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Brahma Sarovar: महाभारत के इस सरोवर का इतिहास जानिए

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महाभारत से जुड़ी इस ऐतिहासिक जगह पर सुबह की शांति, शाम की आरती और सदियों पुरानी कहानियों का अलग ही अनुभव मिलता है। अगर आप Delhi की भागदौड़ से थोड़ा दूर निकलकर ऐसी जगह तलाश रहे हैं, जहां शांति भी मिले और इतिहास से जुड़ने का मौका भी, तो कुरुक्षेत्र का Brahma Sarovar आपके लिए अच्छा विकल्प हो सकता है। यहां आपको न बहुत शोर मिलेगा और न ही किसी आम पर्यटन स्थल जैसा माहौल। इसके बजाय चारों तरफ पानी, घाट, मंदिर और सदियों पुरानी कहानियों से जुड़ा वातावरण नजर आता है। कुरुक्षेत्र का Brahma Sarovar सिर्फ एक बड़ा जलाशय नहीं है। इसे भारत की पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत से जोड़कर देखा जाता है। सुबह के समय यहां शांत माहौल में टहलना और शाम को घाट पर होने वाली आरती देखना अपने आप में अलग अनुभव है। खास बात यह है कि Brahma Sarovar का संबंध महाभारत और कई पुरानी धार्मिक मान्यताओं से भी बताया जाता है। यही वजह है कि यहां सिर्फ श्रद्धालु ही नहीं, बल्कि इतिहास और संस्कृति में दिलचस्पी रखने वाले लोग भी पहुंचते हैं। अगर आप कुरुक्षेत्र घूमने का मन बना रहे हैं, तो Brahma Sarovar को अपनी यात्रा में जरूर शामिल कर सकते हैं। आइए जानते हैं इस जगह से जुड़ी खास बातें। Brahma Sarovar का पुराना इतिहास क्या है? Brahma Sarovar से जुड़ी सबसे दिलचस्प बात इसकी पौराणिक कहानी है। मान्यता है कि भगवान ब्रह्मा ने कुरुक्षेत्र की इसी पवित्र धरती पर एक विशाल यज्ञ किया था और यहीं से सृष्टि की रचना की शुरुआत हुई थी। इसी वजह से इस सरोवर का नाम Brahma Sarovar पड़ा। इसे हमारी सभ्यता के पुराने केंद्रों में से एक के रूप में भी देखा जाता है। हालांकि इससे जुड़ी कई बातें धार्मिक मान्यताओं और पुरानी कथाओं पर आधारित हैं, लेकिन यही कहानियां इस जगह को खास बनाती हैं। Brahma Sarovar का संबंध महाभारत से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि महाभारत युद्ध के आखिरी दौर में दुर्योधन ने खुद को इसी सरोवर के पानी में छिपा लिया था। ऐसे में जब कोई व्यक्ति आज इसके किनारे खड़ा होता है, तो उसके मन में अपने आप हजारों साल पुरानी महाभारत की कहानी घूमने लगती है। इस जगह का जिक्र पुराने यात्रियों और लेखकों के विवरणों में भी मिलता है। ग्यारहवीं शताब्दी के प्रसिद्ध यात्री और लेखक अल-बिरूनी ने अपनी किताब ‘किताब-उल-हिंद’ में इस विशाल सरोवर का उल्लेख किया था। मुगल बादशाह अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फजल ने भी कुरुक्षेत्र की यात्रा के दौरान इसकी विशालता का वर्णन किया था। फ्रांस के यात्री फ्रैंकोइस बर्नियर ने भी अपनी यात्रा के दौरान इसका जिक्र किया था। यानी Brahma Sarovar सिर्फ आज का पर्यटन स्थल नहीं है। सदियों से यह जगह यात्रियों, श्रद्धालुओं और इतिहास में दिलचस्पी रखने वाले लोगों का ध्यान खींचती रही है। इतना बड़ा है Brahma Sarovar जब आप पहली बार Brahma Sarovar के सामने पहुंचते हैं, तो इसकी विशालता देखकर अंदाजा लगाना आसान नहीं होता कि यह कितना बड़ा है। यह लगभग 3,600 फीट लंबा, 1,500 फीट चौड़ा और करीब 45 फीट गहरा बताया जाता है। इसकी विशालता की वजह से इसे एशिया के बड़े मानव-निर्मित पवित्र जलाशयों में गिना जाता है। Brahma Sarovar को दो हिस्सों में बांटा गया है। इन्हें पूर्वी और पश्चिमी हिस्से के रूप में देखा जाता है। दोनों हिस्सों के बीच में पुरुषोत्तमपुरा बाग नाम का एक सुंदर बाग बना हुआ है। इस बाग के दोनों तरफ रास्ते हैं, जो सरोवर के दोनों हिस्सों को आपस में जोड़ते हैं। चारों तरफ बने पक्के लाल पत्थरों के घाट इसकी खूबसूरती को और बढ़ाते हैं। यहां पहुंचकर आप घाट की सीढ़ियों पर बैठ सकते हैं और कुछ देर पानी को देखते हुए अपना समय बिता सकते हैं। अगर आप सुबह जल्दी पहुंचते हैं, तो आसपास का माहौल और भी शांत नजर आता है। Brahma Sarovar के चारों तरफ बना परिक्रमा मार्ग करीब 3.4 किलोमीटर लंबा है। सुबह इस रास्ते पर टहलना या परिक्रमा करना काफी सुकून देने वाला अनुभव हो सकता है। यहां स्नान के लिए भी खास इंतजाम हैं Brahma Sarovar एक धार्मिक स्थल भी है, इसलिए यहां श्रद्धालुओं के लिए स्नान की व्यवस्था की गई है। स्नान वाले हिस्से को गहरे पानी से अलग रखने के लिए रेलिंग लगाई गई है, ताकि श्रद्धालुओं को परेशानी न हो। महिलाओं की सुविधा और निजी जगह का ध्यान रखते हुए यहां ढके हुए चेंजिंग रूम और अलग घाट भी बनाए गए हैं। इस वजह से धार्मिक यात्रा के लिए आने वाले लोगों को यहां जरूरी सुविधाएं मिल जाती हैं। हालांकि अगर आप सिर्फ घूमने के लिए आ रहे हैं, तो भी Brahma Sarovar के घाटों पर कुछ समय बैठना और आसपास का माहौल देखना आपकी यात्रा को खास बना सकता है। स्नान करते समय पानी की गहराई, मौसम और स्थानीय निर्देशों का ध्यान रखना जरूरी है। बच्चों को पानी के पास अकेला न छोड़ें। सूर्य ग्रहण के समय बदल जाता है पूरा माहौल Brahma Sarovar पर साल भर श्रद्धालु आते हैं, लेकिन सूर्य ग्रहण के समय यहां का माहौल बिल्कुल अलग हो जाता है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सूर्य ग्रहण के दौरान Brahma Sarovar में स्नान करना बेहद शुभ माना जाता है। पुराणों में भी ग्रहण के समय यहां स्नान के महत्व का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि इस दौरान यहां स्नान करने से बहुत बड़ा धार्मिक पुण्य मिलता है। इसी वजह से सूर्य ग्रहण के समय देश के अलग-अलग हिस्सों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु कुरुक्षेत्र पहुंचते हैं। ऐसे समय में Brahma Sarovar के आसपास मंत्रों की आवाज, पूजा-पाठ और श्रद्धालुओं की भीड़ देखने को मिलती है। घाटों पर जलते दीये और धार्मिक माहौल इसे एक अलग ही रूप दे देते हैं। अगर आपको भीड़ पसंद नहीं है और आप शांति से Brahma Sarovar देखना चाहते हैं, तो ऐसे बड़े धार्मिक अवसरों के बजाय सामान्य दिनों में यहां जाना बेहतर रहेगा। गीता महोत्सव में Brahma Sarovar की रौनक कुरुक्षेत्र में हर साल नवंबर के आखिरी सप्ताह या दिसंबर की शुरुआत में अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव का आयोजन किया जाता है। इस दौरान Brahma Sarovar की रौनक कई गुना बढ़ जाती है। शाम होते ही घाट रोशनी से जगमगा उठते

