मध्य प्रदेश की 7 अनदेखी बावली, जानिए पूरा Baoli Trail
जब भी बावलियों की बात होती है, तो सबसे पहले राजस्थान की रानी की वाव और चाँद Baoli का नाम याद आता है। लेकिन मध्य प्रदेश में भी कई ऐसी पुरानी बावलियां मौजूद हैं, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। ये बावलियां इतिहास, वास्तुकला और पानी बचाने की पुरानी समझ का शानदार उदाहरण हैं। मध्य प्रदेश की इन बावलियों को करीब से देखने पर पता चलता है कि पुराने समय में पानी को बचाने के लिए कितनी सोच-समझकर काम किया जाता था। सीढ़ियों से नीचे जाते हुए अलग-अलग मंजिलें, पत्थरों पर बनी नक्काशी और पानी तक पहुंचने की पूरी व्यवस्था आज भी लोगों का ध्यान खींचती है।
अगर आपको इतिहास से जुड़ी शांत और कम भीड़ वाली जगहों पर घूमना पसंद है, तो मध्य प्रदेश का यह Stepwell Trail आपके लिए काफी खास हो सकता है। इस यात्रा में आप धार, मांडू, चंदेरी, ओरछा और विदिशा जैसी ऐतिहासिक जगहों को भी देख सकते हैं।
धार और मांडू से शुरू करें सफर
इस Stepwell Trail की शुरुआत धार से की जा सकती है। धार अपने किले, पुराने इतिहास और सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है। हालांकि बहुत कम लोग जानते हैं कि यहां पुरानी बावलियों और जल संरचनाओं के अवशेष भी देखने को मिलते हैं। धार के बाद आप मांडू की ओर जा सकते हैं। मांडू में रेवा कुंड काफी प्रसिद्ध है, लेकिन यहां चंपा Baoli, उजाली Baoli और अंधेरी बावड़ी जैसी कई पुरानी जल संरचनाएं भी मौजूद हैं।
इन जगहों को देखकर आसानी से समझ आता है कि उस समय पानी को जमा करने और जरूरत के समय इस्तेमाल करने के लिए कितनी अच्छी व्यवस्था बनाई गई थी। मांडू की खासियत यह है कि यहां पुरानी बावलियों के साथ महल, मस्जिद, मकबरे और दूसरे ऐतिहासिक स्मारक भी मौजूद हैं। इसलिए इस Stepwell Trail में आपको सिर्फ पानी की पुरानी संरचनाएं ही नहीं, बल्कि मांडू का पूरा इतिहास देखने को मिलता है।
मांडू की चंपा बावड़ी और उजाली बावड़ी
मांडू की चंपा बावड़ी पुरानी जल संरचनाओं का एक अच्छा उदाहरण मानी जाती है। इसके आसपास मौजूद ऐतिहासिक इमारतें इस जगह को और खास बना देती हैं। माना जाता है कि पुराने समय में यहां आने वाले लोगों और यात्रियों के लिए पानी की व्यवस्था की जाती थी।
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उजाली बावड़ी भी अपनी बनावट और मजबूती के लिए जानी जाती है। इसके नीचे जाने वाली सीढ़ियां और पत्थर की दीवारें आज भी उस समय के निर्माण कौशल की झलक दिखाती हैं। मांडू की बावलियां सिर्फ पानी जमा करने के लिए नहीं बनाई गई थीं। गर्मियों में नीचे का हिस्सा अपेक्षाकृत ठंडा रहता था, इसलिए लोग यहां कुछ समय आराम भी करते थे।
इंदौर के पास 250 साल पुरानी बावड़ी
इंदौर के पास कनाड़िया में करीब 250 साल पुरानी एक बावड़ी मौजूद है। इसे होलकर काल से जुड़ा हुआ माना जाता है। हाल के वर्षों में इस बावड़ी को संरक्षण देकर बेहतर स्थिति में लाने की कोशिश की गई है।
यह बावड़ी करीब 15 मीटर गहरी बताई जाती है। इसमें बारिश का पानी जमा करने और जरूरत के समय उसका इस्तेमाल करने की व्यवस्था बनाई गई थी।
आज जब पानी बचाने की जरूरत पहले से ज्यादा महसूस हो रही है, तब यह पुरानी बावड़ी हमें याद दिलाती है कि हमारे पूर्वज जल संरक्षण को लेकर कितने गंभीर थे।
इंदौर और उज्जैन के आसपास भी कई पुरानी बावलियां मौजूद हैं। इनमें से कुछ बावलियों की सफाई और मरम्मत का काम किया जा रहा है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस विरासत को देख सकें।
