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Golden Temple Amritsar: दर्शन, लंगर, नियम और अन्य जानकारी

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अमृतसर का Golden Temple (श्री हरमंदिर साहिब) भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के सबसे सम्मानित और पवित्र धार्मिक स्थलों में से एक माना जाता है। यह सिर्फ सिख धर्म का सबसे बड़ा तीर्थ स्थल नहीं है, बल्कि इंसानियत, सेवा, समानता और भाईचारे का भी एक अद्भुत प्रतीक है। हर दिन हजारों श्रद्धालु और पर्यटक यहाँ माथा टेकने, शांति महसूस करने और इस ऐतिहासिक स्थल की खूबसूरती देखने आते हैं। Golden Temple की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहाँ किसी भी धर्म, जाति या देश का व्यक्ति बिना किसी भेदभाव के आ सकता है। मंदिर के चारों ओर बने चार प्रवेश द्वार इस बात का प्रतीक हैं कि यह स्थान पूरी मानवता के लिए खुला है। रात के समय जब रोशनी की चमक सरोवर के पानी में दिखाई देती है, तो यह दृश्य किसी जादुई तस्वीर जैसा लगता है। अगर आप अमृतसर की यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो यह गाइड आपके लिए बेहद उपयोगी साबित होगी। Golden Temple पहुँचने का सबसे अच्छा समय और मंदिर की टाइमिंग्स Golden Temple की एक खास बात यह है कि इसके दरवाजे साल के 365 दिन और दिन-रात 24 घंटे श्रद्धालुओं के लिए खुले रहते हैं। हालांकि किसी भी समय दर्शन किए जा सकते हैं, लेकिन कुछ धार्मिक रस्में ऐसी हैं जिन्हें देखने का अनुभव बेहद खास माना जाता है। सुबह तड़के होने वाली पालकी साहिब सेवा के दौरान गुरु ग्रंथ साहिब को अकाल तख्त से हरमंदिर साहिब तक लाया जाता है। यह नज़ारा श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक रूप से भावुक कर देता है। इसी तरह रात में गुरु ग्रंथ साहिब को सम्मानपूर्वक वापस अकाल तख्त ले जाया जाता है। इन दोनों अवसरों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहते हैं। अगर मौसम की बात करें तो नवंबर से अप्रैल के बीच का समय Golden Temple घूमने के लिए सबसे अच्छा माना जाता है। इस दौरान पंजाब का मौसम सुहावना रहता है और घूमने में परेशानी नहीं होती। गुरु नानक देव जी का प्रकाश पर्व और बैसाखी जैसे बड़े पर्व भी इसी दौरान आते हैं, जिससे पूरे अमृतसर का माहौल बेहद खास हो जाता है। वहीं अगर आप भीड़ से बचना चाहते हैं तो सप्ताह के सामान्य दिनों में दोपहर या शाम के समय जाना बेहतर रहेगा। ड्रेस कोड और प्रवेश के जरूरी नियम: जिनका पालन करना है अनिवार्य स्वर्ण मंदिर की पवित्रता और मर्यादा बनाए रखने के लिए कुछ नियमों का पालन करना हर आगंतुक के लिए जरूरी है। सबसे पहला नियम है कि मंदिर परिसर में प्रवेश करने से पहले सिर ढंकना अनिवार्य है। चाहे पुरुष हों या महिलाएँ, सभी को रुमाल, दुपट्टा, स्कार्फ या कपड़े से अपना सिर ढंकना पड़ता है। अगर आपके पास कुछ नहीं है तो प्रवेश द्वार पर निशुल्क कपड़ा