Destination Culture South India Travel

Tamil Nadu क्यों कहलाता है The Land of Temples?

  • 0 Comments

भारत में ऐसी कई जगहें हैं, जहां घूमने पर सिर्फ खूबसूरत नजारे ही नहीं मिलते, बल्कि इतिहास भी हर कदम पर दिखाई देता है। Tamil Nadu उन्हीं जगहों में से एक है। दक्षिण भारत का यह राज्य अपनी प्राचीन संस्कृति, शानदार मंदिरों, पत्थरों पर बनी बारीक नक्काशी और सदियों पुरानी परंपराओं के लिए जाना जाता है। यही वजह है कि Tamil Nadu को प्यार से The Land of Temples यानी मंदिरों की भूमि कहा जाता है। यहां मंदिर सिर्फ पूजा-पाठ की जगह नहीं हैं। इनके आसपास बाजार हैं, फूल बेचने वाले हैं, प्रसाद बनाने वाले हैं, छोटे दुकानदार हैं, कलाकार हैं, बुनकर हैं और हजारों परिवारों की रोजी-रोटी जुड़ी हुई है। यानी Tamil Nadu के मंदिरों को समझना सिर्फ धर्म को समझना नहीं है। यह यहां के इतिहास, समाज, कला और स्थानीय जीवन को समझने का भी एक तरीका है। अगर आप Tamil Nadu घूमने का प्लान बना रहे हैं और मंदिरों को सिर्फ दर्शन की नजर से नहीं, बल्कि उनकी कहानी और वास्तुकला को समझते हुए देखना चाहते हैं, तो यह सफर आपके लिए बहुत खास हो सकता है। Tamil Nadu को The Land of Temples क्यों कहा जाता है? Tamil Nadu में मंदिरों की संख्या बहुत बड़ी है। राज्य के अलग-अलग शहरों, गांवों और छोटे कस्बों में प्राचीन तथा आधुनिक मंदिर देखने को मिलते हैं। इनमें कई मंदिर सैकड़ों साल पुराने हैं और कुछ सदियों से यहां की संस्कृति का हिस्सा बने हुए हैं। लेकिन Tamil Nadu की खासियत केवल मंदिरों की संख्या नहीं है। असली बात यह है कि यहां मंदिरों का रिश्ता लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से बहुत गहरा है। किसी मंदिर के आसपास सुबह-सुबह फूलों की दुकानें दिखेंगी, कहीं प्रसाद बनता मिलेगा, तो कहीं कांसे की मूर्तियां और पारंपरिक सामान तैयार होते नजर आएंगे। यही वजह है कि The Land of Temples नाम Tamil Nadu पर बिल्कुल फिट बैठता है। यहां मंदिरों की दीवारें सिर्फ धार्मिक कहानियां नहीं बतातीं, बल्कि पुराने राजाओं, उनकी व्यवस्था, कला और उस दौर के समाज की झलक भी दिखाती हैं। कई मंदिरों में मिले शिलालेख उस समय की व्यवस्था और शासन के बारे में जानकारी देते हैं। इन शिलालेखों में स्थानीय प्रशासन, दान, जमीन, कर व्यवस्था और सामाजिक नियमों से जुड़े विवरण भी मिलते हैं। यानी आज से कई सदियां पहले भी यहां का समाज काफी व्यवस्थित था। Dravidian Architecture की अलग पहचान अगर आपने उत्तर भारत के मंदिर देखे हैं और फिर Tamil Nadu के मंदिरों के सामने खड़े होते हैं, तो आपको दोनों की वास्तुकला में काफी फर्क दिखाई देगा। Tamil Nadu के मंदिरों की सबसे खास पहचान उनकी Dravidian Architecture है। ऊंचे गोपुरम, विशाल मंदिर परिसर, पत्थरों पर बारीक नक्काशी और बड़े मंदिर तालाब इस शैली को अलग बनाते हैं। मंदिर के गर्भगृह के ऊपर बनी पिरामिड जैसी सीढ़ीदार संरचना को विमाना कहा जाता है। इसके अलावा मंदिर के प्रवेश द्वार पर बने विशाल और कई मंजिलों वाले दरवाजे गोपुरम कहलाते हैं। कई बार गोपुरम इतना बड़ा और सजावटी होता है कि पहली नजर में देखने वाले का ध्यान मुख्य मंदिर से ज्यादा उसी पर चला जाता है। देवी-देवताओं की मूर्तियों से सजे ये गोपुरम Tamil Nadu के मंदिरों की