और उपासना के लिए उपयोग में लाया जाता था। इन कक्षों में चित्रों और मूर्तियों के द्वारा भगवान बुद्ध के अवतार के बारे में विस्तृत वर्णन देखने को मिलता है। विहार का उपयोग भिक्षुओं के द्वारा बुद्ध के धार्मिक उपदेशों के ज्ञान और अध्ययन के लिए किया जाता था।अजंता की गुफाओं का निर्माण दो समय काल में करवाया गया था। पहला तेहरवाड काल और दूसरा महायान काल। तेहरवाड काल में गुफा नंबर 9 और 10 का निर्माण आराधना के लिए करवाया गया था। वहीं गुफा नंबर 8, 12, 13 और 15 का निर्माण विहार कक्ष के रूप में करवाया गया था। वहीं महायान कल में तीन चैत्य कक्ष गुफा नंबर 19, 26 और गुफा नंबर 29 का निर्माण आराधना कक्ष के रूप में करवाया गया था। वहीं अन्य 11 गुफाओं का निर्माण वास स्थान अर्थात विहार परिसर के रूप में करवाया गया था। अजंता की गुफाओं में मुख्यतः बौद्ध के जीवन से संबंधित चित्र देखने को मिलते हैं। इसके अलावा चित्रों के जरिए जातक कथाओं का वर्णन देखने को मिलता है। इन चित्रों में राज दरबारों की तत्कालीन स्थितियों आपको भी उकेरा गया है और रोजमर्रा की जिंदगी को दिखाया गया है। इन सबसे परे गुफाओं में फूलों और पशुओं का भी चित्रण किया गया है। अजंता की गुफाओं तक कैसे पहुंचे (How to reach Ajanta Caves)? अगर आप अजंता की गुफाओं को घूमना चाहते हैं तो इसके लिए तीनों तरह के परिवहन माध्यमों का उपयोग कर सकते हैं। अजंता की गुफाएं महाराष्ट्र के औरंगाबाद में स्थित है। इसलिए अगर आप बाय रोड आना चाहते हैं तो आप सबसे पहले औरंगाबाद पहुंच सकते हैं। औरंगाबाद से अजंता की गुफाओं तक पहुंचने में आपको लगभग 45 मिनट का समय लगेगा। अगर आप वाया ट्रेन आना चाहते हैं तो उसके लिए भी आपको औरंगाबाद रेलवे स्टेशन तक आना पड़ेगा। वहीं फ्लाइट से आने के लिए आप जलगांव एयरपोर्ट तक का फ्लाइट ले सकते हैं। जलगांव एयरपोर्ट अजंता की गुफाओं से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

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मांगी तुंगी- जो दिखती है ‘द ग्रेट वॉल आफ चाइना’ की तरह

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क्या आपको पता है इंडिया में भी ‘द ग्रेट वॉल आफ चाइना’ के जैसी ही एक वॉल है? जी हां आपने कुछ भी गलत नहीं पढ़ा है! यह सच है कि भारत में भी द ग्रेट वॉल आफ चाइना के जैसी ही एक इमारत है। आज के इस ब्लॉग में हम इसी वॉल के बारे में आपको बताएंगे। इस वॉल का नाम है मांगी तुंगी पिनेकल्स। जैन धर्म के सबसे प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक मांगी तुंगी पिनेकल्स महाराष्ट्र के सबसे खूबसूरत पर्यटन स्थलों में से एक है। जिसे एक्सप्लोर करने दूर-दूर से पर्यटक यहां घूमने आते हैं।