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Munsiyari Travel Guide: घूमने की जगहें, ट्रेक, होटल और पूरी जानकारी

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क्या आपने कभी ऐसी जगह की कल्पना की है, जहाँ सुबह खिड़की खोलते ही बर्फ से ढकी चोटियाँ दिखाई दें, जहाँ हवा में देवदार की खुशबू घुली हो और जहाँ समय जैसे थोड़ा धीमा पड़ जाता हो? अगर नहीं, तो आपको एक बार Munsiyari जरूर जाना चाहिए। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में लगभग 2,200 मीटर की ऊँचाई पर बसा Munsiyari आज उन यात्रियों की पसंद बनता जा रहा है, जो भीड़-भाड़ वाले हिल स्टेशनों से दूर प्रकृति के बीच कुछ सुकून भरे पल बिताना चाहते हैं। यही वजह है कि कई लोग Munsiyari को उत्तराखंड का असली Hidden Gem भी कहते हैं। “सार संसार, एक मुनस्यार”- एक कहावत जो सब कुछ कह देती है कुमाऊँ में एक पुरानी कहावत काफी प्रसिद्ध है—“सार संसार, एक मुनस्यार”। इसका अर्थ है कि एक तरफ पूरी दुनिया की खूबसूरती रख दी जाए और दूसरी तरफ मुनस्यारी, तो मुनस्यारी का पलड़ा भारी पड़ेगा। जब आप Munsiyari की हरी-भरी घाटियों, दूर तक फैले जंगलों और हिमालयी चोटियों को देखते हैं, तो यह कहावत बिल्कुल सच लगने लगती है। यहाँ की सबसे बड़ी खासियत इसकी सादगी है। अभी भी यह जगह बड़े पैमाने पर व्यावसायिक पर्यटन से बची हुई है, इसलिए यहाँ प्रकृति का असली रूप देखने को मिलता है। Munsiyari को ‘छोटा कश्मीर‘ क्यों कहा जाता है? कई पर्यटक पहली बार Munsiyari पहुँचकर यही कहते हैं कि यहाँ के दृश्य उन्हें कश्मीर की याद दिलाते हैं। सर्दियों में जब पूरा इलाका बर्फ की सफेद चादर से ढक जाता है, तब यह जगह किसी पोस्टकार्ड जैसी दिखाई देती है। वहीं गर्मियों में यहाँ की घास से ढकी पहाड़ियाँ, रंग-बिरंगे फूल और साफ आसमान एक अलग ही अनुभव देते हैं। बारिश के मौसम में Munsiyari की हरियाली और भी निखर जाती है और बादल पहाड़ों के बीच उतर आते हैं। यही कारण है कि इसे प्यार से “Little Kashmir” भी कहा जाता है। पंचाचूली की चोटियाँ: Munsiyari की सबसे बड़ी पहचान अगर किसी एक चीज ने Munsiyari को सबसे ज्यादा प्रसिद्ध बनाया है, तो वह हैं पंचाचूली की पाँच बर्फीली चोटियाँ। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, स्वर्ग जाने से पहले पांडवों ने यहाँ अपना अंतिम भोजन बनाया था। इसी कारण इन चोटियों का नाम पंचाचूली पड़ा, जिसका अर्थ है “पाँच चूल्हे”। सुबह सूरज की पहली किरण जब इन चोटियों पर पड़ती है, तो ये सुनहरे रंग में चमकने लगती हैं। शाम के समय इनका रंग धीरे-धीरे नारंगी और गुलाबी दिखाई देने लगता है। कई फोटोग्राफर सिर्फ इस दृश्य को कैमरे में कैद करने के लिए Munsiyari आते हैं। ट्रेकिंग प्रेमियों के लिए किसी जन्नत से कम नहीं अगर आपको ट्रेकिंग पसंद है, तो Munsiyari आपके लिए एक शानदार डेस्टिनेशन साबित हो सकता है। यहाँ से प्रसिद्ध खलिया टॉप ट्रेक शुरू होता है। इस ट्रेक के दौरान घास के मैदान, घने जंगल और बर्फ से ढकी चोटियाँ दिखाई देती हैं। ऊपर पहुँचने के बाद हिमालय का 360 डिग्री दृश्य देखने को मिलता है। इसके अलावा Munsiyari को मिलम ग्लेशियर, रालम ग्लेशियर और नामिक ग्लेशियर जैसे प्रसिद्ध ट्रेक्स का प्रवेश द्वार भी माना जाता है। यही वजह है कि एडवेंचर प्रेमियों के बीच इस जगह की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। पक्षियों