पहचान बन चुके हैं। मंदिरों में आपको द्वारपालकों की विशाल मूर्तियां भी देखने को मिलती हैं। इन्हें गर्भगृह के रक्षक माना जाता है। वहीं मंदिर की बाहरी दीवारों पर बने अलग-अलग आलों में देवी-देवताओं की मूर्तियां होती हैं। कई पुराने मंदिरों में पवित्र तालाब या कुंड भी मिलते हैं। ये तालाब धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ पुराने समय में पानी बचाने की व्यवस्था का भी महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। Pallava राजवंश की पत्थर कला Tamil Nadu के मंदिरों की कहानी किसी एक राजवंश से शुरू नहीं होती। अलग-अलग समय में Pallava, Chola, Pandya और Vijayanagara जैसे राजवंशों ने यहां की मंदिर वास्तुकला को आगे बढ़ाया। Pallava राजाओं के समय में विशाल चट्टानों को काटकर मंदिर और मूर्तियां बनाने की कला को बढ़ावा मिला। Kanchipuram और Mahabalipuram आज भी Pallava कला को देखने के लिए सबसे खास जगहों में गिने जाते हैं। Mahabalipuram का Shore Temple और Pancha Rathas इस स्थापत्य कला की शानदार मिसाल हैं। यहां चट्टानों को काटकर बने मंदिर, गुफा मंदिर, विशाल नक्काशी और पत्थर की संरचनाएं दिखाई देती हैं। Mahabalipuram के स्मारक 7वीं और 8वीं शताब्दी में Pallava राजाओं के समय बनाए गए थे। Mahabalipuram की चट्टानों पर बनी गंगा अवतरण या अर्जुन की तपस्या जैसी नक्काशी को देखकर यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि उस समय के कलाकारों ने पत्थरों को तराशने में कितनी मेहनत की होगी। अगर आप इतिहास और कला को करीब से समझना चाहते हैं, तो Mahabalipuram में केवल Shore Temple देखकर वापस न आएं। यहां की चट्टानों पर बनी मूर्तियों और पत्थर के रथों को ध्यान से देखना इस जगह का असली अनुभव देता है। Chola राजवंश की भव्यता अगर Pallava राजाओं ने पत्थरों को तराशने की कला को मजबूत किया, तो Chola राजाओं ने Tamil Nadu की मंदिर वास्तुकला को एक अलग ऊंचाई पर पहुंचा दिया। 9वीं से 13वीं शताब्दी के बीच Chola राजाओं ने कई विशाल मंदिर बनवाए। इनमें राजा Rajaraja Chola प्रथम और Rajendra Chola प्रथम का नाम खास तौर पर लिया जाता है। इनमें सबसे प्रसिद्ध है Thanjavur का Brihadeeswara Temple। इसे Rajaraja Chola प्रथम ने करीब 1010 ईस्वी के आसपास बनवाया था। मंदिर की विशालता और इसकी वास्तुकला आज भी लोगों को हैरान करती है। इस मंदिर का विमाना बहुत ऊंचा है और मंदिर के निर्माण में ग्रेनाइट का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ है। मंदिर के सामने मौजूद विशाल नंदी प्रतिमा भी इसकी भव्यता को और बढ़ा देती है। Tamil Nadu का यह मंदिर सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यहां की प्राचीन इंजीनियरिंग और शिल्पकला का भी शानदार उदाहरण है। Chola विरासत सिर्फ Thanjavur तक सीमित नहीं है। Gangaikonda Cholapuram में भी Brihadeeswara Temple बनाया गया था। इसके बाद Darasuram का Airavatesvara Temple Chola काल की एक और खूबसूरत मिसाल बना। Thanjavur, Gangaikonda Cholapuram और Darasuram के इन तीन मंदिरों को Great Living Chola Temples के रूप में जाना जाता है। ये 11वीं और 12वीं शताब्दी के Chola मंदिरों की वास्तुकला, मूर्तिकला और कला की महत्वपूर्ण पहचान हैं।  Airavatesvara Temple

