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Dilli Haat INA, Delhi- History, Timings, How to Reach

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Dilli Haat-दिल्ली हाट: पारम्परिक भारत की खूबसूरत झलक अगर आपका लगाव ट्रेडिशनल चीज़ों से हैं और पारम्परिक खरीदारी और हस्तकलाओं का बेहद शौक रखते हैं और शहरी परिवेश में रहते हैं तो दिल्ली के आईएनए स्थित  दिल्ली हाट जरूर जाइएगा।  दिल्ली के शहरी परिवेश में ग्रामीण और पारम्परिक भारत का अहसाह कराने वाले बाजार यानी दिल्ली हाट (आईएनए) का अपना ही एक अलग स्वैग है। मेट्रो के आसान और सुहाने सफर का लुत्फ़ उठाते हुए उतर जाइए आईएनए मेट्रो स्टेशन पर। मेट्रो से बाहर निकलते ही सामने ही है आपका दिल्ली हाट।(Dilli Haat) किस समय यहाँ आना सबसे बेहतर हाट के परिसर में घुसते ही सामने ही टिकट घर है। आपको ये  टिकट घर कुछ अलग ही दिखाई देगा, जैसे मधुबनी की कोई हस्तनिर्मित झोपड़ी जो कि किसी का भी ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करेगी । यहाँ कोविड महामारी के बाद से पर्यटकों की कमी साफ दिखाई दी । और यहाँ  खरीददारी के लिए आने वालों की कमी का असर टिकट के दामों पर साफ साफ़ दिखाई दिया, जो टिकट 30 रुपये की  हुआ करती थी, इस वक्त वो 10 रुपये की कर दी गयी थी। पिछले एक साल से इस कोरोना महामारी से सबसे ज्यादा प्रभाव पर्यटन और बाजारों पर ही देखने को मिला है। और खबर ये भी मिली कि दिल्ली हाट में खरीददारों के लिए आने वालों के लिए एक समय ये  एंट्री मुफ्त भी कर दी गई थी।(Delhi Haat) वैसे तो साल भर यहाँ पर्यटकों और खरीददारों का आना लगा रहता है लेकिन फिर भी अक्टूबर से मार्च का महीना यहाँ आने के लिए बेस्ट रहता है। लेकिन जब भी आपका मन कुछ एंटीक खरीदने का हो तब आप किसी भी समय यहाँ बेधड़क आ सकते हैं फिर चाहे कोई भी मौसम हो। ख़ूबसूरत पारम्परिक बाजार आप जैसे ही दिल्ली हाट में अंदर प्रवेश करेंगे  तो आपको लगेगा आप एक बारगी तो जैसे किसी गांव के पारम्परिक बाजार में पहुंच गए हो। ईंटो की जालीदार शैली से बने छोटे-छोटे कमरे एक कतार में बड़ी सुंदरता से बनाए गए हैं। वहां सभी दुकानों में सीमेंट के पलस्तर की जगह हाथों से लिपाई-पुताई की गई है, इस तरह हट नुमा घर की बनावट आपको किसी भी सामान्य भारतीय गांव में आसानी से देखने को मिल जाती है। शायद यही ख़ूबसूरती दिल्ली हाट को बाकी सभी बाज़ारों से अलग करता है। इसलिए यहाँ जितने लोग खरीददारी करने आते हैं उतने ही वीकेंड पर मौज मस्ती, खाने-पीने या यूँ कहिये अपना क्वालिटी टाइम बिताने भी आते हैं। ये हाट पूरे भारत की एक छोटी सी पारम्परिक झलक दिखाता है। हस्तकला और क्राफ्ट से संबंधित गांव इस जगह घूम कर आपको ऐसा लगेगा जैसे  देश के अलग-अलग हिस्सों से आये कारीगरों ने यहाँ अपना एक अलग हस्तकला और क्राफ्ट से संबंधित गांव बसा दिया दिया हो। कहीं कोई अपने खिलौने बेच रहा था तो कोई महिलाओं से सम्बंधित वस्तुएं। खास बात ये थी कि ज्यादातर पूरे हाट में महिलाओं से सम्बन्धित प्रोडक्ट ही दिखाई दे रहे थे। हर दूसरी शॉप में कोई न कोई  अपनी कारीगरी और कला का प्रदर्शन कर रहा था।  देश के हर कोने से हुनरमंदों को एक छत्त के नीचे लाने से न केवल इन कलाकारों के हुनर को एक विशेष पहचान मिल रही है बल्कि यह उनके लिए आय का भी एक बेहतरीन जरिया सिद्ध हो रहा है। यहाँ ख़रीददारी के लिए आने वाले  लोगो में इन हस्तनिर्मित चीज़ों को खरीदने की चाहत भी साफ देखी जा सकती थी। देश के छोटे-छोटे हिस्सों से आए इन कलाकारों के लिए ये जगह किसी सपने से कम नही वरना ऐसी कीमती कला कुछ हिस्सों तक सिमट कर रह जाती हैं और एक समय पर अपना अस्तित्व ही खो बैठती हैं। ओपन रंगमंच अगर आप परिवार और दोस्तों के साथ इस जगह पर आने की सोच रहे हों तो यह एक शानदार निर्णय रहेगा।  