International Travel

अटलांटा इंडिया फेस्टिवल- भारत की एक झलक अमेरिका में भी!

  • 0 Comments

संस्कृतियों का मेल-मिलाप हमेशा से दुनिया को आकर्षित करता रहा है। अटलांटा इंडिया फेस्टिवल की शुरुआत इसी विचार से हुई थी कि भारत की समृद्ध परंपरा और संस्कृति को अमेरिका की धरती पर प्रस्तुत किया जाए। अमेरिका में बसे भारतीय समुदाय ने कई दशकों से अपनी संस्कृति को जीवित रखा है और उसी का परिणाम है यह भव्य उत्सव अटलांटा इंडिया फेस्टिवल। 1980 के दशक में जब भारतीय प्रवासियों की संख्या अटलांटा और आसपास के इलाकों में बढ़ने लगी, तो उनकी इच्छा थी कि भारत की परंपरा, त्यौहार और लोक कला को नई पीढ़ी भी अनुभव कर सके। शुरु-शुरू में यह आयोजन छोटे स्तर पर हुआ करता था। कुछ परिवार मिलकर पारंपरिक नृत्य, संगीत और खाने-पीने की चीज़ें साझा करते थे। लेकिन धीरे-धीरे इसका आकार बढ़ता गया और अब यह अटलांटा का एक प्रमुख सांस्कृतिक उत्सव बन चुका है। जिसमें हर साल हजारों लोग शामिल होते हैं और इसमें केवल भारतीय ही नहीं, बल्कि अमेरिकी और अन्य देशों से आए लोग भी हिस्सा लेते हैं। अटलांटा इंडिया फेस्टिवल अब केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि भारत-अमेरिका के बीच दोस्ती और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का प्रतीक बन गया है। इसमें भारत की विविधता का जश्न मनाया जाता है उत्तर से लेकर दक्षिण तक, पूर्व से लेकर पश्चिम तक। यह मंच हर भारतीय को अपने देश से जुड़ाव महसूस कराता है और विदेशियों को भारत को करीब से जानने का मौका देता है। फेस्टिवल में कला, नृत्य और संगीत का रंग कला और नृत्य भारत की आत्मा हैं और अटलांटा इंडिया फेस्टिवल का सबसे बड़ा आकर्षण भी यही है। यहां भरतनाट्यम, कथक, कुचिपुड़ी, गरबा, भांगड़ा और गिद्धा जैसे पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत किए जाते हैं। जब मंच पर युवा और बच्चे रंग-बिरंगे परिधानों में पारंपरिक संगीत की धुन पर थिरकते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे अटलांटा का माहौल अचानक भारत की गलियों में बदल गया हो। फेस्टिवल में बॉलीवुड डांस भी खूब लोकप्रिय है। अमेरिकी दर्शकों को बॉलीवुड की चमक-दमक, गाने और नृत्य बेहद लुभाते हैं। कई बार अमेरिकी बच्चे और युवा भी भारतीय गानों पर प्रस्तुति देते हैं, जिससे संस्कृति का यह संगम और खास हो जाता है। संगीत के मामले में भी यहां विविधता देखने को मिलती है। तबला, सितार, बांसुरी और ढोल की धुनें भारतीय शास्त्रीय संगीत की आत्मा को उजागर करती हैं, जबकि गिटार और पियानो जैसे पश्चिमी वाद्ययंत्रों के साथ फ्यूजन प्रस्तुतियां भी होती हैं। इस अनोखे मिश्रण से दर्शकों को एक नई दुनिया का अनुभव मिलता है। यह मंच केवल कला और मनोरंजन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह अगली पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का माध्यम भी बनाता है। अमेरिका में पले-बढ़े भारतीय बच्चे जब अपनी संस्कृति को मंच पर जीवित करते हैं, तो वे गर्व और आत्मीयता का अनुभव करते हैं। यही वजह है कि अटलांटा इंडिया फेस्टिवल सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारतीय कला का जश्न है। अटलांटा में भारत का स्वाद और खाने-पीने का रंग भारत का जिक्र हो और खाने की बात न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। अटलांटा इंडिया फेस्टिवल में सबसे ज्यादा भीड़ खाने के स्टॉल्स पर ही देखने को मिलती है। यहां परोसा जाने वाला खाना भारत की विविधता को पूरी तरह दर्शाता है। उत्तर भारत के छोले-भटूरे, आलू-पूरी, राजमा-चावल, समोसा और जलेबी हों या दक्षिण भारत के डोसा, इडली, वड़ा और सांभर हर स्वाद यहां मौजूद होता है और भारत के स्वाद का एहसास कराता है। बंगाल की मिठाइयां जैसे रसगुल्ला और संदेश, महाराष्ट्र का वड़ा पाव और गुजरात का ढोकला भी लोगों को खूब भाता है। अमेरिकी और अन्य विदेशी दर्शक इन व्यंजनों को बड़े शौक से चखते हैं। उनके लिए मसालों का यह मेल नया और रोमांचक अनुभव होता है। कई लोग तो इस फेस्टिवल में खाना खाने के लिए ही आते हैं और भारतीय पकवानों को अपनी सूची में शामिल कर लेते हैं। फूड स्टॉल्स पर सिर्फ खाना ही नहीं, बल्कि भारतीय आतिथ्य और प्रेम महोब्बत का भी अनुभव मिलता है। लोग एक-दूसरे से बातचीत करते हुए नए व्यंजनों का स्वाद लेते हैं और इस मेल-मिलाप में संस्कृति का असली रंग नजर आता है। युवाओं के लिए यह फेस्टिवल खास तौर पर आकर्षक है क्योंकि वे इस जगह पर भारत के स्ट्रीट फूड का मजा अमेरिका में बैठकर ले पाते हैं। यही कारण है कि हर साल खाने-पीने के स्टॉल्स के लिए सबसे ज्यादा उत्साह देखने को मिलता है। अटलांटा इंडिया फेस्टिवल और भारतीय युवा अटलांटा इंडिया फेस्टिवल केवल बड़ों के लिए नहीं, बल्कि युवाओं और बच्चों के लिए भी खास महत्व रखता है। अमेरिका में पले-बढ़े भारतीय मूल के युवाओं के लिए यह त्योहार उनकी जड़ों से जुड़ने का अवसर होता है। युवा पीढ़ी को यहां अपने देश की संस्कृति, परंपराओं और मूल्यों का अनुभव होता है। नृत्य, संगीत और फैशन शो में भाग लेकर वे खुद को भारत से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। कई युवा स्वयंसेवक इस आयोजन में मदद भी करते हैं, स्टॉल लगाने से लेकर मंच संचालन तक। इससे उनमें नेतृत्व और कौशल भी विकसित होते हैं। फेस्टिवल की एक और खासियत है “फ्यूजन कल्चर”। अमेरिकी और भारतीय युवाओं का मिलन यहां देखने को मिलता है। चाहे वह डांस हो, संगीत हो या फैशन, दोनों संस्कृतियों का सम्मिश्रण नई पीढ़ी को खास बनाता है। यही कारण है कि अटलांटा इंडिया फेस्टिवल युवाओं में लगातार लोकप्रिय हो रहा है। सोशल मीडिया ने भी इस लोकप्रियता को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। इंस्टाग्राम और फेसबुक पर लोग फेस्टिवल की तस्वीरें और वीडियो साझा करते हैं। इससे न केवल भारतवंशी युवाओं को प्रेरणा मिलती है, बल्कि अमेरिकी मित्र भी भारतीय संस्कृति से जुड़ाव महसूस करते हैं। अटलांटा इंडिया फेस्टिवल वास्तव में भारत-अमेरिका की दोस्ती का पुल है अटलांटा इंडिया फेस्टिवल का महत्व केवल सांस्कृतिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक और वैश्विक भी है। यह उत्सव भारत और अमेरिका के बीच दोस्ती और आपसी समझ का पुल बन चुका है। अमेरिकी दर्शक जब भारतीय संस्कृति को नजदीक से देखते और अनुभव करते हैं, तो वे भारत के प्रति और अधिक सम्मान महसूस करते हैं। दूसरी ओर, भारतीय प्रवासी समुदाय को भी गर्व होता है कि वे अपनी संस्कृति को विदेश में जिंदा रख पा रहे हैं। फेस्टिवल में व्यापार और शैक्षणिक