International South India Travel

तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर: 1000 साल पुराना ऐसा चमत्कार जो आज भी वैज्ञानिकों को हैरान करता है

  • 0 Comments

दक्षिण भारत के तमिलनाडु राज्य के तंजावुर शहर में स्थित बृहदेश्वर मंदिर भारत की प्राचीन वास्तुकला का ऐसा चमत्कार है जिसे देखकर आज भी लोग हैरान रह जाते हैं। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और इसे दक्षिण भारत में “बिग टेम्पल” के नाम से भी जाना जाता है। लगभग एक हजार साल पहले चोल साम्राज्य के महान शासक राजराजा चोल प्रथम ने इसका निर्माण करवाया था। इतिहासकारों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी की शुरुआत में हुआ और यह द्रविड़ वास्तुकला की सबसे भव्य और विकसित कृतियों में से एक माना जाता है। मंदिर की ऊंची संरचना, विशाल पत्थर, नक्काशीदार दीवारें और वैज्ञानिक तरीके से बनाया गया परिसर इस बात का प्रमाण हैं कि उस समय भारतीय शिल्पकार और वास्तुकार कितने उन्नत थे। आज यह मंदिर केवल आस्था का केंद्र ही नहीं बल्कि विश्व धरोहर भी है। यूनेस्को ने इसे “Great Living Chola Temples” के रूप में विश्व धरोहर स्थल का दर्जा दिया है। हजार साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यह मंदिर उसी भव्यता के साथ खड़ा है और दुनिया भर के पर्यटकों और शोधकर्ताओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। नीचे दिए गए 10 चौंकाने वाले तथ्य इस मंदिर की अद्भुत विशेषताओं और रहस्यों को और भी गहराई से समझाते हैं। बृहदेश्वर मंदिर से जुड़े 10 चौंकाने वाले तथ्य 1. केवल छह वर्षों में बना इतना विशाल मंदिर इतिहासकारों के अनुसार इस विशाल मंदिर का निर्माण लगभग 1003 से 1010 ईस्वी के बीच पूरा हुआ था। उस समय आधुनिक मशीनें, क्रेन या भारी उपकरण मौजूद नहीं थे, फिर भी इतनी बड़ी संरचना को कम समय में बनाना अपने-आप में एक असाधारण उपलब्धि थी। माना जाता है कि हजारों कारीगर, शिल्पकार और वास्तुकार इस निर्माण कार्य में लगे थे। उन्होंने पत्थरों को तराशने से लेकर उन्हें एक-दूसरे के ऊपर रखने तक हर काम बेहद सटीकता से किया। यही कारण है कि एक हजार साल बाद भी मंदिर की संरचना में किसी प्रकार की कमजोरी दिखाई नहीं देती। 2. पूरा मंदिर ग्रेनाइट पत्थरों से बनाया गया बृहदेश्वर मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह लगभग पूरी तरह ग्रेनाइट पत्थरों से बना हुआ है। ग्रेनाइट एक बेहद कठोर और भारी पत्थर होता है जिसे तराशना और ढोना आसान नहीं होता। इतिहासकारों का मानना है कि जिस क्षेत्र में यह मंदिर बना है वहां आसपास बड़ी मात्रा में ग्रेनाइट उपलब्ध नहीं था। इसका मतलब है कि इन भारी पत्थरों को दूर-दराज के क्षेत्रों से लाकर यहां तक पहुंचाया गया होगा। यह तथ्य उस समय की अद्भुत योजना और संगठन क्षमता को दर्शाता है। 3. 200 फीट से भी ऊंचा भव्य विमाना मंदिर का मुख्य टावर जिसे विमाना कहा जाता है, लगभग 216 फीट ऊंचा है। यह द्रविड़ शैली की वास्तुकला का शानदार उदाहरण माना जाता है। इस टावर की खासियत यह है कि इसकी संरचना ऊपर की ओर जाते-जाते धीरे-धीरे संकरी होती जाती है, जिससे इसका भार संतुलित रहता है। इतनी ऊंची संरचना को हजार साल पहले इतनी सटीक गणना के साथ बनाना उस समय के वास्तुकारों की अद्भुत प्रतिभा को दर्शाता है। 