Angkor Wat Travel Destination Latest

Angkor Wat: World’s Biggest Hindu Temple क्यों कहलाता है?

  • 0 Comments

जब भी दुनिया के सबसे बड़े हिंदू मंदिर की बात आती है तो ज़्यादातर लोगों के दिमाग में भारत के बड़े मंदिरों के नाम आते हैं — श्रीरंगम, अक्षरधाम या बृहदेश्वर। पर सच कुछ अलग है। दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक परिसर भारत में नहीं बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया के कंबोडिया देश में है। इसका नाम Angkor Wat है। Angkor Wat आखिर इतना खास क्यों है? Angkor Wat सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि इतिहास, कला और प्राचीन इंजीनियरिंग का ऐसा नमूना है जिसकी बराबरी मुश्किल से ही कही दिखती है। यह लगभग 400–402 एकड़ में फैला हुआ है — इतना विशाल कि इसके अंदर कई बड़े स्टेडियम या छोटे-छोटे शहर के हिस्से आराम से समा सकते हैं। Guinness World Records ने इसे दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक स्मारक के रूप में मान्यता दी है। यह कंबोडिया के Siem Reap के पास स्थित है और देश की पहचान बन चुका है — इतना कि इसकी तस्वीर कंबोडिया के राष्ट्रीय ध्वज पर भी है। मंदिर तक पहुंचने का अनुभव अलग क्यों है? Angkor Wat के चारों ओर एक बड़ी पानी से भरी खाई (moat) है, जिससे मंदिर एक तरह से पानी के बीच खड़ा नजर आता है। मंदिर तक पहुंचने के लिए पत्थर की लंबी सैरगाह है और जैसे ही आप करीब आते हैं तो ऊँचे-ऊँचे शिखर दिखाई देने लगते हैं। सूर्योदय के वक्त यह दृश्य और भी मनोहारी बन जाता है — यही वजह है कि Angkor Wat दुनिया के सबसे ज्यादा फोटोग्राफ़ किए जाने वाले स्मारकों में से एक है। क्यों और किसने बनवाया? Angkor Wat का निर्माण 12वीं शताब्दी में खमेर साम्राज्य के प्रसिद्द राजा सूर्यवर्मन द्वितीय ने करवाया था। वह भगवान विष्णु के बड़े भक्त थे और मंदिर को विष्णु को समर्पित किया गया था। इतिहासकारों के अनुसार निर्माण में 30–40 साल लगे और लाखों मजदूरों व हजारों कारीगरों ने इसमें हिस्सा लिया। उस समय आधुनिक मशीनों का सहारा न होते हुए भी पत्थरों को इतनी सटीकता से जोड़ा गया कि आज 900 साल बाद भी मंदिर मजबूती से खड़ा है। बिना मशीनों के यह कैसे संभव हुआ? पत्थर दूर-दूर के खानों से लाए गए, नदियों और लकड़ी के बेड़ों से ढोए गए और कुशल कारीगरों ने उन्हें जोड़ा। पत्थरों के जोड़ इतने परफेक्ट हैं कि सीमेंट जैसी गद्दी बहुत कम जगहों पर ही उपयोग हुई दिखती है। यही कारण है कि Angkor Wat को प्राचीन इंजीनियरिंग का एक उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। मंदिर की बनावट क्या दर्शाती है? Angkor Wat की डिजाइन हिन्दू ब्रह्मांडीय कल्पनाओं का प्रतीक है। मध्य में बने पाँच शिखर मेरु पर्वत के प्रतीक हैं — जिसे देवताओं का निवास माना जाता है। चारों तरफ बनी दीवारें पहाड़ों का प्रतीक हैं और बाहर की विशाल खाई समुद्र का प्रतिनिधित्व करती है। यानी पूरा परिसर हिंदू ब्रह्मांड की संरचना को पत्थरों में व्यक्त करता है। सूर्य और मंदिर — एक खास नाता Angkor Wat की खगोलीय योजना भी काबिले-तारीफ है। साल में दो बार Equinox के समय उगता हुआ सूरज मंदिर के मुख्य शिखर के ठीक पीछे दिखाई देता है। हजारों लोग सिर्फ यही नज़ारा देखने