Culture Destination Travel

एक कप कॉफी.. काफी है! लेकिन ये आई कहाँ से? पढ़ें और जानें

  • 0 Comments

कॉफी का इतिहास सदियों पुराना है। लेकिन इसके जन्मस्थान के रूप में अक्सर इथियोपिया को देखा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि वहां के चरवाहों ने पहली बार देखा कि उनकी गायें कुछ खास पौधों के बीज खाने के बाद अत्यधिक सक्रिय और ऊर्जावान हो जाती हैं। यही कारण था कि लोगों ने इस पौधे की खासियत पर ध्यान देना शुरू कर दिया था। धीरे-धीरे इसी बीज से कॉफी तैयार की गई और यह पेय बन गया। अफ्रीका से पूरी दुनिया में 15वीं शताब्दी में कॉफी यमन पहुंची। यहां सूफी साधु रात भर ध्यान और प्रार्थना में जागते रहने के लिए कॉफी पीते थे। यह सिर्फ ऊर्जा देने वाला पेय नहीं था, बल्कि मानसिक तंदुरुस्ती और ताजगी का साधन भी बन गया। समय के साथ कॉफी एशिया और यूरोप के विभिन्न हिस्सों में फैल गई। 16वीं और 17वीं शताब्दी में विनीशिया और इटली जैसे देशों में कॉफी हाउस खुल गए थे। यह बुद्धिजीवियों, व्यापारियों और लेखकों का मिलन स्थल बन गया। कॉफी हाउस को ज्ञान का घर क्यों कहा जाता था? यूरोप में कॉफी हाउस को “ज्ञान का घर” कहा जाने लगा। लोग यहां बैठकर चर्चा करते, साहित्य और कला पर बातचीत करते और नए विचारों को जन्म देते। इतिहासकारों का कहना है कि कॉफी ने यूरोप में सामाजिक और बौद्धिक जीवन को नई दिशा दी। इसी दौरान कॉफी ने कला, संगीत और साहित्य में भी अपनी छाप छोड़ी। भारत में कॉफी की शुरुआत लगभग 17वीं शताब्दी में हुई। केरल और कर्नाटक के बागानों में पहली बार कॉफी के पौधे लगाए गए। वहां की जलवायु और मिट्टी कॉफी के लिए बिल्कुल उपयुक्त थी। धीरे-धीरे भारत में कॉफी ने अपनी खास पहचान बनाई और इसे सिर्फ पेय नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा माना जाने लगा। आज जब हम कॉफी का स्वाद लेते हैं, तो केवल उसकी सुगंध ही नहीं, बल्कि सदियों पुरानी यात्रा, विभिन्न संस्कृतियों और ऐतिहासिक घटनाओं की कहानी भी हमारे सामने होती है। जानिए कॉफी की खेती कैसे होती है? कॉफी मूल रूप से दो प्रकार की होती है “अरबिका और रोबस्टा”। अरबिका की खुशबू और हल्का स्वाद इसे विशेष बनाता है, जबकि रोबस्टा में कड़वाहट थोड़ी ज्यादा होती है और कैफीन की मात्रा अधिक होती है। आज कॉफी का उत्पादन ब्राजील, वियतनाम, कोलंबिया और अफ्रीका के कई देशों में होता है। भारत में कॉफी की खेती मुख्य रूप से कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में होती है। यहां की मिट्टी, ऊंचाई और जलवायु, कॉफी की गुणवत्ता को बढ़ाती हैं। प्रत्येक बीज, हर पौधा, और हर फल समय के साथ विकसित होकर स्वाद और सुगंध में योगदान देते हैं। कॉफी का विश्वव्यापी प्रसार व्यापार, समुद्री रास्तों और शाही संरचनाओं के माध्यम से हुआ था। जब कॉफी पर बात होती है, तो एनर्जी के साथ दिल भी मिलते हैं। यूरोप में कॉफी हाउस सामाजिक और बौद्धिक मिलन के स्थल बन गए। यहां व्यापारी, लेखक, शिक्षक और कलाकार मिलते, विचार साझा करते और नई योजनाएं बनाते थे। आज कॉफी केवल ऊर्जा देने वाला पेय नहीं रह गई है। यह सामाजिक जीवन, पेशेवर बैठक और रचनात्मकता का हिस्सा बन गई है। साथ ही साथ नवयुवकों और युवतियों के लिए मुलाकातों का जरिया भी। कैफे और कॉफी हाउस युवा, पेशेवर और रचनाकारों के लिए विशेष स्थान हैं। यह सिर्फ पेय नहीं बल्कि संवाद, मित्रता और रचनात्मक ऊर्जा का प्रतीक बन गया है। युवा और कॉफी का बढ़ता प्रचलन कॉफी आज की युवा पीढ़ी के जीवन में एक अभिन्न हिस्सा बन गई है। यह सिर्फ जागने और ऊर्जा पाने का साधन नहीं है, बल्कि स्टाइल, लाइफस्टाइल और सामाजिक पहचान का प्रतीक बन गई है। कॉलेज कैंपस, ऑफिस और कैफे हर जगह युवाओं की कॉफी पीने की आदत देखने को मिलती है। सोशल मीडिया ने कॉफी की लोकप्रियता को और बढ़ाया है। हॉट लैट, कैपुचिनो, फ्रैपुचिनो और कोल्ड ब्रू की तस्वीरें लगातार साझा की जाती हैं। दोस्तों के साथ कैफे में बैठकर बातें करना, मीटिंग में कॉफी का आनंद लेना या अकेले काम पर फोकस करना सब युवाओं की जीवनशैली का हिस्सा बन गया है। मानसिक एकाग्रता बढ़ाने, मूड सुधारने और काम के दौरान उत्साह बनाए रखने में भी मदद करती है। यही कारण है कि युवा इसे अपने दैनिक जीवन में शामिल करते हैं और कैफे संस्कृति में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। कॉफी के इर्द-गिर्द कई सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियां भी जुड़ी हैं। कॉफी हाउस में अक्सर लाइव म्यूजिक, बुक क्लब और वार्ता सत्र होते हैं। यह सिर्फ पेय नहीं बल्कि सामाजिक संवाद और रचनात्मकता का केंद्र बन गया है। कॉफी का विज्ञान कॉफी सिर्फ स्वाद और सामाजिक जीवन का हिस्सा नहीं है, बल्कि इसके स्वास्थ्य लाभ भी महत्वपूर्ण हैं। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स शरीर को हानिकारक तत्वों से बचाते हैं। यह मस्तिष्क को सक्रिय रखता है, याददाश्त को तेज करता है और मूड को सुधारता है। कैफीन, जो कॉफी का मुख्य तत्व है, ऊर्जा बढ़ाने और थकान कम करने में सहायक है। इसके सेवन से हृदय रोग और मधुमेह के जोखिम को भी कम किया जा सकता है। लेकिन सीमित मात्रा में ही सेवन करना फायदेमंद होता है। आधुनिक विज्ञान ने कॉफी पीने के अनुभव को और विविध बना दिया है। अब अलग-अलग बीन्स, फ्लेवर और ब्रूइंग तकनीकें इसे एक कला और अनुभव बना देती हैं। कोल्ड ब्रू, फ्लैट व्हाइट, एस्प्रेसो और कैपुचिनो हर प्रकार की कॉफी एक अलग स्वाद और अनुभव देती है। कॉफी ने स्वास्थ्य, स्वाद और सामाजिक जीवन को जोड़कर एक ऐसा अनुभव दिया है, जो सिर्फ पेय नहीं बल्कि जीवनशैली का हिस्सा बन गया है। सोशल लाइफ और ग्लोबल पहचान कॉफी केवल पेय नहीं बल्कि जीवन का हिस्सा बन गई है। विश्वभर में कॉफी हाउस क्रीएटीविटी, सोशल डायलॉग और अन्य मीटिंग्स का केंद्र हैं। भारत में भी कैफे संस्कृति तेजी से बढ़ रही है। लोग अब घर में नहीं, बल्कि कैफे में बैठकर कॉफी का आनंद लेते हैं और बातचीत करना पसंद करते हैं। कॉफी हर मग में संवाद, दोस्ती और अनुभव भर देती है। यह ग्लोबल संस्कृति का हिस्सा बन गई है, जो युवा, पेशेवर और कला प्रेमियों को जोड़ती है। कॉफी की यात्रा केवल स्वाद तक सीमित नहीं रही। यह इतिहास, संस्कृति, स्वास्थ्य, युवाओं की जीवनशैली और वैश्विक पहचान सबको एक साथ जोड़ती है।

Travel Uttar Pradesh

यूपी का यह महल है फिल्म शूटिंग का अड्डा, इसमें हैं 60 खम्बे!