और तितलियों की रंगीन दुनिया बहुत कम लोग जानते हैं कि Munsiyari बर्ड वॉचिंग और बटरफ्लाई वॉचिंग के लिए भी काफी प्रसिद्ध हो रहा है। पिथौरागढ़ क्षेत्र में पक्षियों और तितलियों की सैकड़ों प्रजातियाँ पाई जाती हैं। सुबह के समय जंगलों से आती पक्षियों की आवाजें पूरे वातावरण को और भी शांत बना देती हैं। प्रकृति प्रेमियों के लिए Munsiyari का यह पहलू किसी छिपे हुए खजाने से कम नहीं है। झरने, झीलें और सुकून भरे नज़ारे Munsiyari की यात्रा केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं है। यहाँ से कुछ दूरी पर स्थित बिर्थी फॉल लगभग 125 मीटर की ऊँचाई से गिरता है और मानसून के दौरान इसका दृश्य बेहद आकर्षक दिखाई देता है। इसके अलावा महेश्वरी कुंड भी पर्यटकों के बीच काफी लोकप्रिय है। स्थानीय लोग इस झील से जुड़ी कई दिलचस्प कहानियाँ सुनाते हैं। आसपास फैली हरियाली और शांत वातावरण इसे और भी खास बना देते हैं। Munsiyari कैसे पहुँचें? पहाड़ी क्षेत्र में स्थित होने के बावजूद Munsiyari तक पहुँचना पहले की तुलना में काफी आसान हो गया है। सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन काठगोदाम है। यहाँ से सड़क मार्ग द्वारा लगभग 10 से 12 घंटे में मुनस्यारी पहुँचा जा सकता है। यदि आप हवाई यात्रा करना चाहते हैं, तो पंतनगर एयरपोर्ट सबसे नजदीकी हवाई अड्डा है। दिल्ली, हल्द्वानी, अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ से नियमित बस और टैक्सी सेवाएँ भी उपलब्ध हैं। सड़क यात्रा के दौरान पहाड़ों, घाटियों और नदियों के खूबसूरत दृश्य पूरे सफर को यादगार बना देते हैं। Munsiyari में कहाँ ठहरें? पिछले कुछ वर्षों में Munsiyari में पर्यटन सुविधाएँ काफी बेहतर हुई हैं। यहाँ आपको बजट होटल, होमस्टे और छोटे गेस्ट हाउस आसानी से मिल जाएंगे। कई होमस्टे ऐसे हैं जहाँ कमरे की खिड़की से सीधे पंचाचूली की चोटियाँ दिखाई देती हैं। अगर आप स्थानीय संस्कृति को करीब से समझना चाहते हैं, तो किसी होमस्टे में रुकना बेहतर विकल्प हो सकता है। इससे आपको यहाँ के खान-पान और लोगों की जीवनशैली को समझने का मौका भी मिलेगा। यहाँ के लोग और संस्कृति भी उतनी ही खास है Munsiyari सिर्फ प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान के लिए भी जाना जाता है। यहाँ मुख्य रूप से शौका (भोटिया) जनजाति के लोग रहते हैं। पुराने समय में ये लोग तिब्बत के साथ व्यापार करते थे। आज भी उनकी संस्कृति, पहनावा और खान-पान में उस विरासत की झलक दिखाई देती है। यहाँ स्थित ट्राइबल हेरिटेज म्यूजियम स्थानीय संस्कृति को समझने के लिए एक बेहतरीन जगह मानी जाती है। Five Colors of Travel की ओर से कुछ खास सुझाव भट्ट की चुड़कानी और मडुआ की रोटी जैसे स्थानीय व्यंजनों का स्वाद जरूर लें। यदि आप ट्रेकिंग करने जा रहे हैं, तो अच्छी ग्रिप वाले जूते और गर्म कपड़े साथ रखें। स्थानीय महिलाओं द्वारा बनाए गए पश्मीना शॉल और ऊनी उत्पाद खरीदकर स्थानीय अर्थव्यवस्था को सहयोग करें। पहाड़ों की स्वच्छता बनाए रखने के लिए प्लास्टिक कचरा बिल्कुल न फैलाएँ और “Leave No Trace” के सिद्धांत का पालन करें। यदि आप बर्फ देखना चाहते हैं, तो जनवरी और

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Hidimba Devi Temple: हिमाचल के मनाली में एकमात्र भीम की पत्नी हिडिंबा को समर्पित महाभारत युगीन मंदिर! 

