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Delhi में लग चुका है Handicraft Mela 2026

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Delhi की गर्मी के बाद जब मानसून की बारिश शुरू होती है, तो शहर का मौसम और घूमने का अंदाज दोनों बदल जाते हैं। ऐसे मौसम में अगर खरीदारी के साथ कला, संस्कृति और अलग-अलग राज्यों की पारंपरिक चीजें देखने का मौका मिल जाए, तो घूमने का अनुभव और भी अच्छा हो जाता है। इसी वजह से दस्तकार मानसून मेला 2026 इस अगस्त में Delhi घूमने वालों के लिए खास आयोजन बन सकता है। यह मेला उन लोगों के लिए उपयोगी है, जिन्हें हथकरघा, पारंपरिक छपाई, कढ़ाई, हस्तनिर्मित कपड़े और अलग-अलग तरह के हस्तशिल्प पसंद हैं। इस मेले की सबसे अच्छी बात यह है कि यहां आपको केवल तैयार सामान देखने को नहीं मिलता। कई जगहों पर उसे बनाने वाले कारीगरों से सीधे मिलने और उनके काम को समझने का मौका भी मिलता है। यानी जिस कपड़े, बैग, आभूषण या दूसरी हस्तनिर्मित चीज को आप खरीदते हैं, उसके पीछे काम करने वाले कारीगर के बारे में भी जान सकते हैं। अगर आप Delhi में मानसून के दौरान घूमने के लिए कोई अलग जगह तलाश रहे हैं, तो दस्तकार मानसून मेला 2026 को अपनी यात्रा सूची में शामिल कर सकते हैं। दस्तकार क्या है और इसकी शुरुआत कैसे हुई? दस्तकार की शुरुआत साल 1981 में दिल्ली की छह महिलाओं ने की थी। इनमें वर्तमान अध्यक्ष लैला तैयबजी भी शामिल थीं। शुरुआत में दस्तकार केवल करीब 15 शिल्प समूहों के साथ काम करता था, लेकिन धीरे-धीरे इसका काम देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंच गया। आज दस्तकार सैकड़ों शिल्प समूहों से जुड़ा हुआ है। इसका मुख्य उद्देश्य पारंपरिक कारीगरों और उनके उत्पादों को बड़े बाजार तक पहुंचाना है। देश के कई गांवों और छोटे शहरों में आज भी कारीगर पारंपरिक तरीकों से कपड़े, आभूषण, घर की सजावट का सामान और दूसरी चीजें बनाते हैं। लेकिन हर कारीगर के लिए अपने उत्पादों को बड़े शहरों के ग्राहकों तक पहुंचाना आसान नहीं होता। दस्तकार ऐसे कारीगरों को बाजार से जोड़ने का काम करता है। इसके आयोजनों में ग्राहकों को सीधे कारीगरों के उत्पाद खरीदने का अवसर मिलता है। इसी वजह से दस्तकार का मानसून मेला केवल सामान्य खरीदारी का आयोजन नहीं है। यहां खरीदारी के साथ-साथ पारंपरिक हस्तशिल्प को समझने का भी मौका मिलता है। मानसून मेला 2026 कब और कहां है? इस साल का मानसून मेला 6 अगस्त से 17 अगस्त 2026 तक आयोजित किया जा रहा है। मेले से जुड़ी जरूरी जानकारी इस प्रकार है। इसका आयोजन नेचर बाजार, किसान हाट, अंधेरिया मोड़, छतरपुर के पास, नई दिल्ली में किया जा रहा है। मेला सुबह 11 बजे से शाम 7 या 8 बजे तक खुला रह सकता है। इसकी कुल अवधि 12 दिन है। प्रवेश शुल्क से जुड़ी जानकारी आयोजन के अनुसार अलग हो सकती है। अगर आप मेले में जाने का कार्यक्रम बना रहे हैं, तो निकलने से पहले आयोजन की आधिकारिक जानकारी से समय और प्रवेश शुल्क जरूर जांच लें। मानसून के