  • 0 Comments

उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में स्थित शिवगढ़ का महेश विलास पैलेस सिर्फ एक महल नहीं है, बल्कि यह एक जीता-जागता इतिहास है, जो राजस्थानी वास्तुकला और अवधी संस्कृति का अद्भुत संगम है। अपनी शानदार बनावट, हरे-भरे लॉन और विशाल बरामदों के कारण यह पैलेस फिल्म निर्माताओं और पर्यटकों के लिए समान रूप से आकर्षण का केंद्र बन चुका है। यह महल न केवल अपनी खूबसूरती के लिए जाना जाता है, बल्कि बॉलीवुड व भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री के लिए भी एक महत्वपूर्ण शूटिंग डेस्टिनेशन बन गया है। बता दें, रायबरेली के शिवगढ़ में महेश विलास पैलेस का निर्माण वर्ष 1942 में शिवगढ़ के राजा महेश सिंह ने कराया था। यह महल राजपूताना शैली में बनाया गया है, जो बीकानेर के लालगढ़ किले की डिज़ाइन से प्रेरित है। स्थापत्य कला का एक बेजोड़ नमूना इस महल की सबसे खास बात यह है कि इसे बीकानेर के प्रसिद्ध लालगढ़ पैलेस की तर्ज पर बनाया गया है। इस पैलेस का डिजाइन राजस्थानी स्थापत्य शैली को दर्शाता है, जिसमें लाल पत्थर का उपयोग और विस्तृत नक्काशी शामिल है। महल के सामने का विशाल बरामदा 60 बड़े खंभों पर टिका हुआ है, जो इसकी भव्यता को और बढ़ा देता है। यह बरामदा मेहमानों के स्वागत और आराम करने के लिए एक शानदार जगह प्रदान करता है। महल के अंदर कदम रखते ही इसकी भव्यता और बढ़ जाती है। इसका फर्श खूबसूरत इटालियन संगमरमर से बना है, जो इसकी सुंदरता में चार चांद लगा देता है। शांत और प्राकृतिक माहौल इस महल की सबसे बड़ी विशेषता इसके खूबसूरत और हरे-भरे लॉन हैं, जो इसकी प्राकृतिक सुंदरता को और बढ़ा देते हैं । यहां आने वाले लोग अपने परिवार के साथ बैठकर आराम कर सकते हैं और शांत तथा प्राकृतिक नजारों का आनंद ले सकते हैं। महल के सामने एक प्यारा सा फव्वारा भी है, जो खासकर चांदनी रातों में बेहद सुंदर लगता है। यह शांत और सुकून देने वाला माहौल प्रदान करता है, जो व्यस्त जीवन से दूर एक ब्रेक के लिए एकदम सही है। बच्चों के लिए भी यह खुली जगह खेलने और मस्ती करने के लिए आदर्श है। फिल्म इंडस्ट्री का पसंदीदा शूटिंग डेस्टिनेशन महेश विलास पैलेस अब फिल्मों और टीवी सीरियल्स की शूटिंग के लिए एक बहुत मशहूर जगह बन गया है। यहां अब तक 24 से अधिक फिल्में और टीवी सीरियल शूट हो चुके हैं। यह उत्तर प्रदेश का पहला ऐसा पैलेस है, जिसे इतनी बड़ी संख्या में फिल्मों के लिए चुना गया है। फिल्म निर्माता इस जगह को इसलिए पसंद करते हैं, क्योंकि इसका देसी इंटीरियर और शाही माहौल फिल्मों में राजमहल या शाही परिवार के दृश्यों को दर्शाने के लिए एकदम उपयुक्त है। बता दें, यहां बुलेट राजा, गांधीगिरी, भोजपुरी फिल्म गदर, अजय देवगन की मशहूर फिल्म रेड, भोजपुरी फिल्म जबरिया जोड़ी कलइयां भी शूट हो चुकीं हैं। पर्यटकों के लिए सुविधाएं महेश विलास पैलेस के अंदर पर्यटकों और फिल्म क्रू के लिए भी कई सुविधाएं उपलब्ध हैं। मनोरंजन के लिए यहां पूल और टेबल टेनिस जैसे इनडोर गेम्स की सुविधा है। इन सुविधाओं ने इस जगह को फिल्म इंडस्ट्री के लिए और भी आकर्षक बना दिया है। यहां का शाही माहौल और आधुनिक सुविधाएं इसे एक आदर्श शूटिंग लोकेशन बनाती हैं। कैसे पहुंचें महेश विलास पैलेस? महेश विलास पैलेस उत्तर प्रदेश के लखनऊ जिले के पास, रायबरेली में स्थित है। यहां पहुंचने के लिए सबसे अच्छा तरीका लखनऊ रेलवे स्टेशन या चौधरी चरण सिंह एयरपोर्ट आना है। स्टेशन और एयरपोर्ट से पैलेस की दूरी लगभग 25-30 किलोमीटर है। यहां तक पहुंचने के लिए टैक्सी, ऑटो या निजी वाहन आसानी से उपलब्ध हैं। लखनऊ शहर के किसी भी हिस्से से आप कैब या लोकल बस के जरिए भी महेश विलास पैलेस तक आराम से पहुंच सकते हैं। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर महेश विलास पैलेस एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर है, जो अपनी खूबसूरती, शांति और फिल्म उद्योग में अपने योगदान के लिए जाना जाता है। यह एक ऐसा स्थान है जो पर्यटकों को एक शांत और शाही अनुभव प्रदान करता है, वहीं फिल्म निर्माताओं को उनकी कहानियों के लिए एक आदर्श पृष्ठभूमि देता है।

Madhya pradesh Travel

बल्देवगढ़- एक ऐसा किला, जहां तोप चलाने से हो जाता था महिलाओं का गर्भपात!

  • 0 Comments

मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ जिले में स्थित बल्देवगढ़ किला इतिहास का एक ऐसा नमूना है, जिसकी वीरता की कहानियां ना सिर्फ प्रेरित करती हैं, बल्कि बुन्देलखंड की गौरव को सहेजे हुए प्रतीत होता है। यह किला छोटा होते हुए भी अपने वैभव, स्थापत्य और वीरता की कहानियों के लिए बेहद प्रसिद्ध है। बुंदेलखंड की भूमि पर बसा यह किला एक ओर तो प्राचीन स्थापत्य कला की झलक दिखाता है, वहीं दूसरी ओर युद्धों और संघर्षों की गवाही भी देता है। चारों ओर फैली हरियाली, तालाब और ऊंची ऊंची पहाड़ियां इस किले को प्राकृतिक सौंदर्य से भी खास बनाती हैं। जब मैं यहां पहुंचा तो मुझे थोड़ी ग्लानि सी हुई, ग्लानि इस बात की इतनी खूबसूरत जगह को सरकार ने खंडर बना कर रखा है, ये नायाब चीजें हमारी धरोहर हैं और हमें इन चीजों की कद्र करनी चाहिए। खैर, बल्देवगढ़ कस्बा, टीकमगढ़ से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर बसा है और यहां पहुंचने के लिए सड़क मार्ग सबसे आसान साधन है। यह जगह भीड़भाड़ से दूर, शांति और इतिहास के खूबसूरत पन्नों को संजोए हुए है। जब कोई सैलानी किले की ओर बढ़ता है तो दूर से ही उसकी विशाल दीवारें और बुर्ज अपनी मौजूदगी का एहसास दिलाते हैं। स्थानीय लोग बताते हैं कि इस किले का नाम बल्देवगढ़ इसलिए पड़ा क्योंकि यहां कभी भगवान बलराम के मंदिर और उनकी पूजा का प्रचलन हुआ करता था। धीरे-धीरे यह जगह राजाओं और सेनापतियों की शरणस्थली बनी और एक मजबूत किले के रूप में विकसित हो गई। बल्देवगढ़ का वातावरण आज भी वीरता, शौर्य और परंपरा की कहानी कहता है। आइए इस पेशकश में जानते हैं, इस किले के बारे में कुछ खास बातें। किले का अतीत जान क्यों परेशान हो जाते हैं लोग? बल्देवगढ़ किला बुंदेला राजाओं की वीरता और स्थापत्य कला का जीवंत प्रतीक है। जैसा की आप तस्वीरों में देख पा रहे हैं कहा जाता है कि इस किले का निर्माण 17वीं शताब्दी में बुंदेला शासक राजा भोजराज ने करवाया था। उस समय बुंदेलखंड में लगातार युद्ध और संघर्ष चल रहे थे, इसलिए यह किला सुरक्षा और शासन दोनों दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण था। किले की ऊंची दीवारें, मजबूत दरवाजे और गुप्त मार्ग इस बात का सबूत हैं कि इसे युद्धकला को ध्यान में रखकर बनाया गया था। यहां कई महल, मंदिर और बैठकें थीं जहां पर राजदरबार लगता था और समस्याएं निपटती थी। इतिहासकार बताते हैं कि यह किला कभी राजनीति, युद्धनीति और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रहा है। मुगल और मराठों के दौर में भी बल्देवगढ़ किले का महत्व कम नहीं हुआ है। कई बार यह किला आक्रमणों और घेराबंदियों का गवाह बना, लेकिन अपनी मजबूती के कारण लंबे समय तक अडिग खड़ा रहा और आज भी भले सरकार इसकी देख रेख को नजरंदाज करती है फिर भी यह किला बहुत नायाब चीज है। यह किला सिर्फ ईंट और पत्थर का ढांचा नहीं है, बल्कि इसमें बुंदेला योद्धाओं की शौर्य गाथाएं दर्ज हैं। आज भी जब सैलानी इसके खंडहरों को देखते हैं तो उन्हें अतीत की वह गूंज सुनाई देती है, जब तलवारें टकराती थीं और रणभूमि में जयघोष गूंजता था। स्थापत्य कला में छिपे हैं इतिहास के राज बल्देवगढ़ किले की सबसे बड़ी खूबी इसकी स्थापत्य कला है। भले ही यह किला आकार में बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन इसकी संरचना बेहद मजबूत और आकर्षक है। किले के चारों ओर ऊंची दीवारें बनी हुई हैं, जिन पर बने बुर्ज और झरोखे आज भी स्थापत्य की उत्कृष्टता को दर्शाते हैं। किले के अंदर बने महल कभी राजपरिवार का निवास स्थल हुआ करते थे। इन महलों की खिड़कियों और दरवाजों पर की गई नक्काशी उस समय की कारीगरी का अद्भुत उदाहरण है। किले के भीतर एक सुंदर तालाब भी है, जिसे यहां के निवासी ‘सागर ताल’ कहते हैं। यह तालाब न केवल जल की जरूरत पूरी करता था बल्कि किले की खूबसूरती भी बढ़ाता है। किले के अंदर बने मंदिर इसकी धार्मिक महत्ता को भी दर्शाते हैं। बहुत पहले यहां भगवान बलराम और अन्य देवी-देवताओं की पूजा होती थी। इसके अलावा किले में बने गुप्त मार्ग और तहखाने यह बताते हैं कि इसे कितनी सोच-समझकर डिजाइन किया गया था। आज भले ही किला खंडहर हो गया हो, लेकिन इसके खंडहरों में भी एक अलग ही रोमांच और रहस्य छिपा है। पर्यटक जब इसकी दीवारों पर हाथ रखते हैं तो उन्हें पत्थरों के बीच से इतिहास की धड़कनें सुनाई देती हैं। स्थापत्य कला के ये नमूने बल्देवगढ़ को विशेष बनाते हैं। लोककथाओं में किले की वीरता का होना इसे और खास बनाता है बल्देवगढ़ किला सिर्फ एक ऐतिहासिक इमारत नहीं, बल्कि बुंदेलखंड की संस्कृति का भी हिस्सा है। यहां के लोग इस किले से गहरा जुड़ाव महसूस करते हैं। स्थानीय लोककथाओं में इस किले का जिक्र बार-बार आता है। बुजुर्ग आज भी वीर योद्धाओं की कहानियां सुनाते हैं, जिन्होंने इस किले की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए हैं। त्यौहारों और मेलों के दौरान बल्देवगढ़ किले की रौनक और बढ़ जाती है। खासकर, होली, दीवाली और दशहरा जैसे पर्व यहां बड़े धूमधाम से मनाए जाते हैं। होली पर यहां का माहौल बेहद खास होता है, जब लोकगीतों की गूंज और रंगों की बौछार इस किले की दीवारों को भी सुंदर बना देती है। यहां की लोककथाओं में छिपी वीरता और प्रेम की कहानियां पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं। कहा जाता है कि इस किले में कभी राजा-रानियों का शाही परिवार बसा था, जिसकी चहल-पहल  अब भी हवा में महसूस की जा सकती है। बुंदेली कला, नृत्य और संगीत की परंपरा इस किले से गहराई से जुड़ी है। बल्देवगढ़ किला बुंदेलखंड की आत्मा को समझने का एक माध्यम है। यहां आकर कोई भी सिर्फ दीवारें और खंडहर नहीं देखता, बल्कि उस संस्कृति को महसूस करता है जिसने सदियों से इस भूमि को जीवित रखा है। मैंने स्वयं यहां आकार यह अनुभव की इतिहास में हमारी संस्कृति कितनी खास थी। खास तो आज भी लेकिन यदि हम इसे सुरक्षित कर पाएं तो ज्यादा बेहतर होगा।   किले का पहले और आज में क्या बदला आज बल्देवगढ़ किला भले ही खंडहर में तब्दील हो चुका हो, लेकिन इसका आकर्षण आज भी कम नहीं हुआ है। यह जगह इतिहास प्रेमियों,

