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ये हैं देश के सबसे खूबसूरत और बड़े रेलवे स्टेशन

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देश के सबसे सुंदर रेलवे स्टेशनों(beautiful Railway stations) के लिस्ट में सबसे ऊपर लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन का नाम आता है।यह ब्रिटिश काल की एक भव्य रचना है जो कि अंदर और बाहर दोनों से ही काफी आश्चर्यजनक और लुभावनी है। रेलवे स्टेशन को ऊपर से देखने पर इसकी आकृति चेसबोर्ड जैसी दिखती है जो कि काफी आकर्षक होती है साथ ही स्टेशन बनाए गए खंबे और गुंबद चेस की गोटी जैसी दिखती है। अगर हम इमारत को ध्यान से देखें तो वहां हमें इमारत की वास्तुकला में मुगल, राजपूत और अवधी संस्कृति की झलक भी मिलती है। ‌ 2.कानपुर रेलवे स्टेशन (Kanpur Railway Station) यह स्टेशन ना केवल भारत में सबसे बड़ा(Largest Railway station) है बल्कि सबसे ज्यादा व्यस्त भी है। भारत के चार प्रमुख केंद्र रेलवे स्टेशनों में से एक है। कानपुर रेलवे स्टेशन को लखनऊ के चारबाग स्टेशन के तर्ज पर ही बनाया गया है। 3.हावड़ा रेलवे स्टेशन (Howrah Railway Station) हावड़ा रेलवे स्टेशन भारत का सबसे पुराना स्टेशन है। जिसे 1854 में बनाया गया था। इसके 23 प्लेटफार्म, हर दिन 10 लाख लोगों को सेवा प्रदान करते हैं। हुगली नदी के तट पर स्थित होने की वजह से यह स्टेशन काफी अमेजिंग लगता है। 4. जैसलमेर रेलवे स्टेशन(Jaisalmer Railway Station) जैसा कि नाम में ही रॉयल की झलक रही है, यह स्टेशन भी काफी रॉयल है रेगिस्तान के मध्य स्थित यह भूरे रंग की इमारत है। यह स्टेशन पश्चिम रेलवे चित्र का एक हिस्सा है जोधपुर और जैसलमेर के बीच एक लिंक बनाता है। 5. कटक रेलवे स्टेशन (Cuttack Railway Station)इस स्टेशन की खासियत यह है कि इस एक माह का विश्लेषण के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि 1896 में टैरिफ के लिए इसे खोला गया। इसका डिजाइन बाराबती किले के वास्तुकार से प्रभावित है, जो कि कलिंग क्षेत्र में सीरवी शताब्दी में निर्मित एक अद्भुत वास्तुशिल्प कृति है। कटक का आर्किटेक्चर काफी अनोखा है और लुभावना भी।(Architectural wonders of Indian Railways) 6. छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (Chhatarpati Shivaji Terminus)1888 में निर्मित यह रेलवे स्टेशन, आर्थिक राजधानी मुंबई में स्थित है। स्टेशन को इसकी पुराने नाम विक्टोरिया टर्मिनस के नाम से भी जाना जाता है जो कि ब्रिटेन की रानी के नाम पर रखा गया था। बाहर से देखने रेलवे स्टेशन फाइव स्टार की तरह ही नायाब दिखता है।(Iconic Railway Station) 7. चेन्नई सेंट्रल रेलवे स्टेशन (Chennai Railway Station)चेन्नई सेंट्रल या मद्रास सेंट्रल, जिसका नाम सबसे पुराने स्टेशनों में गिना जाता है। इस स्टेशन को दक्षिण के प्रवेश द्वार के रूप में भी जाना जाता है। स्टेशन की ऊंची लाल बिल्डिंग आंखों को बहुत ज्यादा अट्रैक्ट करती है। 8. विजयवाड़ा रेलवे स्टेशन (Vijaywada Railway Station)आंध्र प्रदेश में स्थित यह स्टेशन बेहद खूबसूरत(Stunning Railway Station) है। इसकी सफेद इमारत इसे और भी ज्यादा सुंदर बनाती है।

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5 Best Tourist Places to Visit in Jodhpur | Rajasthan | 2023