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Hidimba Devi Temple: मनाली का नाम लेते ही अक्सर हमारी आंखों के सामने बर्फ़ से ढकी चोटियां, सेब के बागान और रोमांटिक हनीमून डेस्टिनेशन की तस्वीर उभर आती है। लेकिन इस पूरी तस्वीर के बीच एक जगह ऐसी भी है, जो सिर्फ़ टूरिस्ट स्पॉट नहीं, बल्कि लोक-आस्था, हिमाचली विरासत और प्रकृति का मिला-जुला शानदार स्पॉट है हिडिंबा देवी मंदिर। पुरानी मनाली के धुंगरी इलाके में, ऊंचे देवदार के पेड़ों के बीच बसा यह प्राचीन गुफ़ा-मंदिर 16वीं सदी का है और हिडिंबा देवी यानी भीम की पत्नी को समर्पित है। लकड़ी की चार मंज़िला पगोड़ा शैली की इमारत, काले-सफ़ेद पत्थरों से बनी नीची दीवारें, ऊपर से देवदार के पेड़ों की घनी छांव और मंदिर तक पहुंचने वाली पत्थरों की सीढ़ियां, यह सब ऐसा माहौल बना देती हैं कि लगता है जैसे आप किसी और ही जगह पहुंच गए हों। दिन में यहां दर्शन के लिए लंबी कतारें लगती हैं, लेकिन सुबह-सुबह या शाम के वक़्त जब हल्की-हल्की ठंडक, पेड़ों के बीच से छनकर आती रोशनी और घंटियों की आवाज़ मिलकर गूंजती है, तो इस जगह का जादू और भी बढ़ जाता है। कई लोग सिर्फ़ आध्यात्मिक वजह से नहीं, बल्कि यहां की वाइब, शांति और फ़ोटोग्राफ़ी के लिए भी बार-बार लौट कर आते हैं। हिडिंबा देवी मंदिर कहां है? हिडिंबा देवी मंदिर हिमाचल प्रदेश के कुल्लू ज़िले में बसे प्रसिद्ध हिल स्टेशन मनाली में स्थित है। यह मनाली के प्रसिद्ध मॉल रोड से लगभग 2 से 3 किलोमीटर दूर धुंगरी वन क्षेत्र Dhungri Van Vihar के बीचों-बीच है, जिसे लोकल लोग धुंगरी मंदिर भी कहते हैं। मॉल रोड से आप पैदल भी आराम से यहां तक पहुंच सकते हैं। हल्का चढ़ाई वाला रास्ता है, लेकिन इतना कठिन नहीं कि सांस फूल जाए। (कई लोग सिर्फ़ आध्यात्मिक वजह से नहीं, बल्कि यहां की वाइब, शांति और फ़ोटोग्राफ़ी के लिए भी बार-बार लौट कर आते हैं।) रास्ते में छोटे-छोटे कैफ़े, ऊनी कपड़ों की दुकानें और लोकल फोटोग्राफर कैमरा लिए खड़े नज़र आते हैं, जो आपकी पारंपरिक हिमाचली ड्रेस में तस्वीरें खींचने का ऑफर देते रहते हैं। मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण इसकी अनोखी वास्तुकला है। यह पूरी तरह पारंपरिक हिमाचली शैली की पगोड़ा Pagoda शैली में बना है। ऊपर की तरफ़ जाते हुए छोटी होती चार परतों वाली लकड़ी की छत, जिसमें तीन मंज़िलों पर देवदार की लकड़ी की टाइलें और सबसे ऊपर पीतल का शंकु-नुमा कलश लगा है। नीचे पत्थर और मिट्टी से बनी मोटी दीवारें, अंदर एक विशाल चट्टान, जिसे देवी का प्रतीक मानकर पूजा जाता है। हिडिंबा देवी का महाभारत यगीन इतिहास हिडिंबा देवी की कहानी सीधे महाभारत के समय से जुड़ती है। कथा के अनुसार, हिडिंबा और उसका भाई हिडिंब यहां के घने जंगलों में रहते थे। कहा जाता है कि हिडिंब बहुत शक्तिशाली और क्रूर था और उसकी शर्त थी कि जो भी उसे युद्ध में हराएगा, वही हिडिंबा का वर बनेगा। जब पांडव वनवास के दौरान इस क्षेत्र में पहुंचे तो हिडिंब ने उन पर हमला किया लेकिन भीम ने उसे परास्त कर दिया। हिडिंबा ने भीम की वीरता और