Category International Travel

फ़्लोरेस द्वीप पर माउंट इनेरी ज्वालामुखी की चढ़ाई! क्या ये सम्भव है?

  • 0 Comments

पूर्वी इंडोनेशिया का फ़्लोरेस द्वीप अपने अद्भुत प्राकृतिक नजारों, रंग-बिरंगी झीलों और रहस्यमयी गुफाओं के लिए जाना जाता है। लेकिन इन सब में से एक चीज जो सबसे ज्यादा रोमांच पैदा करती है, वह है माउंट इनेरी ज्वालामुखी की चढ़ाई। यह ज्वालामुखी फ़्लोरेस द्वीप के सबसे आकर्षक पर्वतों में से एक है, जो अपने अनूठे पिरामिड-जैसे आकार के लिए प्रसिद्ध है। अगर आप एडवेंचर के शौकीन हैं और प्रकृति को करीब से देखना पसंद करते हैं, तो माउंट इनेरी की चढ़ाई आपके लिए एक अविस्मरणीय अनुभव हो सकती है। माउंट इनेरी, जो कि ‘इना’ और ‘एरी’ शब्दों से बना है, जिसका अर्थ है ‘मां’ और ‘पिता’। यहां के लोगों के लिए एक पवित्र स्थल माना जाता है। यह पर्वत समुद्र तल से लगभग 2,245 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इसकी सबसे खास बात इसका आकार है। दूर से देखने पर यह एक विशाल, नुकीले पिरामिड की तरह लगता है, जो आसमान को छू रहा हो। चढ़ाई की शुरुआत माउंट इनेरी की चढ़ाई की शुरुआत आमतौर पर रात के 2 या 3 बजे होती है। इसका कारण यह है कि सुबह सूरज निकलने से पहले ही चोटी पर पहुंचना होता है ताकि आप उस मनमोहक सूर्योदय का नजारा देख सकें, जिसके लिए यह जगह मशहूर है। चढ़ाई का रास्ता शुरू में काफी आसान होता है, लेकिन जैसे-जैसे आप ऊपर जाते हैं, रास्ता कठिन होता जाता है। ढलानें बहुत खड़ी हैं, और रास्ता ज्वालामुखी की ढीली मिट्टी और पत्थरों से भरा हुआ है, जिस पर फिसलन हो सकती है। चढ़ाई के दौरान, आपको जंगल का घनापन महसूस होगा। रास्ते में बांस के पेड़ और कई तरह के जंगली पौधे देखने को मिलते हैं। जैसे-जैसे आप ऊंचाई पर पहुंचते हैं, मौसम ठंडा होने लगता है। गाइड के बिना इस रास्ते पर चलना काफी मुश्किल हो सकता है, इसलिए एक स्थानीय गाइड को साथ लेना बहुत ज़रूरी है। वे न केवल आपको सही रास्ता दिखाते हैं, बल्कि स्थानीय कहानियां और जानकारी भी देते हैं। सूर्योदय का जादुई नजारा लगभग 3-4 घंटे की कड़ी मेहनत के बाद, जब आप चोटी पर पहुंचते हैं, तो वहां का नजारा आपकी सारी थकान दूर कर देता है। चोटी पर पहुंचते ही आपको पूर्व दिशा में सूरज को धीरे-धीरे क्षितिज से ऊपर आते हुए देखने का मौका मिलता है। नारंगी, गुलाबी और लाल रंगों का मिला-जुला यह नजारा बेहद ही खूबसूरत होता है। सूरज की पहली किरण जब आसपास के पहाड़ों और बादलों पर पड़ती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे पूरी दुनिया रंगीन हो गई हो। फोटोग्राफी के लिए स्वर्ग है यह जगह माउंट इनेरी फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए एक स्वर्ग है। सूरज उगने के समय के रंगीन नजारों से लेकर पिरामिड के आकार के इस पहाड़ के अनूठे फ्रेम तक, हर कदम पर कुछ नया कैद करने को मिलेगा। चोटी से नीचे का नजारा भी बेहद शानदार होता है, जहां बादल आपके पैरों के नीचे तैरते हुए दिखते हैं। आसपास के हरे-भरे गांव और दूर समुद्र का नीला रंग एक अद्भुत कॉन्ट्रास्ट पैदा करते हैं। यहां पर आप लॉन्ग एक्सपोजर शॉट्स, पैनोरमा, और सनराइज टाइम-लैप्स वीडियो भी बना सकते हैं। दिल्ली से माउंट इनेरी जाने का रास्ता और खर्च गूगल के मुताबिक, माउंट इनेरी तक पहुंचने के लिए सबसे पहले आपको दिल्ली से इंडोनेशिया के बाली (Bali) जाना होगा। यानी दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से बाली के नगुरा राय अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के लिए सीधी उड़ानें या एक स्टॉप वाली उड़ानें उपलब्ध हैं। यह यात्रा आमतौर पर 7 से 10 घंटे की होती है। बाली से फ़्लोरेस द्वीप के लिए कई घरेलू उड़ानें उपलब्ध हैं। आपको लैबुआन बाजो के कोमोडो हवाई अड्डे के लिए एक उड़ान लेनी होगी, जो कि फ़्लोरेस द्वीप का प्रवेश द्वार है। लैबुआन बाजो से बाजावा तक सड़क मार्ग से जाना होगा। यह यात्रा करीब 6-7 घंटे की है। आप टैक्सी, निजी कार या स्थानीय बस से जा सकते हैं। बाजावा शहर माउंट इनेरी के सबसे नजदीक है। बाजावा से माउंट इनेरी के बेसकैंप तक जाने में लगभग 30-40 मिनट लगते हैं। आप टैक्सी या ओजेक (मोटरसाइकिल टैक्सी) का उपयोग कर सकते हैं। अनुमानित खर्च -दिल्ली से बाली हवाई किराया: 25,000 – 45,000 रुपये (आने-जाने का, मौसम और बुकिंग के आधार पर)।-बाली से लैबुआन बाजो हवाई किराया: 4,000 – 8,000 रुपये (आने-जाने का)।-लैबुआन बाजो से बाजावा सड़क यात्रा: 1,500 – 2,500 रुपये (टैक्सी या निजी कार के लिए)।-माउंट इनेरी गाइड और प्रवेश शुल्क: 1,000 – 2,000 रुपये (प्रति व्यक्ति)।-अन्य खर्च (खाना, रहना): 5,000 – 10,000 रुपये (प्रति व्यक्ति, दिन के हिसाब से)। कुल खर्चः 45,000 से 70,000 रुपये के बीच हो सकता है।