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मेहरानगढ़ का किला और इस फ़ेहरिस्त में सबसे पहले आता है- भारत के सबसे पुराने और विशाल किलों में से एक मेहरानगढ़ का किला जिससे भारत के समृद्धशाली अतीत की अनोखी झलक मिलती है। क्योंकि मेहरानगढ़ का यह किला देश के सबसे बड़े किलों में से एक है और बेहद ऊंचाई पर भी स्थित है  इसलिए आपको यह जोधपुर शहर के किसी भी हिस्से से दिखाई देगा। आपको जानकर थोड़ी हैरानी होगी कि मेहरानगढ़ का किला आज भी जोधपुर की रॉयल फेमिली के संरक्षण में है। जोधपुर का शाही परिवार ही किले का रख रखाव कर रहा है।  शायद यही कारण है कि यहाँ की एंट्री टिकट भारतीय टूरिस्ट के लिए भी 200 रुपए की है। देश के बाकी किलों की तुलना में यह थोड़ा ज्यादा लगता है। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि किले को देखने के बाद यह पूरा पैसा वसूल लगता है। क्योंकि यह किला काफी बड़ा है और संरचनात्मक तौर पर शानदार भी, इसलिए इसको अच्छे से विजिट करने के लिए चार से पांच घंटे अवश्य रिज़र्व रखें। यह ऐतिहासिक किला भारत में सर्वाधिक लोकप्रिय किलों में से एक हैं। यह किला करीब 125 मीटर की ऊंचाई पर बना है। 15वीं शताब्दी में इस किले की नींव राव जोधा ने रखी थी, जो रणमल के चौबीस पुत्रों में से एक पन्द्रहवां  राठौर राजा था। मेहरानगढ़ का यह किला भारत की समृद्धि व महानता का प्रतीक माना जाता है और प्राचीन समय मे की गई कारीगरी और खूबसूरत नक्काशी का बेजोड़ नमूना है। देश की अन्य बेहद प्रसिद्ध इमारतों की तरह  मेहरानगढ़ किले का निर्माण भी सुंदर बलुआ पत्थरों से किया गया है। यह किला धरातल से लगभग 400 फिट की ऊंचाई पर है। मेहरानगढ़ किले के भीतर कई भव्य महल अद्भुत नक्काशी वाले दरवाजे अनेकों जालीदार खिड़कियां देखने लायक है। मेहरानगढ़ फोर्ट भारत के सबसे पुराने किलों में से एक है, जो भारत के मजबूत और गौरवशाली इतिहास को खुद में समेटे है. मेहरानगढ़ किले का म्यूजियम राजस्थान के बेहतरीन और फेमस म्यूजियम में से एक है., जिसमें राजा-महाराजाओं की पोशाकें और उनके हथियार रखे गए हैं. साथ ही, उनके रहन-सहन, दैनिक जीवन और संस्कृति से जुड़ी चीजें आज भी यहां मौजूद हैं। यह पढ़ना न भूलें : Jaisalmer: जैसलमेर – रेगिस्तान, शानदार किलों, पुरानी हवेलियों और राजसी ठाठ-बाट का शहर जसवंत थड़ा आप अगर जोधपुर विजिट करने निकले हैं तो जसवंत थड़ा देखना बिलकुल न भूलें। मेहरानगढ़ फोर्ट के बिलकुल पास में स्थित जसवंत थड़ा जोधपुर राजपरिवार का मेमोरियल है।  जसवंत थड़ा  जोधपुर शहर से लगभग 10  किमी. की दूरी पर स्थित है, जो सफेद संगमरमर से बना हुआ है, जिसे “मारवाड़ का ताजमहल” भी कहते है। जसवंत थड़ा की संरचना तो ताजमहल जैसी नहीं दिखती है, लेकिन सफेद संगमरमर से बना जसवंत थड़ा ताजमहल जैसा ही लगता है। दोस्तों आपको बता दें कि जोधपुर में स्थित जसवंत थड़ा को देखने के लिए हर साल लाखों पर्यटक देश और विदेश से आते हैं। अगर आप भी जोधपुर शहर में जा रहे हैं, तो जसवंत थड़ा को विजिट जरूर करें।जसवंत थड़ा में जाने के लिए भारतीय पर्यटकों के लिए एंट्री टिकट  30 रुपए  है और विदेशी पर्यटकों का एंट्री टिकट  50 रुपए है। उम्मेद भवन पैलेस मेहरानगढ़ फोर्ट के बाद जोधपुर की दूसरी सबसे खूबसूरत जगह है उम्मेद भवन पैलेस। मण्डोर गार्डन जोधपुर में एक और बेहतरीन जगह है मण्डोर गार्डन। इस स्थान का प्राचीन नाम माण्डवपुर था। यह पुराने समय में मारवाड़ राज्य की राजधानी हुआ करता था। पौराणिक कथाओं के अनुसार रावण का ससुराल हुआ करता था। यहाँ सदियों से होली के दूसरे दिन रावण का मेला लगता है। मारवाड़ की प्राचीन राजधानी मण्डोर जोधपुर के उत्तर में स्थित है। यहां जोधपुर के  शासकों के स्मारक एवं छतरियां हैं। राजस्थान स्थापत्य कला से बनी परम्परागत छतरियों की अपेक्षा ये हिन्दू मंदिरों की संरचना पर आधारित है। यहाँ पर्यटकों के लिए एंट्री बिलकुल फ्री है।  लेकिन यहाँ पर बने म्यूजियम में जाने के लिए आपको 25 रुपए का टिकट लेना पड़ेगा। कायलाना झील अगर आप पहाड़ियों के बीच खूबसूरत झील में बोटिंग का आनंद लेना चाहते हैं तो जोधपुर की कायलाना झील एक बेहतरीन विकल्प है। जैसलमेर रोड पर यह कायलाना झील, एक सुंदर पिकनिक स्पॉट है। माछिया सफारी जैसलमेर मार्ग पर कायलाना झील से लगभग 1 किलोमीटर दूर माछिया सफारी उद्यान स्थित है। यह एक पक्षीविहार है। यहां हिरण, रेगिस्तान की लोमड़ियां, विशाल छिपकली, नीलगाय, ख़रगोश, जंगली बिल्लियां, लंगूर, बंदरों जैसे कई पशु पाये जाते हैं। यह बायोडायवर्सिटी पार्क सूर्यास्त के खूबसूरत दृश्य के लिए भी फेमस है। यह पढ़ना न भूलें : अलवर फोर्ट सफारी – दिल्ली के नजदीक लीजिये जंगल सफ़ारी का मजा घंटाघर बाजार जोधपुर शहर के बीचोबीच स्थित ऐतिहासिक घंटाघर बाजार यहाँ आने वाले टूरिस्ट्स को अपनी और जरूर आकर्षित करता है। जोधपुर शहर के बीच में स्थित घंटाघर का निर्माण जोधपुर के महाराजा श्री सरदार सिंह ने करवाया था। यहां के सबसे व्यस्त सदर बाज़ार में स्थित यह घंटाघर अद्भुत व ऐतिहासिक है। सदर बाजार देशी व विदेशी पर्यटकों में काफी लोकप्रिय है। यहां राजस्थानी वस्त्र, लाख की चूड़ियां, स्थानीय छपाई के कपड़े, मिट्टी की मूर्तियां व बर्तन, खिलौने, पीतल, लकड़ी व संगमरमर के बने ऊँट-हाथी और मार्बल-इन-ले में बना सजावटी सामान प्रचुर मात्रा तथा उचित दामों पर मिलता है। चांदी के जड़ाऊ गहने खरीदने के लिए भी यह उपयुक्त स्थान है। कब जाएँगर्मियों के मौसम में जोधपुर की यात्रा करने की बजाए अगस्त, सितंबर, फरवरी और मार्च के महीनों के दौरान यात्रा करें। क्योंकि अप्रैल से जुलाई तक पूरे राजस्थान में चिलचिलाती गर्मी पड़ती है। आज के इस ब्लॉग में फ़िलहाल इतना ही, फिर मिलते हैं किसी नए ब्लॉग में किसी नयी डेस्टिनेशन पर। तब तक हँसते रहिये, मुस्कुराते रहिये ।।

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The Most Haunted Places in India