दौरान मौसम अचानक बदल सकता है। इसलिए यात्रा की योजना बनाते समय बारिश और यातायात दोनों को ध्यान में रखें। मेले में क्या देखने को मिलेगा? दस्तकार मानसून मेले में भारत के अलग-अलग हिस्सों से जुड़े कई तरह के पारंपरिक उत्पाद देखने को मिल सकते हैं। यहां हथकरघा, पारंपरिक छपाई, कढ़ाई और हस्तनिर्मित वस्त्र खास आकर्षण हो सकते हैं। इसके अलावा कपड़ों के साथ आभूषण, बैग, जूते-चप्पल, घर की सजावट का सामान और दूसरी हस्तनिर्मित चीजें भी खरीदी जा सकती हैं। यहां आने वाले कई उत्पादों की खासियत यह होती है कि उन्हें बड़े पैमाने पर मशीनों से तैयार करने की बजाय कारीगर अपने हाथों और पारंपरिक तकनीकों से बनाते हैं। अगर आपको एक जैसे दिखने वाले बाजारू उत्पादों से अलग कुछ खरीदना पसंद है, तो यह मेला आपके लिए अच्छा विकल्प हो सकता है। हथकरघा और कपड़ों की खरीदारी अगर आपको पारंपरिक भारतीय वस्त्र पसंद हैं, तो मानसून मेले में सबसे पहले हथकरघा और कपड़ों वाले स्टॉल देखने चाहिए। भारत के अलग-अलग राज्यों की अपनी वस्त्र परंपराएं हैं। कहीं खास तरह की बुनाई देखने को मिलती है, तो कहीं कढ़ाई या छपाई की अलग तकनीक इस्तेमाल की जाती है। यहां आपको ऐसे कपड़े मिल सकते हैं, जिनमें पारंपरिक डिजाइनों के साथ आधुनिक अंदाज भी जोड़ा गया है। महिलाओं के लिए साड़ियों, दुपट्टों और दूसरे पारंपरिक कपड़ों के साथ रोजाना पहनने वाले कपड़ों के विकल्प भी मिल सकते हैं। पुरुषों के लिए सूती कुर्ते, कमीज और दूसरे पारंपरिक तथा सामान्य पहनावे के कपड़े देखे जा सकते हैं। अगर आपको प्राकृतिक कपड़े और हाथ से तैयार किए गए वस्त्र पसंद हैं, तो यहां खरीदारी के लिए काफी विकल्प मिल सकते हैं। पारंपरिक छपाई में क्या खास है? भारतीय कपड़ों में लकड़ी के ठप्पों से की जाने वाली छपाई की अपनी अलग पहचान है। इस तकनीक में लकड़ी के ठप्पे पर डिजाइन तैयार किया जाता है और फिर उसे कपड़े पर इस्तेमाल किया जाता है। हर डिजाइन को तैयार करने में कारीगर को काफी सावधानी रखनी पड़ती है। मानसून मेले में अलग-अलग डिजाइनों और रंगों वाले छपे हुए कपड़े देखने को मिल सकते हैं। अगर आपको फूलों वाले डिजाइन, पारंपरिक आकृतियां और भारतीय रंग पसंद हैं, तो ऐसे स्टॉल पर थोड़ा समय जरूर बिताएं। इनसे बने दुपट्टे, कपड़े और दूसरे उत्पाद रोजाना इस्तेमाल के साथ त्योहारों के लिए भी खरीदे जा सकते हैं। हाथ की कढ़ाई की झलक हाथ की कढ़ाई भारतीय वस्त्र परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। एक छोटे से कपड़े पर भी कढ़ाई का काम पूरा करने में काफी समय लग सकता है। यही वजह है कि हाथ से की गई कढ़ाई वाले उत्पादों में मशीन से बने सामान्य डिजाइनों की तुलना में अलग बारीकी दिखाई देती है। मेले में आपको अलग-अलग तरह की कढ़ाई वाले कपड़े और सामान देखने को मिल सकते हैं। अगर आपको किसी उत्पाद पर किया गया कढ़ाई का काम पसंद आता है, तो उसे बनाने वाले कारीगर से उसके काम और तकनीक के बारे में पूछना भी दिलचस्प रहेगा। यही इस तरह के मेलों की खासियत है कि आप उत्पाद खरीदने के साथ उसके पीछे की मेहनत और तकनीक को भी समझ सकते हैं। कारीगरों से सीधे मिलने का फायदा दस्तकार मानसून मेले में जाने का एक बड़ा फायदा यह है कि