असल में मांगी और तुंगी सह्याद्री के पहाड़ियों की दो चोटियां है जिन्हें जोड़ने के लिए सीढ़ियां बनाई गई हैं। जो दूर से देखने पर बिल्कुल ‘द ग्रेट वॉल ऑफ चाइना’ के जैसी दिखाई देती है। मांगी तुंगी पिनेकल्स तक पहुंचने के लिए सीढ़ियों का निर्माण करवाया गया है। अगर सीढ़ियों के संख्या की बात की जाए तो इन सीढ़ियों की संख्या लगभग 3500 से भी ज्यादा है। जिसे चढ़ने में आपको दो से तीन घंटे का समय लग सकता है। लेकिन इन सीढ़ियों को चढ़ते हुए आपको जरा भी थकान का एहसास नहीं होगा। क्योंकि इन सीढ़ियों के दोनों ओर दिखने वाले खूबसूरत नजारे किसी के भी थकान को पल भर में गायब करने के सक्षम हैं। इन खूबसूरत नजारों को देखने के बाद और ज्यादा उत्सुकता होती है कि अगर यह रास्ता इतना खूबसूरत है तो पीक पर पहुंचने के बाद का नजारा कितना खूबसूरत होगा? …और यही सवाल पर्यटकों को थकने नहीं देता है और आगे बढ़ने के लिए मोटिवेट करता है। मांगी तुंगी ट्रेक पर जाने के लिए दो रास्ते जाते हैं। जिसमें एक रास्ता पैदल ट्रैकिंग करने वालों के लिए है। जिसमें आपको 3500 सीढ़ियां चढ़नी पड़ेंगी। वहीं दूसरा रास्ता उन लोगों के लिए है जो गाड़ी से जाना चाहते हैं। लेकिन इस रास्ते में आप पूरी दूरी गाड़ी से कवर नहीं कर सकते हैं। इस रास्ते के जरिए आपको लास्ट के 1000 सीढ़ियों की चढ़ाई करनी होगी। मांगी तुंगी पिनेकल्स घूमने जाने का सबसे सही समय (Best time to visit Mangi Tungi pinnacles) खासकर के जब भारत में मानसून की एंट्री होती है और इसके बाद धीरे-धीरे ठंड बढ़ने लगती है तो मांगी तुंगी पिनेकल्स पर कोहरे का साया मंडराने लगता है। अक्टूबर से मार्च तक के समय में मांगी तुंगी पिनेकल्स का यह नजारा देखने लायक होता है। अगर आप मांगी तुंगी पिनेकल्स को विजिट करना चाहते हैं तो, हमारा यह सुझाव होगा कि आप मानसून के बाद ही यहां आए। क्योंकि इस समय चारों ओर ग्रीनरी ही ग्रीनरी देखने को मिलती है। जिसके कारण  मांगी तुंगी पीक्स की खूबसूरती और भी ज्यादा निखर का सामने आती है। मांगी तुंगी पीक्स से दिखने वाले नजारे इतने खूबसूरत होते हैं कि कुछ पल के लिए खुद को भूलकर उसे मूमेंट में ठहर जाने का दिल चाहता है। सनराइज और सनसेट के समय का लाल आकाश इस पिनेकल्स की खूबसूरती को और बढ़ा देता है। अगर आप नेचर लवर हो तो आपको इस ट्रेक के लिए जरूर जाना चाहिए। कैसे पहुंचे (How To Reach Mangi Tungi Pinnacles)? मांगी तुंगी नासिक शहर से लगभग 125 किलोमीटर, मुंबई से तकरीबन 280 किलोमीटर और पुणे शहर से लगभग 330 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। अगर आप पब्लिक ट्रांसपोर्ट से मांगी तुंगी पहुंचना चाहते हैं तो इसके लिए आपको सबसे पहले ताराबाद टाउन पहुंचाना पड़ेगा। आप ताराबाद टाउन से नासिक टू नंदुरबार स्टेट बस के जरिए मांगी तुंगी के बेस