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ऐसी जगह जो अपने खौफनाक किस्सों के कारण दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं और जिनका इतिहास आपको हैरान कर देगा(The Most Haunted Places in India) Research By Sakshi Joshi/ Edited by Pardeep Kumar भानगढ़ का किला,  Indian Ghost Town of Bhangarh और इस लिस्ट में सबसे पहले नंबर पर है राजस्थान का भानगढ़ फोर्ट।अरावली की पहाड़ियों के बीच बसा भानगढ़ का किला अपने आप में बहुत लम्बा इतिहास समेटे हुए है। भानगढ़ का किला जयपुर और अलवर शहर के बीच सरिस्का से 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस भव्य किले का निर्माण 17 वीं शताब्दी में राजा माधो सिंह, महान मुगल सेनापति, आमेर के मान सिंह के छोटे भाई द्वारा करवाया गया था। शाही महल के अलावा, भानगढ़ में 1720 तक 9,000 से अधिक घर थे जिसके बाद धीरे-धीरे ये आबादी में कम हो गई। पूरी बस्ती के साथ भानगढ़ किला लगातार तीन किलेबंदी और पांच विशाल दरवाजों से सुरक्षित था। इस किले के परिसर के भीतर भव्य हवेलियों, मंदिरों और सुनसान बाजारों के अवशेष हैं, जो किले की विराटता और समृद्धता का संकेत देते हैं। यह जगह भूत प्रेत की वजह से ज्यादा जानी जाती है, भानगढ़ किला फिर भी अपने शांत वातावरण, सुंदर अरावली पर्वत के कारण पर्यटकों की भीड़ को आकर्षित करता है। ऐसी ही यहाँ के लोगों में बेहद प्रचलित एक दूसरी कहानी राजकुमारी रत्नावती से जुड़ी है, जो बहुत सुंदर थी और देश के शाही परिवारों के कई प्रेमी काले जादू में माहिर थे। एक जादूगर को राजकुमारी से प्यार हो गया। जैसे ही राजकुमारी एक दिन अपने दोस्तों के साथ खरीदारी करने गई, जादूगर ने उसे इत्र या कहें कि परफ्यूम खरीदते हुए देखा और इत्र को एक प्रेम दवाई से बदल दिया। हालाँकि, राजकुमारी को जादूगर की चाल का पता चला और उसने दवाई को पास के एक विशाल पत्थर पर फेंक दिया। इसके कारण वह विशाल पत्थर जादूगर की ओर लुढ़क गया और उसकी कुचलकर मौत हो गई। लेकिन मौत के मुंह में जाने से पहले, उसने शहर को यह कहते हुए शाप दिया कि इसे जल्द ही नष्ट कर दिया जाएगा और कोई भी इसके परिसर में नहीं रह पाएगा। बाद में आक्रमणकारी मुगल सेनाओं द्वारा राज्य को बर्खास्त कर दिया गया, जिससे किले के सभी निवासियों को राजकुमारी रत्नावती के साथ मार दिया गया। जैसा कि इसे एक भूतिया स्थान माना जाता है, भानगढ़ का किला सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद पर्यटकों के लिए बंद रहता है। भानगढ़ किले की ये कहानियां इसलिए भी और अधिक खौफनाक लगती हैं क्योंकि ASI यानी Archaeological Survey of India ने भानगढ़ के किले को भारत की सबसे डरावनी जगहों में सबसे ऊपर रखा है। बाकायदा यहाँ इस विषय में सूचना पट लगाया गया है जिसमें ये साफ़ दर्ज़ है कि सूर्योस्त के बाद यहाँ किसी भी व्यक्ति का आना वर्जित है। अग्रसेन की बावली Agrasen ki Baoli,New Delhi दिल्ली के दिल कनॉट प्लेस में स्थित यह खूबसूरत अग्रसेन की बावली कब और किसके द्वारा बनाई गई इसका कोई स्पष्ट ऐतिहासिक रिकॉर्ड नहीं है। हालांकि कई इतिहासकारों का कहना है कि इसका निर्माण किसी और ने नहीं बल्कि अग्रोहा के महान राजा अग्रसेन द्वारा किया गया था। और फिर 14 वी शताब्दी में इसका पुनर्निर्माण तुगलक वंश या लोधी वंश के दिल्ली पर शासन के दौरान किया गया। ऐसा कहा जाता है कि यहां पर कुएं के अंदर जानलेवा काला पानी है। यह आत्मघाती काला पानी लोगों को अपने वाश में कर लेता है। और इसके पास जाने पर यह लोगों को आत्महत्या करने पर मजबूर तक कर देता है। जैसे ही लोग सीढ़ियों से पानी की ओर जाते हैं, तो उन्हें ऐसा लगता है जैसे कोई अदृश्य शक्ति उन्हें अपनी ओर खींच रही है। ऐसी कितनी ही कहानियां इस बावड़ी के बारे में अच्छी खासी प्रसिद्ध हैं। और कहते हैं ना कि इन्ही कहानियों से भूतिया किरदार गढ़े जाते हैं और ऐसी पुराणी सुनसान जगह डरावनी बन जाती हैं। लेकिन अग्रसेन की बावली को अक्सर दिल्ली की सबसे खूबसूरत जगहों में गिना जाता है। यह जगह फिल्म शूटिंग के लिए बॉलीवूड द्वारा बहुत पसंद की गई है। अग्रसेन की बावली को कई फिल्मों में दिखाया गया है और यह दिल्ली में प्रसिद्ध फिल्म शूटिंग स्थानों में से एक है। पुणे का शनिवारवाड़ा, Shaniwar Wada, Pune भले ही देश में बहुत से लोग शनिवार वाड़ा (महल) के बारे में न जानते हो। पर घुम्मकड़ और खासकर मराठी लोग इसके बारे में बखूबी जानती हैं। शनिवार वाड़ा महाराष्ट्र के पुणे में स्थित है, जिसका निर्माण मराठा-पेशवा साम्राज्य को बुलंदियों पर ले जाने वाले बाजीराव पेशवा ने करवाया था। यह महल 1732 में यह पूरी तरह बनकर तैयार हो गया था। कहा जाता है कि उस समय इसे बनाने में करीब 16 हजार रुपये खर्च हुए थे। तब के समय में यह राशि बहुत अधिक थी। उस समय इस महल में करीब 1000 लोग रहते थे। यह एक एतिहासिक महल है, जो कभी मराठा साम्राज्य की आन-बान और शान हुआ करता था, लेकिन आज से करीब 246 साल पहले इस महल में एक ऐसी घटना घटी थी, जिसकी गूंज आज भी सुनाई देती है। जिसकी वजह से ही लोग इस महल को रहस्यमय मानते हैं। कहते हैं कि इसी महल में 30 अगस्त 1773 की रात 18 साल के नारायण राव की हत्या कर दी गई थी, जो मराठा साम्राज्य के नौवें पेशवा बने थे। कहा जाता है कि उनके चाचा ने ही उनकी हत्या करवाई थी। आस-पास के लोगों का कहना है कि आज भी अमावस्या की रात महल से किसी की दर्द भरी आवाज सुनाई देती है, जो बचाओ-बचाओ चिल्लाती है। और यही कहानी इस जगह को डरावना बनाने के काफी है। आज भी लोग शाम के समय इस महल के आस पास से गुजरना भी नहीं चाहते। जैसलमेर का कुलधरा गांव, The Ghost Village बहुत सी जगह हैं जो अपने रहस्यमयी कारणों के चलते चर्चाओं में बनी रहती हैं। ऐसी ही जगहों में से एक है जैसलमेर का कुलधरा गांव। कहा जाता पिछले सैंकड़ों सालों से यह जगह शापित है। पर सवाल ये है कि ऐसा क्या हुआ था इधर कि सिर्फ एक रात में यहां लगभग 600 घरों

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Best Places & Best Timings to Visit in Udaipur