उपलब्ध कराया जाता है। कपड़ों के मामले में भी शालीनता का ध्यान रखना चाहिए। बहुत छोटे कपड़े, स्लीवलेस ड्रेस या ऐसे कपड़े जो धार्मिक स्थल के अनुरूप न हों, पहनने से बचना चाहिए। आरामदायक और सभ्य कपड़े पहनना सबसे अच्छा विकल्प माना जाता है। मंदिर में प्रवेश से पहले जूते और मोजे उतारकर जोड़ा घर में जमा करने होते हैं। इसके बाद प्रवेश द्वार पर बने पानी के कुंड में पैर धोकर अंदर प्रवेश किया जाता है। यह परंपरा स्वच्छता और सम्मान का प्रतीक मानी जाती है। इसके अलावा मंदिर परिसर में तंबाकू, सिगरेट, शराब, गुटखा या किसी भी प्रकार का नशा ले जाना पूरी तरह प्रतिबंधित है। यहाँ तक कि च्यूइंग गम और कई बार सनग्लासेस पहनकर प्रवेश करने से भी मना किया जाता है। फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी के नए नियम (SGPC के निर्देश) पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के कारण Golden Temple में फोटो और वीडियो बनाने को लेकर कई नए दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। मंदिर प्रशासन चाहता है कि श्रद्धालु यहाँ की आध्यात्मिक गरिमा को बनाए रखें और इसे केवल कंटेंट बनाने की जगह न समझें। मंदिर परिसर के भीतर वीडियो रिकॉर्डिंग पर कड़े नियम लागू हैं। मुख्य गर्भगृह के अंदर फोटोग्राफी पूरी तरह प्रतिबंधित है। बाहरी परिक्रमा क्षेत्र में कुछ तस्वीरें ली जा सकती हैं, लेकिन इसके दौरान भी मर्यादा और शांति बनाए रखना जरूरी है। सोशल मीडिया रील्स, डांस वीडियो, प्रैंक वीडियो या धार्मिक वातावरण को प्रभावित करने वाली किसी भी गतिविधि पर प्रशासन सख्त कार्रवाई कर सकता है। इसलिए यहाँ आने वाले पर्यटकों को सलाह दी जाती है कि वे इस स्थान को एक धार्मिक स्थल के रूप में सम्मान दें और नियमों का पालन करें। लंगर और सेवा: दुनिया की सबसे बड़ी सामुदायिक रसोई का अनुभव Golden Temple का लंगर पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इसे दुनिया की सबसे बड़ी सामुदायिक रसोइयों में गिना जाता है। यहाँ हर दिन हजारों लोग मुफ्त भोजन करते हैं और सबसे खास बात यह है कि भोजन पाने वालों में किसी तरह का भेदभाव नहीं किया जाता। जब लोग एक साथ जमीन पर बैठकर भोजन करते हैं, तो इसे ‘पंगत’ कहा जाता है। यह परंपरा समानता का संदेश देती है। चाहे कोई करोड़पति हो या मजदूर, सभी एक ही कतार में बैठकर एक जैसा भोजन ग्रहण करते हैं। यहाँ आने वाले श्रद्धालु सेवा में भी हिस्सा ले सकते हैं। कोई बर्तन धोता है, कोई रोटियाँ बनाता है, कोई सब्जियाँ काटता है तो कोई लंगर परोसता है। यही सेवा भावना स्वर्ण मंदिर की सबसे बड़ी पहचान मानी जाती है। कई लोग बताते हैं कि सेवा करने का अनुभव उनके लिए दर्शन से भी अधिक यादगार बन जाता है। Golden Temple में ठहरने की व्यवस्था: निशुल्क और बजट विकल्प अगर आप स्वर्ण मंदिर के पास रुकना चाहते हैं, तो यहाँ श्रद्धालुओं के लिए कई सराय और निवास उपलब्ध हैं। गुरु राम दास निवास, गुरु नानक