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Hidimba Devi Temple: हिमाचल के मनाली में एकमात्र भीम की पत्नी हिडिंबा को समर्पित महाभारत युगीन मंदिर! 

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Hidimba Devi Temple: मनाली का नाम लेते ही अक्सर हमारी आंखों के सामने बर्फ़ से ढकी चोटियां, सेब के बागान और रोमांटिक हनीमून डेस्टिनेशन की तस्वीर उभर आती है। लेकिन इस पूरी तस्वीर के बीच एक जगह ऐसी भी है, जो सिर्फ़ टूरिस्ट स्पॉट नहीं, बल्कि लोक-आस्था, हिमाचली विरासत और प्रकृति का मिला-जुला शानदार स्पॉट है हिडिंबा देवी मंदिर। पुरानी मनाली के धुंगरी इलाके में, ऊंचे देवदार के पेड़ों के बीच बसा यह प्राचीन गुफ़ा-मंदिर 16वीं सदी का है और हिडिंबा देवी यानी भीम की पत्नी को समर्पित है। लकड़ी की चार मंज़िला पगोड़ा शैली की इमारत, काले-सफ़ेद पत्थरों से बनी नीची दीवारें, ऊपर से देवदार के पेड़ों की घनी छांव और मंदिर तक पहुंचने वाली पत्थरों की सीढ़ियां, यह सब ऐसा माहौल बना देती हैं कि लगता है जैसे आप किसी और ही जगह पहुंच गए हों। दिन में यहां दर्शन के लिए लंबी कतारें लगती हैं, लेकिन सुबह-सुबह या शाम के वक़्त जब हल्की-हल्की ठंडक, पेड़ों के बीच से छनकर आती रोशनी और घंटियों की आवाज़ मिलकर गूंजती है, तो इस जगह का जादू और भी बढ़ जाता है। कई लोग सिर्फ़ आध्यात्मिक वजह से नहीं, बल्कि यहां की वाइब, शांति और फ़ोटोग्राफ़ी के लिए भी बार-बार लौट कर आते हैं। हिडिंबा देवी मंदिर कहां है? हिडिंबा देवी मंदिर हिमाचल प्रदेश के कुल्लू ज़िले में बसे प्रसिद्ध हिल स्टेशन मनाली में स्थित है। यह मनाली के प्रसिद्ध मॉल रोड से लगभग 2 से 3 किलोमीटर दूर धुंगरी वन क्षेत्र Dhungri Van Vihar के बीचों-बीच है, जिसे लोकल लोग धुंगरी मंदिर भी कहते हैं। मॉल रोड से आप पैदल भी आराम से यहां तक पहुंच सकते हैं। हल्का चढ़ाई वाला रास्ता है, लेकिन इतना कठिन नहीं कि सांस फूल जाए। (कई लोग सिर्फ़ आध्यात्मिक वजह से नहीं, बल्कि यहां की वाइब, शांति और फ़ोटोग्राफ़ी के लिए भी बार-बार लौट कर आते हैं।) रास्ते में छोटे-छोटे कैफ़े, ऊनी कपड़ों की दुकानें और लोकल फोटोग्राफर कैमरा लिए खड़े नज़र आते हैं, जो आपकी पारंपरिक हिमाचली ड्रेस में तस्वीरें खींचने का ऑफर देते रहते हैं। मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण इसकी अनोखी वास्तुकला है। यह पूरी तरह पारंपरिक हिमाचली शैली की पगोड़ा Pagoda शैली में बना है। ऊपर की तरफ़ जाते हुए छोटी होती चार परतों वाली लकड़ी की छत, जिसमें तीन मंज़िलों पर देवदार की लकड़ी की टाइलें और सबसे ऊपर पीतल का शंकु-नुमा कलश लगा है। नीचे पत्थर और मिट्टी से बनी मोटी दीवारें, अंदर एक विशाल चट्टान, जिसे देवी का प्रतीक मानकर पूजा जाता है। हिडिंबा देवी का महाभारत यगीन इतिहास हिडिंबा देवी की कहानी सीधे महाभारत के समय से जुड़ती है। कथा के अनुसार, हिडिंबा और उसका भाई हिडिंब यहां के घने जंगलों में रहते थे। कहा जाता है कि हिडिंब बहुत शक्तिशाली और क्रूर था और उसकी शर्त थी कि जो भी उसे युद्ध में हराएगा, वही हिडिंबा का वर बनेगा। जब पांडव वनवास के दौरान इस क्षेत्र में पहुंचे तो हिडिंब ने उन पर हमला किया लेकिन भीम ने उसे परास्त कर दिया। हिडिंबा ने भीम की वीरता और नेक दिल स्वभाव से प्रभावित होकर उससे विवाह किया और उनसे घटोत्कच नाम के पराक्रमी पुत्र का जन्म हुआ। जिसने आगे चलकर कुरुक्षेत्र के युद्ध में अहम भूमिका निभाई। महाभारत के युद्ध के बाद जब