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Udaipur Trip: झीलों का शहर- उदयपुर by Pardeep Kumar लॉकडाउन से पहले उदयपुर का प्रोग्राम बना। अक्टूबर का महीना और झीलों का शहर, ऐसे जैसे किसी सपने का सच हो जाना। क्योंकि कई बार एक शहर सिर्फ शहर नही होता बल्कि आपकी ज़िंदगी का एक अहम् ठहराव बन जाता है, आपके जज़्बातों का, ख्यालों का और दिल के धड़कने का ज़रिया बन जाता है। उदयपुर उन्ही शहरों में से एक है जिनके ख़्वाब देख कर मैं बड़ा हुआ। महाराजा उदय सिंह का बसाया उदयपुर शहर यकीनन राजा-महाराजाओं की विरासत का सबसे खूबसूरत प्रमाण है। अपनी इसी ख़ूबसूरती के कारण उदयपुर आज भी फ़िल्मी दुनिया के तमाम निर्माता-निर्देशकों की पहली पसंद है।(Udaipur) लेक व्यू होटल हम दिल्ली से उदयपुर ट्रैन से पहुंचे। टैक्सी ली और चल पड़े अपने होटल की और। हालांकि होटल पहले ही बुक कर दिया था लेकिन फिर भी किस्मत से होटल मिला उदयपुर के बेहद खास मंदिर जगदीश टेम्पल के बिलकुल पास में। और इतने पास में की होटल के रूम से मंदिर साफ़ दिखाई दे रहा था। पुराने उदयपुर शहर और लाल घाट के पास। सामने दूर तक फैली हुई पिछौला झील के पानी में चमकता सिटी पैलेस बस होटल के पैसे वसूल करवा रहा था। उदयपुर में लेक व्यू होटल लेने का ये सबसे बड़ा फ़ायदा है। एक बात आप अवश्य ध्यान रखिये की जब भी उदयपुर का ट्रिप बने होटल आप लेक व्यू देखकर ही बुक करें। रूफ टॉप पर शाम की चाय हो और सामने नीली झील को निहारने का अवसर। यकीन मानिये आपका पूरा टूर शानदार बन जायेगा। देश के सबसे रोमांटिक शहरों में से एक- उदयपुर वैसे उदयपुर देश के सबसे रोमांटिक शहरों में से एक है। जहां देखों वहीं पानी से लबालब झीलें गर्मियों में भी ठंडक का अहसास कराती हैं और ये तो फिर भी अक्टूबर का महीना था। दिन में ठीक-ठाक गमी थी, लेकिन रात थोड़ा-थोड़ा सर्दी का अहसास दे रही थी। दिन में, शहर में सड़कों पर ट्रैफिक और भीड़-भाड़ न के बराबर, इसलिए ज्यादा तपिश महसूस नही होती। वैसे उदयपुर में महल, हवेली, मंदिर , बाग और म्यूजियम हर चीज की भरमार है लेकिन जो एक चीज इसे दूसरे शहरों से जुदा करती है वो है चारों ओर झीलें ही झीलें- मानो जन्नत के बेइंतहां नजारे! यहां घूमने और देखने योग्य चार झीलें हैं -पिछौला लेक, फ़तेह सागर, उदय सागर और रंग सागर। चारों झीलें एक नहर से आपस में जुड़ी हैं। सिटी पैलेस की दीवार से सटकर पिछौला लेक है। और दूध तलाई नाम की झील पास ही है। किसी जमाने में यहां दूध बिकता था और आज पूजा-अर्चना होती है।(Udaipur) किस समय यहाँ आना सबसे बेहतर लम्बे सफ़र के बाद हम दिल्ली से उदयपुर ट्रैन से पहुंचे थे और वो भी सुबह-सुबह के वक़्त। इसलिए वक़्त का तकाज़ा था कि थोड़ा आराम कर लिया जाए। दो-तीन घटे आराम करने के बाद हमने होटल में ही चाय-नाश्ता किया। राजस्थान में हों और नाश्ते में पोहा न खाएं तो बस ये तो फिर राजस्थानी खान-पान के साथ एक तरह से ज्यादती है। आप राजस्थान के किसी भी शहर में चले जाएं, पोहा आपको हर जगह आसानी से मिल ही जाएगा। वैसे तो साल भर यहाँ पर्यटकों का आना लगा रहता है लेकिन फिर भी अक्टूबर से मार्च का महीना यहाँ आने के लिए बेस्ट रहता है। बहुत से पर्यटक यहाँ मानसून में आना पसंद करते हैं। बारिशों में यहाँ झील का दीदार करना बेहद सुखद अनुभव है। आप जब भी किसी टूरिस्ट जगह पर घूमने जाएं तो बेहतर यही होता है की अच्छे से घूमने की प्लानिंग करें ताकि इत्मीनान से सभी जगह दखने का, खाने-पीने का, खरीददारी करने का सही ढ़ंग से लुत्फ़ उठा सकें। सो हमने उदयपुर घूमने का एक शेड्यूल बनाया और उसी के अनुसार निकल पड़े, सबसे पहले फ़तेह सागर झील के पास स्थित सहेलियों की बाड़ी। Best Place to Visit in Udaipur-सहेलियों की बाड़ी देश के मशहूर बागों में शुमार सहेलियों की बाड़ी नाम का यह सुन्दर बाग हरियाली और झर-झर बहते फव्वारों के लिए खूब जाना जाता है। इस बाग़ की खूबसूरती के कारण न जाने कितनी ही फिल्मों के बेहतरीन गीत यहाँ फिल्माए जा चुके हैं। बताते हैं कि इसे महाराणा संग्राम सिंह (द्वितीय) ने 1710 से 1734 के बीच राज परिवार की महिलाओं के सैरगाह के लिए बनवाया था। इसीलिए इसका नाम सहेलियों की बाड़ी रखा गया।     बाग के कई भाग हैं जिनके बेहद खूबसूरत नाम भी रखे गए हैं जैसे- सावन भादो, हाथी फव्वारें, बिन बादल बरसात और रास लीला आदि। बताते हैं कि पहले फ़तेह सागर झील के करीब छोटे-छोटे बहुत सारे बाग़-बगीचे थे। इन्हें महाराणा फ़तेह सिंह ने सहेलियों की बाड़ी में मिलाकर शानदार और भव्य रूप दे दिया। हमने बाग़ की सुंदरता का खूब आनंद लिया और तकरीबन दो घंटे से भी ज्यादा का समय यहाँ बिताया, बाग़ में बने सुन्दर-सुन्दर हाथियों और माहौल को खुशनुमा बना रहे फव्वारों के साथ खूब सारे फोटो लिए, वीडियो बनाई। आखिर यादें ही तो हैं जिनकों संजो कर रखा जा सकता है। इसलिए आप उदयपुर आये और इस बाग़ को न देखा तो समझ लीजिये आप जन्नत के एक लाज़वाब टुकड़े के दीदार से महरूम रह गए। अगले पड़ाव की तरफ बढ़ते तब तक भूख ने शोर मचाना शुरू कर दिया था। सो सहेलियों की बाड़ी के पास ही बड़ा बाजार है जहां बहुत सारे छोटे-बड़े भोजनालय आपको आसानी से मिल जायेंगे। लेकिन हमने दोपहर के भोजन में राजस्थानी थाली को तवज्जो दी। भारत में किसी भी शहर में घूमने का सीधा मतलब होता है अच्छे दृश्यों के साथ-साथ उस जगह के खाने की चीजों के स्वाद लेना। क्योंकि जब भी आप कहीं घूमने जाए अगर खाना वहां का स्पेशल न हो तो फिर आप शायद खाने के शौक़ीन नही हैं। थाली में राजस्थान का पारम्परिक भोजन दाल-चूरमा-बाटी के साथ लहसुन मिर्च की चटनी और तीखी सब्जियों के साथ तवे की रोटी सच में अद्भुत संजोग था। खाना अच्छा लगा इसलिए खूब खाया। दोपहर के भोजन के बाद हम शेड्यूल के हिसाब से चल पड़े सिटी पैलेस देखने। सिटी पैलेस देखने का समय सुबह 9 से शाम 5 बजे तक है। सिटी पैलेस में

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The Great Wall of India – Kumbhalgarh

