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राजस्थान की संस्कृति को वैश्विक पटल पर रखता है घूमर

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घूमर सिर्फ एक नृत्य नहीं बल्कि समर्पण का एहसास है। यह नृत्य की एक ऐसी विद्या है जो वर्षों से राजस्थान में पीढ़ी दर पीढ़ी संरक्षित होती चली आ रही है। राजस्थान हमेशा से ही अपने सांस्कृतिक विविधताओं और राजसी ठाठ बाट के लिए दुनिया भर में जाना जाता रहा है। यहां के ऐतिहासिक इमारत, पहनावे, रहन-सहन, बोलचाल और नृत्य के कारण यह राज्य भारत के सबसे समृद्ध सांस्कृतिक धरोहरों वाला राज्य माना जाता है। राजस्थान का इतिहास इसलिए भी इतना खास है क्योंकि यहां निभाई जाने वाली परंपराओं का इतिहास बेहद हीं समृद्ध रहा है। यह सांस्कृतिक विरासत हीं है जो राजस्थान को पूरे भारत में सबसे अनोखा बनाता है और इसी सांस्कृतिक विरासत का एक हिस्सा है यहां का सबसे प्रमुख लोकनृत्य “घूमर” (Ghoomar Dance) आज के ब्लॉग में हम आपको बताने जा रहे हैं राजस्थानी नृत्य घूमर के इतिहास के बारे में और इससे जुड़े कुछ रोचक तथ्यों के बारे में। भारी भरकम घेर वाला घाघरा पहनकर और माथे पर घूंघट डालकर किया जाने वाला यह नृत्य आज के समय में दुनिया भर में प्रसिद्ध हो गया है।इस नृत्य में महिलाएं बड़ा घेरा बनाकर नृत्य प्रस्तुत करती हैं। इस नृत्य के दौरान पहने जाने वाले पोशाक इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं। हालांकि राजस्थान के अलग-अलग भागों में घूमर नृत्य की शैली तथा इस नृत्य के दौरान पहने जाने वाले पहनावे में थोड़ा बहुत अंतर देखने को मिलता है, लेकिन इस नृत्य को प्रस्तुत करने वाले लोगों के भावनाओं में कोई अंतर नहीं होता।आपको बता दें कि घूमर राजस्थान का राजकीय नृत्य है और राजस्थान में होने वाले सामाजिक कार्यक्रमों में आपको इसकी झलक देखने को मिल जाएगी। ट्रेड फेयर जैसे मौके पर भी घूमर नृत्य की झलकियां देखने को मिल जाती हैं। घूमर नृत्य की शुरुआत राजस्थान के भील जनजातियों के द्वारा किया गया था। भील जनजाति के लोग माता सरस्वती की आराधना में यह नृत्य प्रस्तुत किया करते थे। राजा-रजवाड़ों के समय यह नृत्य बहुत ही प्रसिद्ध हो गया। जिसके बाद राज्यसभाओं में इस नृत्य की प्रस्तुति होने लगी और वहीं परंपरा आज तक चली आ रही है। आज भी राजस्थान में अक्सर किसी भी शुभ अवसर पर घूमर की झलकी देखने को मिल जाती है। घूमर सिर्फ नृत्य नहीं राजस्थान की संस्कृति का एक अमूल्य धरोहर है। अक्सर नर्तकों द्वारा नृत्य के सभी विधाओं में घूमर को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इतना हीं नहीं आपको यह जानकर हैरानी होगी कि घूमर राजस्थान का सबसे प्राचीनतम लोक नृत्य है और सिर्फ महिलाओं के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। घूमर सिर्फ एक नृत्य नहीं एक परंपरा है, जिसे वर्षों से राजस्थान में निभाया जाता रहा है। जब भी राजस्थान में कोई नव विवाहिता अपने ससुराल आती है तो वह घूमर नृत्य करके अपने वैवाहिक जीवन में कदम रखती है।इसके अलावा शादियों, त्योहारों और अलग-अलग सामाजिक तथा धार्मिक अवसरों पर घूमर नृत्य प्रस्तुत किया जाता है। इतना हीं नहीं समय-समय पर इस नृत्य की झलकियां फिल्मों में भी हमें देखने को मिलती रहती है।राजस्थान सरकार भी इस नृत्य को बढ़ावा देने का प्रयास करती रहती है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेले जैसे जगहों पर भी इस नृत्य की प्रस्तुति हमें देखने को मिलती है।