पांडव आगे बढ़ गए, तो हिडिंबा ने मनाली में ही रहकर घोर तपस्या की। माना जाता है कि देवी ने वर्षों तक ध्यान लगाकर ऐसी आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त की कि धीरे-धीरे लोग उन्हें देवी स्वरूप मानने लगे। बाद में 1553 ईस्वी में कुल्लू घाटी के शासक महाराजा बहादुर सिंह ने इस गुफ़ा के ऊपर लकड़ी का यह भव्य मंदिर बनवाया, जो आज हिडिंबा देवी मंदिर के नाम से जाना जाता है। खाना-पीना और रुकने की जगहें। अब बात करते हैं उस चीज़ की जो हर यात्री के दिल के बहुत करीब होती है अच्छा खाना और आरामदायक ठहरने की जगह। हिडिंबा देवी मंदिर के आसपास का इलाका पुराने मनाली Old Manali से भी जुड़ता है, जहां आपको बजट गेस्ट हाउस से लेकर कॉज़ी होमस्टे और मिड-रेंज बुटीक होटल तक हर तरह का स्टे ऑप्शन मिल जाएगा। धुंगरी मंदिर रोड और सियाल क्षेत्र में कई ऐसे होटल हैं, जो मंदिर से पैदल दूरी पर हैं। सुबह बालकनी से बैठकर पहाड़ों को निहारिए और थोड़ी ही देर में मंदिर के दर्शन के लिए निकल पड़िए। अगर आप शांत माहौल चाहते हैं तो पुराने मनाली के पुल के उस पार वाले होमस्टे चुन सकते हैं, जहां कैफ़े कल्चर भी है और पहाड़ी गांव वाली सादगी भी। खाने की बात करें तो मंदिर के आसपास छोटी-छोटी दुकानों से लेकर अच्छे रेस्टोरेंट तक मिलते हैं। कई दुकानों पर आलू-पराठा, छोले-भटूरे, समोसा, पकोड़े और गरम-गरम चाय मिलती है, जो ठंडे मौसम में जान डाल देती है। हिडिंबा मंदिर तक कैसे पहुंचें? मनाली पहुंचना आजकल काफी आसान हो गया है और शहर में आ जाने के बाद हिडिंबा देवी मंदिर तक पहुंचना तो और भी आसान। सबसे नज़दीकी एयरपोर्ट भुंतर कुल्लू-मनाली एयरपोर्ट है, जो मनाली से लगभग 50 किलोमीटर दूर है। यहां से आप टैक्सी या बस लेकर लगभग डेढ़ दो घंटे में मनाली पहुंच जाते हैं। ट्रेन से आने पर नज़दीकी बड़ा रेलवे स्टेशन चंडीगढ़ है। वहां से मनाली के लिए लगातार वोल्वो, प्राइवेट और एचआरटीसी बसें उपलब्ध रहती हैं। रास्ता लंबा ज़रूर है, लेकिन व्यास नदी के साथ-साथ चलते घुमावदार पहाड़ी मार्ग, सुरंगें और बीच-बीच में छोटे कस्बे पूरे सफ़र को यादगार बना देते हैं। जब आप मनाली शहर में हों, तो मॉल रोड, सर्किट हाउस या पुराने मनाली के किसी भी हिस्से से हिडिंबा मंदिर तक टैक्सी, ऑटो या बाइक से आसानी से जा सकते हैं। मंदिर का टाइम आम तौर पर सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे तक बताया जाता है और प्रवेश पूरी तरह मुफ़्त है। बस पूजा या फोटोग्राफ़ी के लिए कहीं-कहीं छोटा-मोटा शुल्क लग सकता है।   मंदिर की सुंदरता और आसपास के आकर्षण हिडिंबा देवी मंदिर की असली खूबसूरती सिर्फ़ इसकी इमारत में नहीं बल्कि उसके माहौल में है। मंदिर के चारों ओर फैला घना देवदार वन ऐसा आभास देता है मानो आप किसी प्राचीन रहस्यमयी जंगल में हों। पेड़ों की ऊंचाई इतनी ज़्यादा है कि कई जगह धूप सीधे

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भारत का एक मात्र मंदिर जहाँ मूषक नहीं मोर है गणेश जी की सवारी-खासियत जानकर रह जायेंगे दंग