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Kumbhalgarh Fort: कुम्भलगढ़ – ग्रेट वॉल ऑफ इंडिया by Pardeep Kumar जबसे मेरी विशेष रूचि भारत का इतिहास जानने में हुई खासकर बड़े-बड़े किलों और महलों का, तब से कुम्भलगढ़ की दीवार के बारे में खूब सुना था। चौदहवीं सदी में बना कुम्भलगढ़ परकोटा दुनिया भर में अपनी अलग पहचान रखता है। चीन की दीवार के बाद कुम्भलगढ़ के परकोटे की चौड़ाई सबसे अधिक है।(Kumbhalgarh Fort) किस समय यहाँ आना सबसे बेहतर राजस्थान के राजसमन्द जिले में स्थित कुम्भलगढ़ के किले को इत्मीनान से देखने के लिए आपको पूरा एक दिन लग ही जाता है। अपने शेड्यूल के हिसाब से हम सुबह 11 बजे तक कुम्भलगढ़ पहुँच गए थे। पार्किंग से कुम्भलगढ़ किले तक जाने के दो तरीके हैं एक आप लगभग दो किलोमीटर चढ़ाई पैदल चलें, दूसरा वहां बहुत सारी जीप आपको मिल जाएँगी जिसमें सौ रुपए सवारी के हिसाब से वो किले तक पहुंचा देंगे। जहाँ से आपको टिकट लेना और अंदर प्रवेश करना है। अक्टूबर का महीना था इसलिए अभी 11 बजे तक इतनी खास गर्मी नहीं थी। पानी और कुछ खाने पीने का सामान अपने पास अवश्य रखें क्योंकि ये किला बहुत बड़ा है, ऊपर से पूरे किले में सिर्फ चढ़ाई ही चढ़ाई है जोकि अमूमन सभी किलों में होती ही है। लेकिन यहाँ आपको सीढियां भी बहुत चढ़नी पड़ेंगी इसलिए शारीरिक और मानसिक रूप से अपने आप को मजबूत रखें। वैसे तो साल भर यहाँ पर्यटकों का आना लगा रहता है लेकिन फिर भी अक्टूबर से मार्च का महीना यहाँ आने के लिए बेस्ट रहता है। क्योंकि देखा जाए तो राजस्थान में साल भर गर्मी ही रहती है। कुंभलगढ़ का किला राजस्थान के किलों का अपना एक अलग समृद्ध इतिहास है, जो इसे देसी-विदेशी सैलानियों के लिए आकर्षण का केन्द्र बनाता है। यहां के किले व महल अपनी बनावट के कारण अनजाने ही लोगों को अपनी ओर खींचते हैं। वैसे राजस्थान के लगभग सभी किले चाहे वो जैसलमेर का सोनार किला हो या जयपुर का आमेर या जयगढ़ का किला सभी सैलानियों में अच्छे खासे प्रसिद्ध हैं, लेकिन फिर भी कुंभलगढ़ का किला अपना एक अलग महत्व रखता है। वो इसलिए कि इस किले की खासियत है उसकी दीवार, जिस पर चार घुड़सवार एक साथ चल सकते हैं।(Kumbhalgarh Fort) दुनिया के सात आश्चर्यों में से एक चीन की दीवार के बारे में तो सब जानते हैं, लेकिन यहाँ आपको बता दें कुंभलगढ़ को भी ग्रेट वॉल ऑफ इंडिया कहा जाता है। चित्तौड़गढ़ किले के बाद कुंभलगढ़ किला राजस्थान का दूसरा सबसे बड़ा किला माना जाता है। यूनेस्को द्वारा वर्ल्ड हेरिटेज घोषित यह किला मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप का जन्मस्थान है। इस किले को युद्ध में कभी भी जीता नहीं गया। कहते हैं हल्दी घाटी के युद्ध के बाद महाराणा प्रताप भी काफी समय तक इसी किले में रहे। कुम्भलगढ़ किला परिसर बता दें किसी समय कुम्भलगढ़ किला परिसर में छोटे-बड़े लगभग 400 मंदिर होते थे। कुछ एक मंदिरों को छोड़कर बाकी अब नष्ट हो गए हैं। किले के मुख्य दरवाजे से जैसे ही प्रवेश करते हैं वैसे ही सामने दाहिने हाथ की तरफ नीलकंठ महादेव जी का एक भव्य मंदिर दिखाई देता है। मुख्य दरवाजे से अंदर जाते ही मंदिर की तरफ छोटा-सा बाजार बना हुआ है जहाँ आप खाने-पीने से लेकर हल्की-फुल्की खरीददारी कर सकते हैं। आपकी चढ़ाई इस किले के सबसे ऊपरी हिस्से में बादल महल व कुम्भा महल में जाकर समाप्त होती है, बदल महल से आप दूर-दूर तक फैली हुई अरावली श्रंखला की ख़ूबसूरती निहार सकते हैं। हमनें वहां से आसपास के खूबसूरत नज़ारों को कैमरे में कैद किया। किले में कई जगह ऐसी हैं जहाँ से आप कुम्भलगढ़ की दीवार को भी देख सकते हैं जिससे इस किले की विशालता का सहज ही अनुमान हो जाता है। अबुल फजल किले की ऊंचाई के विषय में लिखते हैं “यह दुर्ग इतनी बुलंदी पर बना हुआ है कि नीचे से ऊपर की तरफ देखने पर सिर से पगड़ी गिर जाती है।“ सच कहूं तो इस ऐतिहासिक किले का अनुभव बेहद शानदार रहा। यहाँ से लौटने के बाद मन सोचने पर विवश हो जाता है कि किस तरह इंसान जीवन के किस्से लिखता है और साम्राज्यों की कहानियां भी। और भले ही इन किलों की गर्वीली कहानियां कितनी ही पुरानी क्यों न हो जाये लेकिन फिर भी सदियों तक दोहराई जाती रहेंगी। (Kumbhalgarh Fort) Written by Pardeep Kumar Glimpse of Kumbhalgarh Fort….

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Best Places to Visit in Jaisalmer