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राजस्थानी आत्मसम्मान का प्रतीक है साफा

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जब भी कभी साफा का जिक्र होता है हमारे ध्यान में सबसे पहले राजस्थान का नाम आता है। और आए भी क्यों ना साफा का इतिहास कहीं न कहीं राजस्थान से हीं जुड़ा हुआ है। सर पर बड़े-बड़े पगड़ी बांधे राजस्थानी लोग अपने राजसी संस्कृति को पूरे विश्व के सामने प्रस्तुत करते हैं। यह साफा न सिर्फ उनके लिए एक श्रृंगार है बल्कि उनका आत्मसम्मान भी है। राजस्थान में साफ़ा का बहुत हीं ऐतिहासिक और नैतिक महत्व है। लोग इसे आत्म सम्मान से जोड़कर देखते हैं।आपको बता दें की राजस्थान के अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग तरीके से साफा बांधने का प्रचलन रहा है। इतना हीं नहीं सफा के रंग में भी एक कहानी छुपी हुई होती है जो साफा के मूल्य से हमें अवगत करवाती है। जैसे सफेद साफा का राजस्थान में अपना ही एक महत्व है, वहीं केसरिया साफा के पीछे एक अलग ही कहानी छुपी हुई होती है। अगर रंगों के आधार पर साफा को विभाजित किया जाए तो वह विभाजन कुछ इस प्रकार का होगा। :- केसरिया साफा :यह सफा शौर्य और वीरता की निशानी है। यह सफा एक राजस्थानी तब अपने सिर पर बांधता है जब वह युद्ध के लिए अग्रसर होता है। अक्सर जब राजा महाराजा युद्ध के लिए जाया करते थे तो वह अपने सिर पर केसरिया साफा बांधकर जाते थे। क्योंकि केसरिया रंग का अर्थ शौर्य और वीरता से परिपूर्ण होता है। अधिकतर राजपूतानराजपूतानों में केसरिया रंग के साफा को बांधने का प्रचलन था। सफेद साफा :राजस्थान में सफेद रंग के साफे का अर्थ होता है शोक! अगर आपको कोई भी राजस्थानी व्यक्ति सफेद रंग का साफा पहना दिख जाए तो इसका मतलब है कि वह शोक में है। हालांकि राजस्थान में कुछ ऐसे समुदाय भी हैं जहां सफेद रंग का साफा आम दिनों में भी पहना जाता है। ऐसे समुदाय में बिश्नोई समुदाय का नाम सबसे पहले आता है बिश्नोई समुराई के लोग सामान्य दिनों में भी सिर पर सफेद साफा बांधा करते हैं। लेकिन अधिकतर जगहों पर सफेद रंग के साफे को शोक से जोड़कर देखा जाता है। खाकी साफा :खाकी साफा राजस्थान में अक्सर बुजुर्ग लोगों द्वारा बांधा जाता है। आम दिनों में राजस्थानी बुजुर्ग खाकी शाखा बांधा करते हैं। आप आम दिनों में कभी भी राजस्थान में ऐसे बुजुर्गों को देख लेंगे जो अपने सिर पर खाकी साफा बांधकर घूमते हैं। नीला और मरून साफा :राजस्थान में साफा के रंगों का बहुत हीं महत्व होता है। अगर कोई राजस्थानी व्यक्ति किसी के प्रति सहानुभूति व्यक्त करने जाता है तो वह नीले या फिर मेहरून रंग के साफ़ा को पहन कर जाता है। इसलिए नीला और मेहरून रंगों के साफों को सहानुभूति सभा से जोड़कर देखा जाता है। बहुरंगा साफा :बहुरंगे साफों का उपयोग अधिकतर अलग-अलग समारोहों में किया जाता है। हालांकि कुछ समुदाय ऐसे भी हैं जो बहुरंगे साफे को सामान्य दिनों में भी पहनते हैं, लेकिन अधिकतर इसका उपयोग किसी कार्यक्रम में ही किया जाता है। क्यों पहना जाता है साफा (Why is Safa worn)? अगर राजस्थान के जलवायु के बारे में बात की जाए तो यह भारत का सबसे गर्म प्रदेश है और यहां लगभग 9 महीने तक गर्मी पड़ती है। ऐसे में लंबे समय तक यहां लू की आंधी चलती रहती है। साफा का इतिहास भी कहीं ना कहीं गर्मी और लू से जुड़ा हुआ है। राजस्थानी लोग अपने आप को लू के थपेड़ों से बचाने के लिए कई परतों वाला साफा अपने सिर पर बांधते हैं। यह साफा लोगों को डिहाइड्रेशन से बचता है। इसके