विलेज यानी भीलवड़ विलेज तक पहुंच सकते हैं। यह बस आपको मांगी तुंगी ट्रैक के बिल्कुल गेट के पास उतारेगी। जहां से आप अपना ट्रेकिंग स्टार्ट कर सकते हैं। मांगी तुंगी पिनेकल्स पर बना मंदिर शाम के 3:00 बजे बंद हो जाता है। क्योंकि अंधेरा होने के कारण किसी भी दुर्घटना के होने के चांसेस बहुत ज्यादा बढ़ जाते हैं। इन्हीं दुर्घटनाओं को अवॉइड करने के लिए यहां पर 3:00 बजे शाम के बाद मंदिर बंद हो जाते हैं। जिसके बाद आपको वापस से लौटना होगा। आप मैक्सिमम तीन बजे तक यहां घूम सकते हैं। इस ट्रेक के लिए हमारी ओर से आपको एक सुझाव होगा कि आप जब भी मांगी तुंगी ट्रेक के लिए जाएं तो अपने साथ एक डंडा या फिर हाइकिंग पोल जरूर रखें। क्योंकि मांगी तुंगी ट्रेक के आसपास बंदरों की संख्या बहुत ज्यादा है। जो कि यहां आने वाले पर्यटकों के बैग पर झपट्टा मार देते हैं। उन बंदरों से बचने के लिए आप अपने पास एक छोटा सा लकड़ी का डंडा रख सकते हैं। आपके पास कुछ नहीं है तो घबराने वाली कोई बात नहीं है। इस ट्रेक के स्टार्टिंग पॉइंट पर हीं बहुत सारी कठिया मिलती हैं। जिन्हें आप ₹20 देकर खरीद सकते हैं। बेहतरीन है यहां की कलाकृति (The artwork here is excellent) मांगी तुंगी पिनेकल्स के पास आपको कई सारी गुफाएं देखने को मिलेंगी। जिनके अंदर जैन स्थापत्य कला के कई उदाहरण देखने को मिलते हैं। इनमें जैन धर्म से जुड़े लेख भी शामिल हैं। इसके अलावा वहां कई सारी मूर्तियां भी देखने को मिलती हैं जो जैन धर्म से ताल्लुकात रखती हैं। जब आप यह ट्रेक स्टार्ट करेंगे तो लगभग 250 सीढ़ियां चढ़ने के बाद आपको एक छोटा सा मंदिर देखने को मिलेगा जो बहुत हीं प्राचीन मंदिर है और जैन धर्म के भगवान मुनि शत नाथ से जुड़ा हुआ है। मांगी तुंगी की चोटियों पर पहाड़ियों को खोदकर तरह-तरह के मूर्तियों को उकेरा गया है। हजारों साल पुराने होने के बावजूद भी इन मूर्तियों की फिनिशिंग देखने लायक है। मांगी तुंगी के पिनेकल्स पर भगवान महावीर की गुफा, शांतिनाथ जैन दिगंबर और श्री मांगी गिरी के गुफा के साथ-साथ और कई सारी गुफाएं हैं। जिनके अंदर बहुत सी कलाकृतियों को उकेरा गया है। यहां स्थापित है भगवान ऋषभ गिरी देवता की सबसे ऊंची प्रतिमा (The tallest statue of Lord Rishabh Giri Devta is installed here) मांगी तुंगी ट्रैक पर हीं आपको भगवान ऋषभ गिरी देवता की प्रतिमा भी देखने को मिलती है। जो 108 फीट ऊंची है। इस प्रतिमा का इनॉग्रेशन 2016 में किया गया और इस प्रतिमा को बनाने में लगभग 22 साल लग गए। अगर आज के

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कुम्भे वॉटरफॉल : सह्याद्री की पहाड़ियों में बहता हुआ खूबसूरत झरना