हाट के परिसर में सामने की ओर एक रंगमंच भी है जो मनोरंजन के उद्देश्य से बनाया गया है। इस ओपन रंगमंच में विभिन्न प्रदेशों के कलाकारों द्वारा  पारम्परिक वाद्ययंत्र और संगीत की ध्वनि आपको थिरकने पर मजबूर कर देगीं। खान-पान के लिए भी प्रसिद्ध हस्तनिर्मित वस्तुओं और संगीत संध्या के अलावा दिल्ली हाट अपने खान-पान के लिए भी प्रसिद्ध है। विभिन्न कलाओं के साथ-साथ यहां के भोजन में भी पूरे भारत की झलक मिलती है। गुजराती ढोकला खाने की इच्छा हो या दक्षिण का उत्तपम यहां हर राज्य के पकवान आपका स्वागत करेंगे। सिक्किम से लेकर कश्मीर तक सब कुछ मिलेगा यहां। समझ लीजिए छोटा-सा भारत दिल्ली हाट के रूप में बसा दिया गया है। इतना तय है कि ये जगह आपको निराश तो बिल्कुल नहीं कर सकती।(Delhi Haat) तो आइये और छोटे भारत के दर्शन पर निकल पड़िए। मधुबनी से लेकर चिकनकारी तक सब कुछ है यहां। कोल्हापुरी हो या गोटापत्ती हर चीज़ आपको यहां देखने को मिलेगी तो इंतज़ार किस बात का शहरों के मॉल देख कर थक गए हो तो आओ कुछ नया अनुभव करने। ग्रामीण अनुभव और सुंदर कलाओं के इस जश्न में। Research – Nikki Rai Written & Edited by Pardeep Kumar You can visit our YouTube channel to explore more destinations- Like & Subscribe

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Lodhi Garden Delhi

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Lodhi Garden: लोधी गार्डन- मकबरों और बागों का स्वर्ग हम दिल्ली वालों के लिए बारिश किसी वरदान से कम नहीं है। खासतौर पर तब जब हद से ज्यादा गर्मी पड़ रही हो। जून हो या जुलाई, दिल्ली की झुलसा देने वाली गर्मी घर से बाहर निकलने नहीं देती। ऐसे में बारिश का सुहावना मौसम बन जाए तो फिर दिल्ली दर्शन की बात ही क्या। समझ लीजिए आनंद के सागर में डुबकी लगा ली। पिछले दो दिनों से लगातार हो रही बारिश अब थम चुकी थी। मौसम को देखते हुए योजना बनी लोधी गार्डन घूमने की।(Lodhi Garden) watch Vlog of Lodhi Garden. Like and subscribe अब आप सोचेंगे इसमें ऐसा क्या खास है तो बता दें ये केवल एक गार्डन नहीं बल्कि मकबरों से सुसज्जित एक परिसर है, जिसे पर्यटन के लिहाज से गार्डन का नाम दे दिया गया है। प्रकृति प्रेमी बंधुओं के लिए यह जगह स्वर्ग से कम नहीं। इसकी खूबसूरती और इतिहास इतना खास है जिसे जानने के बाद आप खुद को इस जगह जाने से रोक नहीं पाएंगे। कैसे पहुंचे लोधी गार्डन लोधी गार्डन मेन लोधी रोड, इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के पास स्थित है। लोधी गार्डन जेएनएल मेट्रो स्टेशन से चंद कदम की दूरी पर ही है। खास बात ये कि लोधी गार्डन की एंट्री बिलकुल फ्री है। बड़ा गुबंद जैसे ही हमनें गार्डन में प्रवेश किया अंदर जाते हुए केवल पेड़ पौधे ही नजर आ रहे थे। कुछ कदम आगे बढ़ते ही एक बेहद आकर्षक इमारत दिखी। ये था बड़ा गुबंद। सबसे जरूरी बात ये पूरा परिसर लोधियों के अंतर्गत हुआ करता था। आज इस परिसर में लोधी वंश से सम्बन्ध रखने वालों की कब्रें हैं जिनपर मकबरे बने हुए हैं। ये मकबरे ही आज यहाँ आने वाले सैलानियों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें लोधी वंशज सुल्तानों के राज्यकाल (1454-1526) में दो प्रकार के मकबरों का निर्माण हुआ एक चौकोर और दूसरा अठपहलू। बड़ा गुबंद चौकोर मकबरे का उदाहरण है। इस मकबरे के बिल्कुल साथ में एक मस्जिद बनी हुई है जिसे बड़ा गुबंद मस्जिद कहा जाता है। कुछ विद्वान मानते हैं बड़ा गुबंद मकबरा इस मस्जिद का प्रवेश द्वार है परंतु ये एक अलग मकबरा ही है। इस मकबरे में दफनाये गए व्यक्ति की पहचान नहीं कि जा सकी है पर माना जाता है ये व्यक्ति सिकन्दर लोधी के राज्य में किसी विशिष्ट पद पर रहा होगा। बगल में ही बड़ा गुबंद नाम की मस्जिद भी है जो मेहराबों जैसे आकार की है। स्तम्भों पर स्थित ये मस्जिद सन 1494 के आस पास की है। इसके अंदर की खूबसूरती देखकर कोई भी दंग रह जायेगा। सफेद चूना पत्थर और लाल बलुआ पत्थरों से बनी ये मस्जिद अद्भुत वास्तुशैली की मिसाल है। एक बार जो इसे देख ले उसका मुंह खुला का खुला रह जाए। अरबी शैली में बनी ये मस्जिद पूरी तरह से कुरान की आयतों और रंगीन बेलबूटों से सजी हुई है। हम तो पूरी तरह इसकी सुंदरता के कायल हो गए। शीश गुबंद मस्जिद के सामने खड़े होने पर सामने ही एक और अनोखा मकबरा नजर आ रहा था। ये था शीश गुबंद। हम सुंदर बाग और फूलों की महक लेते हुए सामने के मकबरे यानी शीश गुबंद पहुँचे। शीश-गुबंद अन्य इमारतों से कुछ अलग लगा। इसके ऊपरी भाग पर नीले रंग की टाइलें इसे अलग ही चमक दे रही थी। इस्लामिक शैली से बना ये मकबरा आज भी खूबसूरती में किसी से कम नहीं। यह मकबरा प्रथम लोधी बादशाह बहलोल लोधी का है। मकबरे की छत पर उकेरी गई कलाकृतियां और डिज़ाइन अद्भुत थे। बारीक कारीगरी देखकर नजरें हटने का नाम नहीं ले रही थीं। अठपुला दूर-दूर तक देखने पर बाग में बस हरियाली ही हरियाली नजर आ रही थी पर वहां लगा परिसर का नक्शा आगे बहुत कुछ होने की सूचना दे रहा था। कुछ दूरी पर एक मानवनिर्मित झील दिखी जिस पर एक पुल बना हुआ है जिसे अठपुला कहा जाता है। सिकंदर लोधी के मकबरे से थोड़ी ही दूर सात मेहरावों वाला एक पुल है जिसे नाले पर बनाया गया है। सूचना बोर्ड की जानकारी कह रही थी यह मेहराबी पुल अकबर के शासन काल में बनवाया गया जो कि नाले के पानी को यमुना नदी तक पहुँचाने का काम करता था। सिकन्दर लोधी का मकबरा लोधी गार्डन की खास बात यही है कि ये पूरा परिसर ही सुंदरता लिए हुए है आप जितना आगे चलते जायेंगे आपको यहाँ उतना ही अच्छा फील होगा। आगे चलते हुए हमें दिखाई दी यहाँ की मुख्य इमारत यानी सिकन्दर लोधी का मकबरा। अठपहलू शैली का ये मकबरा अन्य सब मकबरों से अलग भी था और भव्य भी। सिकन्दर लोधी, लोधी वंश का द्वितीय शासक था। मकबरा ऊंचाई पर बनाया गया है जिसमें मकबरे का एक अलग बाग भी है। यहाँ जितने भी मकबरें दिखाई दिए उन सबकी संरचना एक जैसी ही थी। इसकी खासियत ये है ये मकबरा पूरे परिसर के बीचों-बीच है। ये मकबरा अष्टभुजाकार है जो चारों ओर से देखने पर एक समान दिखता है। लोधी गार्डन ऐसी जगह है जहाँ आप घंटों प्रकृति का आनंद ले सकते हैं। ज़िंदगी की भागम-भाग से दूर किसी अपने के साथ यहाँ क्वालिटी टाइम बिता सकते हैं। सब कुछ है यहाँ पुरानी इमारतें, मकबरें और पानी की झीलें भी। मुहम्मद शाह सय्यिद मकबरा अब वक्त हो चला था घर लौटने का, बस बाहर निकलने के लिए चले ही थे कि अचानक बारिश अपने पूरे शबाब के साथ बरसने लगी, मानो बादलों का सारा गुस्सा आज ही फूट पड़ा हो। निकलते हुए लोधी गार्डन का एक आखिरी मकबरा जो हमसे छूट रहा था सामने नजर आया। बारिश से बचने के लिए हम भागे मकबरे की ओर। ये था मुहम्मद शाह सय्यिद मकबरा। ये गोलाकार मकबरा दूर से किसी महल के बैठकघर जैसा लगता है। अगर मुझसे पूछा जाए तो पूरे परिसर में सबसे अनोखा मकबरा यही लगा। बारिश से बचते कई लोग इस मकबरे की सीढ़ियों पर बारिश का सुखद आनंद लेते दिखे। और मुझे याद आया क़तील शिफ़ाई का एक मशहूर शेर- दूर तक छाए थे बादल और कहीं साया न था इस तरह बरसात का मौसम कभी आया न था बारिश के ऐसे

