Bazar Delhi

क्यों कहते हैं इस जगह को दिल्ली की रूह? चावड़ी बाज़ार की गलियों में छिपे हैं कई अनकहे राज़!

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पहली झलक में चावड़ी बाज़ार चावड़ी बाज़ार एक मात्र ऐसा बाजार है जिसकी पहचान बस आवाजों से की जा सकती है, जैसे ही मैं मेट्रो स्टेशन से बाहर निकलता हूं, कानों में एक साथ सैकड़ों ध्वनियां घुल जाती हैं, घंटियों की टन-टन, रिक्शे की बेल, दुकानदारों की पुकार और खरीदारों की चहल पहल। हवा में घुली हुई चाय और जलेबी की मिठास मन को उसी पल से अपनी गिरफ्त में ले लेती है। यहां कदम रखते ही ऐसा लगता है जैसे दिल्ली की रगों में बहती पुरानी नब्ज़ को आप महसूस कर रहे हों। गलियां तंग हैं, लेकिन हर गली में ज़िंदगी का जश्न आप यहां देख सकते हैं। दुकानों के ऊपर लटकते बिजली के तार किसी पुराने नाटक के मंच जैसे लगते हैं, जहां हर किरदार अपनी-अपनी भूमिका निभा रहा है। एक घुमक्कड़ के लिए यह जगह सिर्फ बाज़ार नहीं, एक म्यूज़ियम है जहां हर दीवार, हर मोड़ और हर गली एक कहानी सुनाती है। यहां कोई जल्दी में नहीं होता, क्योंकि हर कोई जानता है कि चावड़ी बाज़ार की रफ्तार अपने हिसाब से चलती है।(चावड़ी बाज़ार एक मात्र ऐसा बाजार है जिसकी पहचान बस आवाजों से की जा सकती है,) इतिहास की गलियों में चावड़ी बाज़ार दिल्ली का इतिहास जितना पुराना है, उतनी ही पुरानी ये गलियां हैं। चावड़ी शब्द की जड़ें मराठी से आती हैं जिसका मतलब होता है पब्लिक हॉल या “सामुदायिक सभा स्थल। पुराने ज़माने में यहां सरकारी ऐलान होते थे, अदालतें लगती थीं, और व्यापारी अपने सौदे तय करते थे। मुगल काल में चावड़ी बाज़ार सिर्फ व्यापार का ठिकाना नहीं था, बल्कि यह सामाजिक जीवन का केंद्र भी था। यहां से लेकर जामा मस्जिद तक का इलाका तब भी दिल्ली की रौनक कहलाता था। अंग्रेज़ी राज में यही बाज़ार दिल्ली के कई ब्रिटिश ऑफिसर क्वार्टर्स से जुड़ा हुआ था। आज भी जब आप इन गलियों में चलते हैं, तो पुराने हवेलियों की झरोखों से झांकती लकड़ी की जालियां और दीवारों की उखड़ी पपड़ी उस बीते वक्त की गवाही देती हैं। इतिहास के बीच से गुजरते हुए ऐसा लगता है जैसे आप किसी टाइम मशीन में बैठ गए हों हर कदम आपको दिल्ली के किसी और दौर में ले जाता है। कैसे पहुंचें दिल्ली की नब्ज़ चावड़ी बाज़ार चावड़ी बाज़ार तक पहुंचना उतना ही आसान है जितना दिल्ली में किले खोज लेना। अगर आप दिल्ली मेट्रो से आ रहे हैं, तो ब्लू लाइन या येलो लाइन से कनेक्ट होकर सीधे चावड़ी बाज़ार मेट्रो स्टेशन पर उतरिए। जैसे ही एस्कलेटर से ऊपर आएंगे, हवा का एक झोंका और दुकानों की चमक आपको बता देगी कि आप सही जगह पहुंचे हैं। जो लोग पुरानी दिल्ली की गलियों के दीवाने हैं, वे चाहें तो रिक्शा राइड लेकर यहां तक पहुंच सकते हैं। रिक्शा चलाने वाले अंकल अक्सर आपको रास्ते में वो कहानियां सुना देंगे जो किसी किताब में नहीं मिलतीं। अगर आप थोड़े घुमक्कड़ हैं, तो चावड़ी बाज़ार तक पैदल आना सबसे अच्छा अनुभव देगा जामा मस्जिद, दरियागंज और कुचामन गली जैसे