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Brahma Sarovar Kurukshetra – Best Place to Visit in Haryana 

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कुरुक्षेत्र का ब्रह्मसरोवर – एशिया का सबसे बड़ा मानव निर्मित सरोवर हमारे देश में बहुत-सी ऐसी जगह हैं जिनका जिक्र हमारे धार्मिक ग्रंथों में भी किया गया है। और यह स्थान कई हजार साल पुराने हैं। यही कारण है कि लोग उन जगहों पर घूमना बहुत पसंद करते हैं,जो बहुत प्राचीन हैं और हमारी आस्था के साथ भी जुड़े हुए हैं। महाभारत के युध्द को कौन नहीं जानता, महाभारत के सभी मुख्य किरदार आज भी हमारे दिलों दिमाग में बैठे हुए हैं। महाभारत का युद्ध कुरुक्षेत्र में हुआ था यह बात तो सभी जानते हैं, मगर बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो कुरुक्षेत्र से ज्यादा दूरी होने की वजह से वहां पर नहीं जा पाते हैं। और कुरुक्षेत्र में कौन-सी जगह क्यों प्रसिद्ध है, इसकी भी जानकारी उन्हें नहीं है। अगर आप  कुरुक्षेत्र जाने की प्लानिंग कर रहे हैं  तो यह ब्लॉग आपके लिए बहुत फायदेमंद हो सकता है। स्टेशन से ब्रह्मसरोवर आप जैसे ही कुरुक्षेत्र रेलवे स्टेशन के बाहर निकलेंगे तो आपको यह रेलवे स्टेशन किसी राजमहल से कम नहीं लगेगा। आप स्टेशन की डेकोरेशन देखकर ही अनुमान लगा लेंगे कि जरूर इस शहर में कोई ना कोई खास बात है। स्टेशन के बाहर कई ऑटो वाले खड़े होते हैं आप चाहे तो ऑटो स्पेशल रिजर्व करा कर भी जा सकते हैं या सवारी के हिसाब से भी सफर कर सकते हैं। ब्रह्मसरोवर जाने का किराया प्रति सवारी मात्र 20 रुपये है। स्टेशन से ब्रह्मसरोवर की दूरी 3.5 किलोमीटर की है। ब्रह्मसरोवर की ओर जाते  हुए छठी पातशाही गुरुद्वारा, सन्निहित सरोवर, पैनारोमा एवं विज्ञान केंद्र, श्री कृष्ण संग्रहालय इसी मार्ग में मिलेंगे। लेकिन आज इस ब्लॉग में हम आपको रूबरू करवाएंगे कुरुक्षेत्र के प्रसिद्ध ब्रह्म सरोवर से। जानिए ब्रह्मसरोवर का इतिहास सबसे पहले समझते हैं ब्रह्म सरोवर के इतिहास को, यह जगह क्यों फेमस है और क्यों यहाँ देश के दक्षिणी राज्यों केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटका तक से श्रद्धालु आते हैं। जिन लोगों की धर्म में अटूट आस्था है वो साल भर यहाँ बड़े श्रद्धा भाव से आते हैं। बाकी बहुत से लोग विशेष अवसरों पर जैसे सोमवती अमावस्या, सूर्य ग्रहण पर यहाँ आते हैं। दरअसल ब्रह्मसरोवर का संबंध सृष्टिकर्ता ब्रह्मा से माना गया है। भगवान विष्णु के अवतार भगवान परशुराम का इस सरोवर से विशेष संम्बंध रहा है। पौराणिक अध्ययनों के अनुसार इस सरोवर की सर्वप्रथम खुदाई राजा कुरु ने करवाई थी इन्ही के नाम पर इस स्थान का नाम कुरुक्षेत्र पड़ा। इसी स्थल पर प्रजापति ब्रह्मा ने सबसे पहले युद्ध किया था। द्रोपदी कूप सूर्य ग्रहण के अवसर