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Hauz Khas Village – Best Tourist Attraction in Delhi

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Hauz Khas- हौज़ ख़ास विलेज: दिल्ली के युवाओं की मनपसंद जगह Five Colors of Travel दिल्ली के कल्चर को अच्छे से जानने के लिए सबसे परफेक्ट है हौज़ ख़ास। यही वो जगह है जहाँ आप दिल्ली वालों के स्वैग और स्टाइल दोनों को करीब से देख सकते हैं। कैसे जाएं हौज़ ख़ास हौज़ ख़ास मेट्रो स्टेशन से लगभग 3 किलोमीटर दूर बना हौज़ ख़ास विलेज(Hauz Khas Village) अपनी बनावट के लिए बहुत फेमस है, जहाँ जाते वक्त रास्ते में सबसे पहले आपकी नज़र छोटी गुमटी की तरफ जाएगी। अब आप कहेंगे ये क्या है? छोटी गुमटी एक गुमत है जो चारो तरफ से घिरी हरियाली के बीचों-बीच बनी है। यहाँ इतनी शांति है कि इस गुमटी में जाकर आप अलग-अलग किस्म के पक्षियों की आवाज़ें और यहाँ तक की अपनी धड़कनों को महसूस कर पाएंगे। अगर आपको शांत जगह खूब भाती हैं तब यह जगह आपके लिए बिलकुल अनुकूल रहेगी।(Hauz Khas)         hauz khas vollage- cafe hub हौज़ ख़ास मार्किट छोटी गुमटी के बाद थोड़ा आगे चलने पर आएगा डियर पार्क और उसके बाद शुरू हो जाएगी हौज़ ख़ास मार्किट, जहाँ आपको चारों तरफ क्लब, कैफ़े और गानों की ध्वनि सुनाई देगी। आपको बता दें हौज़ ख़ास मार्किट कुछ खरीदने से ज्यादा पेट पूजा और एन्जॉय करने के मकसद से बनाई गयी है। यही कारण है कि वहां हर वक़्त युवाओं का जमावड़ा लगा रहता है। चाहे आपको किसी से मिलना हो, डेटिंग करनी हो या बर्थडे सेलिब्रेट करना हो, उसके लिए हौज़ ख़ास परफेक्ट प्लेस है। हौज़ ख़ास मार्किट में से गुजरते वक्त आपको फुल बेस में बजते हुए गाने और युवा लड़के-लड़कियों की टोलीयां नज़र आएंगी और बस यही इस मार्किट की खासियत है। हौज़ ख़ास -महक का छोटा किला हौज़ ख़ास मार्किट के बाद शुरू हो जाता है हौज़ ख़ास विलेज जो दूर तक फैला हुआ है। हौज़ ख़ास को महक का छोटा किला भी कहा जाता है। विलेज में एंट्री के लिए 25 रुपय की टिकट लगती है। टिकट लेते ही आपके सामने होगा हौज़ ख़ास विलेज, उसकी अद्भुत बनावट और चारों और फैली हरियाली ही हरियाली।     hauz khas fort वैसे आपको बता दें उर्दू के शब्द हौज़ का अर्थ है पानी की टंकी और ख़ास का अर्थ है राजसी अथार्त राजसी पानी की टंकी। माना जाता है कि इस बड़ी-सी टंकी का निर्माण अल्लाउद्दीन खिलज़ी द्वारा सिरी फ़ोर्ट के निवासियों के लिए करवाया गया था। इस्लामी वास्तुकला से बना ये हेरिटेज हौज़ खास में आकर्षण का मुख्य केंद्र बिंदु है।(Hauz Khas) हौज़ ख़ास विलेज, विलेज बनने से पहले फिरोज शाह का मदरसा था। फिरोज शाह दिल्ली सल्तनत में तुगलक वंश के तीसरे शासक थे जिन्होंने 37 साल राज किया। फिरोज शाह ने ही हौज़ ख़ास विलेज में मदरसा बनवाया था और यहीं उनका मकबरा भी बनाया गया है। इस मकबरे के गुंबद का शीर्ष पूरे परिसर में सबसे ऊंचा है। यह खड़े अष्टकोणीय और वर्गाकार छतरियों को मकबरे के रूप में बनाया गया था। इस इमारत की मरम्मत बादशाह सिकंदर लोदी ने करवाई थी। कक्ष के बीचों-बीच बनी कब्र फिरोज शाह की है, जबकि