4. 80 टन का पत्थर मंदिर के शिखर पर मंदिर के सबसे ऊपर जो विशाल पत्थर रखा गया है, उसका वजन लगभग 80 टन बताया जाता है। यह पत्थर पूरे मंदिर के शिखर का आधार है। इतिहासकारों का अनुमान है कि इस पत्थर को ऊपर चढ़ाने के लिए लगभग 4–6 किलोमीटर लंबा मिट्टी का ढलान (रैंप) बनाया गया था। इस ढलान के सहारे हाथियों और मजदूरों की मदद से पत्थर को धीरे-धीरे ऊपर तक ले जाया गया होगा। यह तकनीक उस समय की इंजीनियरिंग समझ का अद्भुत उदाहरण मानी जाती है। 5. बिना सीमेंट के जुड़ी हैं पत्थरों की दीवारें मंदिर की दीवारों और संरचना को जोड़ने के लिए आधुनिक सीमेंट या गारे का उपयोग नहीं किया गया था। इसके बजाय पत्थरों को इस तरह तराशा गया कि वे एक-दूसरे में इंटरलॉक होकर मजबूती से फिट हो जाएं। इस तकनीक के कारण मंदिर की संरचना अत्यंत मजबूत बन गई। यही वजह है कि हजार साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी मंदिर भूकंप और मौसम के प्रभावों को झेलते हुए मजबूती से खड़ा है। 6. एक ही पत्थर से बनी विशाल नंदी प्रतिमा मंदिर परिसर में भगवान शिव के वाहन नंदी की एक विशाल प्रतिमा स्थापित है। यह प्रतिमा लगभग 16 फीट लंबी और 13 फीट ऊंची है और इसे एक ही बड़े पत्थर को तराशकर बनाया गया है। इतनी बड़ी मूर्ति को एक ही पत्थर से तराशना शिल्पकला का अद्भुत उदाहरण है। यह प्रतिमा न केवल धार्मिक महत्व रखती है बल्कि कला और मूर्तिकला की उत्कृष्टता को भी दर्शाती है। 7. मंदिर की दीवारों पर हजार साल पुरानी चित्रकला मंदिर के अंदर कई स्थानों पर चोल काल की भित्ति चित्रकला देखने को मिलती है। इन चित्रों में उस समय के धार्मिक समारोह, नृत्य, संगीत और सामाजिक जीवन को दर्शाया गया है। इन चित्रों की खासियत यह है कि इतने लंबे समय बाद भी इनके रंग और आकृतियां काफी हद तक सुरक्षित हैं। यह उस समय के कलाकारों की उन्नत तकनीक और रंग बनाने की कला को दर्शाता है। 8. दीवारों पर लिखी है हजार साल पुरानी प्रशासनिक जानकारी मंदिर की दीवारों पर तमिल भाषा में कई शिलालेख खुदे हुए हैं। इन शिलालेखों में उस समय की प्रशासनिक व्यवस्था, मंदिर को मिलने वाले दान, कर प्रणाली और सामाजिक जीवन के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है। इतिहासकारों के लिए ये शिलालेख बेहद महत्वपूर्ण स्रोत हैं क्योंकि इनके माध्यम से चोल साम्राज्य के राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास को समझने में मदद मिलती है। 9. कभी चोल साम्राज्य का सांस्कृतिक केंद्र था यह मंदिर प्राचीन समय में यह मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं था बल्कि एक बड़ा सांस्कृतिक केंद्र भी था। यहां नृत्य, संगीत और धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़े कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे। इतिहासकारों के अनुसार मंदिर से जुड़े कई कलाकार, नर्तक और संगीतकार नियमित रूप से यहां प्रदर्शन करते थे। इस तरह यह स्थान चोल साम्राज्य के सांस्कृतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा था। 10. आज भी जीवित परंपरा का प्रतीक सबसे खास बात यह है कि हजार साल से अधिक पुराना होने के बावजूद यह