पर ब्रह्म सरोवर में लाखों की संख्या में श्रद्धालु स्नान कर पुण्य अर्जित करते हैं। पौने चार किलोमीटर में फैला यह प्राचीन सरोवर भारत के मानव निर्मित सरोवरों में से सबसे बड़ा सरोवर है। इसी स्थान पर सरोवर के मध्य भाग में प्राचीन द्रोपदी कूप भी है जिसे चंद्रकूप कहा जाता है। ब्रह्म सरोवर आने वाले श्रृद्धालु सरोवर में स्नान करने के उपरांत इस कूप के दर्शन अवश्य करते है, जिसे बहुत शुभ माना जाता है। इस सरोवर की विशालता को देखते हुए अकबर के कवि अबुल फजल ने इसे लघु समुद्र की संज्ञा दी थी। इस सरोवर में स्नान करना हजारों अश्वमेध यज्ञ करने के बराबर माना जाता है। महाभारत का युद्ध जीतने के बाद युधिष्ठिर ने इस के मध्य भाग में विजय स्तंभ निर्माण करवाया। महाभारत में भी ब्रह्म सरोवर का जिक्र है कि महाभारत युद्ध के अंतिम दिन, युद्ध में हार जाने के बाद, दुर्योधन इसी सरोवर में आकर छुप गया था। आप को ब्रह्मसरोवर के मुख्य द्वार के सामने, बाहर की और कई तरह की दुकानें दिखाई देंगी, जहाँ आपको हर तरह के सजावट और वुडेन क्राफ्ट का सामान मिल जायेगा। यहाँ से आप हल्की फुलकी शॉपिंग कर सकते हैं। बाहर काफी सारे भोजनालय भी आपको आसानी से मिल जायेंगे लेकिन यहाँ खाने से पहले थोड़ा क्वालिटी रिसर्च कर लें तो बेहतर होगा।  यहां पर रविवार के दिन काफी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ देखने को मिलती है। बाकी सप्ताह में भीड़ इतनी ज्यादा नहीं होती। हां, अगर कोई पर्व या त्यौहार हो तो यहां पर अच्छी खासी भक्तों की भीड़ देखने को मिल सकती है। ब्रह्मसरोवर में प्रवेश करते ही आपको शानदार नजारा देखने को मिलता है जो सामान्यतः किसी सरोवर को देखने पर नहीं मिलता। एकबारगी यह सरोवर किसी लघु समुंदर से कम नही लगता। इसकी विशालता और भव्यता को देखकर आप मनमोहित हो जाओगे। सरोवर के बीचोबीच पुल बना हुआ है जहाँ खड़े होकर आप सरोवर की ख़ूबसूरती का आनंद ले सकते हैं। साथ ही यहां पर आप प्राचीन ऐतिहासिक और हस्तशिल्प की कलाओं से परिचित होंगे। सरोवर के पास बनी दीवारों पर आपको कई तरह के चित्र देखने को मिलेंगे। सरोवर के चारो और अलग अलग पौराणिक दैवीय पात्रों के नाम पर स्नान घाट बने हुए हैं जो सूर्यास्त के समय या संध्या के समय एक अलग ही छटा बिखेरते हैं। इन घाट पर बैठकर आप आसानी से योग, अध्यात्म और ध्यान कर सकते हैं। सुबह शाम यहाँ आपको मंदिर की आरती और घंटियों की आवाज़ सुनाई देती है। ऐतिहासिक शिव महादेव मंदिर श्रीकृष्ण की अर्जुन को उपदेश देते हुए  विराट प्रतिमा सरोवर के बीच में ऐतिहासिक शिव महादेव मंदिर भी है जहाँ काफी संख्या में श्रद्धालु आते हैं और वहीँ मंदिर के किनारे सीढ़ियों पर बैठकर मछलियों को आटा दाना खिलाते हैं। कहते हैं यहाँ मछलियों को भोजन कराने से पुण्य की प्राप्ति होती है। यह मंदिर एक छोटे से पुल द्वारा सरोवर के किनारे से जुडा हुआ है।  नवंबर दिसंबर के महीने में गीता जयंती के अवसर पर देश भर से श्रद्धालु ब्रह्म सरोवर में स्नान करने आते हैं।  