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Kala Patthar क्यों है Everest देखने की सबसे खास जगह?

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नेपाल का नाम आते ही अगर आपके दिमाग में ऊंचे पहाड़, बर्फ से ढकी चोटियां और रोमांच से भरी ट्रेकिंग आती है, तो इसमें कोई हैरानी नहीं है। हिमालय की खूबसूरती देखने के लिए हर साल दुनिया भर से लोग नेपाल पहुंचते हैं। इनमें से बहुत से लोगों का सपना माउंट एवरेस्ट को करीब से देखने का होता है। इसी वजह से एवरेस्ट बेस कैंप ट्रेक दुनिया के सबसे मशहूर ट्रेक में गिना जाता है। लेकिन यहां एक ऐसी बात है जो बहुत से लोगों को पहली बार वहां पहुंचने के बाद पता चलती है। एवरेस्ट बेस कैंप पहुंचने के बाद भी माउंट एवरेस्ट की मुख्य चोटी साफ दिखाई नहीं देती। सामने नुप्त्से की विशाल पश्चिमी दीवार और ल्होत्से का दक्षिणी हिस्सा खड़ा रहता है, जिसकी वजह से एवरेस्ट का असली शिखर नजरों से छिप जाता है। यही वजह है कि एवरेस्ट का पूरा और शानदार नजारा देखने के लिए ट्रेकर्स Kala Patthar की तरफ जाते हैं। यह जगह कोई अलग पर्वत नहीं है, बल्कि पुमोरी पर्वत के दक्षिणी हिस्से में बनी एक ऊंची पथरीली कगार है। अपनी खास जगह और ऊंचाई की वजह से Kala Patthar खुम्बु घाटी के सबसे बेहतरीन नजारा दिखाने वाले स्थानों में शामिल है। यहां से माउंट एवरेस्ट के साथ नुप्त्से, ल्होत्से और पुमोरी जैसी विशाल चोटियां भी दिखाई देती हैं। खासकर जब सूरज की रोशनी एवरेस्ट की चोटी पर पड़ती है, तब यहां खड़े होकर पहाड़ों को देखना ऐसा अनुभव बन जाता है जिसे लंबे समय तक भुलाना मुश्किल होता है। अगर आप भी नेपाल में एवरेस्ट क्षेत्र की ट्रेकिंग का सपना देख रहे हैं, तो Kala Patthar को अपनी यात्रा में शामिल करने से पहले इसके रास्ते, ऊंचाई, मौसम और जरूरी सावधानियों को समझना बहुत जरूरी है। Kala Patthar की ऊंचाई कितनी है? Kala Patthar की ऊंचाई को लेकर अक्सर थोड़ा भ्रम देखने को मिलता है। इसके निचले हिस्से की ऊंचाई करीब 5,545 मीटर यानी लगभग 18,192 फीट मानी जाती है। यही वह हिस्सा है जहां बहुत से ट्रेकर्स रुककर तस्वीरें और वीडियो बनाते हैं। वहीं इसकी ऊपरी रिज का सबसे ऊंचा हिस्सा करीब 5,644 मीटर यानी लगभग 18,519 फीट तक जाता है। यानी नीचे वाले हिस्से की तुलना में करीब 100 मीटर और ऊंचाई। अगर इसकी तुलना एवरेस्ट बेस कैंप से करें, तो बेस कैंप करीब 5,364 मीटर की ऊंचाई पर है। इस हिसाब से Kala Patthar का लोकप्रिय व्यू पॉइंट बेस कैंप से करीब 180 मीटर ज्यादा ऊंचाई पर है। इतनी ऊंचाई पर पहुंचना बिल्कुल आसान नहीं है। यहां हवा का दबाव समुद्र तल की तुलना में काफी कम हो जाता है। इसका सीधा असर सांस लेने पर पड़ता है। मैदानों में जिस तरह आसानी से सांस आती है, यहां वैसा महसूस नहीं होता। इसी वजह से Kala Patthar की छोटी दूरी भी ट्रेकर्स को काफी मुश्किल लग सकती है। यह इलाका सागरमाथा नेशनल पार्क के अंदर खुम्बु क्षेत्र में स्थित है। आसपास काले रंग की चट्टानें और