चंदेरी: जहां कभी बड़ी संख्या में बावलियां थीं
इस Stepwell Trail का सबसे दिलचस्प पड़ाव चंदेरी हो सकता है। चंदेरी अपनी खूबसूरत साड़ियों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है, लेकिन इसका इतिहास इससे कहीं ज्यादा पुराना और दिलचस्प है।
पुराने लेखों में चंदेरी में बड़ी संख्या में बावलियों का जिक्र मिलता है। समय के साथ इनमें से कई बावलियां खत्म हो गईं, लेकिन आज भी यहां कुछ ऐसी जल संरचनाएं मौजूद हैं जो इस शहर के पुराने दौर की कहानी सुनाती हैं। चंदेरी की गलियों में घूमते समय आपको कई पुराने महल, मंदिर, मस्जिद और ऐतिहासिक इमारतें दिखाई देंगी। इन्हीं के बीच मौजूद बावलियां इस शहर की पुरानी जल व्यवस्था की जानकारी देती हैं।
बत्तीसी बावड़ी की बनावट है बेहद खास
चंदेरी की बत्तीसी बावड़ी इस Stepwell Trail की सबसे खास जगहों में शामिल है। इसकी गहराई, सीढ़ियों की बनावट और पत्थरों की संरचना देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसे बनाने में कितनी मेहनत और योजना लगी होगी।
नीचे जाने पर इसकी सीढ़ियां और दीवारों की बनावट और साफ दिखाई देती है। ऊपर से देखने पर यह बावड़ी साधारण लग सकती है, लेकिन अंदर उतरने पर इसकी असली खूबसूरती सामने आती है।
बत्तीसी Baoli को देखकर यह भी समझ आता है कि पुराने समय में जल संरचनाओं को केवल उपयोगी नहीं, बल्कि सुंदर और मजबूत बनाने पर भी ध्यान दिया जाता था।
चकला बावड़ी भी है खास
चंदेरी की चकला बावड़ी भी अपनी अलग बनावट के लिए जानी जाती है। इसकी वास्तुकला में उस दौर की शाही शैली साफ दिखाई देती है। ऐसा माना जाता है कि इस तरह की बावलियों का इस्तेमाल केवल पानी लेने के लिए नहीं होता था। गर्मी के दिनों में लोग यहां बैठते थे और नीचे बने ठंडे हिस्सों में कुछ समय आराम करते थे।
इस Baoli को देखने पर समझ आता है कि पुरानी जल संरचनाएं किस तरह रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हुआ करती थीं। यहां पानी, आराम और सामाजिक मेल-जोल, तीनों की व्यवस्था एक साथ दिखाई देती है।
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राजमती बावड़ी की कहानी
चंदेरी के पास सिंहपुर गांव में राजमती बावड़ी भी मौजूद है। इसे 15वीं सदी से जुड़ा हुआ माना जाता है। इस बावड़ी से जुड़े शिलालेख इसके इतिहास के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं। माना जाता है कि इसके निर्माण का संबंध राजमती नाम की एक महिला से था। उस दौर में बावड़ी बनवाना केवल पानी जमा करने का काम नहीं था। इससे आसपास रहने वाले लोगों को पानी मिलता था और दूर-दराज से आने वाले यात्रियों को भी राहत मिलती थी।
राजमती बावड़ी इस Stepwell Trail की खास जगहों में शामिल है, क्योंकि यहां इतिहास के साथ उस समय की सामाजिक सोच की झलक भी मिलती है। चंदेरी में घूमते समय खुद को केवल प्रसिद्ध स्मारकों तक सीमित न रखें। इन पुरानी बावलियों को देखने से आपकी यात्रा और भी दिलचस्प बन सकती है।
ओरछा में भी छिपी है पुरानी Baoli
ओरछा का नाम आते ही ज्यादातर लोगों को राम राजा मंदिर, महल और किले याद आते हैं। लेकिन इस ऐतिहासिक शहर में कुछ ऐसी जगहें भी हैं जहां पर्यटक कम ही रुकते हैं। लक्ष्मीनारायण मंदिर के पीछे मौजूद पुरानी बावली ऐसी ही जगहों में शामिल है। इसकी बनावट काफी संकरी है और नीचे उतरते समय इसकी पुरानी पत्थर की सीढ़ियां और दीवारें साफ दिखाई देती हैं।