वहीँ आसपास संगमरमर की कुछ अन्य कब्रें भी बनी हैं। हौज़ ख़ास विलेज फिरोज शाह के मकबरे के पश्चिम में दूर तक फैला है। ऊपरी मंजिल में खुले स्तंभों युक्त कमरे हैं और निचली मंजिल में मेहराबी कमरे हैं। निचली मंजिल में छोटी अंधेरी कोठरियां भी हैं जो शायद छात्रों के लिए बनी होंगी। जिसके अंदर रोशनी और हवा के लिए तंग रोखे हैं, और सामान रखने के लिए छोटे आले बने हैं। कहा जाता है कोठरियों के सामने मेहराबी कमरे थे जो अब ढह चुके हैं। इस हिस्से के पश्चिमी छोर में एक बड़ा गुम्बदनुमा दो मंजिला भवन है।(Hauz Khas) hauz khas fort पिकनिक स्पॉट हौज़ ख़ाज़ के परिसर में प्रवेश करते ही इतनी उम्दा वास्तुकला दिखती है जिसे देख कोई भी असमंजस में पड़ जाए कि पहले दाएं जाया जाए या बाएं। बनावट कुछ इस प्रकार की है जो गर्मी में धूप से बचाए और बरसात में बारिश से। पूरे विलेज में कही भी खड़े होने पर चारों तरफ विलेज के साथ बने डिअर पार्क की झील दिखती है जो आँखों को ठंडक देती और मन को तृप्त करती है। पूरे विलेज का एक-एक कोना इतना शानदार है कि वहां न सिर्फ दोस्तों के साथ मजे से घूमा जा सकता है बल्कि यह जगह क्वालिटी टाइम बिताने के लिए भी शानदार है। selfie time with friends विलेज के शांत माहौल व सुरक्षा के लिहाज़ से भी देखें तो यह जगह बेहतरीन विकल्प है। हमें अनेक जोड़ें यहाँ इत्मीनान से बैठे दिखाई दिए। साथ ही आप परिवार और दोस्तों के साथ पिकनिक के लिए भी यहाँ आ सकते हैं। हौज़ ख़ास विलेज अपनी खूबसूरती और बनावट दोनों के कारण यहाँ आने वाले हर ऐज ग्रुप को अपनी ओर आकर्षित करता है। दौड़ती-भागती जिंदगी में दो पल सुकून से बिताने के लिए ये जगह बिल्कुल फिट बैठती है, ऐसे ही थोड़ी इसे महक का छोटा किला कहा जाता है।(Hauz Khas) Research – Geetu Katyal Written & Edited by Pardeep Kumar You can visit our YouTube Channel to explore more beautiful destination- Like & Subscribe

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Sunder Nursery – Delhi’s Heritage Park

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Sunder Nursery: सुंदर नर्सरी- इतिहास और कुदरत का सुंदर मिलन Five colors of Travel भागते-दौड़ते शहरों के लोगों को सबसे ज्यादा कमी अगर किसी चीज की खलती है, तो वो है प्राकृतिक सौंदर्य की। अगर आप किसी ऐसी जगह की तलाश में हैं तो समझ लीजिये आपकी तलाश आज मुक्कमल हुई। क्योंकि आज हम आपको रू-ब-रू करवाएंगे ऐसी ही एक बेहद खास जगह- सुंदर नर्सरी से। जिसके बारे में भले ही आपने कम सुना होगा या पढ़ा होगा लेकिन यहाँ आने के बाद आप महसूस करेंगे की ये शानदार जगह किसी जन्नत से कम नहीं।(Sunder Nursery) दुनिया की 100 बेहतरीन जगहों में दिल्ली की सुंदर नर्सरी हुमायूं टॉम्ब के ठीक सामने स्थित ये नर्सरी एक नर्सरी के साथ-साथ बायोडायवर्सिटी पार्क, एक ऐतिहासिक विरासत और गार्डन भी है। आप यहाँ 40 रुपये की टिकट लेकर प्रवेश कर सकते हैं। नाम से समझ आता है ये सिर्फ एक गार्डन भर है पर अंदर जाने पर मालूम हुआ यहां तो बहुत कुछ है। परिवार के साथ क्वालिटी टाइम बिताने और नेचर के करीब जाने के लिए ये जगह बिल्कुल परफेक्ट है। टाइम्स मैगज़ीन ने 2018 के अपने सर्वे में सुंदर नर्सरी (Sunder Nursery) को 100 सर्वश्रेष्ठ घूमने लायक जगहों में शामिल किया है। इस नर्सरी का हर ज़र्रा-ज़र्रा इसके बदलाव की तस्वीरों की गवाही देता है। दरअसल ये जगह लगभग पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी थी। आर्किलोजिकल डिपार्टमेंट के मार्गदर्शन में इस जगह पर पुनर्निर्माण कार्य शुरू किया गया। नतीजा आज ये नर्सरी देखने के लिहाज़ से बेहद खूबसूरत लगती है। मुग़ल आर्किटेचर और बाग-बगीचों से सजी ये नर्सरी लगभग 90 एकड़ में फैली हुई है। एंट्री गेट पर नक्शा देखकर ये तो समझ आ गया था कि आज पैरों की अच्छी-खासी कसरत होने वाली है। आप भी यहां आएं तब ये माइंड सेट करके आएं की खूब सारा पैदल चलना पड़ेगा तभी इसकी नायाब खूबसूरती के दीदार कर पाएंगे।