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Surat Castle: घूमने का सबसे सही समय, Full Travel Guide

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सूरत का नाम सुनते ही सबसे पहले हमारे दिमाग में हीरे, कपड़े, स्वादिष्ट खाना और तेजी से बढ़ता हुआ एक बड़ा शहर आता है। लेकिन सूरत सिर्फ व्यापार और आधुनिक इमारतों के लिए ही मशहूर नहीं है। इस शहर का इतिहास भी उतना ही पुराना और दिलचस्प है। तापी नदी के किनारे खड़ा सूरत का ऐतिहासिक किला आज भी इस पुराने इतिहास की कहानी सुनाता है। आज इसे लोग Surat Castle के नाम से जानते हैं। बाहर से देखने पर यह किला भले ही एक मजबूत पुरानी इमारत जैसा दिखाई देता हो, लेकिन इसकी दीवारों के अंदर सूरत के कई सौ साल पुराने इतिहास की कहानियां छिपी हुई हैं। आज सूरत भारत के सबसे बड़े व्यापारिक शहरों में से एक है, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब यहां दुनिया के अलग-अलग देशों से जहाज आया करते थे। सूरत का बंदरगाह इतना महत्वपूर्ण था कि एशिया, यूरोप और अरब देशों के व्यापारी यहां व्यापार करने पहुंचते थे। मसाले, कपड़े, कीमती सामान और दूसरी चीजों का व्यापार यहां बड़े स्तर पर होता था। इसी वजह से सूरत की संपत्ति पर कई बाहरी ताकतों की नजर रहती थी। इस शहर को बचाने के लिए जिस मजबूत किले का निर्माण किया गया, वही आज Surat Castle के रूप में हमारे सामने मौजूद है। सूरत में किला बनाने की जरूरत क्यों पड़ी? 16वीं शताब्दी में सूरत एक तेजी से बढ़ता हुआ व्यापारिक शहर था। यहां का बंदरगाह व्यापारियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण था और शहर में बड़ी मात्रा में कीमती सामान मौजूद रहता था। उस समय समुद्र के रास्ते आने वाले हमलों का खतरा हमेशा बना रहता था। पुर्तगाली सैनिक और समुद्री हमलावर सूरत पर कई बार हमला कर चुके थे। इन हमलों के दौरान शहर को काफी नुकसान हुआ और लोगों को अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भागना पड़ा। कहा जाता है कि 1512 और 1530 में पुर्तगालियों ने सूरत पर बड़े हमले किए। उस समय शहर की सुरक्षा के लिए कोई ऐसी मजबूत व्यवस्था नहीं थी जो दुश्मनों को रोक सके। व्यापारिक शहर होने के कारण सूरत में धन और सामान की कमी नहीं थी, इसलिए हमलावरों के लिए यह एक आकर्षक निशाना था। इन हमलों के बाद यह साफ हो गया कि सूरत को बचाने के लिए एक मजबूत किले की जरूरत है। गुजरात के सुल्तान महमूद शाह तृतीय ने शहर की सुरक्षा के लिए किले के निर्माण का फैसला लिया। इस काम की जिम्मेदारी सफी आगा नाम के एक तुर्की अधिकारी को दी गई। बाद में उन्हें खुदावंद खान के नाम से भी जाना गया। उन्होंने तापी नदी के किनारे ऐसी जगह चुनी जहां से शहर और नदी दोनों पर नजर रखी जा सके। इस तरह Surat Castle के निर्माण की शुरुआत हुई। पुर्तगाली हमलों से बचाने के लिए बना था किला Surat Castle का सबसे बड़ा उद्देश्य सूरत शहर को बाहरी हमलों से बचाना था। उस समय पुर्तगाली समुद्र के रास्ते काफी ताकतवर माने जाते थे। उनके पास मजबूत जहाज और हथियार थे। अगर किसी शहर की सुरक्षा कमजोर होती थी, तो वे समुद्र के रास्ते हमला कर देते थे। किले का निर्माण इस तरह किया गया कि यह जमीन और पानी दोनों तरफ से होने वाले हमलों का सामना कर सके। इसकी मोटी दीवारें और मजबूत बुर्ज किसी भी हमलावर के लिए बड़ी चुनौती थे। 