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Jaisalmer: जैसलमेर – रेगिस्तान, शानदार किलों, पुरानी हवेलियों और राजसी ठाठ-बाट का शहर by Pardeep Kumar पिछले काफी अरसे से मैं राजस्थान घूमने का प्लान कर रहा था। क्योंकि राजस्थान शब्द सुनते ही ज़ेहन में खूबसूरत महलों, शानदार किलों और वीरों के इतिहास की झांकी तैरने लगती है। पूरा राजस्थान ऐतिहासिक सांस्कृतिक और प्राकृतिक सौंदर्य से जगमग है। यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज यह “रजवाड़ों की धरती” भारत के सबसे बड़े पर्यटक स्थलों में से एक है। मीलों तक फैली सुनहरी रेत पर अनेक विजय गाथाओं के साक्षी रहे यहाँ के दुर्ग, पिंक सिटी, झीलों का शहर, गोल्डन सिटी, बीकानेरी भुजिया, गजब वास्तुकला, मुँह में पानी लाने वाले व्यंजन, आदिवासी गाँव, तीर्थ स्थल और रंगीन त्यौहार जैसी अनोखी चीज़ें न केवल राजस्थान को दूसरों से अलग करती है बल्कि नायाब भी बनाती हैं।(Jaisalmer) और अगर आपको सोने जैसी रेत वाला रेगिस्तान, शानदार किलें, पुरानी हवेलियां और राजसी ठाठ-बाट की झलक देखनी हो तो हो देश के पश्चिमी कोने में स्थित जैसलमेर से बेहतरीन दूसरा कोई डेस्टिनेशन नहीं। हम दिल्ली से सम्पर्क क्रांति एक्सप्रेस ट्रैन से जैसलमेर के लिए रवाना हुए । लगभग 15 घंटे के सफर के बाद हम जैसलमेर रेलवे स्टेशन पर पहुंचे। शायद उस समय रात के एक बजे थे। होटल बुक था और उन्होंने टैक्सी पहले ही भेज दी थी इसलिए किसी तरह की कोई परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा। जब भी आप ट्रैन से ऐसे किसी भी डेस्टिनेशन पर जाएँ तो होटल और टैक्सी का इंतज़ाम पहले ही कर लें। आजकल सब ऑनलाइन है इसलिए बहुत ज्यादा चिंता की बात है नहीं। मेरे लिए यात्रा का मतलब सिर्फ घूमना कभी नहीं रहा। यात्रा मेरे लिए हमेशा से अपना सर्वोत्तम समय व्यतीत करना रहा है। चाहे जिस भी डेस्टिनेशन की यात्रा का प्रोग्राम बने, वहां के परिवेश को समझना और किस तरह ये रहन-सहन हमारे परिवेश से अलग है, ये भी जानना मुझे हमेशा से ही अच्छा लगता रहा है। बचपन में परिवार के साथ घूमने का कार्यक्रम बनता था, पर वक़्त के साथ जैसे बड़े हुए, कमाने लगे या यूँ कह लीजिये आर्थिक रुप से मजबूत हुए तो यात्रायें करना थोड़ा आसान हो जाता है , फिर तो जब भी मन किया निकल पड़े किसी नई जगह। क्योंकि अगर आप आर्थिक रूप से थोड़े सक्षम हैं तो फिर किसी तरह की कोई टेंशन नहीं रहती आपका जहाँ मन करें उड़ जाइये। खूब घूमिये और खान-पान का आनंद लीजिये। किस समय यहाँ आना सबसे बेहतर वैसे तो साल भर यहाँ पर्यटकों और खरीददारों का आना लगा रहता है लेकिन फिर भी अक्टूबर से मार्च का महीना यहाँ आने के लिए बेस्ट रहता है। क्योंकि देखा जाए तो राजस्थान में साल भर गर्मी ही रहती है। आप जब भी कहीं घूमने जाएँ, किस दिन कहाँ जाना है? क्या देखना है? सब का शेड्यूल पहले ही बना लें। इसका फायदा ये होता है आप बिना किसी फालतू की आपाधापी के इत्मीनान से उस जगह को विजिट कर लेते हैं। इसलिए हमने अगले तीन दिन का पूरा शेड्यूल बना लिया था।(Jaisalmer) गोल्डन फोर्ट (सोनार किला) सुबह हमने नाश्ते में स्वादिष्ट पोहा और कड़क चाय को प्राथमिकता दी। एक प्याला कड़क चाय आपके सफर को ऊर्जामयी बना देता है। अच्छे से नाश्ता किया और निकल पड़े जैसलमेर के किले की तरफ। यहां जाएं तो सबसे पहले दिन के समय में जैसलमेर किला विजिट कर लें। क्योंकि एक तो ये काफी बड़ा है दूसरा बेहद खूबसूरत भी। इसे सोनार किला कहते हैं और यह दुनिया के सर्वश्रेष्ठ रेगिस्तानी किलों में से एक माना जाता है। सुबह-सुबह के समय जब सूरज की चमकीली किरणें इस किले पर पड़ती हैं तो यह पीले रंग से दमक उठता है। यह सोनार किला पीले सेन्ड स्टोन पत्थरों को जोड़कर बनाया गया है। ये किला जितना खूबसूरत है उतने ही रोचक तरीके से इसका निर्माण भी हुआ है। इस किले को राजपूत राजा रावल जैसल ने बनवाया था। इस किले के चारों ओर बनाये गए गढ़ों से आप इसकी विशालता और भव्यता का आंकलन कर सकते हैं। हम जैसे ही किले के मुख्य द्वार पर पहुंचे शानदार नक्काशी और वास्तुकला का नमूना देखने को मिला। यहाँ आने वाले पर्यटकों को लुभाने के लिए जैसे ये मुख्य द्वार ही काफी है। मुख्य द्वार के पास से ही परम्परागत वस्तुओं की खरीददारी के लिए बाजार शुरू हो जाता है। जहाँ से आप ट्रेडिशनल चीजों की शॉपिंग कर सकते हैं। वैसे इस किले में अखे पोल, सूरज पोल, गणेश पोल और हवा पोल नामक चार दरवाजे हैं। किले में अंदर आपको मोती महल, रंग महल और राज विलास जैसे स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूने दिखाई देंगे। किले के अंदर ही खूबसूरत जैन मंदिर भी है। यह किला शहर के बीचों-बीच बना हुआ है। दिन के समय सूरज की रोशनी में इस किले की दीवारे हल्के सुनहरे रंग की दिखती है. इसी कारण इस किलें को सोनार किला या गोल्डन फोर्ट के नाम से भी जाना जाता है। देश भर में अनेक किले ऐसे हैं जिनको आलीशान होटलों में बदल दिया गया है लेकिन जैसलमेर के किले की यही सबसे बड़ी खासियत है कि आज भी यह अपने पुराने स्वरुप में मौज़ूद है। इसलिए शायद इसे लाइव फोर्ट भी कहा जाता है। फिलहाल इस किले के अंदर पांच हजार के लगभग लोग रहते हैं जो यहाँ आने-जाने वाले ट्यूरिस्ट के जरिये ही अपना गुजर बसर कर रहे हैं। अंदर एक चाट पापड़ी वाले ने हमें बताया कि किले में एक हजार से भी अधिक लोग फ्री में रहते हैं वो यहाँ रहने के लिए किसी भी तरह का रेंट नहीं चुकाते। हम ने जब इस बात की तस्दीक की तो हमें यह जानकार हैरानी हुई कि यह बात बिलकुल सही है। कहते हैं राजा रावल जैसल सेवादारों की सेवा से बहुत खुश हुए थे। इसलिये उन्होंने उन सेवादारों को किलें में रहने देने का फैसला किया। तब से आज तक सेवादारों के वंशज इस किले में बिना किराया दिए मुफ्त में रहते हैं। इस किले में रहने वालों की आबादी के हिसाब से यह दुनिया भर के किलों में अलग स्थान रखता है। हम अनेक छोटी-छोटी रिहायशी गलियों से होकर इस किले के ऊपरी हिस्से में पहुंचे जहाँ एक विशाल तोप

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Best Places to Visit in Mount Abu