अलावा राजस्थान राजा रजवाड़ों का गढ़ रहा है। ऐसे में वहां अक्सर युद्ध जैसी परिस्थितियों आती रहतीं थी। सफा युद्ध के समय पर सिर पर किए गए अकस्मात आघात से योद्धाओं को बचता था। आज साफा राजस्थान के संस्कृति का एक अहम हिस्सा बन चुका है। रंग है अलग-अलग समुदाय की निशानी (Color is a symbol of different communities): पूरे राजस्थान में अलग-अलग समुदाय के लोग अलग-अलग तरह के साफा का उपयोग करते हैं। राजस्थान के लोगों के साफा के रंग और उसे बांधने के स्टाइल को देखकर काफी हद तक आप उनके समुदाय का पता लगा सकते हैं। जैसे बिश्नोई समुदाय के लोग हमेशा सफेद साफा बांधते हैं। वहीं रेवाड़ी और राईका समुदाय के लोग लाल रंग का साफा बांधते हैं। कलबेलिया, लंगा- मांगणियार लोग रंग बिरंगे छापों वाला साफा बांधते हैं, जबकि व्यापारी समुदाय गुलाबी केसरिया और लाल रंग का पगड़ी बांधते हैं।

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Top 5 National Parks of Rajasthan

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बरसात का सीजन खत्म हो गया है और धीरे-धीरे ठंड बढ़ने लगा है, ऐसे में नेशनल पार्क्स भी जंगल सफारी और टूर के लिए खुल गए हैं। अगर आप अभी किसी अच्छे से वीकेंड टूर की प्लानिंग कर रहे हैं तो जंगल सफारी और टूर आपके लिए एक बेहतर ऑप्शन हो सकता है। आज के फाइव कलर्स आफ ट्रैवल के इस ब्लॉग में हम आपको बताने वाले हैं राजस्थान के नेशनल पार्क्स (National Parks of Rajasthan) के बारे में, जहां आप अच्छे से बायोडायवर्सिटी को एक्सप्लोर कर सकते हैं और अपना वीकेंड एंजॉय कर सकते हैं। 1. रणथम्भोर नेशनल पार्क (Ranthambore National Park) रणथम्भोर राष्ट्रीय उद्यान राजस्थान के सवाई माधोपुर ज़िला में अवस्थित है। यह नेशनल पार्क लगभग 1334 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। सर्वप्रथम रणथम्भोर राष्ट्रीय उद्यान को 1955 में सवाई माधोपुर खेल अभयारण्य के रूप में जाना जाता था। इसके पश्चात 1973 में इसे टाइगर रिजर्व घोषित किया गया। 1 नवंबर 1980 को इस टाइगर रिजर्व को राष्ट्रीय उद्यान बना दिया गया। रणथम्भोर नेशनल पार्क में कई प्रकार के वन्य जीव निवास करते है जिनमे बाघ (Tiger), सांभर हिरण (Sambhar Deer), नर मोर (Male Peacock) और चित्तीदार हिरण (Spotted Deer) शामिल है। इसके अलावा यहाँ तेंदुए (Leopards) भी पाए जाते है। कैसे पहुंचे रणथम्भोर राष्ट्रीय उद्यान (How to reach Ranthambore National Park)? 2. मुकुंदरा हिल्स राष्ट्रीय उद्यान (Mukundara Hills National Park) मुकुंदरा हिल्स राष्ट्रीय उद्यान जिसे दर्राह नेशनल पार्क भी कहा जाता है राजस्थान के कोटा जिले के पास स्थित है। मुकुंदरा हिल्स नेशनल पार्क लगभग 760 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है और इसकी स्थापना 2004 में हुई थी। इस नेशनल पार्क में तीन वन्य जीव अभ्यारण्य सम्मलित हैं दर्रा वन्यजीव अभयारण्य, राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य और जवाहर सागर वन्यजीव अभयारण्य। इस राष्ट्रीय उद्यान में जंगलों का बहुत बड़ा भाग शामिल है जो पहले राजाओं का शिकारगाहों का हिस्सा था। यह नेशनल पार्क राजस्थान का तीसरा टाइगर रिजर्व है। एक समय इस राष्ट्रीय उद्यान को एशियाई शेर के पुनः उत्पादन के लिए माना जाता था। मुकुंदरा हिल्स राष्ट्रीय उद्यान में कई प्रकार के फॉउना (Fauna) निवास करते है जिनमे बंगाल टाइगर, भारतीय भेड़िया, भारतीय तेंदुआ, स्लॉथ भालू, सांभर, चिंकारा, हिरण, चीतल, नीलगाय और जंगली सूअर शामिल हैं। इसके अलावा यहाँ मगरमच्छ और घड़ियाल भी पाए जाते हैं । कैसे पहुंचे मुकुंदरा हिल्स राष्ट्रीय उद्यान (How to reach Mukundra Hills National Park)? 3. केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (Keoladeo National Park) केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान भारत के वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स की सूची में शामिल, एक प्रसिद्ध बर्ड अभयारण्य है। इस नेशनल पार्क की प्रसिद्धि का कारण है सर्दियों के दौरान यहाँ आने वाले साइबेरियन सारस। यह नेशनल पार्क राजस्थान के भरतपुर में स्थित है जिसके कारण इस उद्यान को भरतपुर पक्षी विहार भी कहा जाता है। इस पक्षी विहार में हजारों की संख्या में लुप्तप्राय और दुर्लभ पक्षी पाए जाते है। केवलादेव नेशनल पार्क लगभग 28 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। इस राष्ट्रीय उद्यान को 1982 में नेशनल पार्क का दर्जा दे दिया गया। गंभीर और बाणगंगा नदी इस पार्क में बहती है। यह पक्षी विहार पर्यटकों को काफी आकर्षित करता है। केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में कई प्रकार के फॉउना निवास करते है जिनमे पक्षियों की 350 से अधिक प्रजातियां, स्तनधारियों की कुल 36 प्रजातियां और मछलियों की 43 प्रकार की प्रजातियां पाई जाती है। कैसे पहुंचे केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (How to reach Keoladeo National Park)? 4. अलवर सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान (Alwar Sariska National Park) दिल्ली के नजदीक स्थित अलवर सरिस्का सफारी अन्य जंगल सफारियों से काफी अलग है। क्योंकि आप यहां मानसून में भी जंगल सफारी का आनंद उठा सकते हैं। सरिस्का जंगल सफारी दिल्ली से मात्र ढाई घंटे की दूरी पर स्थित है और नेचर को एक्सप्लोर करने के लिए एक बेहतरीन जगह है। सरिस्का जंगल सफारी के पास हीं स्थित है, अलवर फोर्ट और बाला फोर्ट बफर जोन (buffer zone)। आप इन दोनों जगह पर जाकर भी घूम सकते हैं। अलवर के किले पर खड़े होकर आप पूरे सरिस्का नेशनल पार्क को देख सकते हैं। चारों ओर बड़े-बड़े पेड़, घना जंगल और जंगलों में बिना डरे चहल कदमी कर रहे हिरन आपका मन मोह लेंगे। खड़े होकर आसपास के सीनरी को निहारना भी सुकून दायक होता है। कैसे पहुंचे अलवर सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान (How to reach Alwar Sariska National Park)? 5. डेजर्ट राष्ट्रीय उद्यान (Desert National Park) डेजर्ट राष्ट्रीय उद्यान राजस्थान में एक नेशनल पार्क है जो, जैसलमेर और बाड़मेर जिले के पास स्थित है। डेजर्ट नेशनल पार्क लगभग 3162 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है और इसकी स्थापना 1981 में हुई थी। यह नेशनल पार्क भारत के सबसे बड़े राष्ट्रीय उद्यानों में से एक है। यह नेशनल पार्क यहाँ पाए जाने वाले ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (Great Indian Bustard) के कारण प्रसिद्ध है जो इस उद्यान में अच्छी-खासी संख्या में पाया जाता है। इस उद्यान में डायनासोर के अवशेष भी प्राप्त हुए है। डेजर्ट राष्ट्रीय उद्यान में कई प्रकार के फॉउना (Fauna) निवास करते है जिनमे रेगिस्तानी लोमड़ी, भेड़िया, बंगाल लोमड़ी, स्पाइनी-टेल्ड छिपकली, मॉनिटर छिपकली, चिंकारा, हाथी, छोटे पंजे वाले ईगल, टैनी ईगल और रेगिस्तानी बिल्ली शामिल है। कैसे पहुंचे डेजर्ट राष्ट्रीय उद्यान (How to reach Desert National Park)?