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सह्याद्री की पहाड़ियों की असीम खूबसूरती दुनिया भर से पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है। पहाड़ियों की श्रृंखला में खतरनाक ट्रैकिंग डेस्टिनेशंस के साथ-साथ कुछ ऐतिहासिक किले और कई सारे प्राकृतिक झरने भी हैं जो पर्यटकों के मनमोहन में सक्षम है। यहां एडवेंचर टूरिज्म से लेकर रिलिजियस टूरिज्म तक के लिए हर तरह के पर्यटन स्थल मौजूद हैं। आज के इस ब्लॉग में मैं सह्याद्री के इन्हीं पहाड़ियों को चीर कर बहने वाली एक खूबसूरत झरने के बारे में बताने वाली हूंँ जिसका नाम है कुम्भे वॉटरफॉल। कैसे पहुँचे (How to reach)? सह्याद्री की पहाड़ियों में बहता कुम्भे वॉटरफॉल महाराष्ट्र के मानगांव में स्थित है। जवाब मानगांव से छोटे पगडंडियों के जरिए इस झरने की ओर कदम बढ़ाएंगे तो दूर से ही आपके कानों में इस झरने की कौतुहलता घुलने लगेगी। मानगांव पहुंचने के लिए आप अगर बाय रोड जाना चाहते हैं तो मानगांव बस स्टॉप तक बस की सुविधा उपलब्ध हो जाती है। वहीं अगर वाया ट्रेन मानगांव पहुंचाना चाहते हैं तो मानगांव में एक रेलवे स्टेशन भी है। जिसका नाम मानगांव रेलवे स्टेशन है। हवाई हवाई रूट के जरिए ट्रेवल करने के शौकीन लोगों के लिए कुम्भे वॉटरफॉल से सबसे नजदीकी हवाई अड्डा पुणे हवाई अड्डा है। जो कुम्भे वॉटरफॉल से लगभग 126 किलोमीटर दूर स्थित है और यह एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है। कुम्भे वॉटरफॉल के इस असीम खूबसूरती को देखने के लिए दुनिया भर के अलग-अलग कोने से पर्यटक यहां घूमने आते हैं। यहां अक्सर लोग पिकनिक मनाने, ट्रैकिंग करने और कैंप लगाने के लिए आते हैं। अगर आप नेचर को पसंद करने वाले हैं तो आपको यह जगह बहुत ही पसंद आने वाला है। नेचर फोटोग्राफी करने वाले लोगों के लिए भी कुम्भे वॉटरफॉल एक बेहतरीन फोटोग्राफी डेस्टिनेशन है। जहां से वह प्रकृति की खूबसूरती को बहुत ही बेहतरीन तरीके से अपने कैमरे में कैद कर सकते हैं। कुम्भे वॉटरफॉल जाने का सबसे सही समय (Best time to visit Kumbhe Waterfall)? वैसे तो कुम्भे वॉटरफॉल्स घूमने कभी भी जा सकते हैं, लेकिन यहां जाने का सबसे सही समय मानसून का होता है। क्योंकि इस समय वॉटरफॉल में पानी की मात्रा बहुत ज्यादा होती है। साथ ही इस समय आसपास ग्रीनरी भी देखने को मिलता है। जिसके कारण वॉटरफॉल की खूबसूरती में चार चांद लग जाते हैं। मानसून में झरने में पानी की मात्रा बढ़ जाने के कारण झरना और भी तेज गति से आगे बढ़ता है। जब आप पहाड़ियों के बीच से झरने को बहता हुआ देखेंगे तो यकीन मानिए इसकी खूबसूरती देखकर कुछ पल के लिए आपको भी ऐसा ही लगेगा कि जैसे इससे खूबसूरत और क्या हीं हो सकता है? बड़े शहरों के शोर शराबे से दूर प्रकृति की गोद में बहते हुए इस झरने के बारे में आज भी बहुत कम लोग जानते हैं। इस वजह