(Sunder Nursery) अंदर घुसते ही सबसे पहले एक मकबरा नजर आया। छानबीन से मालूम हुआ ये सुंदर बुर्ज़ है। इस मकबरे की अंदरूनी खूबसूरती का बखान करना मुश्किल है। 16वीं सदी की इस मुगलकालीन इमारत के अंदरूनी हिस्सें में सफेद चूना पत्थर से सजावट की गई है। पूरा मकबरा कुरान की आयतों से सजा है। इस बेहतरीन मकबरें के दीदार से सफर की शुरुआत कुछ ज्यादा ही रोमांचित लगने लगी। खास बात ये थी जगह-जगह इस पूरी नर्सरी की बदलती तस्वीरों को दिखाया गया था। जो इस खूबसूरत क्षेत्र की हर कहानी को दिखाने के लिए जरूरी भी है। लक्कड़वाड़ा बुर्ज चलते-चलते झील के सुंदर नज़ारे भी आराम से देखने मिल रहे थे। यकीन मानिये आपका मन ऐसी खूबसूरती देख उत्साहित हुए बिना रह ही नहीं सकता। कुदरत की ये बेहतरीन नक्काशी किसी कागज पर उतारना कई बार किसी लेखक के बस में भी नहीं होती। रास्ते में एक और ऐतिहासिक विरासत दिखी। ये था 16वीं सदी का लक्कड़वाड़ा बुर्ज। इस बुर्ज की खासियत ये है कि इसे 2017 में इसकी बनावटी खूबसूरती को देखते हुए विश्व विरासत घोषित किया गया। सामने की ओर से ये पूरा बुर्ज गुलाब बाग से सुसज्जित है। इस नर्सरी में जगह-जगह पेड़ों की कई प्रजातियां मौजूद है। हर पेड़ पर उसका नाम देख कर आप उसकी प्रजाति का पता आसानी से लगा सकते हैं। साथ ही साथ यहां पक्षियों की लगभग 80 प्रजातियां संरक्षित हैं। घूमते हुए रास्ते भर तरह-तरह के पक्षियों की आवाज़ें सुनाई दे रहीं थी। यहां ये फैसला करना थोड़ा मुश्किल हो जाता है कि अगली जगह कौन-सी देखी जाए। शानदार पिकनिक स्पॉट चलते हुए एक और खास जगह दिखाई दी जिससे मन आनंदित हो गया। बांस के पेड़ों की ओंट में ठीक झील के सामने एक कैफ़े दिखा। सोचिए कुदरत की गोद में बैठ कर लंच का मज़ा ही कुछ और होगा। इसके दूसरी तरफ ठीक सामने फूलों से भरी रंगीन नर्सरी थी। ऐसे में प्रेमी जोड़े और उनके खिलखिलाते चेहरे देख कर नजारा और भी हसीन लगने लगा। जगह-जगह बच्चों के लिए प्लेइंग जोन मिल जाएंगे। न केवल युवाओं के लिए बल्कि परिवार और बच्चों के साथ भी यहां आ के आपका दिन बन सकता है।(Sunder Nursery) सुन्दरवाला महल बाहर निकलते हुए एक और महल पर नजर पड़ी। ये था सुन्दरवाला महल। जगह-जगह गार्डन और मकबरों का ऐसा मेल आपको बोरियत का एहसास तो बिल्कुल नहीं होने देगा। इस महल में कब्रगाह के चारों तरफ आठ कमरे बने हैं। जो इसे चौकोर मकबरे का आकार देता है। इस महल की हालत बहुत ज्यादा खराब हो चुकी थी जिसे पुनर्निर्माण के जरिये ठीक किया गया। इसके ठीक सामने एक भूमिगत रंगमंच भी है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजनों में इसका उपयोग किया जाता है। सफर में आगे बढ़ते हुए तरफ-तरह के पक्षियों और फूलों को देखना लुभाता है। रास्ते में छोटे-छोटे कॉफी पॉइंट नजारों को और भी ज्यादा आकर्षक बना देते हैं। अंतिम पड़ाव में एक और ऐतिहासिक इमारत पर नज़र पड़ी। ये था मिर्जा मुजफ्फर हुसैन का मकबरा। बादशाह अकबर के दामाद का ये मकबरा एक दुर्लभ ढांचा है। इसके अंदर कब्र है जिसे आठ कमरों से घेरा हुआ है। महीन सजावट और आयतों से सजा ये मकबरा देखने के लिहाज से बेहद खास है। इसकी सुंदरता मोहित करती है। (Sunder Nursery) क्यों जाएँ सुन्दर नर्सरी?    