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पक्षियों की हजारों से अधिक प्रजातियां का निवास स्थल है केवलादेव पक्षी विहार

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केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (Keoladeo National Park) भारत के वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स की सूची में शामिल, एक प्रसिद्ध बर्ड अभयारण्य है। इस नेशनल पार्क की प्रसिद्धि का कारण है सर्दियों के दौरान यहाँ आने वाले साइबेरियन सारस। यह नेशनल पार्क राजस्थान के भरतपुर में स्थित है जिसके कारण इस उद्यान को भरतपुर पक्षी विहार भी कहा जाता है। इस पक्षी विहार में हजारों की संख्या में लुप्तप्राय और दुर्लभ पक्षी पाए जाते है। केवलादेव नेशनल पार्क लगभग 28 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। इस राष्ट्रीय उद्यान को 1982 में नेशनल पार्क का दर्जा दे दिया गया। गंभीर और बाणगंगा नदी इस पार्क में बहती है। यह पक्षी विहार पर्यटकों को काफी आकर्षित करता है। फॉउना और फ्लोरा (Floras and Faunas in Keoladeo National Park) केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में कई प्रकार के फॉउना निवास करते है जिनमे पक्षियों की 350 से अधिक प्रजातियां पायी जाती है। इनमे साइबेरियन सारस (Siberian Stork), घोमरा (Ghomra), उत्तरी शाह चकवा (Northern Shah Chakwa), जल पक्षी (Waterfowl), लाल सर बत्तख (Red-headed Duck) आदि शामिल है। इसके अलावा यहाँ स्तनधारियों की कुल 36 प्रजातियाँ रहती है जिनमे से कुछ प्रमुख ये है- (Sambar), हनुमान लंगूर (Hanuman Langur), चीतल हिरण (Chital Deer), नीलगाय (Nilgai) तथा धारीदार लकड़बग्घा (Striped Hyena)। यहां मछलियां की 43 प्रकार की प्रजातियाँ पाई जाती है। अगर बात की जाए फ्लोरा की तो, यहाँ के जंगलों में बबूल (Acacia nilotica), कदंब (Mitragyna parvifolia) और जामुन (Syzygium cuminii) के पेड़ बहुत अधिक संख्या में पाए जाते है। वही जलीय वनस्पतियों में यहाँ वाटर लिली (Nymphaea nouchali), लोटस (Nelumbo nucifera) तथा वॉटर फ़र्न (Azolla), पाए जाते हैं। बेस्ट टाइम टू विजिट केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (Best time to visit Keoladeo National Park) यह राष्ट्रीय उद्यान साल के बारहों महीने खुला रहता है। आप यहाँ किसी भी महीने में आ सकते है। लेकिन अगर आप यहाँ माइग्रेटरी बर्ड्स (Migratory Birds) की ज्यादा प्रजातियाँ देखना चाहते है तो आप सर्दियों (अक्टूबर से फरवरी) में आने का कोशिश करें। वही यदि आप यहां के स्थानीय पक्षियों (Local Birds) के बारें में जानना चाहते है तो आप अगस्त से नवंबर के बीच कभी भी आ सकते है। कैसे पहुंचे केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (How to reach Keoladeo National Park)?