सुबह-सुबह आते हैं — जब सूरज की किरणें शिखर के पार निकलती हैं तो पूरा परिसर सुनहरी रोशनी से भर जाता है। इतनी सटीक समय-निर्धारण के साथ निर्माण प्राचीन योजनाकारों की दूरदर्शिता को दर्शाता है। दीवारों की नक्काशियाँ   Angkor Wat की दीवारों पर उकेरी गई नक्काशियाँ इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती हैं। दीवारों पर रामायण, महाभारत और समुद्र मंथन जैसी पौराणिक कहानियाँ विस्तृत रूप में उकेरी गई हैं। समुद्र मंथन से लेकर महाभारत के युद्ध तक—हर दृश्य बारीकी से पत्थरों पर खुदा हुआ है। साथ ही यहाँ लगभग 1700 अप्सराओं की मूर्तियाँ भी हैं—और भी दिलचस्प बात यह कि हर मूर्ति का चेहरा, गहना और भाव अलग है—कोई भी दो अप्सरा बिल्कुल समान नहीं दिखती। हिंदू मंदिर से बौद्ध स्थल बनने तक का सफर Angkor Wat की शुरुआत विष्णु को समर्पित हिंदू मंदिर के रूप में हुई थी। पर समय के साथ कंबोडिया में बौद्ध धर्म का प्रभुत्व बढ़ा और धीरे-धीरे यहाँ बौद्ध प्रभाव भी दिखाई देने लगा। राजा जयवर्मन सप्तम के बाद बौद्ध परंपरा का असर बढ़ा, पर मंदिर की मूल वास्तुकला में बड़े परिवर्तन नहीं हुए। आज यहाँ हिंदू और बौद्ध दोनों संस्कृतियों के संकेत देखे जा सकते हैं, जिससे यह स्थान और भी अनोखा बन गया है। कई साल जंगलों में छिपा रहा यह मंदिर 15वीं सदी के बाद खमेर साम्राज्य कमजोर पड़ा और राजधानी दूसरी जगह चली गयी, जिससे Angkor Wat धीरे-धीरे जंगलों में खो गया। लेकिन स्थानीय लोग इसे कभी भूल नहीं पाए और समय-समय पर पूजा के लिए आते रहे। 19वीं सदी में फ्रांसीसी खोजकर्ताओं और बाद में विशेषज्ञों की मदद से यह फिर से दुनियाभर की नज़रों में आया। भारत की Archaeological Survey of India (ASI) ने भी संरक्षण और मरम्मत में योगदान दिया है और आज कंबोडिया व अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ मिलकर इसे संरक्षित करती हैं। UNESCO वर्ल्ड हेरिटेज साइट क्यों है? Angkor Wat की ऐतिहासिक, स्थापत्यात्मक और सांस्कृतिक अहमियत के चलते 1992 में UNESCO ने इसे World Heritage Site में शामिल किया। आज यह हर साल लाखों पर्यटकों को आकर्षित करता है—इतिहासकार, फोटोग्राफ़र, वास्तुकला के छात्र और धर्म-परीक्षक सभी के लिए यह एक अनमोल स्थान है। सूर्योदय के वक्त मंदिर की जलप्रतीछाया (reflection) देखने लायक बेहद मनोरम दृश्य बनाती है। घूमने का सबसे अच्छा समय Angkor Wat घूमने के लिए नवंबर से फ़रवरी के बीच का मौसम सबसे अच्छा माना जाता है — तब तापमान ठंडा और आरामदायक रहता है। मार्च–मई में गर्मी बढ़ जाती है और जून–अक्टूबर मॉनसून का समय होता है। अगर आप सर्वोत्तम सूर्योदय का अनुभव लेना चाहें तो सुबह-सुबह पहुँचना सबसे अच्छा रहेगा। पूरा परिसर बड़ा है—इसे एक दिन में भाग-दौड़ में देखने की बजाय 2–3 दिन का समय देना बेहतर रहता है। Angkor Wat सिर्फ मंदिर नहीं, एक इतिहास की किताब है यहाँ की नक्काशियाँ, शिल्प और योजना इस बात का प्रमाण हैं कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति का प्रभाव सदियों पहले दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैला हुआ था। जब कोई भारतीय पहली बार यहाँ आता है तो उसे एक तरह की अपनत्व भावना महसूस होती है—क्योंकि कई कहानियाँ और प्रतीक भारतीय ग्रंथों से जुड़े हैं।