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Mount Abu- राजस्थान का एक मात्र हिल स्टेशन Five Colors of Travel जब भी हमारे जेहन में राजस्‍थान का नाम आता है तो स्वतः ही दूर-दूर तक फैले रेत के धोरे, तेज गर्म हवाएं, कीकर के झाड़, भव्य हवेलियां या गर्वीले इतिहास की विरासत को अपने अंदर संजोए  रजवाड़ों के किले और महल तैरने लगते हैं या फिर राजपूताना शान के प्रतीक अनेक रंगों को अपनी पहचान बनाए यहाँ के शहर लेकिन अलग-अलग रंगों को अपने में संजोए इस राजस्‍थान का एक खूबसूरत रंग ऐसा भी है जिसकी पहचान एक शानदार हिल स्टेशन के तौर पर दुनिया भर में है और वो है माउंट आबू। यह खूबसूरत जगह किसी जमाने में राजस्थान की जबरदस्त गरमी से बदहाल राजघरानों के शाही लोगो का ‘समर-रिज़ॉर्ट’ हुआ करता था। (Mount Abu) धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक केंद्र के रूप में क्योंकि इस शहर के साथ अनेक धार्मिक और सामाजिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं इसलिए भी माउंट आबू धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक केंद्र के रूप में भी अच्छा खासा प्रसिद्ध है। यहां की चटटानों एवं जंगलों में ऋषियों, मुनियों और साधकों की आज भी अनेकों गुफाएं आसानी से देखने को मिल जाती हैं जो प्राचीन भारतीय संस्कृति और अध्यात्म की याद को तरोताजा कर देती हैं। बेइंतहा तेजी से भागती-दौड़ती जिन्दगी में सुकून के पलों की तलाश करते आदमी को सच्चे सुख और अदद शान्ति का अहसास कराने में सक्षम है राजस्थान के कश्मीर के रूप में प्रसिद्ध- माउंट आबू। कैसे पहुंचे माउन्ट आबू आप यहाँ सड़क मार्ग के अलावा रेल मार्ग से भी यहाँ आसानी से पहुँच सकते हैं। माउन्ट आबू के पास में आबू रोड रेलवे स्टेशन है जो लगभग सभी बड़े शहरों से कनेक्ट है। हवाई मार्ग द्वारा माउंट आबू पहुँचने के लिए आप उदयपुर की उड़ान ले सकते हैं जो माउंट आबू का निकटतम हवाई अड्डा है। उदयपुर हवाई अड्डा इस शहर से लगभग 185 किमी. की दूरी पर स्थित है। मेरी ये दूसरी माउन्ट आबू यात्रा थी। हम देर रात यहाँ पहुंचे थे, होटल पहले से बुक था। आबू रोड से माउंट आबू तक पहुँचने के लिए लगभग 30 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है। अरावली शृंखला के सर्पीले रास्तों से गुजरते हुए जब आप चढ़ाई चढ़ते हैं तब थोड़ी थकान लाज़िमी है, लेकिन ऐसी यात्रायें रोमांचक भी होती हैं अगर वो दिन में हो। रात का सफर अक्सर थका देता है, सो होटल पहुंचे, डिनर किया और बिस्तर पर लेटते ही कब नींद आ गई पता ही नहीं चला।  अगले दिन सुबह नाश्ता किया और निकल पड़े माउंट आबू की हृदयस्थली नक्की झील की और। माउंट आबू बाजार और गुजराती टच चारों और पहाड़ों से घिरी इस झील की ख़ूबसूरती ही यही है कि यहां आने वाले पर्यटक झील में बोटिंग किए बिना वापसी का रूख नहीं करते। झील के पास स्थित बाजार में आपको  गुजराती संस्कृति का ज्यादा बोलबाला दिखाई देगा वजह शायद यही कि यह जगह बिलकुल गुजरात की सीमा से सटी हुई है। आपको यहाँ के खाने में मीठेपन के साथ ही गुजराती टच का अहसास हो जायेगा। इस बाजार में  हस्तकला निर्मित सामग्री जैसे- वस्त्र, चादरें, पर्स, गहने, चप्पलें, खिलौने आदि मिलते हैं। माउंट आबू का हार्ट – नक्की झील नक्की झील के बारे में हिन्दू पौराणिक मान्यता है कि इसे देवताओं द्वारा राक्षसों से बचाने के लिए अपने नाखूनों से खोदा गया था। पहले इसे नख की झील ही कहा जाता था, बाद में इसका नाम  नक्की झील पड़ गया। नक्की झील में आपको बोटिंग के अलावा कुछ वाटर स्पोर्ट्स एक्टिविटीज भी दिखाई देंगी जहाँ आप अपनी पसंद के अनुसार उन एक्टिविटीज का आनंद ले सकते हैं। झील के किनारे पर एक खूबसूरत रेस्तरां बना हुआ है जहाँ आप चाय कॉफी के साथ प्राकृतिक नज़ारों से घिरी झील की ख़ूबसूरती का रसपान कर सकते हैं। यहाँ पैडल और शिकारा बोट दोनों ही उपलब्ध हैं। हमने पहले बोटिंग की और फिर इत्मीनान से खाया-पिया। जहाँ हम बैठे कॉफी पी रहे थे वहीं से सामने झील के किनारे भारत माता का भव्य मंदिर भी दिखाई दे रहा था। इस तरह के मंदिर आपको कुछ चुनिंदा जगहों पर ही मिलेंगे। (Mount Abu) जब आप पार्किंग से झील की तरफ जाते हैं तब रास्ते में आपको घुड़सवारी और ऊंट सवारी  का विकल्प भी मिलता है। आपको आसानी से बच्चे और कुछ न्यू  मैरिड कपल वहां सवारी करते और फोटोग्राफी करते दिख जायेंगे। यह झील नेचर लवर्स और फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए एक बेहद पॉपुलर जगह है। हमने यहाँ फुरसत से अच्छा-खासा समय बिताया। दिलवाड़ा के प्रसिद्ध जैन मंदिर और फिर शेड्यूल के अनुसार निकल पड़े अगले पड़ाव दिलवाड़ा के प्रसिद्ध जैन मंदिर की और। अगर कहें कि दिलवाड़ा जैन मंदिर जैनियों के सबसे सुंदर तीर्थ स्थलों में से एक है तो बिलकुल भी गलत नहीं होगा। इस मंदिर का निर्माण 11वीं और 13वीं शताब्दी के बीच चालुक्य राजाओं वास्तुपाल और तेजपाल द्वारा किया गया था। यह मंदिर अपनी अद्भुत नक्काशी और  संगमरमर से सजे होने के लिए प्रसिद्ध है। बाहर से देखने पर भले ही यह मंदिर सामान्य दिखाई दे लेकिन जैसे ही आप मंदिर के अंदर प्रवेश करते हैं आप यहाँ की छत, मेहराबों, दीवारों और स्तंभों पर करीने से बनाये गए डिजाइनों को देखकर हैरत में पड़ जायेंगे। क्योंकि मंदिर के अंदर फोटोग्राफी मना है इसलिए बहुत से लोग इसकी सुंदरता से महरूम हैं। लेकिन फिर भी गूगल करने पर आपको दिलवाड़ा मन्दिर की बहुत सारी फ़ोटोज़ मिल जाएँगी, जिसे देखकर आप इसकी अद्भुत नक्काशी और सुन्दरता का अंदाजा लगा सकते हैं। यहाँ की मूर्तियों पर पॉलिशिंग इतनी चमकदार है कि सैकड़ों वर्ष पुरानी होने के बाद भी बिलकुल नई-सी लगती है। यहाँ की सभी मूर्तियां संगमरमर की है और उन पर बेहद फाइन कारीगरी की गई है। बताते हैं ये मन्दिर बनाने में लगभग 1500 शिल्पकार और 1200 श्रमिकों की कड़ी मेहनत लगी है। अपनी महीन नक्काशी और बनावट के लिए दुनिया भर में फेमस दिलवाड़ा मन्दिर बनने में 14 साल लगे और करीब 18 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। जैन मंदिर जैन भक्तों के लिए सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक खुला रहता है और अन्य धर्म के लोगो के लिए यह दोपहर 12 से शाम 6 बजे तक