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Best Places to Visit in Jaisalmer

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Jaisalmer: जैसलमेर – रेगिस्तान, शानदार किलों, पुरानी हवेलियों और राजसी ठाठ-बाट का शहर by Pardeep Kumar पिछले काफी अरसे से मैं राजस्थान घूमने का प्लान कर रहा था। क्योंकि राजस्थान शब्द सुनते ही ज़ेहन में खूबसूरत महलों, शानदार किलों और वीरों के इतिहास की झांकी तैरने लगती है। पूरा राजस्थान ऐतिहासिक सांस्कृतिक और प्राकृतिक सौंदर्य से जगमग है। यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज यह “रजवाड़ों की धरती” भारत के सबसे बड़े पर्यटक स्थलों में से एक है। मीलों तक फैली सुनहरी रेत पर अनेक विजय गाथाओं के साक्षी रहे यहाँ के दुर्ग, पिंक सिटी, झीलों का शहर, गोल्डन सिटी, बीकानेरी भुजिया, गजब वास्तुकला, मुँह में पानी लाने वाले व्यंजन, आदिवासी गाँव, तीर्थ स्थल और रंगीन त्यौहार जैसी अनोखी चीज़ें न केवल राजस्थान को दूसरों से अलग करती है बल्कि नायाब भी बनाती हैं।(Jaisalmer) और अगर आपको सोने जैसी रेत वाला रेगिस्तान, शानदार किलें, पुरानी हवेलियां और राजसी ठाठ-बाट की झलक देखनी हो तो हो देश के पश्चिमी कोने में स्थित जैसलमेर से बेहतरीन दूसरा कोई डेस्टिनेशन नहीं। हम दिल्ली से सम्पर्क क्रांति एक्सप्रेस ट्रैन से जैसलमेर के लिए रवाना हुए । लगभग 15 घंटे के सफर के बाद हम जैसलमेर रेलवे स्टेशन पर पहुंचे। शायद उस समय रात के एक बजे थे। होटल बुक था और उन्होंने टैक्सी पहले ही भेज दी थी इसलिए किसी तरह की कोई परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा। जब भी आप ट्रैन से ऐसे किसी भी डेस्टिनेशन पर जाएँ तो होटल और टैक्सी का इंतज़ाम पहले ही कर लें। आजकल सब ऑनलाइन है इसलिए बहुत ज्यादा चिंता की बात है नहीं। मेरे लिए यात्रा का मतलब सिर्फ घूमना कभी नहीं रहा। यात्रा मेरे लिए हमेशा से अपना सर्वोत्तम समय व्यतीत करना रहा है। चाहे जिस भी डेस्टिनेशन की यात्रा का प्रोग्राम बने, वहां के परिवेश को समझना और किस तरह ये रहन-सहन हमारे परिवेश से अलग है, ये भी जानना मुझे हमेशा से ही अच्छा लगता रहा है। बचपन में परिवार के साथ घूमने का कार्यक्रम बनता था, पर वक़्त के साथ जैसे बड़े हुए, कमाने लगे या यूँ कह लीजिये आर्थिक रुप से मजबूत हुए तो यात्रायें करना थोड़ा आसान हो जाता है , फिर तो जब भी मन किया निकल पड़े किसी नई जगह। क्योंकि अगर आप आर्थिक रूप से थोड़े सक्षम हैं तो फिर किसी तरह की कोई टेंशन नहीं रहती आपका जहाँ मन करें उड़ जाइये। खूब घूमिये और खान-पान का आनंद लीजिये। किस समय यहाँ आना सबसे बेहतर वैसे तो साल भर यहाँ पर्यटकों और खरीददारों का आना लगा रहता है लेकिन फिर भी अक्टूबर से मार्च का महीना यहाँ आने के लिए बेस्ट रहता है। क्योंकि देखा जाए तो राजस्थान में साल भर गर्मी ही रहती है। आप जब भी कहीं घूमने जाएँ, किस दिन कहाँ जाना है? क्या देखना है? सब का शेड्यूल पहले ही बना लें। इसका फायदा ये होता है आप बिना किसी फालतू की आपाधापी के इत्मीनान से उस जगह को विजिट कर लेते हैं। इसलिए हमने अगले तीन दिन का पूरा शेड्यूल बना लिया था।