से  यहां ज्यादा लोगों की आवाजाही नहीं होती है। यही वजह है कि यहां आप बहुत ही शांत माहौल में पिकनिक मना सकते हैं। अगर आप कुछ समय के लिए अपने काम से ब्रेक लेकर किसी प्राकृतिक पर्यटन स्थल को घूमना चाहते हैं तो कुम्भे वॉटरफॉल इसके लिए सबसे बेस्ट ऑप्शन हो सकता है, क्योंकि यहां आपकी प्राइवेसी में दखल देने वाला कोई नहीं होता है। आप बहुत ही आराम से यहां अपनी छुट्टियां बिता सकते हैं। साथ ही ट्रैकिंग और कैंपिंग के जरिए आप अपनी छुट्टी को और भी ज्यादा रोमांचक बना सकते हैं।

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बांधवगढ़ नेशनल पार्क जहां आप देख सकते हैं बेख़ौफ़ बंगाल टाइगर्स को

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मध्य प्रदेश के विंध्याचल पर्वत में स्थित बांधवगढ़ नेशनल पार्क अपने बाघों के लिए प्रसिद्ध है। बांधवगढ़ नेशनल पार्क में इन बाघों को देखने के लिए दुनिया के अलग-अलग कोने से साल भर में लगभग 50,000 से भी ज्यादा पर्यटक आते हैं और जंगल सफारी के जरिए बाघों की खोज में निकल जाते हैं। बांधवगढ़ नेशनल पार्क लगभग 105 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। इस नेशनल पार्क में बाघ के अलावा कई अन्य प्रकार के स्तनधारी जीव भी पाए जाते हैं। जिनमें तेंदुआ, भेड़िया, सियार, हिरण, भालू, लंगूर, बंदर, जंगली सूअर, जंगली कुत्ते, लोथल बीयर और चीतल जैसे जीव प्रमुख है।वर्तमान समय में बांधवगढ़ नेशनल पार्क में 165 बाघ अपना जीवन यापन कर रहे हैं। इतिहास (History)बांधवगढ़ का यह इलाका आजादी से पहले राजा महाराजाओं के लिए शिकार का स्थान हुआ करता था। लेकिन आजादी के बाद यहां के महाराज मार्तंड सिंह के अनुरोध पर सरकार ने इस क्षेत्र को बंधवगढ़ अभ्यारण घोषित कर दिया।इसके बाद 1968 में बांधवगढ़ अभयारण्य क्षेत्र को नेशनल पार्क की उपाधि दे दी गई और 1993 में इसे टाइगर रिजर्व घोषित कर दिया गया।इस क्षेत्र का नाम विंध्याचल के पहाड़ी पर बने हुए बांधवगढ़ किले के नाम पर बांधवगढ़ रखा गया। वैसे तो आज के समय में बांधवगढ़ किला सिर्फ खंडहर के रूप में बच गया है लेकिन यह आज भी विंध्याचल के गौरवशाली इतिहास की गवाही देता है। बांधवगढ़ में जंगल सफारी के लिए दो तरह के टूर पैकेज उपलब्ध हैं। पहला टूर पैकेज दो रातों और तीन दिनों का है। वही दूसरा टूर पैकेज तीन रातों और चार दिनों का है। पहले टूर पैकेज के तहत आपका टूर प्लान कुछ इस प्रकार का होगा : पहले दिन आप बांधवगढ़ पहुंचेंगे जहां आपको रिजॉर्ट में रुकने के लिए दिया जाएगा। इसके बाद आपको दिन का लंच दिया जाएगा। लंच करने के बाद आप शाम को अपने रिजॉर्ट के आसपास के इलाकों में टहल सकते हैं और फिर रात को डिनर करके आप रिजॉर्ट में ही आराम करेंगे।