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Amer Fort

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Amer Fort : राजस्थान की आन-बान और शान- आमेर का ऐतिहासिक किला by Pardeep Kumar गुलाबी शहर के नाम से प्रसिद्ध जयपुर से कोई विरला ही होगा जो वाकिफ न हो। भारत के सबसे बड़े राज्यों में से एक राजस्थान की राजधानी जो अपने खानपान से लेकर समृद्ध इतिहास, संस्कृति और कला के कारण भी दुनिया भर में फेमस है। you can watch this blog on YouTube कहा जाता है कि इस शहर को वेल्स के राजकुमार के स्वागत की खुशी में गुलाबी रंग से रंगा गया था और तभी से इसे गुलाबी शहर (पिंक सिटी ) के नाम से जाना जाता है। जयपुर शहर का नाम आते ही यहाँ के बड़े-बड़े और भव्य किले दिलोदिमाग में तैरने लगते हैं। और इन्हीं किलों में निसंदेह सबसे पहले जिस किले की छवि उभरती है वो है खूबसूरत आमेर का किला। राजस्थान के जयपुर शहर को और ज्यादा खूबसूरत बना देने वाला ये आमेर का किला, अम्बर किला के नाम से भी जाना जाता है। ये किला ना केवल जयपुर शहर बल्कि पूरे राजस्थान के शानदार पर्यटन स्थलों में से एक है। आमेर का किला इतना प्रसिद्ध है कि यहाँ पर हर रोज छह हजार से भी अधिक लोग घूमने के लिए आते हैं। यह किला राज्य की राजधानी जयपुर से 11 किलोमीटर की दूरी पर है। आमेर जाने का सबसे अच्छा समय अगर आप इस किले की खूबसूरती का आनंद लेना चाहते हैं, तो सर्दियों के समय में नवंबर से मार्च महीने के बीच यहां जाना सबसे अच्छा माना जाता है। इसका कारण ये है कि रेतीले राजस्थान में दिन के समय मौसम गर्म ही रहता है। ऐसे में धूप और सूरज की गर्मी कभी-कभी आपको बहुत ज्यादा परेशान कर सकती है। इसलिए बेहतर होगा कि आप सर्दियों में ही जयपुर जैसे शहर की यात्रा करने की प्लानिंग करें। आमेर कैसे पहुंचे इस किले तक पहुंचने के लिए जयपुर से बस, ऑटो-रिक्शा, टैक्सी या कैब ली जा सकती है। आप अजमेरी गेट और एमआई रोड से आमेर शहर के लिए रोडवेज या प्राइवेट बसों से भी जा सकते हैं। आमेर का किला एक पहाड़ी पर है, इसलिए किले का दीदार करने के लिए आपको किले के थोड़ी दूर पहले से ही या तो पैदल चलना होगा या फिर आप टैक्सी या जीप से भी किले के मुख्य द्वार तक पहुँच सकते हैं। या फिर आप अपनी पर्सनल गाड़ी से भी यहां जा सकते हैं। किले के मुख्य द्वार के पास थोड़ी सपाट चढ़ाई है, इसलिए अगर आप एक्सपर्ट ड्राइवर हैं तो ही अपनी पर्सनल गाड़ी से किले तक जाने का रिस्क लें। अगर आप सीजन के दौरान यहां जा रहे हैं, तो खुद की गाड़ी से जाने से बचना ही बेहतर होगा, क्योंकि ट्रैफिक जाम आपके लिए सिरदर्द साबित हो सकता है। हालांकि ऐसा सीजनल टाइम में ही ज्यादा होता है। अंदर प्रवेश करके आप हाथी की सवारी का भी अपना आनंद और रोमांच ले सकते हैं। हाथी सवारी आपके लिए तब और ज्यादा फायदेमंद साबित हो जाती है, जब आप परिवार के साथ किला घूमने गए हो, हालांकि अगर आप हाथी की सवारी करते हुए किले की सैर करना चाहते है, तो एक हाथी की सवारी के लिए आपको लगभग 1000-1,200 रुपये का तक देना पड़ सकता है। याद रहे कि एक हाथी पर दो से ज्यादा पर्यटक सवार नहीं हो सकते। हाथियों की ये सवारी सुबह से ही शुरू हो जाती है। टिकट और लागत आमेर के किले के लिए विदेशी सैलानियों से 250 रुपये और भारतीयों सैलानियों से टिकट के 50 रुपये लिए जाते हैं। अगर आप स्टूडेंट हैं, तो जयपुर शहर की यात्रा करते समय अपना स्कूल या कॉलेज आईडी कार्ड ले जाना कभी मत भूलिए, किले की सैर के लिए मिलने वाली टिकटों पर स्टूडेंट्स को भारी छूट दी जाती है, इसके अलावा सात साल से कम उम्र के बच्चे के लिए यहां ज्यादातर जगहों पर टिकट निःशुल्क हैं। आमेर के किले में टिकट काउंटर सूरज पोल के सामने जलेब चौक प्रांगण में मौजूद है। आप वहां एक ऑफिसियल टूरिस्ट गाइड भी ले सकते हैं। इसके अलावा लंबी लम्बी लाइनों से बचने के लिए आप टिकट ऑनलाइन भी खरीद सकते हैं। आमेर का इतिहास आमेर के किले की इतिहास की बात करें, तो यह कभी जयपुर रियासत की राजधानी हुआ करती थी। यह किला राजपूत शासकों का निवास स्थान हुआ करता था। मुगल सम्राट अकबर की सेना का नेतृत्व करने वाले महाराजा मान सिंह प्रथम ने 1592 में 11वीं सदी के किले के अवशेषों पर इसका निर्माण शुरू करवाया था। राजस्थान में छह पहाड़ी किलों के समूह के हिस्से के रूप में किले को 2013 में यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट भी घोषित किया गया। इस किले की वास्तुकला राजपूत (हिंदू) और मुगल (इस्लामी) शैलियों का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। माना जाता है कि 967 ई. में मीणाओं के एक उप कुल में आमेर शहर और आमेर का किला राजा एलन सिंह चंदा द्वारा बसाया और बनाया गया था. चूंकि मीना अंबा माता की भक्त थीं, इसलिए उन्होंने अपने किले का नाम उनके नाम पर आमेर का किला रखा. पहाड़ी पर ऊंचे स्थान पर स्थित इस किले से माओटा झील दिखाई देती है, यह झील ही आमेर पैलेस के लिए पानी का मुख्य स्रोत है। आपको बता दें आमेर और जयगढ़ किले को एक ही संरचना के रूप में माना जाता है, क्योंकि ये दोनों किले लगभग एक ही परिसर में हैं और खास बात ये कि एक ही भूमिगत मार्ग दोनों किलों को आपस में जोड़ता है। ऐसा माना जाता है कि किसी युद्ध के समय या जब कभी दुश्मन हमला कर दें तो उन हमलों से बचने के लिए इस मार्ग का उपयोग किया जाता था। किले का निर्माण सम्राट अकबर के नवरत्नों में से एक राजा मान सिंह प्रथम ने करवाया था। बाद में, अन्य राजपूत शासकों द्वारा इसका आगे विस्तार किया गया। अपनी अद्भुत वास्तुकला के साथ, जो मुगल और हिंदू शैलियों को जोड़ती है, लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर से बना किला, अपने उच्च प्राचीर, कई द्वारों, पत्थरों वाले रास्तों और शानदार दृश्यों के कारण खासा प्रसिद्ध है। वैसे आमेर का यह किला चार भागों में बँटा है जिसका प्रत्येक