अगर आप मध्य प्रदेश की Baoli विरासत को करीब से देखना चाहते हैं, तो ओरछा को इस सफर में जरूर शामिल कर सकते हैं। यहां की बावली भले ही बहुत बड़ी न हो, लेकिन यह पुराने समय की जल व्यवस्था और निर्माण शैली की जानकारी जरूर देती है।
विदिशा में दिखती है पानी बचाने की पुरानी तकनीक
इस Stepwell Trail का अगला पड़ाव विदिशा हो सकता है। उदयगिरि की गुफाओं के आसपास पानी जमा करने की पुरानी तकनीक के कई उदाहरण देखने को मिलते हैं। यहां चट्टानों को काटकर बनाए गए जलाशय इस बात की जानकारी देते हैं कि पुराने समय में लोग पहाड़ी इलाकों में पानी को संभालकर रखने के लिए किस तरह की तकनीक अपनाते थे।
यह संरचनाएं पारंपरिक बावली जैसी दिखाई नहीं देतीं, लेकिन पानी बचाने की सोच इनसे बहुत पुरानी जुड़ी हुई है। इससे पता चलता है कि उस समय जल संरक्षण स्थानीय भूगोल और जरूरत के अनुसार किया जाता था।
Baoli की असली खूबसूरती नीचे उतरने पर दिखती है
इन जगहों पर पहुंचने के बाद केवल ऊपर से देखकर आगे बढ़ जाना सही नहीं होगा। Baoli की असली खूबसूरती इसकी सीढ़ियों से नीचे उतरने के बाद दिखाई देती है। जैसे-जैसे आप नीचे जाते हैं, तापमान कम महसूस होने लगता है। दीवारों पर बनी नक्काशी, पत्थरों के डिजाइन और पुराने निर्माण की बारीकियां ज्यादा साफ नजर आती हैं।
कई जगह फूलों के डिजाइन, जाली का काम और पुराने पत्थर के पैनल भी देखने को मिलते हैं। कुछ बावलियों में नीचे की तरफ इस्तेमाल किए गए पत्थरों और ऊपर की बनावट में अंतर दिखाई देता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि समय के साथ पानी का स्तर बदलने पर इन संरचनाओं में बदलाव और मरम्मत की गई होगी। यही वजह है कि हर Baoli अपने साथ केवल पानी की कहानी नहीं रखती, बल्कि उस समय के लोगों की जरूरतों, मेहनत और निर्माण कला के बारे में भी बताती है।
450 किलोमीटर का यह Trail कैसे पूरा करें?
अगर आप इस पूरे Baoli Trail को घूमना चाहते हैं, तो धार से शुरुआत करके मांडू, इंदौर, चंदेरी, ओरछा और विदिशा तक जा सकते हैं। पूरा रूट लगभग 450 किलोमीटर का हो सकता है, इसलिए अपनी कार या किराये की गाड़ी से जाना ज्यादा सुविधाजनक रहेगा। इस यात्रा के लिए अक्टूबर से फरवरी का समय बेहतर माना जा सकता है। इस दौरान मौसम अपेक्षाकृत ठंडा रहता है और पुराने स्मारकों को घूमने में ज्यादा परेशानी नहीं होती।
मानसून के दौरान पुरानी सीढ़ियों पर काई जम सकती है। इसलिए नीचे उतरते समय ज्यादा सावधानी रखनी चाहिए। कई जगहों पर Baoli के अंदर रोशनी की सुविधा भी नहीं होती, इसलिए छोटी टॉर्च साथ रखना अच्छा रहेगा। सुबह के समय इन जगहों पर जाना ज्यादा अच्छा रहता है। उस समय भीड़ कम मिलती है और पत्थरों पर पड़ने वाली प्राकृतिक रोशनी से पुरानी नक्काशी भी साफ दिखाई देती है।
यात्रा को कितने दिनों में पूरा करें?
अगर आप इस ट्रेल को आराम से देखना चाहते हैं, तो कम से कम चार से पांच दिन का समय रखें।
- पहले दिन धार और मांडू घूम सकते हैं।
- दूसरे दिन मांडू की बावलियों और आसपास के स्मारकों को देख सकते हैं।
- तीसरे दिन चंदेरी पहुंचकर बत्तीसी बावड़ी, चकला बावड़ी और राजमती बावड़ी देख सकते हैं।
- चौथे दिन ओरछा के महल, मंदिर और पुरानी Baoli घूम सकते हैं।
- पांचवें दिन विदिशा और उदयगिरि की जल संरचनाओं को देखा जा सकता है।
इस तरह आप बिना जल्दबाजी के बावलियों के साथ-साथ मध्य प्रदेश की ऐतिहासिक विरासत को भी समझ पाएंगे।
इन बावलियों को बचाना क्यों जरूरी है?