पैकेज के दूसरे दिन आप सुबह-सुबह जिप्सी में सवार होकर जंगल सफारी के लिए निकल जाएंगे। रास्ते में ही आपको ब्रेकफास्ट दिया जाएगा। जंगल सफारी के बाद आप वापस लौटेंगे और लंच करेंगे। लंच करने के बाद आप फिर से जंगल सफारी के लिए निकल जाएंगे। शाम को जंगल सफारी करके लौटेंगे और रिजॉर्ट में रात का भोजन करके आराम करेंगे।तीसरा दिन आपके टूर पैकेज का आखिरी दिन होगा जिसमें आप सुबह नाश्ता करके आप अपने स्टेशन के लिए चेक आउट कर जाएंगे। दूसरे टूर पैकेज के तहत भी आपका टूर प्लान कुछ इसी प्रकार का होगा। आप पहले दिन बांधवगढ़ नेशनल पार्क पहुंचेंगे और वहीं के रिजॉर्ट में ठहरेंगे।दूसरे और तीसरे दिन जंगल सफारी पर जाएंगे। जिसमें दोनों दिन आप दो-दो जंगल सफारी करेंगे। एक लंच से पहले और एक लंच के बाद। चौथे दिन आप अपने घर के लिए वापस लौट जाएंगे। बांधवगढ़ नेशनल पार्क जाने का सबसे सही समय (Best time to visit Bandhavgarh National Park) अगर आप भी बांधवगढ़ नेशनल पार्क जाना चाहते हैं तो इसके लिए सबसे सही समय ठंड के मौसम में होता है। इसलिए आप अक्टूबर से मार्च तक के बीच कभी भी यहाँ जंगल सफारी के लिए जा सकते हैं। इस समय टेंपरेचर बहुत ज्यादा नहीं होता है। जिसके कारण जंगल सफारी करना आसान हो जाता है। बांधवगढ़ नेशनल पार्क कैसे पहुंचे (How to reach Bandhavgarh National Park)? अगर आप हवाई मार्ग से बांधवगढ़ नेशनल पार्क पहुंचाना चाहते हैं तो आपको जबलपुर हवाई अड्डा के लिए फ्लाइट की टिकट बुक करवानी होगी। जबलपुर हवाई अड्डा पहुंचकर वहां से आपको बांधवगढ़ नेशनल पार्क के लिए बाय रोड जाना होगा। जबलपुर हवाई अड्डा से बांधवगढ़ नेशनल पार्क की दूरी लगभग 200 किलोमीटर है। इसे आप अपनी सुविधा अनुसार लोकल ट्रांसपोर्ट या फिर कैब के द्वारा तय कर सकते हैं।अगर आप रेल मार्ग के द्वारा बांधवगढ़ पहुंचाना चाहते हैं तो बांधवगढ़ नेशनल पार्क से सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन उमरिया रेलवे स्टेशन और कटनी रेलवे स्टेशन हैं। बांधवगढ़ नेशनल पार्क से उमरिया रेलवे स्टेशन की दूरी लगभग 35 किलोमीटर है। वहीं कटनी रेलवे स्टेशन की दूरी लगभग 100 किलोमीटर की है।आप बाय रोड भी बांधवगढ़ नेशनल पार्क पहुंच सकते हैं।

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सतपुड़ा की रानी पंचमढ़ी की खूबसूरती है देखने लायक

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“पंचमढ़ी मध्य प्रदेश के सतपुड़ा पहाड़ियों के क्षेत्र में आता है और इसकी खूबसूरती के कारण इसे “सतपुड़ा की रानी” के नाम से जाना जाता है। पंचमढ़ी को मध्य प्रदेश का सबसे प्रसिद्ध हिल स्टेशन माना जाता है। आज के इस ब्लॉग में हम आपको बताएंगे पचमढ़ी के फेमस टूरिस्ट स्पॉट्स के बारे में । इसके साथ हीं मैं आपको यह भी बताऊंगी कि पंचमढ़ी