Golden Temple Latest Travel Travel News & Information

Golden Temple Langar: यहाँ रोज़ मिलता है मुफ्त खाना

  • 0 Comments

अमृतसर के गोल्डन टेंपल की तस्वीरें तो आपने कई बार देखी होंगी। पानी के बीच चमकती सुनहरी इमारत, माथा टेकने आते श्रद्धालु और चारों तरफ़ फैला सुकून। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसी परिसर में एक ऐसी रसोई भी है, जहाँ हर दिन हज़ारों लोगों के लिए खाना बनता है और बिना किसी पैसे के परोसा जाता है? यहाँ कोई यह नहीं पूछता कि आप अमीर हैं या गरीब, किस जाति से हैं या किस धर्म को मानते हैं। जो भी आता है, उसे बैठने के लिए जगह और खाने के लिए भोजन मिलता है। यह है श्री हरिमंदिर साहिब का Golden Temple Langar, जिसे दुनिया भर में सेवा और बराबरी की मिसाल माना जाता है। यहाँ खाना बनाना, रोटियाँ सेंकना, लोगों को परोसना और जूठे बर्तन धोना, हर काम में लोग अपनी मर्ज़ी से हिस्सा लेते हैं। इस पूरी व्यवस्था को देखकर समझ आता है कि किसी जगह की असली खासियत सिर्फ उसकी खूबसूरत इमारत नहीं, बल्कि वहाँ लोगों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है, यह भी है। तो चलिए, जानते हैं कि Golden Temple Langar की शुरुआत कैसे हुई, इतने लोगों के लिए खाना किस तरह तैयार किया जाता है और आखिर इस जगह को दुनिया भर में इतना खास क्यों माना जाता है। गोल्डन टेंपल का लंगर आखिर इतना खास क्यों है? अमृतसर के श्री हरिमंदिर साहिब परिसर में चलने वाला Golden Temple Langar सिर्फ खाना खिलाने की व्यवस्था नहीं है। यह सिख धर्म की उस सोच को दिखाता है, जिसमें हर इंसान को बराबर माना जाता है। यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं और दूसरे लोगों को दाल, रोटी, सब्ज़ी और चावल जैसे सादे खाने के साथ सेवा और अपनापन भी मिलता है। Golden Temple इस लंगर की सबसे खास बात यह है कि भोजन के लिए किसी से पैसे नहीं लिए जाते। आपको अपनी पहचान, कमाई या सामाजिक हैसियत बताने की जरूरत नहीं होती। आप देश के किसी भी हिस्से से आए हों या विदेश से, यहाँ सबके लिए जगह है। आम दिनों में यहाँ बहुत बड़ी संख्या में लोग भोजन करते हैं, जबकि त्योहारों और छुट्टियों के दौरान भीड़ और बढ़ जाती है। लोगों की संख्या हर दिन एक जैसी नहीं रहती, इसलिए रोज़ाना भोजन करने वालों के बारे में बताए जाने वाले आँकड़े अलग-अलग हो सकते हैं। गुरु नानक देव जी की सोच से शुरू हुई लंगर की परंपरा Golden Temple Langar के पीछे की सोच को समझने के लिए हमें सिख धर्म के शुरुआती दौर में जाना होगा। गुरु नानक देव जी ने लोगों को बराबरी, ईमानदारी से मेहनत करने और जरूरतमंदों की मदद करने का संदेश दिया। उनके जीवन से जुड़ी ‘सच्चा सौदा’ की कहानी भी इसी सोच को सामने लाती है। कहा जाता है कि जब गुरु नानक देव जी के पिता ने उन्हें व्यापार करने के लिए पैसे दिए, तो उन्होंने उन पैसों से भूखे और जरूरतमंद लोगों को खाना खिलाया। उनके लिए जरूरतमंदों की मदद करना ही