Travel News: 35 फीट ऊंची चट्टान पर बना भारत का वो अजेय किला, जहां की वास्तुकला और नजारे देख विदेशी भी रह जाते हैं दंग
Travel News ग्वालियर । भारत का इतिहास और यहाृं की प्राचीन धरोहरें हमेशा से ही वैश्विक पर्यटन का मुख्य केंद्र रही हैं। जब भी देश के सबसे अजेय, वास्तुकला से भरपूर और रणनीतिक रूप से मजबूत किलों की चर्चा होती है, तो मध्य प्रदेश का ग्वालियर किला सबसे पहले दिमाग में आता है। गोपांचल नामक एक ऊंची और खड़ी पहाड़ी पर स्थित यह विशालकाय किला आज भी अपने भीतर सदियों पुरानी गौरवगाथाओं और अनगिनत रहस्यों को समेटे सीना ताने खड़ा है। Travel News, Best places to visit in Madhya Pradesh
अपनी अभेद्य भौगोलिक बनावट और सुरक्षा संरचना के कारण इस किले को भारत का जिब्राल्टर कहा जाता है। इसकी भव्यता और वास्तुकला की खूबसूरती का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मुगल सम्राट बाबर ने इसे ‘हिंद के किलों का मोती’ नाम दिया था। आइए इस ट्रैवल गाइड के जरिए विस्तार से जानते हैं कि, आखिर क्यों यह ऐतिहासिक धरोहर आज भी दुनिया भर के पर्यटकों और ऑफबीट ट्रैवलर्स के लिए सबसे पसंदीदा डेस्टिनेशन बनी हुई है। Travel News, Man Singh Palace Gwalior Tourism
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Travel News- ग्वालियर किले का इतिहास: अजेयता की वो कहानी जो रूह कंपा दे
ऐतिहासिक दस्तावेजों और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, ग्वालियर किले का निर्माण 8वीं शताब्दी में राजा सूरज सेन द्वारा करवाया गया था। यह किला विंध्यन बलुआ पत्थर की एक विशालकाय पहाड़ी पर स्थित है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसकी बाहरी सुरक्षा दीवारें लगभग 35 फीट ऊंची और दो मील के दायरे में फैली हुई हैं। Invincible Forts of India, Gwalior Fort Architecture
सदियों के इतिहास में इस किले ने कई बड़े राजनीतिक और सांस्कृतिक बदलाव देखे हैं। तोमर राजवंश के राजा मानसिंह तोमर के शासनकाल में इस किले को इसकी सबसे खूबसूरत वास्तुकला और पहचान मिली। तोमर राजाओं के बाद इस पर मुगलों, मराठों और अंत में अंग्रेजों का नियंत्रण रहा। इल्तुतमिश और मोहम्मद गोरी जैसे कई बाहरी आक्रमणकारियों ने इस किले को जीतने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी, लेकिन इसकी अभेद्य दीवारों को सीधे युद्ध में भेद पाना लगभग नामुमकिन था।
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ग्वालियर किले के अंदर कदम रखते ही इतिहास प्रेमियों को एक अनोखा सांस्कृतिक फ्यूजन देखने को मिलता है। चूंकि इस पर कई अलग-अलग संस्कृतियों के राजाओं ने राज किया, इसलिए यहां हिंदू, राजपूत, और इस्लामिक वास्तुकला का एक अद्भुत मेल दिखाई देता है।
1. मान मंदिर महल