Madhya pradesh Travel

झांसी की कहानियां तो आपने जरूर सुनी होंगी, जानिए इसके किले के बारे में

  • 0 Comments

बुंदेलों हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थीखूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी.. इन पंक्तियों को कहीं न कहीं कभी न कभी आपने सुना ही होगा, आइए आज जानते हैं इस झांसी की दास्तां जहां वीरांगना लक्ष्मीबाई ने कुछ ऐसा कर दिखाया जिसने उन्हें अमर कर दिखाया।उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में स्थित झांसी का किला भारत के उन ऐतिहासिक स्थलों में गिना जाता है, जो साहस, शौर्य और देशभक्ति की अद्भुत मिसाल हैं। झांसी का सौन्दर्य ऐसा ही कोई भी कायल हो जाए यह किला बुंदेलखंड की ऊंची पहाड़ी पर स्थित है, जहां से पूरा शहर नज़र आता है। झांसी रेलवे स्टेशन से यह किला मात्र 3 किलोमीटर दूर है और शहर की पहचान के रूप में हमेशा यात्रियों का ध्यान खींचता है। झांसी किले का निर्माण बुंदेला शासक ओरछा के राजा बीर सिंह जूदेव ने 1613 में करवाया था। इसे इस तरह बनाया गया कि यह दुश्मनों के हमले को झेल सके और युद्ध के समय सेना को सुरक्षित स्थान मिल सके। किले की मोटी दीवारें, ऊंचे बुर्ज और बड़े दरवाज़े इसकी मजबूती और सामरिक महत्ता को दर्शाते हैं। आज झांसी का किला सिर्फ एक ऐतिहासिक स्मारक नहीं है बल्कि यह भारत की स्वतंत्रता संग्राम की गवाही देता है। यहां की मिट्टी में रानी लक्ष्मीबाई की बहादुरी की कहानी बसी है, जिसे सुनकर हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। जब कोई यात्री यहां पहुंचता है तो उसे सिर्फ ईंट-पत्थर का किला नहीं दिखता, बल्कि उसमें शौर्य और बलिदान की गूंज सुनाई देती है। कला का कोहिनूर झांसी का किला झांसी किला स्थापत्य कला का बेहतरीन उदाहरण है। इसे ग्रेनाइट और मजबूत पत्थरों से बनाया गया है ताकि यह समय और युद्ध की sहर परीक्षा में खरा उतर सके। किले का क्षेत्रफल लगभग 15 एकड़ है और इसके चारों ओर फैली 20 से 30 फीट मोटी दीवारें इसे और भी विशाल बनाती हैं। किले में 10 विशाल दरवाज़े हैं जिनमें प्रमुख हैं खिलौना गेट, लक्ष्मी गेट, सागर गेट और ओरी गेट। हर दरवाज़ा अपनी खास शैली और कारीगरी के लिए जाना जाता है। इसके अलावा किले में कई बुर्ज और तोपखाने हैं, जहां कभी सैनिक तैनात रहते थे। आज भी यहां रखी तोपें उस दौर की सैन्य क्षमता की याद दिलाती हैं। किले के भीतर रानी महल, बारादरी और मंदिर स्थापत्य कला की अनोखी झलक प्रस्तुत करते हैं। यहां की दीवारों पर की गई नक्काशी, आर्च और गुंबद उस समय की कला और सौंदर्यबोध को दर्शाते हैं। किले की बनावट को देखकर यह समझ आता है कि इसे युद्ध के लिहाज से कितनी सावधानी से तैयार किया गया था। दुश्मनों के प्रवेश को रोकने के लिए घुमावदार रास्ते, ऊंचे दरवाज़े और गुप्त मार्ग बनाए गए थे। यही कारण था कि झांसी किला सिर्फ एक शाही महल नहीं, बल्कि एक सशक्त किला भी था। “मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी” ऐतिहासिक उद्घोष की कहानी झांसी किला भारतीय स्वतंत्रता संग्राम 1857 की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं का साक्षी है। यहीं से रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के खिलाफ अपना निर्णायक युद्ध लड़ा। रानी लक्ष्मीबाई, जिन्हें प्यार से झांसी की रानी कहा जाता है, अपने साहस, वीरता और साहस के लिए जानी जाती हैं। जब अंग्रेजों ने झांसी को हड़पने की कोशिश की, तो रानी ने “मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी” का ऐतिहासिक उद्घोष किया। किले की दीवारों से अंग्रेजी सेना का सामना करना और अपनी छोटी सी सेना के साथ वीरता पूर्वक लड़ना इतिहास का वह अध्याय है जिसे कोई भूल नहीं सकता। किले के भीतर बने ‘रानी महल’ में ही रानी लक्ष्मीबाई ने कई रणनीतियां बनाई थीं। युद्ध के दौरान जब हालात कठिन हो गए तो रानी ने अपने पुत्र को पीठ पर बांधा और किले की दीवार से घोड़े पर कूदकर बाहर निकल पड़ीं। यह दृश्य भारतीय इतिहास में अदम्य साहस का प्रतीक बन गया। 1857 का संग्राम भले ही अंग्रेजों की जीत के साथ खत्म हुआ, लेकिन झांसी की रानी और इस किले ने पूरे भारत में स्वतंत्रता की आग जलाई। आज भी जब कोई इस किले की प्राचीर पर खड़ा होता है तो उसे रानी लक्ष्मीबाई की तलवार की चमक और उनका अदम्य आत्मबल महसूस होता है। झांसी क्यों जाना चाहिए? आज झांसी किला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित स्मारक है। यह किला शैलानियों इतिहास प्रेमियों और छात्रों के लिए आकर्षण का केंद्र है। हर साल हजारों लोग यहां आते हैं और उस वीरता की कहानियों को महसूस करते हैं जो इस किले की दीवारों में बस चुकी हैं। किले के अंदर बने संग्रहालय में पुराने हथियार, तोपें, मूर्तियां और कई प्राचीन वस्तुएं रखी गई हैं। ये सभी वस्तुएं आगंतुकों को 17वीं और 18वीं शताब्दी की झांसी की झलक दिखाती हैं। संग्रहालय में रखे चित्र और दस्तावेज रानी लक्ष्मीबाई और 1857 की क्रांति के बारे में विस्तार से बताते हैं। पर्यटन की दृष्टि से झांसी किला न सिर्फ ऐतिहासिक महत्व रखता है बल्कि यहां से शहर का खूबसूरत नज़ारा भी दिखता है। गाइड की मदद से किले का भ्रमण और भी दिलचस्प हो जाता है क्योंकि वे हर कोने की कहानी सुनाते हैं। झांसी का किला स्वतंत्रता और शौर्य का जीवंत प्रतीक है। यहां आकर हर भारतीय गर्व और प्रेरणा से भर जाता है। यही कारण है कि यह किला भारत के ऐतिहासिक धरोहरों की सूची में एक अनमोल रत्न माना जाता है। झांसी किले तक कैसे पहुंचें और यात्रा अनुभव झांसी पहुंचना बेहद आसान है क्योंकि यह उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीच स्थित एक प्रमुख शहर है। झांसी रेलवे स्टेशन उत्तर भारत का बड़ा जंक्शन है और देश के लगभग सभी प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। निकटतम हवाई अड्डा ग्वालियर और कानपुर में है, जहां से सड़क या ट्रेन द्वारा झांसी पहुंचा जा सकता है।किले तक पहुंचने के लिए आप रेलवे स्टेशन या बस स्टैंड से आसानी से टैक्सी, ऑटो या रिक्शा ले सकते हैं। शहर का वातावरण पर्यटन के लिहाज से काफी सुरक्षित और सुविधाजनक है। यात्रा अनुभव की बात करें तो झांसी किला सिर्फ एक जगह घूमने का ठिकाना नहीं बल्कि भावनाओं का केन्द्र है। यहाँ की हवा में वीरता और त्याग की गंध है। जब आप किले की प्राचीर पर खड़े होकर पूरे शहर को

Category Culture Madhya pradesh Travel

वीरों का घर, गीतों का रंग और स्वाद का संग- अपनो बुंदेलखंड!