इलाकों से गुजरते हुए आपको असली पुरानी दिल्ली का स्वाद मिलेगा। यहां का हर मोड़, हर गली किसी रोमांच से कम नहीं है मानो दिल्ली की नब्ज़ यहीं धड़कती हो। सुगंध और स्वाद का ठिकाना क्या खाएं चावड़ी बाज़ार में अगर आप फूडी हैं तो चावड़ी बाज़ार आपके लिए टेस्ट का पैराडाइज़ है। यहां हर 10 कदम पर कोई न कोई खुशबू आपको खींच ले जाएगी। सुबह की शुरुआत करें परांठे वाली गली से जहां आलू, गोभी, पनीर, और यहां तक कि मीठे परांठे तक मिलते हैं। एक कौर लेते ही मक्खन का स्वाद ज़ुबान पर पिघल जाता है और आप सोच में पड़ जाते हैं कि क्या यही है दिल्ली की असली पहचान? थोड़ा आगे चलें तो जलेबी वाला आपको गरमागरम जलेबियां देगा, जो देसी घी में तली हुई होती हैं। लस्सी की कुल्हड़ पकड़े किसी दुकान के बाहर खड़े होकर पीना, गर्मी में ठंडक का सबसे प्यारा एहसास देता है खैर अब तो सर्दी का मौसम आ गया है तो आप चाय या गरम कॉफी का मजा ले साकेत हैं। यहां की गलियों में छोटे ठेलों पर मिलने वाले छोले-भटूरे, मटर-कुल्चे और आलू टिक्की न सिर्फ पेट भरते हैं बल्कि दिल भी खुश कर देते हैं। रात को जब बाज़ार की रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ती है, तो कुल्हड़ चाय की दुकानें जाग जाती हैं। वहां बैठकर अगर आप चाय की चुस्की लेते हुए लोगों को गुजरते देखें, तो महसूस होगा कि यह बाज़ार रात में भी सोता नहीं, बस धीरे-धीरे सपने देखता है। इस रंगों के मेले से क्या खरीदें? चावड़ी बाज़ार खरीददारों के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं। यहां की दुकानों में जो विविधता है, वो शायद ही किसी और जगह मिले। शादी के कार्ड्स से लेकर सजावट की झिलमिल लाइट्स तक, हर चीज़ में एक पुरानी दिल्ली वाली आत्मा बसती है। अगर आप शादी या त्यौहार की तैयारी कर रहे हैं, तो यहां के कार्ड प्रिंटिंग शॉप्स, गिफ्ट रैप पेपर, और सजावट की दुकानों में आपको हर रंग, हर डिज़ाइन मिलेगा।थोड़ा आगे बढ़ें तो पीतल और तांबे के बर्तन, पुराने ग्रैमोफोन रिकॉर्ड्स, और घंटियों की आवाज़ वाली दुकानें मिलेंगी। बातचीत करते वक्त दुकानदार की क्या चाहिए बाबूजी? वाली आवाज़ आपको साठ-सत्तर के दशक में ले जाती है। यहां बार्गेनिंग भी एक कला है अगर आपने थोड़ा धैर्य दिखाया, तो दाम आधा भी हो सकता है। दुकानदारों की बोली, ले जाइए साब, आख़िरी भाव! सुनकर मुस्कुराना बनता है यदि आप चाहें तो। रात की रौनक, जब बाज़ार पर चांद की नजर होती है! दिनभर की भीड़-भाड़ के बाद जैसे ही सूरज पश्चिम में ढलने लगता है, चावड़ी बाज़ार का रूप बदल जाता है। दुकानों के शटर गिरते हैं, लेकिन गलियों की हवा अब भी गर्म रहती है  खुशबू, धूल और यादों से भरी हुई। कुछ दुकानों के बाहर बैठे लोग चाय पीते हैं, दिनभर की बिक्री गिनते हैं और अपने घरों की तरफ लौटने की तैयारी करते हैं। दीवारों पर लटके बल्ब अब झिलमिलाते हैं, जैसे बाज़ार खुद को रात के लिए सजा रहा हो। उस पल चावड़ी बाज़ार किसी बूढ़े दादा की तरह लगता है, जो दिनभर की मेहनत के बाद अपनी पुरानी कुर्सी पर बैठा है, लेकिन आंखों में