आज पानी की कमी और भूजल स्तर में गिरावट बड़ी समस्या बन चुकी है। ऐसे समय में पुरानी Baoli को केवल एक ऐतिहासिक इमारत मानकर छोड़ देना सही नहीं होगा। पुराने समय में ऐसी संरचनाएं बारिश का पानी जमा करने और आसपास के लोगों की जरूरत पूरी करने में मदद करती थीं। कई जगहों पर इनका इस्तेमाल यात्रियों और स्थानीय लोगों के लिए पानी के स्रोत के रूप में भी होता था।
अगर इन पुरानी संरचनाओं की सफाई और मरम्मत सही तरीके से की जाए, तो कुछ जगहों पर इन्हें दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है। इससे इतिहास भी बच सकता है और पानी बचाने की पुरानी सोच को भी समझा जा सकता है। मध्य प्रदेश की यह Baoli विरासत अभी भी देश के कई लोकप्रिय पर्यटन स्थलों की तरह चर्चा में नहीं है। शायद यही इसकी सबसे बड़ी खासियत है। यहां आपको बड़ी भीड़ के बजाय पुराने पत्थर, शांत गलियां और इतिहास से जुड़ी कई छोटी-बड़ी कहानियां देखने को मिलती हैं।
यात्रा के दौरान इन बातों का ध्यान रखें
पुरानी Baoli में कई जगहों पर सुरक्षा की व्यवस्था सीमित हो सकती है। इसलिए किसी भी बंद हिस्से में जबरदस्ती प्रवेश न करें और स्थानीय प्रशासन के निर्देशों का पालन करें। सीढ़ियां असमान या फिसलन वाली हो सकती हैं। नीचे उतरते समय रेलिंग या दीवार का सहारा लें और बच्चों को अकेले आगे न जाने दें।
कई Baoli के अंदर मोबाइल नेटवर्क कमजोर हो सकता है। इसलिए यात्रा शुरू करने से पहले जरूरी जानकारी अपने फोन में सेव कर लें। इन जगहों पर खाने-पीने की दुकानें हर जगह नहीं मिलतीं। इसलिए पानी की बोतल और हल्का नाश्ता साथ रखना अच्छा रहेगा।
FiveColorsOfTravel की ओर से खास सुझाव
- टॉर्च जरूर रखें: पुरानी बावलियों के अंदर कई जगह काफी अंधेरा हो सकता है। छोटी टॉर्च आपके बहुत काम आएगी।
- सुबह जाएं: सुबह का समय कम भीड़ और बेहतर रोशनी के लिए अच्छा रहता है। इस समय पत्थरों की नक्काशी भी साफ दिखाई देती है।
- अच्छे जूते पहनें: पुरानी सीढ़ियां असमान, टूटी या फिसलन वाली हो सकती हैं। इसलिए अच्छे ग्रिप वाले जूते पहनकर जाएं।
- स्थानीय गाइड लें: गाइड के साथ आपको हर Baoli से जुड़ी स्थानीय कथा और ऐतिहासिक जानकारी बेहतर तरीके से समझ आएगी।
- दीवारों को नुकसान न पहुंचाएं: नक्काशी को छूने, उस पर लिखने या पत्थरों को नुकसान पहुंचाने से बचें।
- पानी और हल्का नाश्ता रखें: कई बावलियां दूरदराज के इलाकों में हैं, इसलिए जरूरी सामान पहले से साथ रखें।
मौसम देखकर यात्रा करें: अक्टूबर से फरवरी तक का समय इस ट्रेल के लिए सबसे सुविधाजनक रहेगा। बरसात के बाद फिसलन और काई की वजह से सावधानी ज्यादा जरूरी होती है।
मध्य प्रदेश की ये पुरानी बावलियां शायद सोशल मीडिया पर उतनी मशहूर न हों, लेकिन अगर आपको इतिहास, वास्तुकला और कम भीड़ वाली जगहें पसंद हैं, तो यह Baoli Trail आपकी अगली यात्रा के लिए एक अलग तरह का अनुभव दे सकता है। यहां घूमते हुए आपको यह समझने का मौका मिलेगा कि पुराने समय में लोग पानी को केवल रोजमर्रा की जरूरत नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाकर रखने वाली अनमोल चीज मानते थे। यही सोच मध्य प्रदेश की इन अनदेखी बावलियों को राजस्थान की प्रसिद्ध बावड़ियों से अलग और खास बनाती है।