असली सौदा था। इसी भावना को आगे चलकर लंगर की परंपरा से जोड़ा गया। इस परंपरा का मकसद सिर्फ भूख मिटाना नहीं, बल्कि यह बताना भी था कि किसी इंसान की इज्जत उसके पैसे या सामाजिक पहचान से तय नहीं होती। Golden Temple समय के साथ लंगर सिख समुदाय की एक अहम परंपरा बन गया। आज भी देश और दुनिया के कई गुरुद्वारों में इसी सोच के साथ लोगों को मुफ्त भोजन कराया जाता है। Golden Temple माता खीवी जी और गुरु अमर दास जी ने लंगर को कैसे आगे बढ़ाया? लंगर की परंपरा को मजबूत बनाने में दूसरे सिख गुरु, गुरु अंगद देव जी और उनकी पत्नी माता खीवी जी का खास योगदान माना जाता है। माता खीवी जी ने लंगर की व्यवस्था और सेवा में अहम भूमिका निभाई। सिख परंपरा में उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाता है, क्योंकि उन्होंने लोगों को भोजन कराने की व्यवस्था को आगे बढ़ाने में मदद की। तीसरे सिख गुरु, गुरु अमर दास जी ने इस परंपरा को और मजबूत किया। उनसे जुड़ा एक प्रसिद्ध संदेश है—‘पहले पंगत, फिर संगत।’ इसका मतलब है कि गुरु से मिलने से पहले सभी लोग एक साथ बैठकर लंगर छकें। यहाँ ‘पंगत’ का मतलब है एक कतार में बैठकर भोजन करना और ‘संगत’ का मतलब है श्रद्धालुओं की सभा। इस व्यवस्था में किसी के लिए अलग जगह या खास इंतजाम नहीं होता था। परंपरा से जुड़ी ऐतिहासिक कथाओं में मुगल सम्राट अकबर के भी आम लोगों के साथ बैठकर लंगर खाने का जिक्र मिलता है। यह बात उस समय के समाज में बराबरी का संदेश देने के महत्व को दिखाती है। Golden Temple चार दरवाज़े, जो देते हैं बराबरी का संदेश श्री हरिमंदिर साहिब की एक खास बात इसके चारों दिशाओं में बने प्रवेश द्वार हैं। इन्हें आम तौर पर इस संदेश से जोड़ा जाता है कि यह जगह हर दिशा से आने वाले लोगों के लिए खुली है। किसी व्यक्ति का धर्म, जाति, रंग, भाषा या आर्थिक स्थिति उसके यहाँ आने में रुकावट नहीं बननी चाहिए। Golden Temple Langar में भी यही सोच दिखाई देती है। यहाँ हर व्यक्ति को एक जैसी जगह पर बैठकर भोजन करने का मौका मिलता है। किसी को उसके कपड़ों, काम या पैसे के आधार पर अलग नहीं किया जाता। आज भी जब अलग-अलग जगहों से आए लोग एक ही पंक्ति में बैठकर खाना खाते हैं, तो यह व्यवस्था अपने आप में बराबरी का संदेश देती है। पंगत में बैठते हैं सभी लोग, कोई छोटा-बड़ा नहीं लंगर हॉल में पहुँचने पर लोग कतारों में बैठते हैं और सेवादार उनके बीच भोजन बाँटते हैं। यहाँ किसी के लिए अलग से खास मेज या कुर्सी नहीं होती। हर किसी को जमीन पर बैठकर खाना खाने के लिए कहा जाता है। यही वजह है कि Golden Temple Langar में भोजन करने का अनुभव किसी आम रेस्टोरेंट में खाने से बिल्कुल अलग होता है। सोचिए, एक ही पंक्ति में कोई नौकरी करने वाला व्यक्ति बैठा है, कोई विद्यार्थी, कोई बुजुर्ग और कोई विदेश से आया पर्यटक। सभी के सामने एक जैसा खाना रखा जाता है और सभी को समान सम्मान मिलता है। इस परंपरा का मकसद यह समझाना है कि इंसान की अहमियत उसकी