का इतिहास क्या रहा है और यहां आप किस तरह से अपना टूर प्लान कर सकते हैं।” पंचमढ़ी का इतिहास (History of panchmarhi) अगर पंचमढ़ी के इतिहास की बात की जाए तो सबसे पहले इसके नाम के बारे में जानते हैं। पंचमढ़ी का नाम पंचमढ़ी पड़ने के पीछे का कारण यह है कि यहाँ पांडवों ने अपने वनवास के समय पांच गुफाओं का निर्माण करवाया था। जो यहां एक ऊंचे पर्वत के शिखर पर मौजूद है। आजादी के बाद 1955 तक पंचमढ़ी मध्य प्रदेश की समर कैपिटल हुआ करती थी। यहां अभी भी कई सारे प्रशासनिक भवन बने हुए हैं और कई मंत्रियों के आवास स्थल भी यही मौजूद हैं। ये हैं पंचमढ़ी के मुख्य आकर्षण (These are the main attractions of Panchmarhi) बी फॉल वॉटरफॉल (Bee waterfall) पंचमढ़ी में कई वॉटरफाल्स भी हैं जहां लगभग 150 फीट ऊपर से पानी गिरता है। इतनी ऊंचाई से पानी गिरने के कारण जब आप इस वॉटरफॉल के नीचे खड़े होंगे तो पानी के दबाव के कारण आपको ऐसा महसूस होगा कि कई सारी मधुमक्खियां मिलकर आपको काट रही हैं। इसीलिए इस वॉटरफॉल का नाम बी वॉटरफॉल रखा गया है। इस वॉटरफॉल का नामकरण अंग्रेजों द्वारा ही किया गया था और आज के समय में यह वॉटरफॉल पंचमढ़ी के सबसे मुख्य आकर्षणों में से एक है। इसके अलावा पंचमढ़ी में अप्सरा फॉल्स और सिल्वर फॉल्स भी है। जो अपनी अप्रतिम खूबसूरती के कारण लोगों का ध्यान अपनी और आकर्षित करती हैं। धूपगढ़ सनराइज एंड सनसेट पॉइंट (Dhupgarh sunrise and sunset point) धूपगढ़ पचमढ़ी के सबसे प्रसिद्ध टूरिस्ट अट्रैक्शन में से एक है। धूपगढ़ में एक पिक्चर गैलरी भी है। जहां पहुंचकर आपको पता लगेगा की सतपुड़ा के पंचमढ़ी में देखने के लिए क्या क्या है? धूपगढ़ का नाम धूपगढ़ इसलिए रखा गया क्योंकि पचमढ़ी में जब सूरज की पहली किरण पड़ती है तो वह इसी जगह पर पड़ती है और सूर्यास्त के समय सूरज की आखिरी किरण भी यही से विदा लेती है। इस पॉइंट से सूरज को सुबह के समय उगते हुए देखना और शाम के समय आकाश में लालिमा बिखेरते हुए धीरे धीरे अस्त होते देखना वाकई एक मनोरम दृश्य होता है। धूपगढ़ के इस बिंदु से दिखने वाले व्यू भी इतनी खूबसूरत होते हैं कि आप इस मूमेंट अपने लाइफ में कभी नहीं भूल पाएंगे। चारों ओर सतपुड़ा की हरी भरी पहाड़ियां, बादलों से भरा हुआ आकाश और उन बादलों को चीरते हुए निकल रही धूप की किरणें आपका मन मोह लेने में सक्षम होते हैं। बड़ा महादेव टेंपल (Bada Mahadev temple) पचमढ़ी के मेन मार्केट से बड़ा महादेव टेंपल की दूरी लगभग 10 किलोमीटर की है। इसके रास्ते में आपको कुछ व्यु पॉइंट्स भी देखने को मिलेंगे। जिनमें हांडी खोह, इको पॉइंट और प्रियदर्शनी व्यू पॉइंट प्रमुख हैं। जंगल के खूबसूरत नजारों का लुफ्त उठाते हुए जब आप बड़ा महादेव टेंपल के लिए आगे बढ़ेंगे तो कुछ दूर