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गणेश चतुर्थी का त्यौहार देश भर में धूमधाम से मनाया जाता है. इस गणेशोत्‍सव में हर कोई गणपति बप्पा की भक्ति में दिलोजान से रमा नजर आता है। गणेश चतुर्थी के इस खास मौके पर हम आपको गणेश जी से जुड़े एक बेहद खूबसूरत और अनोखे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसकी मान्यता और विशेषता सुनकर आप दंग रह जाएंगे, जो है भारत का एक मात्र मंदिर जहाँ मूषक नहीं मोर है गणेश की सवारी… महाराष्ट्र के शहर पुणे की ऐतिहासिक गलियों में स्थित त्रिशुंड गणपति मंदिर एक ऐसा आध्यात्मिक ठिकाना है, जो न केवल अपनी अनोखी मूर्ति के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि अपनी स्थापत्य कला, रहस्यमय इतिहास और आध्यात्मिक ऊर्जा के लिए भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। यह भारत का शायद इकलौता गणेश मंदिर है, जहां गणपति बप्पा तीन सूंडों (त्रिशुंड), छह भुजाओं और तीन नेत्रों के साथ मोर पर सवार दिखाई देते हैं—जो कि पारंपरिक मूषक वाहन से एकदम अलग और दुर्लभ दृश्य है। इसलिए यह भारत का एक मात्र मंदिर है जहाँ गणेश जी की सवारी मोर है. मंदिरगणेश भक्तों के लिए यह मंदिर एक अनोखा अनुभव है—जहाँ वे न सिर्फ दर्शन करते हैं, बल्कि गणेश के उस रूप से भी जुड़ते हैं जो बल, विवेक और ख़ूबसूरती का प्रतीक है। यह स्थान केवल पुणे की धरोहर नहीं, बल्कि एक ऐसी आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत है, जो बप्पा के मोर-सवार स्वरूप के दर्शन से होती है। कब हुआ था मंदिर का निर्माण मंदिर की नींव 1754 में भिक्षुगिरि गोसावी ने रखी और 1770 में यह बन कर पूरा हुआ। मान्यताओं के अनुसार शुरुआत में यह एक शिव मंदिर था, फिर गणपति मंदिर बन गया। मंदिर संगमरमर व देक्कन बेसाल्ट पत्थर से बना है। बाहरी दीवारों की नक्काशी में घोड़ों, गैंडों, अंग्रेज़ सैनिकों और युद्ध के मैदानों जैसे दृश्य बने हुए हैं। ऐसा माना जाता है कि ये नक्काशी 1757 में हुई प्लासी की लड़ाई के बाद बंगाल और असम पर अंग्रेजों की जीत को दिखाती है। वहीं दूसरी ओर मंदिर की बनावट में मालवा, राजपूताना और द्रविड़ शैलियों का खूबसूरत मेल दिखता है। दीवारों पर तीन लिपियाँ—देवनागरी, संस्कृत और फ़ारसी—मानना हैं कि यह मंदिर सांस्कृतिक और धार्मिक सार्वभौमिकता को दर्शाता है। गुरु पूर्णिमा पर खुलता है मंदिर के विशेष तहखाने का दरवाजा मंदिर में एक तहखाना (जहाँ गोसावी भिक्षुगिरि की समाधि स्थित है) भी है, यहां तपस्वी ध्यान करते थे। ये जगह आमतौर पर बंद रहता है। केवल गुरु पूर्णिमा के दिन ही दर्शन के लिए खोला जाता है। गणेश चतुर्थी पर जगमगा उठता है मंदिर भारत का यह एक मात्र मंदिर -त्रिशुंड गणपति मंदिर खासतौर पर गणेश चतुर्थी और गुरु पूर्णिमा पर रौशनी से जगमगा उठता है। इन दिनों मंदिर को अच्छे से सजाया जाता है,ऐसे खास मौकों पर भजन-कीर्तन, ढोल-मंजीरे और भक्तों की सामूहिक प्रार्थना और भक्ति भाव  पूरे वातावरण को दिव्यता और सौन्दर्यता से भर देते हैं। दूर-दूर से यहाँ भक्त आकर न केवल पूजा-अर्चना करते हैं, बल्कि आत्मिक शांति और आस्था की अनुभूति भी करते हैं। भक्तों का विश्वास है कि यहां से भावपूर्ण भक्ति द्वारा हर मनोकामना पूर्ण होती है यह मंदिर पुणे के सोमवार पेठ (Somwar Peth) इलाके में स्थित है, कमला नेहरू हॉस्पिटल के पास। भक्तों के लिए फाइव कलर्स ऑफ़ ट्रेवल के विशेष सुझाव – 1*भीड़-भाड़ और तंग गलियों में स्थित होने के कारण पार्किंग चुनौतीपूर्ण हो सकती है; सुझाव है कि ऑटो या लोकल परिवहन से आएँ। 2*यदि संभव हो तो सुबह (7–8 ) या शाम (4–6 ) में दर्शन करिए — तब मौसम सुहावना होता है और भीड़ भी थोड़ी कम रहती है। 3*आसपास स्थित अन्य मंदिर (जैसे नागेश्वर मंदिर, जूनी बेलबाग मंदिर) भी दर्शन योग्य हैं। अगर आप यहाँ आये ही हैं तो इन मंदिरों के भी दर्शन कर सकते हैं। बाकी तो सब बढ़िया ही है….. A story by Pardeep Kumar