Five Reasons to Visit This Place – 1.आप चाहें तो यहाँ घंटों व्यतीत कर सकते हैं क्योंकि इस जगह बोर होने का तो सवाल ही नहीं उठता। 2. जिन प्रकृति प्रेमियों को नई-नई जगह देखने का शौक हो उनके लिए सुन्दर नर्सरी एक उम्दा विकल्प है। 3. वैसे आप यहाँ किसी भी समय आ सकते हैं लेकिन फिर भी जब मौसम थोड़ा ठंडा हो तब यहां आना बेहतर रहता है। 4. यहाँ स्थित झील, सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए ओपन एयर थिएटर, भव्य मकबरें और महल आपको प्रकृति और इतिहास दोनों का अहसास कराएंगे। 5. दिल्ली में क्वालिटी टाइम बिताने के लिए यह बेहद शानदार जगह है।  फ़िलहाल हमारा ये सफर तो यहीं खत्म हुआ पर हम फिर मिलेंगे किसी नए सफर पर। Written & Research – Nikki Rai Edited by Pardeep Kumar some glimpse of Sunder Nursery Garden……

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Safdarjung Tomb – History, Facts & Architecture

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Safdarjung Tomb: दिल्ली के किसी बादशाह के नहीं बल्कि प्रधानमंत्री के नाम पर बना है यह मकबरा Five Colors of Travel आपने दिल्ली की जानी-मानी जगहें तो बहुत घूमी होंगी पर अब वक्त है एक अनजान और नए सफर पर ले चलने का। हम निकले हैं दिल्ली की कुछ नायाब इमारतों की खोज में, जिनका महत्व तो बहुत है पर प्रचार और इतिहास में जगह न मिल पाने के कारण आज ये स्थान पर्यटकों की नजरों में या तो नहीं हैं या बहुत कम हैं। लम्बे रिसर्च और ढेरों जानकारियां निकालने के बाद फैसला किया सफदरजंग का मकबरा देखने का। गूगल मैप पर अपनी अन्य खोजों के दौरान कई बार मकबरे के नाम पर नजर पड़ी पर अनजान और अनसुने नाम के कारण कभी गौर नहीं किया था। इस बात की भी कोई जानकारी नहीं थी कि मकबरा हुमायूं के मकबरे जैसी ही सुंदरता समेटे हुए है भले ही वह बहुत विशाल और विस्तृत न हो। गूगल पर कुछ तस्वीरें देखीं और मन बनाया सफदरजंग का मकबरा देखने का। सफर का मकसद दुनिया को दिल्ली की अनछुई, अनदेखी लेकिन खूबसूरत जगहों से रु-ब-रु कराना है। Safdarjung Tomb निकटतम मेट्रो स्टेशन सफदरजंग मकबरे के लिए सबसे निकटतम मेट्रो स्टेशन येलो लाइन पर स्थित जोर बाग है। इस स्टेशन से मकबरा लगभग चार सौ मीटर की दूरी पर है। मेट्रो स्टेशन से मकबरे तक जाने के लिए आप या तो बैटरी रिक्शा किराये पर ले सकते हैं या फिर मकबरे तक आराम से पैदल यात्रा भी कर सकते हैं। मकबरे के मुख्य द्वार पर पहुँच कर लगा जैसे हम किसी राजस्थानी महल के सामने विराजमान हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि मक़बरा बेहद सुन्दर लग रहा था। बिलकुल ऐसे कि बाहर से देखकर कोई भी अंदर खिंचा चला जाए। रुख किया टिकटघर की तरफ 25 रुपये के मामूली दाम का टिकट कटाया और चल पड़े दूर से दिख रहे खूबसूरत से मकबरे की तरफ। मुख्य द्वार (जो एक समय पर मदरसा हुआ करता था) से निकल ही रहे थे कि आवाज़ आई- रुकिए! एंट्री तो कर दीजिए। आवाज़ चौकीदार साहब की थी। एंट्री रजिस्टर देखा तो आश्चर्य से आँखें बड़ी हो गई। केवल 20 लोगों की एंट्री। परिसर में ऐसे तो दूर-दूर तक कोई नहीं दिखा पर थोड़ा आगे चलते ही कुछ प्रेमी परिंदे दिखने लगे तब कुछ राहत मिली। सुनसान और एकांत सा देखकर एक पल थोड़ी घबराहट लाज़िमी है लेकिन थोड़ा आगे बढ़ने पर कुछ ही पलों में यह घबराहट उत्साह में बदल जाती है।