बड़े-बड़े पत्थर दिखाई देते हैं। इसी वजह से इस जगह का नाम Kala Patthar पड़ा। गोरक शेप से शुरू होती है असली चढ़ाई Kala Patthar की चढ़ाई का मुख्य रास्ता गोरक शेप से शुरू होता है। गोरक शेप करीब 5,164 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और यह खुम्बु घाटी का आखिरी ऐसा पड़ाव है, जहां यात्रियों को ठहरने के लिए लॉज और चायघर मिलते हैं। गोरक शेप से Kala Patthar के शिखर तक एक तरफ की दूरी करीब 1.5 किलोमीटर है। मैदानी इलाके में 1.5 किलोमीटर की दूरी कोई बड़ी बात नहीं लगती। लेकिन यहां कहानी बिल्कुल अलग है। इतनी ऊंचाई पर शरीर बहुत धीरे काम करता है और सांस जल्दी फूलती है। इसी वजह से इस छोटी सी दूरी को पूरा करने में करीब 2 से 3 घंटे तक लग सकते हैं। नीचे लौटने में करीब 45 मिनट से एक घंटे तक का समय लग सकता है। रास्ते को मोटे तौर पर तीन हिस्सों में समझा जा सकता है। पहला हिस्सा गोरक शेप से निकलने के बाद पुराने सूखे तालाब के तल से होकर जाता है। यहां जमीन अपेक्षाकृत समतल है और पास में एक छोटा हेलिपैड भी है। इसके बाद चढ़ाई का मुश्किल हिस्सा शुरू होता है। मिट्टी और बजरी वाले रास्ते पर टेढ़े-मेढ़े मोड़ों से ऊपर जाना पड़ता है। यह हिस्सा काफी खड़ी ढलान वाला है और यहीं ज्यादातर ट्रेकर्स की सांस सबसे ज्यादा फूलती है। आखिरी हिस्से में बड़े-बड़े काले पत्थर और चट्टानें मिलती हैं। यहां सामान्य रास्ते की जगह पत्थरों के बीच से आगे बढ़ना पड़ता है। कई जगह संतुलन बनाने के लिए हाथों का सहारा भी लेना पड़ सकता है। आखिर में प्रार्थना झंडों से सजा ऊपरी हिस्सा दिखाई देता है और वहीं पहुंचकर Kala Patthar का शानदार नजारा सामने आता है। Kala Patthar पर सुबह जाएं या शाम को? यह सवाल लगभग हर ट्रेकर के मन में रहता है कि Kala Patthar पर सूर्योदय देखना बेहतर है या सूर्यास्त। सुबह का समय सबसे लोकप्रिय है। सूर्योदय देखने के लिए आमतौर पर तड़के करीब 3:30 से 4 बजे के बीच गोरक शेप से निकलना पड़ता है। उस वक्त अंधेरा होता है और तापमान काफी नीचे जा सकता है। ठंड इतनी ज्यादा हो सकती है कि मोबाइल और कैमरे की बैटरी भी तेजी से खत्म होने लगती है। लेकिन सुबह जाने का एक बड़ा फायदा मौसम है। दोपहर के बाद पहाड़ों पर बादल आने की संभावना बढ़ जाती है, जबकि सुबह आसमान ज्यादा साफ मिलने की उम्मीद रहती है। नीचे लौटते समय दिन का उजाला भी मिल जाता है, इसलिए रास्ता देखना आसान रहता है। दूसरी तरफ शाम का समय फोटोग्राफी के लिए बेहद खास हो सकता है। सूर्यास्त के वक्त सूरज की आखिरी किरणें एवरेस्ट की चोटी पर पड़ती हैं। सफेद बर्फ धीरे-धीरे सुनहरी, नारंगी और गुलाबी रंग में बदलती दिखाई दे सकती है। इसी खूबसूरत रोशनी को अल्पनग्लो कहा जाता है। शाम को भीड़ सुबह की तुलना में कम हो सकती है और माहौल ज्यादा शांत मिल सकता है। लेकिन इसका नुकसान यह है कि दोपहर बाद बादल आ सकते हैं। साथ ही वापसी अंधेरे में करनी पड़ सकती है, इसलिए हेडलैंप जरूरी हो जाता है। इसलिए Kala Patthar के लिए समय चुनते वक्त