आपको पैदल भी चलना पड़ेगा। बड़ा महादेव मंदिर तक जाने वाला यह पैदल रास्ता बहुत ही खूबसूरत है। आप लगभग 2 मिनट तक इस रास्ते पर चलते हुए बड़ा महादेव मंदिर तक पहुंच जाएंगे। हमारी ओर से सुझाव रहेगा कि आप अपने साथ खाने का समान ना रखें। क्योंकि यहां बंदरों की बहुत ज्यादा आवाजाही है। इसलिए आप बंदरों से बच कर रहे। बड़ा महादेव टेंपल में भी बहुत सारे झरने हैं। जिन्हें देखना बहुत ही खूबसूरत सा एहसास होता है। बड़ा महादेव टेंपल पहुंच कर आपको स्पिरिचुएलिटी का सही अर्थ समझ में आएगा। क्योंकि यहां नेचर की गोद में बैठकर आप भगवान की पूजा अर्चना कर सकते हैं और ध्यान में मग्न हो सकते हैं। बड़ा महादेव टेंपल के बारे में बताया जाता है कि जब महादेव ने भस्मासुर को वरदान दिया कि वह जिसके भी सिर पर हाथ रखेगा वह भस्म हो जाएगा तब भस्मासुर अपनी शक्ति के घमंड में चूर होकर शिवजी को ही भस्म करने के लिए चल पड़ा। जिससे बचने के लिए महादेव इस गुफा में जाकर छुप गए थे। फिर विष्णु जी ने मोहिनी का रूप धारण करके भस्मासुर का वध किया। जिसके बाद महादेव यहां से बाहर आए। इस समय से इस गुफा में शिवलिंग स्थापित है और दूर-दूर से भक्त यहां पूजा करने के लिए आते हैं। खास कर नाग पंचमी के समय में आपके पूरे पंचमढ़ी में अलग ही दृश्य देखने को मिलेगा और इस मंदिर में भी नाग पंचमी के समय आपको बहुत ही भीड़ देखने को मिलेगी। पंचमढ़ी से बड़ा महादेव मंदिर के लिए आप अपनी गाड़ी से भी आ सकते हैं। इसके अलावा पचमढ़ी में गुप्त महादेव के दर्शन करने के लिए भी जा सकते हैं। पचमढ़ी के मार्केट से लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर ही आपको जटाशंकर महादेव टेंपल भी देखने को मिलेगा। जटाशंकर महादेव टेंपल के आसपास भी बहुत सारी गुफाएं हैं। पंचमढ़ी में करने लायक एक्टिविटीज (Things to do in panchmarhi) पंचमढ़ी में आप पैरासेलिंग, हॉर्स राइडिंग और बोटिंग जैसे कई एडवेंचरस एक्टिविटीज कर सकते हैं। पंचमढ़ी में नाइट सफारी की भी सुविधा उपलब्ध है। लेकिन इस समय आपको एनिमल्स दिखेंगे कि नहीं यह आपकी किस्मत पर डिपेंड करेगा। वैसे तो डे सफारी में भी एनिमल्स के दिखने के चांसेस बहुत ज्यादा नहीं होते हैं, लेकिन फिर भी डे सफारी में आप व्यूज का बहुत ही अच्छे से लुप्त उठा सकते हैं। लेकिन नाइट सफारी में व्यूज उतने क्लियर नहीं होते हैं। पंचमढ़ी कैसे पहुंचे (How to reach panchmadhi)? अगर आप पंचमढ़ी आना चाहते हैं तो इसके लिए आपको सबसे पहले भोपाल से 150 किलोमीटर दूर स्थित पिपरिया पहुंचना पड़ेगा। पिपरिया में एक रेलवे स्टेशन भी है। इसलिए आप पिपरिया बाय ट्रेन भी पहुंच सकते हैं। पिपरिया पहुंचने के बाद आप बस के द्वारा पंचमढ़ी के लिए निकल सकते हैं। जिसके लिए आपको ₹100 से ₹150 रुपए तक का