साथ ही गीता जयंती के उपलक्ष्य में हरियाणा सरकार द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मेले का भव्य आयोजन किया जाता है जिसमें देश विदेश से कलाकार भाग लेते हैं। ब्रह्म सरोवर में श्रीकृष्ण की अर्जुन को उपदेश देते हुए  विराट प्रतिमा भी विशेष आकर्षण का केंद्र है। अगर आप श्रद्धा और आस्था के अलावा परिवार या दोस्तों के साथ क्वालिटी टाइम बिताना चाहते हैं तो भी यह बेस्ट डेस्टिनेशन है। अगर आप इस  सरोवर को पूरा और अच्छे से घूमना चाहते हैं तो उसके लिए आपको थोड़े

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Surajkund International Crafts Mela (Faridabad)

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Surajkund International Crafts Mela (Faridabad): खानपान, संस्कृति और हस्तशिल्प का अनूठा संगम: सूरजकुंडअंतर्राष्ट्रीय शिल्प मेला फरीदाबाद by Pardeep Kumar सूरजकुंड अंतर्राष्ट्रीय शिल्प मेला आज विश्व में अपनी एक अलग पहचान बना चुका है। फरीदाबाद में  खूबसूरत अरावली पहाड़ियों में लगने वाला यह 35वां अंतर्राष्ट्रीय सूरजकुंड हस्तशिल्प मेला है। (Surajkund International Crafts Mela) 19 मार्च से 4 अप्रैल तक होगा आयोजित आपको बता दें कि कोरोना के चलते वर्ष 2021 में इसका आयोजन नहीं हो पाया था आमतौर पर यह मेला फरवरी के महीने में 1 से 14 फरवरी के बीच लगता है लेकिन इस बार इसका आयोजन 19 मार्च से 4 अप्रैल तक किया गया है। खानपान, संस्कृति और हस्तशिल्प का अनूठा संगम सूरजकुंड मेले का प्रथम बार आयोजन सन् 1987 में हुआ था। वर्ष 2009 में पहली बार भारतीय राज्यों के अलावा दूसरे देशों को आमंत्रित करने का प्रचलन शुरू हुआ।  इस कड़ी में सूरजकुंड में शामिल होने वाला पहला देश मिस्र बना था।  तभी से दुनिया भर के हस्तशिल्पकार और अन्य कलाकार इस मेले में आते हैं। जिस कारण मेले में भारत के अलग-अलग राज्यों की संस्कृति तो देखने को मिलती ही है साथ में विदेशी संस्कृति और हस्तशिल्प कला का यहां पर खूब दीदार होता है। विदेशों के मंझे हुए शिल्पकार अपने हाथों से तैयार किए गए सामान का इस मेले में प्रदर्शन करते हैं। (Surajkund International Crafts Mela) कोरोना के कारण  पिछले साल आयोजित न कर पाने के कारण इस बार हरियाणा सरकार ने इस मेले को भव्य बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। टिकट मूल्य और कैसे करें ऑनलाइन टिकटों की बुकिंग इस बार के मेले में लोगों को बेहतरीन सुविधा देने की व्यवस्था की गई है।  काउंटर के अलावा पेटीएम के सहयोग से मेले की टिकटों की बुकिंग की शानदार व्यवस्था की  गई है। आप आसानी से पेटीएम से टिकट्स बुक कर सकते हो। पर्यटकों को  असुविधा न हो इसके लिए प्रत्येक पार्किंग के पास टिकट काउंटर बनाया गया।  मेले की टिकट आम दिनों में ₹120, वहीं शनिवार और रविवार को टिकट की कीमत ₹180 रखी गई है। मेले की टाइमिंग सुबह 10 बजे से लेकर देर शाम तक है।