  • 0 Comments

भारत के बीचों-बीच स्थित बुंदेलखंड केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि यह एक अनोखी सांस्कृतिक धरोहर है। मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश की सीमाओं में फैला यह इलाका सदियों से वीरता, कला और परंपराओं का गढ़ रहा है। यहां के हर कण में इतिहास बसा है, जो चंदेल और बुंदेला राजाओं की वीरगाथाओं से जुड़ा हुआ है। बुंदेलखंड की पहचान सबसे पहले यहां की भाषा, बोली और लोकगीतों से होती है। बुंदेली बोली अपने आप में अनोखी है और इसकी मिठास सुनने वाले के दिल में उतर जाती है। बुंदेलखंड एक वीर भूमि के रूप में लोककथाओं और गीतों के ज़रिए यहां की जनता ने अपनी संस्कृति और इतिहास को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखा है। इतिहासकारों के अनुसार, चंदेल वंश ने खजुराहो जैसे अद्भुत मंदिरों का निर्माण किया, जिनकी कलाकारी आज भी विश्व धरोहर में शामिल है। बाद में बुंदेला शासकों ने इस क्षेत्र को राजनीतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध किया। यही कारण है कि बुंदेलखंड को “वीरभूमि” और “संस्कृति की धरती” कहा जाता है। बुंदेलखंड का परिचय केवल इसके अतीत तक सीमित नहीं है, बल्कि वर्तमान में भी यह अपनी विशिष्टता को बनाए हुए है। यहां के ग्रामीण जीवन में सादगी, परंपराओं से जुड़ाव और लोक आस्थाओं की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। शादी-ब्याह से लेकर त्योहारों तक हर अवसर पर लोकगीत, नृत्य और रीति-रिवाज बुंदेलखंड की पहचान को और भी जीवंत बना देते हैं। यह तो वीरता, कला, संगीत और लोकजीवन का अद्भुत संगम है, जहां हर पल संस्कृति की महक महसूस की जा सकती है। लोककला और साहित्य बुंदेलखंड की आत्मा में बस्ते हैं! बुंदेलखंड की संस्कृति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसकी लोककला और साहित्य है। यहां का लोकसाहित्य वीरता और प्रेम दोनों की कहानियों से भरा हुआ है। लोकगीतों में रानी दुर्गावती, आल्हा-ऊदल और चंदेल वंश की वीरगाथाओं का गुणगान सुनने को मिलता है। आल्हा-ऊदल के गीत तो आज भी गांव-गांव में गाए जाते हैं और लोगों के भीतर साहस और जोश भर देते हैं। लोककला की बात करें तो बुंदेली चित्रकला और मिट्टी के शिल्प यहां के लोगों की रचनात्मकता का प्रमाण हैं। दीवारों पर बने पारंपरिक चित्र, घरों की सजावट में उपयोग होने वाली लोककला और मंदिरों की भित्ति चित्रकला यहां की पहचान है। इसके अलावा, लोकनृत्यों में राई, दीवारी और फाग विशेष प्रसिद्ध हैं। राई नृत्य में लचक और ताल का अनोखा मेल देखने को मिलता है, जबकि फाग वसंत ऋतु की उमंग को दर्शाता है। बुंदेली साहित्य में काव्य परंपरा भी समृद्ध रही है। कवि ईसुरी और इस क्षेत्र के अन्य रचनाकारों ने लोकभाषा में ऐसे गीत और कविताएं लिखीं जिन्हें आज भी लोग गुनगुनाते हैं। ईसुरी को बुंदेली का “सूरदास” कहा जाता है, क्योंकि उनकी कविताओं ने लोकजीवन के सुख-दुख को सजीव कर दिया। साहित्य और कला ने बुंदेलखंड को केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक चेतना का केंद्र बना दिया। यहां का लोकसाहित्य और लोककला यह साबित करता है कि इस क्षेत्र ने हमेशा से अपनी विशिष्ट पहचान को संभालकर रखा है। बुन्देली रीति-रिवाज और त्यौहारों की अनोखी कहानी बुंदेलखंड की संस्कृति को समझना है तो यहां के रीति-रिवाज और त्यौहारों को जानना बेहद ज़रूरी है। यहां का जीवन परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। शादी-ब्याह के अवसर पर गाए जाने वाले गीत, बारात का स्वागत, और मंडप की रस्में यहां की सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत बनाती हैं। त्यौहारों की बात करें तो बुंदेलखंड में होली, दीपावली, दशहरा, रक्षाबंधन और नवरात्रि पूरे उत्साह से मनाए जाते हैं। इनमें होली का रंग सबसे खास होता है। होली के अवसर पर फाग गीत गाए जाते हैं और ढोलक की थाप पर लोग नाचते-गाते हैं। इसके अलावा, गणेश उत्सव और दीवारी भी यहां बड़े धूमधाम से मनाए जाते हैं। दीवारी नृत्य इस क्षेत्र की खास पहचान है। दीपावली के बाद पुरुष अपने हाथों में डंडे लेकर ढोल-नगाड़ों की थाप पर नाचते हैं। यह नृत्य सामूहिकता और उत्साह का प्रतीक है। इसी तरह, सावन और कजरी के गीत महिलाओं के जीवन की खुशियों और दुखों को अभिव्यक्त करते हैं। ग्रामीण जीवन में जन्म, नामकरण, विवाह और मृत्यु से जुड़े रीति-रिवाज भी गहरे महत्व रखते हैं। इन अवसरों पर गाए जाने वाले गीत और रस्में लोगों की सामाजिक एकता और सांस्कृतिक मूल्यों को बनाए रखती हैं। त्यौहार और रीति-रिवाज केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि लोकजीवन की जीवंतता का प्रतीक हैं। यही कारण है कि बुंदेलखंड में हर मौसम, हर अवसर और हर पर्व संस्कृति के नए रंग लेकर आता है। भोजन और परिधान में झलकती संस्कृति बुंदेलखंड की संस्कृति उसके भोजन और परिधानों में भी झलकती है। यहां का खानपान सरल, पौष्टिक और स्वादिष्ट होता है। प्रमुख भोजन में ज्वार, बाजरा और गेहूं की रोटियां शामिल हैं, जिन्हें दाल, सब्ज़ी और चटनी के साथ खाया जाता है। खासकर भटा बैंगन की सब्ज़ी और बेसन की कढ़ी बुंदेली रसोई की खास पहचान है। सर्दियों में लाई-लाई और मठरी-नमकीन खाने का अलग ही आनंद है। मीठे में गुझिया, पेढ़ा और लड्डू हर त्यौहार की शान होते हैं। यहां की जलेबी और पोहा भी सुबह के नाश्ते का हिस्सा है। गांवों में आज भी मिट्टी के चूल्हों पर बने व्यंजनों का स्वाद लोगों को लुभाता है। परिधान की बात करें तो बुंदेलखंड की संस्कृति यहां भी स्पष्ट दिखती है। महिलाएं पारंपरिक साड़ी, लहंगा-चोली और ओढ़नी पहनती हैं, जिन पर बुंदेली कढ़ाई और गोटा-पट्टी का काम होता है। पुरुष आमतौर पर धोती-कुर्ता, पगड़ी और गमछा पहनते हैं। शादी-ब्याह और त्यौहारों में परिधानों का रंग और भी आकर्षक हो जाता है। आभूषण भी बुंदेलखंड की संस्कृति का अहम हिस्सा हैं। यहां की महिलाएं चांदी के गहनों जैसे पाजेब, तोड़ा, झुमके और कमरबंद पहनना पसंद करती हैं। ये गहने न केवल सजावट के लिए, बल्कि परंपरा और पहचान के प्रतीक भी माने जाते हैं। इस तरह भोजन और परिधान बुंदेलखंड की संस्कृति को रोज़मर्रा के जीवन में जीने का अहसास कराते हैं और लोगों को अपनी जड़ों से जोड़े रखते हैं। बदलते दौर में बुंदेली संस्कृति पर पड़ता प्रहार  आज के बदलते समय में भी बुंदेलखंड की संस्कृति अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है। आधुनिकता और तकनीकी प्रगति ने यहां की जीवनशैली में बदलाव ज़रूर किया है, लेकिन रीति-रिवाज, त्यौहार, भाषा और परंपराएं अब भी मजबूती से

Culture Travel Travel Stories Uttar Pradesh

मेरा सफरनामा- कहीं भी जाने से पहले उसके बारे में पढना क्यों है जरूरी?

  • 0 Comments

मैं हूँ आंचल पांधी! दिल्ली में अच्छी खासी जॉब है और जिंदगी में है घुमक्कड़ी। यूं तो देश दुनिया में हर जगह जाने का मौका मिला परन्तु इस बार सितम्बर में वृन्दावन जाने का निर्णय लिया। जी हाँ, उत्तर प्रदेश के मथुरा में है वृंदावन धाम। यहीं श्री कृष्ण ने बाल लीलाएं रची थीं और भक्ति का संदेश दिया था। मथुरा और वृंदावन तरह-तरह के सुंदर मंदिरों से सुसज्जित है। सुंदरता की छटा तो जैसे अलग ही रंग बिखेरती है। ~ मेरा सफरनामा मथुरा जाने के लिए हम बस, कार या ट्रेन में सफ़र कर सकते हैं। मथुरा से वृंदावन की दूरी केवल १२ किलोमीटर है। रहने के लिए यहां काफी अच्छे होटल रूम मिल जाएंगे जिनका रेट भी सही है। पर मैंने चुना एक बड़ा सा होटल रूम जो कि प्रेम मंदिर से बिल्कुल पास ही था। प्रेम मंदिर पैदल जाया जा सकता था। परन्तु वहां पहुंच कर थकान बहुत ज्यादा थी इसलिए कोई प्रोग्राम नहीं बनाया। अगला दिन था बांके बिहारी मंदिर के नाम हम यात्रा शुरू कर ही रहे थे कि हमने देखा प्रेमानंद महाराज की सवारी को। नए दिन की शुरुआत इससे अच्छी क्या होगी? अभी तक सिर्फ उनको टीवी पर ही देखा था। मगर यूं आँखों से देखने की तो बात ही अलग है। यहां से आगे फिर हम मंदिर तक पहुंचे। यहां आपको बंदरों से थोड़ा सावधान रहना होगा।यह मंदिर १२ से ५ बजे तक बंद रहता है अतः आपको दर्शन के लिए सवेरे या सायं का समय ही उचित रहेगा। कथित तौर पर १८६४ में हरिदास जी ने इस मंदिर का शुभ निर्माण करवाया। यहां गर्भगृह में आपको श्री कृष्ण और राधे जी के दर्शन होंगे। हम साइकिल रिक्शा या बैटरी रिक्शा से किसी से भी मंदिर जा सकते हैं। लेकिन हमने निधिवन के बारे में बहुत कुछ सुना था। तो फिर हम चल दिए निधिवन। कहा जाता है कि १६८०१ रूप लेकर तुलसी वन या निधि वन में श्री कृष्ण ने महा रास रचाया था। आज भी लोग यह मानते हैं कि श्री कृष्ण राधे जी के साथ यहां विचरते हैं और इसलिए सायंकाल में निधिवन में जाना मना होता है। किंवदंती है कि यदि कोई श्रीकृष्ण और राधे जी की रास लीला को देख लेता है तो वो या तो मृत्यु को प्राप्त हो जाता है और या पागल होकर लौटता है। सनातन धर्म ऐसे ही चमत्कारिक मान्यताओं से परिपूर्ण है। राधारमण जी के मंदिर को प्रस्थान.. माना जाता है कि ५०० वर्ष पहले श्री गोपाल भट्ट जी १२ शालिग्राम लिए नेपाल से वृंदावन सिधार रहे थे, जब वो उनकी पूजा करने लगे तो एक १२वीं मूर्ती के श्याम जी ने श्री श्यामल रूप ले लिया जो कि आज भी इस मंदिर में प्रतिष्ठित है। वृन्दावन में रंगनाथ मंदिर का भी बहुत नाम है। रंगनाथ जी का मंदिर एक हीरा व्यापारी ने बनवाया था। ये दक्षिण भारतीय शैली में बना है। यहां एक सोने का खंभा और शीशमहल भी है। इसके अलावा यहां एक संग्रहालय भी है जिसमें श्री कृष्ण की लीलाएं बड़ी सुघड़ता से चित्रित की गई हैं। इसके बाद हमने देखा गोपेश्वर महादेव जी मंदिर और हनुमान गढ़ी मंदिर। भगवान शिव की पूजा महादेव मंदिर में स्त्री रूप में की जाती है। मान्यता है कि श्री महादेव यहां गोपी रूप में प्रतिष्ठित हैं और यदि हम यहां न जाएं तो वृंदावन की यात्रा को अधूरा माना जाता है। चलिए अब गोविंद देव जी के मंदिर चलते हैं। इस मंदिर को देख कर प्रतीत होता है जैसे कोई किला हो। इस का निर्माण राजा मानसिंह ने १५९० ने करवाया था। माना जाता है कि तब इसके सात तल थे (seven floors) लेकिन औरंगज़ेब ने इसको तुड़वा दिया था अतः एक ही तल बाकी रहा। अब आपको ले चलते हैं प्रेम मंदिर! भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में, मथुरा जिले के निकट यह वृंदावन में स्थित बहुत मशहूर मंदिर है। यह जगद्गुरु कृपालु महाराज द्वारा निर्मित भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी के प्रेम का सुंदर प्रतीक माना जाता है और एक प्रख्यात मंदिर है। यहां जा कर लगने लगा कि तन मन पूरी तरह से भक्ति में सराबोर है और निधि वन को देख कर एक सिहरन बदन में दौड़ पड़ती है कि हमारा सनातन धर्म कितना खूबसूरत है और साइंस से भी परे चमत्कारों से भरा हुआ है। मुझे यात्राओं का बहुत शौक है और कहीं भी जाने से पहले मैं उस जगह के बारे में खूब पढ़ती हूं और वहां के अप्रतिम रहस्यों और विशेषताओं के बारे में खूब जानकारी इकट्ठा करती हूं। आशा करती हूँ कि भागवत गीता के ज्ञान को जीवन के भीतर उतार पाऊं। ईश्वरीय सत्ता और धर्म के गूढ़ रहस्यों के बारे में मैं अपनी जानकारी और विश्वास को अचूक मानती हूँ।