नेक दिल स्वभाव से प्रभावित होकर उससे विवाह किया और उनसे घटोत्कच नाम के पराक्रमी पुत्र का जन्म हुआ। जिसने आगे चलकर कुरुक्षेत्र के युद्ध में अहम भूमिका निभाई। महाभारत के युद्ध के बाद जब पांडव आगे बढ़ गए, तो हिडिंबा ने मनाली में ही रहकर घोर तपस्या की। माना जाता है कि देवी ने वर्षों तक ध्यान लगाकर ऐसी आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त की कि धीरे-धीरे लोग उन्हें देवी स्वरूप मानने लगे। बाद में 1553 ईस्वी में कुल्लू घाटी के शासक महाराजा बहादुर सिंह ने इस गुफ़ा के ऊपर लकड़ी का यह भव्य मंदिर बनवाया, जो आज हिडिंबा देवी मंदिर के नाम से जाना जाता है। खाना-पीना और रुकने की जगहें। अब बात करते हैं उस चीज़ की जो हर यात्री के दिल के बहुत करीब होती है अच्छा खाना और आरामदायक ठहरने की जगह। हिडिंबा देवी मंदिर के आसपास का इलाका पुराने मनाली Old Manali से भी जुड़ता है, जहां आपको बजट गेस्ट हाउस से लेकर कॉज़ी होमस्टे और मिड-रेंज बुटीक होटल तक हर तरह का स्टे ऑप्शन मिल जाएगा। धुंगरी मंदिर रोड और सियाल क्षेत्र में कई ऐसे होटल हैं, जो मंदिर से पैदल दूरी पर हैं। सुबह बालकनी से बैठकर पहाड़ों को निहारिए और थोड़ी ही देर में मंदिर के दर्शन के लिए निकल पड़िए। अगर आप शांत माहौल चाहते हैं तो पुराने मनाली के पुल के उस पार वाले होमस्टे चुन सकते हैं, जहां कैफ़े कल्चर भी है और पहाड़ी गांव वाली सादगी भी। खाने की बात करें तो मंदिर के आसपास छोटी-छोटी दुकानों से लेकर अच्छे रेस्टोरेंट तक मिलते हैं। कई दुकानों पर आलू-पराठा, छोले-भटूरे, समोसा, पकोड़े और गरम-गरम चाय मिलती है, जो ठंडे मौसम में जान डाल देती है। हिडिंबा मंदिर तक कैसे पहुंचें? मनाली पहुंचना आजकल काफी आसान हो गया है और शहर में आ जाने के बाद हिडिंबा देवी मंदिर तक पहुंचना तो और भी आसान। सबसे नज़दीकी एयरपोर्ट भुंतर कुल्लू-मनाली एयरपोर्ट है, जो मनाली से लगभग 50 किलोमीटर दूर है। यहां से आप टैक्सी या बस लेकर लगभग डेढ़ दो घंटे में मनाली पहुंच जाते हैं। ट्रेन से आने पर नज़दीकी बड़ा रेलवे स्टेशन चंडीगढ़ है। वहां से मनाली के लिए लगातार वोल्वो, प्राइवेट और एचआरटीसी बसें उपलब्ध रहती हैं। रास्ता लंबा ज़रूर है, लेकिन व्यास नदी के साथ-साथ चलते घुमावदार पहाड़ी मार्ग, सुरंगें और बीच-बीच में छोटे कस्बे पूरे सफ़र को यादगार बना देते हैं। जब आप मनाली शहर में हों, तो मॉल रोड, सर्किट हाउस या पुराने मनाली के किसी भी हिस्से से हिडिंबा मंदिर तक टैक्सी, ऑटो या बाइक से आसानी से जा सकते हैं। मंदिर का टाइम आम तौर पर सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे तक बताया जाता है और प्रवेश पूरी तरह मुफ़्त है। बस पूजा या फोटोग्राफ़ी के लिए कहीं-कहीं छोटा-मोटा शुल्क लग सकता है।   मंदिर की सुंदरता और आसपास के आकर्षण हिडिंबा देवी मंदिर की असली खूबसूरती सिर्फ़ इसकी इमारत में नहीं बल्कि उसके माहौल में है। मंदिर के चारों ओर फैला घना देवदार वन ऐसा आभास देता है मानो आप किसी प्राचीन रहस्यमयी जंगल में हों। पेड़ों की ऊंचाई इतनी ज़्यादा है कि कई जगह धूप सीधे