(Safdarjung Tomb) सफदरजंग का मकबरा सामने सफदरजंग का मकबरा था और उसके आगे बड़ा-सा फव्वारा जो मकबरे की सुंदरता में स्वर्ग-सा तेज प्रदान कर रहा था। फव्वारे के जल में मकबरे का अक्स और भी खूबसूरत लग रहा था, भला कोई कैसे इसकी तस्वीर अपने कैमरे में कैद किए बिना रह सकता था। मकबरे की स्थापत्य शैली बहुत सहज पर शोभनीय लगी। चार बाग शैली इसे और भी आकर्षक बनाती है। कुतुब मीनार, लाल किला के अपने सफर में हम आपको चार बाग शैली के बारे में बता ही चुके हैं। मुगल कालीन इमारतों में ये शैली बहुत प्रसिद्ध रही है। परिसर में बीचों-बीच सफदरजंग मकबरा है और मकबरे के तीन तरफ एक जैसे दिखने वाले तीन अलग-अलग महल हैं- जंगली महल, बादशाह पसन्द और मोती महल। तीनों महल उत्तर मुगलकालीन वास्तुशैली में बने हैं। मेहराबयुक्त मण्डप जैसे सफेद महल परिसर की सुंदरता बढ़ाते हैं। अब मकबरे के अंदर पहुंचने की जल्दी थी। एक खास बात ये थी बाहर से देखने पर मकबरा चारों तरफ से एक जैसा ही दिखता था। चारों ओर एक ही शैली में फ़व्वारे बने हैं। एक पल को ये मकबरा हुमायूं के मकबरे जैसा ही दिखता है। मकबरे के अंदर की खूबसूरती का क्या ही बखान करें। इसे देखना भर ही इसका जवाब है। चारों ओर से सूर्य की किरणें छनकर मकबरे को रोशन करती हैं। मकबरे के बीचों-बीच सफदरजंग की मजार सूर्य की किरणों से चमकती नजर आती है। मकबरे की पहली मंजिल से परिसर में बने तीनों महल और परिसर की मस्जिद भी साफ नजर आती है। यहाँ आकर एक बात जो साफ़ नज़र आयी वो ये कि भले ही यह मकबरा ताज या हुमायूँ के मकबरे की तरह भव्य और आलीशान  न हो लेकिन इसकी सादगी और बनावट मन को खूब भाती है, वाकई में ऐसा नजारा देखना जन्नत से कम नहीं। न जाने क्यों दुनिया इतनी हसीन और खूबसूरत जगह से वाकिफ़ नहीं है, ये किसी बदनसीबी से कम नहीं।  एक प्रधानमंत्री के नाम पर बना है यह मकबरा अक्सर नाम को लेकर यह भ्रम हो ही जाता है कि सफरदजंग कोई बादशाह था, क्योंकि देश भर में अधिकतर मकबरें तो राजा या किसी बादशाह के ही बने हुए हैं। लेकिन सफदरजंग मकबरे के बारें में यह सोचना गलत है। दरअसल, वह मुगल बादशाह मुहम्मद शाह का प्रधानमंत्री था। 1753-54 में नवाब शुजाउद्दीला ने अपने पिता मिर्जा मुकीम अबुल मंसूर खान जिनकी उपाधि सफदरजंग थी, की स्मृति में सफदरजंग मकबरे का निर्माण करवाया था। सफदरजंग मुगल बादशाह मुहम्मद शाह के शासन काल में अवध के सूबेदार और प्रधानमंत्री रहे। लाल बलुआ पत्थर से बना भव्य मकबरा वाकई सुंदरता की मिसाल है। मकबरे के गार्ड साहब से बात करने पर इसके अलग-अलग महलों की जानकारी हुई। परिसर की पूरी जानकारी उन्होंने एक गाइड की भांति मुझे दी। ऐसे किसी स्मारक स्थल पर लम्बे समय तक रहते-रहते कोई भी कर्मचारी एक समय के बाद गाइड हो ही जाता है। बातचीत में गार्ड साहब ने ये भी कहा- ‘ये जगह बहुत खूबसूरत है पर लोग कम ही आते हैं। आए दिन लोग इसके ऊपर वीडियो बनाने आते हैं ताकि लोग इस जगह को जान सके। जबसे इसका जीर्णोद्धार हुआ है तबसे पहले से कुछ ज्यादा लोग यहाँ आने भी लगे हैं। बाकी हमारा अनुभव शानदार रहा। और हम वहां से यह सोचकर विदा हुए कि जल्द ही सर्दियों में इस मकबरे का दोबारा दीदार हो। यही सुझाव है कि दिल्ली आए तो एक बार सफदरजंग का मकबरा जरूर घूमें और दिल्ली के ही हैं तो एक बार इस खूबसूरती पर भी अपनी निगाहें अवश्य डालें। क्यों देखें सफदरजंग मकबरा ? Five reasons to visit this place- 1. मेट्रो