राजा मानसिंह तोमर द्वारा बनवाया गया यह महल किले का सबसे प्रमुख आकर्षण है। इसे ‘पेंटेड पैलेस’ भी कहा जाता है। इसके बाहरी हिस्सों पर फिरोजी, हरे और पीले रंग की चीनी मिट्टी की टाइल्स से बत्तखों, हाथियों और मोरों की जो आकृतियां बनाई गई हैं, वे आज 500 साल बाद भी उतनी ही जीवंत और चमकदार नजर आती हैं।
2. गुजरी महल
यह महल राजा मानसिंह और उनकी गूजर रानी ‘मृगनयनी’ की अमर प्रेम कहानी का प्रतीक है। पहाड़ी के निचले हिस्से में स्थित यह खूबसूरत महल अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का एक प्रसिद्ध संग्रहालय बन चुका है, जहां पहली शताब्दी की दुर्लभ मूर्तियां और ऐतिहासिक अवशेष सहेज कर रखे गए हैं।
3. सास-बहू और तेली का मंदिर
किले के परिसर में स्थित ‘तेली का मंदिर’ उत्तर भारतीय नागर शैली और दक्षिण भारतीय द्रविड़ शैली के मिश्रण से बना एक अनोखा चमत्कारी ढांचा है, जिसकी ऊंचाई करीब 23 मीटर है। इसके ठीक पास स्थित ‘सास-बहू मंदिर‘ भगवान विष्णु को समर्पित है, जिसकी दीवारों पर की गई महीन नक्काशी और लाइट-शैडो का खेल देखकर विदेशी सैलानी हैरान रह जाते हैं।
सिख इतिहास और आस्था का केंद्र: दाता बंदी छोड़ गुरुद्वारा
ग्वालियर किले का धार्मिक लिहाज से बहुत बड़ा महत्व है। मुगल काल के दौरान सम्राट जहांगीर ने इस किले को एक राजनीतिक कारागार के रूप में इस्तेमाल करना शुरू किया था। यहाँ सिखों के छठे गुरु, गुरु हरगोबिंद साहिब जी को दो साल तक नजरबंद रखा गया था।
जब वे मुगलों की कैद से आजाद हुए, तो उन्होंने अपने साथ 52 हिंदू राजाओं को भी सम्मानपूर्वक रिहा करवाया। गुरु साहिब की इसी महानता और त्याग की याद में किले के भीतर ‘दाता बंदी छोड़ गुरुद्वारा’ का निर्माण किया गया, जहां आज भी देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु और शांति की तलाश करने वाले मुसाफिर माथा टेकने आते हैं।
चट्टानों को काटकर बनाई गईं जैन तीर्थंकरों की गगनचुंबी मूर्तियां
यदि आप किले की चढ़ाई ‘उरवाही गेट’ के रास्ते से करते हैं, तो गोपांचल पर्वत की खड़ी चट्टानों को काटकर बनाई गईं जैन तीर्थंकरों की गगनचुंबी मूर्तियां आपका स्वागत करती हैं। 15वीं शताब्दी में तोमर राजाओं के काल में बनी इन मूर्तियों में भगवान आदिनाथ की लगभग 58 फीट ऊंची विशालकाय प्रतिमा मौजूद है। हालांकि मुगल आक्रमण के दौरान इन्हें क्षति पहुँचाने की कोशिश की गई, लेकिन आज भी इनका वैभव और शांति देखने लायक है।
ट्रैवलर गाइड: ग्वालियर किला कैसे पहुंचें?
परिवहन मार्ग: ग्वालियर शहर दिल्ली, आगरा, जयपुर और भोपाल जैसे बड़े शहरों से रेल और सड़क मार्ग के जरिए बेहतरीन तरीके से जुड़ा हुआ है। ग्वालियर रेलवे स्टेशन से किला मात्र 3 से 4 किलोमीटर की दूरी पर है।
घूमने का सही समय: अक्टूबर से लेकर मार्च तक के सर्दियों के महीने यहाँ की यात्रा के लिए सबसे आरामदायक माने जाते हैं।
स्पेशल अट्रैक्शन: शाम के समय किले के प्रांगण में होने वाला ‘लाइट एंड साउंड शो’ बिल्कुल मिस न करें, जिसमें सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की दमदार आवाज में इस अजेय किले का इतिहास जीवंत हो उठता है।