Electric Train: पूर्वोत्तर की 12 ट्रेनें अब बिजली से चलेंगी
उत्तर-पूर्व भारत का नाम सुनते ही असम की चाय के बागान, हरे-भरे जंगल, ऊंचे पहाड़ और ब्रह्मपुत्र नदी याद आने लगती है। यहां घूमने के लिए खूबसूरत जगहें तो बहुत हैं, लेकिन इन इलाकों में रेल चलाना भी आसान काम नहीं है। कई जगहों पर मुश्किल भौगोलिक परिस्थितियों के बीच रेलवे को यात्रियों की सुविधा और पर्यावरण, दोनों का ध्यान रखना पड़ता है। electric train अब इसी दिशा में पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे यानी Northeast Frontier Railway (NFR) ने एक बड़ा कदम उठाया है। रेलवे ने 16 अक्टूबर 2026 से 12 और ट्रेन सेवाओं को डीजल से बिजली पर चलाना शुरू किया है। इसके साथ ही चालू वित्त वर्ष में ऐसी सेवाओं की कुल संख्या 30 हो गई है। इस बदलाव से डीजल की खपत घटने, प्रदूषण कम होने और कुछ जगहों पर यात्रा का समय बचने की उम्मीद है। आखिर कौन-कौन सी ट्रेनें इस बदलाव में शामिल हैं? इससे आम यात्रियों को क्या फायदा मिलेगा और पूर्वोत्तर में रेल नेटवर्क को बेहतर बनाने के लिए क्या काम हो रहे हैं? आइए, आसान भाषा में पूरी जानकारी समझते हैं। पूर्वोत्तर की रेल यात्रा में क्या बदल रहा है? पहले कई रेल सेवाओं में डीजल इंजन का इस्तेमाल होता था। अब जहां रेलवे की बिजली वाली लाइनें तैयार हैं और जरूरी मंजूरी मिल चुकी है, वहां ट्रेनों को इलेक्ट्रिक इंजन से चलाया जा रहा है। इस बदलाव का एक फायदा यह है कि ट्रेन को रास्ते में डीजल इंजन हटाकर बिजली वाला इंजन लगाने की जरूरत कम हो सकती है। electric train इसी तरह की electric train सेवाएं रेलवे को डीजल पर निर्भरता कम करने में मदद करती हैं। हालांकि, बिजली से चलने का मतलब यह नहीं कि ट्रेन से हर तरह का प्रदूषण पूरी तरह खत्म हो जाता है। बिजली बनाने के तरीके का भी पर्यावरण पर असर पड़ता है। फिर भी, ट्रेन के संचालन में डीजल की खपत और उससे निकलने वाले धुएं को कम करना एक महत्वपूर्ण कदम है। पूर्वोत्तर में यह बदलाव इसलिए भी अहम है क्योंकि रेल मार्ग यहां के कई शहरों, कस्बों और दूर-दराज के इलाकों को जोड़ते हैं। यात्रियों के साथ-साथ सामान की ढुलाई के लिए भी रेलवे बहुत जरूरी है। electric train ये 6 ट्रेन जोड़ी अब बिजली से चलेंगी NFR के मुताबिक, 16 अक्टूबर 2026 से छह जोड़ी ट्रेनों यानी कुल 12 ट्रेन सेवाओं को बिजली से चलाने की व्यवस्था की गई है। इनमें असम और आसपास के क्षेत्रों में चलने वाली एक्सप्रेस और इंटरसिटी सेवाएं शामिल हैं। नई व्यवस्था में शामिल ट्रेनों की सूची इस प्रकार है: 15613/15614 – लचित एक्सप्रेस (Lachit Express) 15813/15814 – डेकारगांव–सिलापाथर एक्सप्रेस 15895/15896 – रंगिया–मुरकोंगसेलेक एक्सप्रेस 15927/15928 – रंगिया–न्यू तिनसुकिया एक्सप्रेस 15967/15968 – रंगिया–लेडो एक्सप्रेस 15603/15604 – गुवाहाटी–लेडो इंटरसिटी एक्सप्रेस इन ट्रेनों से रंगिया, गुवाहाटी, तिनसुकिया, लेडो और सिलापाथर जैसे इलाकों में यात्रा करने वाले यात्रियों को फायदा मिल सकता है। बिजली से चलने वाली electric train सेवाओं का विस्तार रेलवे के लिए संचालन को ज्यादा सुविधाजनक