Culture Himachal Pradesh Travel

जानिए हिमाचल प्रदेश का वह महोत्सव जिसमें किया जाता है सर्दियों का स्वागत!

  • 0 Comments

हिमाचल प्रदेश की हरी-भरी वादियां और बर्फीली चोटियां देखना कितना दुर्लभ है। लेकिन जब सितंबर का महीना आता है, तो यहां का माहौल एक अलग ही रंगारंग हो जाता है। यहां का सैर महोत्सव, जिसे हिमाचल सैर महोत्सव भी कहते हैं, इसी समय मनाया जाता है। यह त्योहार नई फसल की खुशी और सर्दियों की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। हिमाचल के विभिन्न जिलों जैसे शिमला, सोलन, कुल्लू, मंडी और कांगड़ा में इसे बड़े उत्साह से और धूमधाम के साथ मनाया जाता है। आओ जानें इतिहास! सैर महोत्सव की जड़ें सदियों पुरानी हैं। यह पर्व हिमाचल की आदिवासी और लोक संस्कृति से जुड़ा है। स्थानीय लोग मानते हैं कि यह समय देवताओं के स्वागत का समय है। वे स्वर्ग से आते हैं और फसल की रक्षा करते हैं। वैसे इस त्योहार की शुरुआत गांवों में पूजा से होती है। लोग साफ-सुथरे कपड़े पहनते हैं, और घरों को कई तरह से सजाते हैं। इस दौरान महिलाएं विशेष पकवान भी बनाती हैं, जैसे सिड्डू और बाबरू। हिमाचल का यह महोत्सव सिर्फ जश्न नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भी प्रतीक माना जाता है। हिमाचल के लोग फसल को देवताओं का आशीर्वाद मानते हैं। इसलिए सैर के दिन वे नाचते-गाते हैं और देवताओं का स्वागत करते हैं। हिमाचल के लगभग सभी गांव सहारों में इस त्यौहार के प्रति उत्सुकता देखी जा सकती है। वे ढोल-नगाड़ों की थाप पर नाचते हैं, और हवा में लोकगीतों की धुन गूंजती है तो मन खुश हो जाता है। दरअसल, यह त्योहार पारिवारिक और सामुदायिक दोनों रूपों में मनाया जाता है। कुल्लू और मंडी में घर-घर में जश्न होता है, जबकि सोलन और शिमला में बड़े-बड़े मेले लगते हैं। कहा जाता है की महोत्सव की शुरुआत 20वीं शताब्दी में लोकप्रिय हुई, लेकिन इसकी जड़ें प्राचीन काल से जमीं हुई हैं। राज्य सरकार भी इसे बढ़ावा देने में पीछे नहीं, हिमाचल सरकार इसे पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए प्रमोट करती है जो हिमाचल के लिए बहुत जरूरी है। पर्यटक यहां आकर स्थानीय जीवन को करीब से देख पाते हैं। सच में यह महोत्सव हिमाचल की विविधता दिखाता है। यहां की संस्कृति में हिंदू, बौद्ध और आदिवासी सभी मिल-जुलकर त्यौहार को मनाते हैं। सांस्कृतिक रस्में जैसे फिर ज़िंदा हो जाती हैं.. सैर के दिन लोग पारंपरिक वेशभूषा पहनते हैं। महिलाएं रंग-बिरंगी शॉल और चूड़ियां पहनकर सजती हैं। पुरुष टोपी और कुर्ता पहनते हैं। जो बहुत की रोमांचक माहौल बना देता है। त्योहार में बैल दौड़, लोक नृत्य और हस्तशिल्प मेला भी लगता है। अगर आप हिमाचल घूमने का प्लान बना रहे हैं, तो सैर महोत्सव को मिस न करें। यह एक ऐसा अनुभव है जो आपको हमेशा याद रहेगा। यकीनन सैर महोत्सव हिमाचल की आत्मा है। और यह त्योहार हमें सिखाता है कि प्रकृति के साथ जुड़ना कितना महत्वपूर्ण है। नाच-गाने इतने खास कि इनमें रम जाएंगे आप! वैसे तो सैर महोत्सव के मुख्य आकर्षण लोक नृत्य और संगीत हैं। लेकिन सोलन के अर्की में बैल दौड़ बड़ा रोमांच भरा होता है। जब ऊंचे पहाड़ों के बीच सरपट दौड़ते बैल दिखाई देते हैं तो किसी फिल्म के नजारे से कम् नहीं लगता। इस दौरान दर्शक चिल्लाते हैं, तो उत्साह का माहौल बन जाता है। वास्तव में यह दौड़ किसानों की मेहनत का प्रतीक है। और इस महोत्सव में नाटी नृत्य भी होता है जो दर्शकों का ध्यान खींचता है। बात दूं की यह नृत्य हिमाचल का प्रसिद्ध नृत्य है। लोग हाथ पकड़कर घेरा बनाते हैं और सब मिलकर नाचते हैं। महिलाएं लाल-पीले कपड़ों में सजती हैं। तो वहीं पुरुष ढोल बजाते हुए नाचते हैं। यह नृत्य एकता का संदेश देता है। इसके अलावा कुल्लू और मंडी में देवताओं की पालकी यात्रा निकलती है जो पूरे गांव में खुशी की बहार सी ला देती है। लोग देवताओं को स्वागत करते हैं, यही इस महोत्सव का मुख्य आकर्षण है। पालकी पर रंगीन झंडे लहराते हैं हुए, गीत गाते हुए गलियों गलियों में घुमाया जाता है। जो लोक गीत इस महोत्सव में गाए जाते हैं ये गीत असल में फसल, प्रकृति और जीवन की कहानियां कहते हैं। इन्ही गीतों के बीच कलाकार फ्लूट बजाते हैं, और दर्शक तालियां। हस्तशिल्प मेला और बोटिंग का अनुभव एक और बात हस्तशिल्प मेला भी यहां का आकर्षण ही मानिए। इन मेलों में ऊनी शॉल, मोहरी के जूते और चांदी के आभूषण बिकते हैं इन्हें खरीदकर शैलानी अपनी यादें संजोते हैं। इसी दौरान शिमला के आसपास के झीलों पर बोटिंग भी होती है इसे भी आप देख सकते हैं। इसके अलावा सैर महोत्सव में विशेष पूजा भी की जाती है, और भगवान से आशीर्वाद मांगा जाता है। बहुत से लोग उत्सव के समय मंदिरों में जाकर भी प्रसाद चढ़ाते हैं। कुल मिलाकर यह सब दुर्लभ चीजें महोत्सव को मजेदार बनाते हैं। यह सब देखकर ऐसा लगता है जैसे पहाड़ खुद नाच रहे हों, वादियाँ खुद गुनगुना रही हों। पर्यटक इन नृत्यों और गीतों में शामिल हो सकते हैं और यहां की संस्कृति का एहसास कर सकते हैं। सांस्कृतिक रस्मों और परंपराओं में छिपा है प्रकृति का आदर सैर महोत्सव में सांस्कृतिक रस्में मुख्य भूमिका निभाती हैं। त्योहार की शुरुआत पूजा से होती है और गांव का पुजारी जो होता है वह देवताओं को बुलाता है। तो लोग फूल, चावल और फल चढ़ाकर अपने लिए आशीर्वाद मांगते हैं। मान्यता है कि यही देवता जिनकी तयोऊहसार के समय पूजा की जाती है वही देवता फसल की रक्षा करते हैं। त्यौहार में महिलाएं विशेष पकवान बनाती हैं। सिड्डू जैसे पकवान जो चावल के आटे से बनता है। और इसे भाप में पकाया जाता है। दूसरा जो पकवान है वह बाबरू जिसे चना दाल से भरा जाता है। ये पकवान देवताओं को चढ़ाए जाते हैं, फिर बाद में पूजा होने के बाद खाए जाते हैं। मतलब यह है कि इसी का फिर प्रसाद बांटा जाता है। इन सभी परंपराओं में एक और खास परंपरा है जिसमें में बैल को सजाना भी है। किसान बैलों को साफ करते हैं। उन्हें घंटियां बांधते हैं। और फिर पूजा के समय उनकी भी पूजा की जाती है। यह सारी रस्म फसल के लिए आशीर्वाद मांगने की है। हिमाचल के सैर महोत्सव की यह परंपरा संस्कृति को जीवित रखने का काम करती है।