1546 के आसपास जब यह किला तैयार हुआ, तब यह सूरत की सुरक्षा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। किले के बनने के बाद शहर पर होने वाले हमलों को रोकने में काफी मदद मिली। आज जब हम Surat Castle को देखते हैं, तो शायद हमें अंदाजा भी नहीं होता कि कभी इसकी दीवारों पर असली युद्ध के निशान पड़े होंगे। इन दीवारों के पीछे सैनिक तैनात रहते थे और नदी की तरफ से आने वाले जहाजों पर नजर रखी जाती थी। उस समय किला सिर्फ एक इमारत नहीं था, बल्कि पूरे सूरत शहर के लिए सुरक्षा कवच था। किले की दीवारें आज भी बताती हैं इसकी मजबूती Surat Castle की सबसे खास बात इसकी मजबूत बनावट है। यह किला लगभग एक एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। इसकी दीवारें कई मीटर मोटी हैं और किले के अलग-अलग हिस्सों में मजबूत गोल बुर्ज बनाए गए हैं। इन बुर्जों का इस्तेमाल सैनिक निगरानी और सुरक्षा के लिए करते थे। किले की दीवारों को मजबूत बनाने के लिए उस समय बेहद खास तकनीक का इस्तेमाल किया गया था। पत्थरों को जोड़ने के लिए लोहे की पट्टियों का इस्तेमाल किया गया और इन जोड़ो में पिघला हुआ सीसा भरा गया। इस तकनीक की वजह से दीवारों को काफी मजबूती मिली। उस समय आधुनिक मशीनें और इंजीनियरिंग उपकरण मौजूद नहीं थे, फिर भी इतनी मजबूत संरचना तैयार करना अपने आप में बड़ी उपलब्धि थी। किले का मुख्य दरवाजा भी काफी मजबूत बनाया गया था। दरवाजे पर लोहे के नुकीले कांटे लगाए गए थे ताकि हाथियों या किसी भारी वस्तु की मदद से इसे तोड़ा न जा सके। उस समय युद्धों में हाथियों का इस्तेमाल अक्सर किले के दरवाजे तोड़ने के लिए किया जाता था। ऐसे में दरवाजे पर लगे ये कांटे सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थे। मुगल दौर में सूरत का बढ़ता महत्व सूरत का इतिहास सिर्फ गुजरात के सुल्तानों तक सीमित नहीं है। साल 1573 में मुगल बादशाह अकबर ने गुजरात पर अपना नियंत्रण स्थापित किया और इसके बाद सूरत भी मुगल साम्राज्य का हिस्सा बन गया। मुगल दौर में सूरत का महत्व और भी बढ़ गया। उस समय सूरत भारत के सबसे महत्वपूर्ण बंदरगाहों में से एक था। विदेशों से आने वाले व्यापारी यहां पहुंचते थे और भारत से सामान लेकर वापस जाते थे। सूरत हज यात्रा पर जाने वाले लोगों के लिए भी एक महत्वपूर्ण बंदरगाह था। बड़ी संख्या में यात्री समुद्री रास्ते से मक्का और मदीना की यात्रा के लिए सूरत से रवाना होते थे। इस दौर में Surat Castle की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। किले में सैनिकों की मौजूदगी रहती थी और शहर की सुरक्षा का जिम्मा इसी तरह की मजबूत संरचनाओं पर था। सूरत में व्यापार बढ़ रहा था और शहर की समृद्धि के साथ उसकी सुरक्षा की जरूरत भी बढ़ती जा रही थी। शिवाजी महाराज के हमले