निवास और श्री गुरु अर्जन देव निवास सबसे लोकप्रिय विकल्पों में शामिल हैं। इन स्थानों पर साधारण लेकिन साफ-सुथरे कमरे उपलब्ध होते हैं। कुछ जगहों पर डोरमेट्री की सुविधा भी मिल जाती है। यहाँ ठहरने के लिए ऑनलाइन बुकिंग की सुविधा नहीं होती, इसलिए पहुँचकर ही कमरा लेना पड़ता है। कमरा लेने के लिए पहचान पत्र दिखाना जरूरी होता है। हालाँकि रहने की व्यवस्था मुफ्त या बहुत कम खर्च में होती है, लेकिन श्रद्धालु अपनी श्रद्धा अनुसार दान दे सकते हैं। परिवार के साथ यात्रा

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Amritsar- आस्था और सुकून का शहर

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मुझे जब भी अपने व्यस्त शेड्यूल में या रोज़मर्रा की ज़िंदगी में थोड़े सुकून के पल चाहिए होते हैं तब अनायास ही यात्रा का ख्याल आता है। जब कभी ऐसा लगता है कि इस तनावपूर्ण और भागदौड़ भरी ज़िंदगी से थोड़ी निजात चाहिए तब मेरे पास अंतिम विकल्प यात्रा का ही बचता है। इस बार कार्यक्रम बना अमृतसर का। वो भी प्रसिद्ध त्यौहार बैसाखी के अगले दिन। स्टेशन से उतरते ही फ्री बस बैसाखी के त्यौहार की शुरुआत भारत के पंजाब राज्य से ही हुई है और इसे रबी की फसल की कटाई शुरू होने की ख़ुशी के रूप में मनाया जाता है। बैसाखी के दिन गोल्डन टेम्पल को जगमगाती लाइटों से सजाया जाता है। देश भर से सिख श्रद्धालु इस दिन अमृतसर पहुँचते हैं। बैसाखी से अगले दिन जाने का फायदा ये हुआ कि भीड़ इतनी नहीं थी। वैसे अमृतसर घूमने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च ही रहता है। हम हिसार से अमृतसर ट्रैन से पहुंचे। स्टेशन से उतरते ही बाहर फ्री बस सेवा का भी इंतेज़ाम रहता है जो ‘सतनाम वाहेगुरु’ के जयकारें लगाते हुए सीधे गोल्डन टेम्पल ले जाती है। गुरूद्वारे पहुँचते-पहुँचते रात के 11 बज चुके थे। हमनें अंदर परिसर में ही स्थित गंगा निवास में वातानुकूलित रूम बुक करवाया था। भले ही अप्रैल के महीने में ठीक-ठाक गर्मी होती है पर अंदर परिसर में ठंडक थी। थोड़ा आराम करने के बाद जैसे ही हमनें हरमंदिर साहिब में कदम रखा एक हमें अलग ही वातावरण की अनुभूति हुई। और लगा जैसे यहाँ आना पूरी तरह सार्थक हो गया। मेन हाल में दर्शन के लिए लम्बी-लम्बी लाइनें लगी हुयी थी। सुबह तड़के पालकी के दर्शन किये। दर्शन के लिए भले ही भीड़ कितनी ही क्यों न हो पर थकान जरा-सी भी नहीं होती, बस यही खासियत है यहाँ की। परमात्मा एक है और वो सब जगह मौज़ूद है।एक औंकार, सतनाम करता पुरख निरभउ निरवैर…… गोल्डन टेम्पल में दिन रात शब्द कीर्तन और गुरुबाणी चलती रहती है जो दुनिया की भाग दौड़ से थके हारे मन को रूहानी सुकून देती है। अद्भुत और अलौकिक गुरुद्वारा स्वर्ण मंदिर में प्रवेश के लिए चार द्वार है जो इस बात के प्रतीक हैं की यहाँ के दरवाज़े हर धर्म के लोगो के लिए खुले हैं। रात में जगमगाती रौशनी में संगमरमर और सोने के आवरण से बना यह गुरुद्वारा अद्भुत और अलौकिक लगता