Category Travel Uttar Pradesh

चंबल का रामपुरा किला है 600 साल पुरानी विरासत! जानिए इतिहास

  • 0 Comments

उत्तरप्रदेश का बुंदेलखंड क्षेत्र हमेशा से राजसी किलों और पुरानी कहानियों का ठिकाना रहा है। वैसे ही रामपुरा फोर्ट जालौन जिले में चंबल की घाटियों के बीच बसा एक ऐसा किला है जो समय की मार झेलते हुए भी अपनी शान बरकरार रखे हुए है। यह किला 600 साल से ज्यादा पुराना है और कछवाहा राजपूतों की 14 पीढ़ियों से जुड़ा हुआ है। 600 साल पुराना इतिहास और कछवाहा वंश से जुड़ाव एक किला जो पहाड़ियों और नदियों के बीच खड़ा हो, जहां हवा में पुरानी लड़ाइयों की गूंज सुनाई देती हो। रामपुरा फोर्ट ऐसा ही है। यह किला मूल रूप से युद्ध के लिए बनाया गया था, ताकि दुश्मनों को रोका जा सके उनके छक्के छुड़ाए जा सकें। बाद में राजपरिवार ने इसे अपना निवास बना लिया। रामपुरा का इतिहास कछवाहा वंश से जुड़ा है। मध्य प्रदेश के नरवाड़ से आए कछवाहा राजपूतों ने यहां मीणों को हराकर बसावट शुरू कर दी थी। किले की नींव 14वीं शताब्दी में रखी गई। एक कथा है कि किले के स्थान पर एक बकरी ने भेड़िए को भगाया था। इसे शक्ति का प्रतीक माना गया और किला यही वनबाए जाने की घोषणा कर दी गई। पुराना किला पहुज नदी के किनारे था, जो अब खंडहर है, लेकिन वहां परिवार का कुलदेवता मंदिर अभी भी बना हुआ है है। समय के साथ किले को मजबूत बनाया गया। दीवारें ऊंची की गईं, तोपों के लिए जगह बनाई गई। होमस्टे में तब्दील हुआ राजसी ठिकाना आज रामपुरा फोर्ट एक होमस्टे के रूप में खुला है। राजा समर सिंह और उनका परिवार पर्यटकों को राजसी जीवन का अनुभव कराते हैं। किले में तीन कमरे हैं, जो सादगी से सजे हैं लेकिन राजसी ठाठ से भरे हैं। यहां रहकर लगता है जैसे पुराने जमाने में जी रहे हों। किले की दीवारें पत्थर और चूने से बनी हैं, जो अभी भी मजबूत और इतिहास के रक्त से सजी हुई हैं। ऊपर से चंबल घाटियों का नजारा कमाल का है आप देखेंगे तो हैरान रह जाएंगे। यहां से सूर्योदय और सूर्यास्त देखना अविस्मरणीय है। यह किला पूरी तरह से बुंदेलखंड की संस्कृति को दर्शाता है, जहां राजपूतों की वीरता और मेहमाननवाजी प्रसिद्ध है। रामपुरा फोर्ट सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि कहानियों का खजाना है। यहां की हवा में राजसी गर्व महसूस होता है। पर्यटक यहां आकर इतिहास को छू सकते हैं, महसूस कर सकते हैं। किले का इतिहास हमें सिखाता है कि समय बदलता है, लेकिन विरासत अमर रहती है। जालौन जिले का यह किला उत्तरप्रदेश के छिपे रत्नों में से एक है। अगर आप इतिहास के शौकीन हैं, तो यह जगह आपके लिए बकमाल है। किले की दीवारें चुपचाप उन पुरानी लड़ाइयों की गवाही देती हैं, जब राजा दुश्मनों से लड़े थे। आज यह शांति का प्रतीक है। रामपुरा फोर्ट की रहस्यमयी दुनिया में खो जाना आसान है। यहां का हर कोना एक कहानी कहता है। यह इतिहास का ऐसा अनौखा चित्र है जो आपको सोचने पर मजबूर कर देगा। किले की मजबूती ने ही संभाली, बुंदेलखंड की संस्कृति रामपुरा फोर्ट की वास्तुकला बुंदेलखंड की राजसी शैली का शानदार उदाहरण है। किला पहुज नदी के किनारे बना है, जो चंबल घाटियों को घेरता है। मुख्य द्वार ऊंचा और मजबूत है, जहां से अंदर का आंगन दिखता है। दीवारें मोटी पत्थरों से बनी हैं, जो तोपों की मार भी झेल सकती थीं। किले में कई कमरे हैं, जो राजपरिवार के लिए बनाए गए थे। ये कमरे सादे लेकिन सुंदर हैं। छतें ऊंची हैं, और खिड़कियां जालीदार हैं। किले का डिजाइन रक्षात्मक है। चारों तरफ बुर्ज हैं, जहां से पहरेदार नजर रखते थे। अंदर एक छोटा सा मंदिर है, जो परिवार के कुलदेवता को समर्पित है। मंदिर की नक्काशी पुरानी है, लेकिन अभी भी चमकती है हुई प्रतीत होती है। राजा समर सिंह ने इसे होमस्टे के रूप में सजाया है। कमरों में पुराने फर्नीचर हैं, जैसे लकड़ी के बिस्तर और दीवान इनका देखना मतलब सैकड़ों साल पीछे का जान लेना। दीवारों पर पुरानी तस्वीरें लगी हैं, जो परिवार के इतिहास को दिखाती हैं। राजसी मेहमाननवाजी और बुंदेलखंड की हवा बुंदेलखंड की शैली में किले सरल लेकिन मजबूत होते हैं। रामपुरा में कोई दिखावटी सजावट नहीं है, बल्कि व्यावहारिक डिजाइन है। किले से घाटियों का नजारा देखना आपको रोमांच से भर देता है। सूर्य की किरणें दीवारों पर पड़ती हैं, तो लगता है जैसे किला कुछ कहना चाहता हो। पर्यटक किले के अंदर घूम सकते हैं और छत पर ऊपर चढ़कर नदी का बहाव देखना काबिले-तारीफ है। किले की संरचना हमें पुराने राजपूतों की सोच बताती है, जो युद्ध और शांति दोनों को महत्व देते थे। आज किला पर्यटकों के लिए खुला है। होमस्टे में रहकर राजसी जीवन महसूस कर सकते हैं। कमरों में ठहरना सस्ता है, लेकिन अनुभव अमूल्य है जिसकी कोई कीमत नहीं है। किले की यह मजबूत संरचना बुंदेलखंड की राजसी शैली को संभाले रखती है। यहां आकर लगता है जैसे समय ठहर सा गया हो। क्योंकि यहां शांति बहुत है। सुंदरता तो यहां की बेमिसाल है इसलिए पर्यटक फोटो लेते हैं और इसकी कहानियां सुनते हैं। किला इतिहास का ऐसा जीवंत प्रमाण है जो हर आने वाले को प्रभावित करता है। चंबल के बीहड़ में चमकते एक कोहिनूर की दास्तां रामपुरा फोर्ट के आकर्षण चंबल घाटियों के बीच बिखरे हैं। मुख्य आकर्षण किले का मुख्य द्वार है, जो ऊंचा और नक्काशीदार है। अंदर आंगन है, जहां उत्सव और त्योहारों पर राजपरिवार इकट्ठा होता था। आंगन के बीच एक छोटा तालाब है, जो पुराने समय में पानी जमा करने के लिए बनाया गया था। अब यह फूलों से सजा है। इसके अलावा आज भी किले में एक पुरानी तोप रखी है, जो युद्ध की याद दिलाती है। किले के बिल्कुल पीछे पहुज नदी बहती है। नदी का किनारा घूमने लायक है इसके पास बैठकर आप अपने महबूब को याद कीजिए या किसी करीबी को। क्योंकि यहां पक्षी चहचहाते हैं और हवा ठंडी लगती है और यह एहसास किसी रोमांच से कम नहीं होता। सूर्यास्त का समय और वो लाल रंग की किरणें.. किले से घाटियों का नजारा देखना कमाल का है देखेंगे को देखते रह जाएंगे। सूर्यास्त के समय लाल रंग की किरणें घाटियों और किले