(Surajkund International Crafts Mela) करीब 47 एकड़ में लगने वाले इस मेले में एंट्री करने के लिए पांच गेट बनाए गए हैं जिसमें लोकल सिटीजंस के लिए दो गेट, एक गेट वीआईपी एंट्री के लिए, एक गेट मीडियाकर्मियों की एंट्री के लिए और एक गेट स्टाफ वर्कर्स की एंट्री के लिए बनाया गया है। पूरे मेला स्थल को 18 सेक्टरों में बांटा गया है। फूड कोर्ट मेले के अंदर खाने पीने के लिए अलग फूड कोर्ट की व्यवस्था की गई है जहां आपको अलग-अलग राज्यों के लज़ीज और स्वादिष्ट पकवान खाने को मिलेंगे। जिसमें दिल्ली की मशहूर चाट, गोहाना की मशहूर जलेबी ,राजस्थान की कचोरी, जम्मू कश्मीर का फेमस चिकन और मटन, साउथ के उत्तपम डोसा, छोले भटूरे ,मटर कुल्चा आदि सारी चीजें मिल जायेंगी। युवाओं और बच्चों के लिए यहां पर एडवेंचर जोन की व्यवस्था भी की गई है। जिसमें तरह-तरह के झूले, निशानेबाजी, गुलेल बाजी और भी कई तरह के गेम्स की व्यवस्था की गई है।अगर आप सूरजकुंड मेले में जाए तो एडवेंचर जोन में जाना बिल्कुल भी ना भूले। सेल्फी प्वाइंट     मेले के अंदर कई जगह पर सेल्फी प्वाइंट भी बनाए गए हैं, जहां पर आप पौराणिक और सांस्कृतिक धरोहरों के साथ अपनी पिक्चर क्लिक करवा सकते हैं। पूरे मेले को अलग-अलग राज्यों की पौराणिक धरोहरों के साथ संजोया गया है। मेले के अंदर एक जगह हरियाणा की प्रसिद्ध चौपाल का इंतजाम भी है। जिसमें अलग-अलग राज्यों और बाहरी देशों के कलाकार अपने क्षेत्र के सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए मेले में पहुंचने वाले लोगों का मनोरंजन करते है और उन्हें अपनी सभ्यता और अपनी संस्कृति से रूबरू करवाते हैं। इसके अलावा आपको हर 10 कदम के बाद अलग-अलग राज्यों की झांकियां देखने को मिलेंगी, जिसमें कलाकार अपने लोकगीतों और लोकनृत्य को प्रस्तुत करते हैं और मेले में आने वाले लोगों को मस्ती में झूमने पर मजबूर कर देते हैं। मेले में अनेकों प्रकार के स्टॉल लगाए गए हैं जिसमें अलग-अलग राज्यों और अलग-अलग क्षेत्रों के हस्तशिल्पकारों द्वारा बनाए गए प्रोडक्ट्स जैसे कढ़ाई किए गए दुपट्टे, शॉल, सूट, अलग-अलग प्रकार के कपड़े, हिमाचली टोपी, कश्मीरी कालीन, राजस्थानी मोजड़ी, जूते और भी कई प्रकार की हैंड मेड चीजें आपको मिल जायेंगी। मेले के अंदर कश्मीरी थीम को ध्यान में रखते हुए वहां की परंपरा, वहां की संस्कृति को दर्शाया गया है। मेले में घूमने आए लोग यहां पर खूब फोटोग्राफी करते हैं।  मेले प्रशासन द्वारा जगह-जगह पर साफ पीने योग्य पानी की व्यवस्था भी की गई है जिससे कि मेले में आने वाले यात्रियों को गर्मी में राहत प्रदान हो। छाता या हैट साथ ले जाना बिल्कुल भी ना भूले आपको बता दें कि आजकल चिलचिलाती गर्मी से बचने के लिए आप अपना छाता या हैट अपने साथ अवश्य रखें और पानी की बोतल ले जाना बिल्कुल भी ना भूले। इससे आपको गर्मी से अवश्य राहत मिलेगी। क्योंकि यह मेला देर शाम तक चलता है इसलिए आप अपनी सुविधा और दिन में पड़ने वाली गर्मी से बचने के लिए शाम के समय भी यहाँ आ सकते हैं। (Surajkund International Crafts Mela) Photo Gallery – Surajkund Crafts Fair