है। दुनिया की सबसे बड़ी रसोई अंदर परिसर में ही दुनिया की सबसे बड़ी रसोई में से एक गुरु के लंगर में रोज़ाना हज़ारों लोग प्रशाद रूप में भोजन ग्रहण करते है। इतनी बेहतरीन व्यवस्था, इतना स्वाद और इतना अपनापन। सच में अद्भुत। इसी कारण कहते हैं अमृतसर में कोई भूखा नहीं सोता। पवित्र जल के तालाब के बीचों-बीच गुरुद्वारा साहिब है व चारों तरफ बड़ा-सा प्रांगण है। जहाँ आपको सैंकड़ों श्रद्धालु सिमरन करते मिल जायेंगे। गुरूद्वारे में एक भव्य म्यूजियम भी है जहां सिख धर्म से जुडी ऐतिहासिक चीज़ें रखी गयी है। गुरुओं की देन- अमृतसर शहर वैसे तो अमृतसर को देश विदेश में सब जानते हैं लेकिन दरबार साहिब (गोल्डन टेम्पल ) इस शहर की लाइफ लाइन है। पूरा अमृतसर शहर गोल्डन टेम्पल के इर्द गिर्द ही बसा हुआ है। अमृतसर शहर गुरुओं की देन माना जाता है। चौथे गुरु रामदास जी ने पांच सौ बीघा जमीन लेकर यह शहर बसाया था। तभी इसका नाम पड़ा रामदासपुर। महाराज रंजीत सिंह ने हरमिंदर साहिब पर उन्नीसवीं शताब्दी में सोने का आवरण चढ़वाया था और तब से अमृतसर को स्वर्ण नगरी भी कहा जाने लगा। एक शहर के तौर पर देखें तो यह सिर्फ अपने गुरुद्वारों के लिए प्रसिद्ध नहीं है बल्कि कौमी एकता का एक बेहतरीन उदाहरण भी है – यहाँ जहां एक तरफ बेहद खूबसूरत दुर्गियाना मंदिर है वहीँ आज़ादी की लड़ाई की गवाह दिल्ली की जामा मस्जिद जैसी दिखती खैरउद्दीन मस्जिद भी है। जहाँ हज़ारों लोग इबादत के लिए आते हैं।(Golden Temple, Amritsar) वाघा बॉर्डर अमृतसर शहर से 30-32 किलोमीटर एकऔर डेस्टिनेशन है वाघा बॉर्डर। यहाँ पर रोज़ शाम को दोनों देशों के सिपाहियों द्वारा बहुत ही जोशीले ढंग से अपने-अपने राष्ट्रीय ध्वज को वापिस उतरा जाता है। इस दौरान देशभक्ति का ऐसा रंग चढ़ जाता है जिसकी कल्पना करना भी सम्भव नहीं। यहाँ की ये जोशीली परेड देखने के लिए आपको समय से पहले ही जाना पड़ता है वरना भीड़ इतनी हो जाती है कि वहां पर खड़े होने की भी जगह नसीब नहीं होती। जलियावालां बाग अमृतसर में ही भारत की आज़ादी के इतिहास का साक्षी प्रसिद्ध जलियावालां बाग भी है। आज जलियावालां बाग एक पर्यटक स्थल बन गया है और रोजाना हजारों सैलानी इसे देखने आते हैं। यहाँ की दीवार पर आज भी उन गोलियों के निशान मौज़ूद हैं जो जनरल डायर ने निहत्थी भीड़ पर चलवाई थी जिसमे हज़ारों लोग मारे गए थे। अमृतसर शहर के पुराने बाजार आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं जैसे किसी ज़माने में हुआ करते थे। आप शाम के समय पैदल ही बाजार की सैर पर निकल सकते हैं। भीड़-भाड़ वाले ये बाजार एक बार तो आपको चांदनी चौक की याद दिला देंगे। अगर आप खाने के शौकीन हैं तो अमृतसर आपके लिए किसी जन्नत से कम नहीं होगा। अमृतसर लस्सी, छोले भटूरे, राजमा चावल और पिन्नी का स्वाद पूरी दुनिया में मशहूर है। बात चाहे धार्मिक आस्था की हो, इतिहास की हो, संस्कृति की या फिर खानपान की, अमृतसर का कोई सानी नहीं। by Pardeep Kumar