बनाने की दिशा में भी मददगार है। electric train यहां ध्यान देने वाली बात है कि इन ट्रेनों का इलेक्ट्रिक इंजन से चलना अपने आप में ट्रेन का नया नाम, नया रूट या नई समय-सारणी शुरू होने का संकेत नहीं है। यात्रियों को यात्रा की तारीख और समय पहले की तरह टिकट तथा रेलवे की आधिकारिक जानकारी से ही जांचना चाहिए। electric train डीजल की बचत और प्रदूषण में कमी का कितना फायदा होगा? रेलवे के अनुमान के मुताबिक, इन 12 नई इलेक्ट्रिक सेवाओं से सालाना करीब 98.55 लाख लीटर डीजल की बचत हो सकती है। इससे खर्च में लगभग 140 करोड़ रुपये सालाना की कमी आने और कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में करीब 26,411 टन प्रति वर्ष की कमी होने का अनुमान है। ये आंकड़े रेलवे के अनुमान हैं, न कि पहले से हासिल हो चुकी वास्तविक सालाना बचत। आखिर डीजल की बचत इतनी जरूरी क्यों है? डीजल इंजन चलाने के लिए लगातार ईंधन की जरूरत होती है। बड़ी संख्या में ट्रेन सेवाओं में डीजल का इस्तेमाल कम होने से रेलवे के ईंधन खर्च पर असर पड़ सकता है। साथ ही, ट्रेन के इंजन से निकलने वाला धुआं भी कम किया जा सकता है। इसी वजह से electric train को ज्यादा ऊर्जा-कुशल रेल संचालन की दिशा में एक अहम विकल्प माना जाता है। लेकिन बिजली से चलने वाली ट्रेन के पर्यावरणीय फायदे का सही आकलन करते समय बिजली उत्पादन और पूरी व्यवस्था की ऊर्जा जरूरतों को भी ध्यान में रखना चाहिए। रेलवे के लिए बचत का मतलब केवल ईंधन खरीदने पर कम खर्च करना नहीं है। संचालन की योजना बेहतर बनाने और उपलब्ध संसाधनों का सही इस्तेमाल करने से दूसरे कामों के लिए भी समय और पैसा बच सकता है। electric train यात्रियों का समय कैसे बच सकता है? कई रेल मार्गों पर पहले डीजल और इलेक्ट्रिक इंजन के बीच बदलाव करना पड़ता था। इस प्रक्रिया को ट्रैक्शन चेंज कहा जाता है। इसमें ट्रेन को स्टेशन पर रोककर एक इंजन हटाया जाता है और दूसरा लगाया जाता है। इस काम में लगने वाला समय रूट और परिचालन व्यवस्था के हिसाब से अलग-अलग हो सकता है। बिजली वाली लाइन पर बिना इंजन बदले ट्रेन चलने से ऐसे कुछ ठहराव हटाए जा सकते हैं। इससे ट्रेन के कुल यात्रा समय में कमी आ सकती है और समय पर चलने की क्षमता बेहतर हो सकती है। हालांकि, हर ट्रेन का समय अपने आप कम हो जाएगा, ऐसा मानना सही नहीं होगा। वास्तविक फायदा ट्रेन के रूट, ठहराव और रेलवे की समय-सारणी पर निर्भर करता है। इस तरह की electric train सेवा यात्रियों को ज्यादा सुविधाजनक यात्रा देने में मदद कर सकती है। लेकिन किसी खास ट्रेन का नया समय जानने के लिए रेलवे की अपडेटेड समय-सारणी ही देखें। HOG तकनीक से कोचों में कैसे मिलती है बिजली? ट्रेन में लाइट, पंखे और एयर कंडीशनिंग चलाने के लिए भी बिजली चाहिए। कुछ पारंपरिक व्यवस्था में इसके लिए ट्रेन के साथ जनरेटर कार लगाई जाती है। ऐसे जनरेटर डीजल से चलते हैं और उनसे शोर तथा धुआं निकल सकता है। HOG यानी Head-on Generation तकनीक में इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव से बिजली अनुकूल कोचों तक पहुंचाई जा सकती है। इससे उन ट्रेनों में अलग डीजल जनरेटर