(Jaisalmer) गोल्डन फोर्ट (सोनार किला) सुबह हमने नाश्ते में स्वादिष्ट पोहा और कड़क चाय को प्राथमिकता दी। एक प्याला कड़क चाय आपके सफर को ऊर्जामयी बना देता है। अच्छे से नाश्ता किया और निकल पड़े जैसलमेर के किले की तरफ। यहां जाएं तो सबसे पहले दिन के समय में जैसलमेर किला विजिट कर लें। क्योंकि एक तो ये काफी बड़ा है दूसरा बेहद खूबसूरत भी। इसे सोनार किला कहते हैं और यह दुनिया के सर्वश्रेष्ठ रेगिस्तानी किलों में से एक माना जाता है। सुबह-सुबह के समय जब सूरज की चमकीली किरणें इस किले पर पड़ती हैं तो यह पीले रंग से दमक उठता है। यह सोनार किला पीले सेन्ड स्टोन पत्थरों को जोड़कर बनाया गया है। ये किला जितना खूबसूरत है उतने ही रोचक तरीके से इसका निर्माण भी हुआ है। इस किले को राजपूत राजा रावल जैसल ने बनवाया था। इस किले के चारों ओर बनाये गए गढ़ों से आप इसकी विशालता और भव्यता का आंकलन कर सकते हैं। हम जैसे ही किले के मुख्य द्वार पर पहुंचे शानदार नक्काशी और वास्तुकला का नमूना देखने को मिला। यहाँ आने वाले पर्यटकों को लुभाने के लिए जैसे ये मुख्य द्वार ही काफी है। मुख्य द्वार के पास से ही परम्परागत वस्तुओं की खरीददारी के लिए बाजार शुरू हो जाता है। जहाँ से आप ट्रेडिशनल चीजों की शॉपिंग कर सकते हैं। वैसे इस किले में अखे पोल, सूरज पोल, गणेश पोल और हवा पोल नामक चार दरवाजे हैं। किले में अंदर आपको मोती महल, रंग महल और राज विलास जैसे स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूने दिखाई देंगे। किले के अंदर ही खूबसूरत जैन मंदिर भी है। यह किला शहर के बीचों-बीच बना हुआ है। दिन के समय सूरज की रोशनी में इस किले की दीवारे हल्के सुनहरे रंग की दिखती है. इसी कारण इस किलें को सोनार किला या गोल्डन फोर्ट के नाम से भी जाना जाता है। देश भर में अनेक किले ऐसे हैं जिनको आलीशान होटलों में बदल दिया गया है लेकिन जैसलमेर के किले की यही सबसे बड़ी खासियत है कि आज भी यह अपने पुराने स्वरुप में मौज़ूद है। इसलिए शायद इसे लाइव फोर्ट भी कहा जाता है। फिलहाल इस किले के अंदर पांच हजार के लगभग लोग रहते हैं जो यहाँ आने-जाने वाले ट्यूरिस्ट के जरिये ही अपना गुजर बसर कर रहे हैं। अंदर एक चाट पापड़ी वाले ने हमें बताया कि किले में एक हजार से भी अधिक लोग फ्री में रहते हैं वो यहाँ रहने के लिए किसी भी तरह का रेंट नहीं चुकाते। हम ने जब इस बात की तस्दीक की तो हमें यह जानकार हैरानी हुई कि यह बात बिलकुल सही है। कहते हैं राजा रावल जैसल सेवादारों की सेवा से बहुत खुश हुए थे। इसलिये उन्होंने उन सेवादारों को किलें में रहने देने का फैसला किया। तब से आज तक सेवादारों के वंशज इस किले में बिना किराया दिए मुफ्त में रहते हैं। इस किले में रहने वालों की आबादी के हिसाब से यह दुनिया भर के किलों में अलग स्थान रखता है। हम अनेक छोटी-छोटी रिहायशी गलियों से होकर इस किले के ऊपरी हिस्से में पहुंचे जहाँ एक विशाल तोप