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Brahma Sarovar Kurukshetra: महाभारत से जुड़ी इस झील की कहानी

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हरियाणा का कुरुक्षेत्र सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास, संस्कृति और आस्था का एक बेहद महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। महाभारत की कथाओं से जुड़ी यह भूमि सदियों से श्रद्धालुओं और यात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करती रही है। इसी पवित्र नगरी के बीचों-बीच स्थित है Brahma Sarovar, जो भारत के सबसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक माना जाता है। जब कोई पहली बार Brahma Sarovar के किनारे पहुँचता है, तो उसकी विशालता और यहाँ का शांत वातावरण तुरंत मन को छू लेता है। दूर तक फैला हुआ जल, पक्के घाट, मंदिरों की घंटियाँ और श्रद्धालुओं की आस्था इस जगह को एक अलग ही पहचान देते हैं। यही कारण है कि हर साल लाखों लोग यहाँ स्नान, पूजा और आध्यात्मिक अनुभव के लिए आते हैं। कई लोगों के लिए यह सिर्फ एक सरोवर नहीं, बल्कि आस्था और इतिहास का जीवंत प्रतीक है। Brahma Sarovar का पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व Brahma Sarovar का नाम भगवान ब्रह्मा से जुड़ा हुआ है, जिन्हें हिंदू धर्म में सृष्टि का रचयिता माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान ब्रह्मा ने इसी स्थान पर अपना पहला यज्ञ किया था और यहीं से सृष्टि की रचना की शुरुआत हुई थी। इसी वजह से यह स्थान हजारों वर्षों से श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है। महाभारत और कई अन्य प्राचीन ग्रंथों में भी इस सरोवर का उल्लेख मिलता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार राजा कुरु ने इस क्षेत्र को विकसित कराया था और उन्हीं के नाम पर इस भूमि का नाम कुरुक्षेत्र पड़ा। कहा जाता है कि महाभारत युद्ध के अंतिम चरण में दुर्योधन ने स्वयं को इसी सरोवर के जल में छिपा लिया था, जिससे यह स्थान महाभारत की घटनाओं से भी गहराई से जुड़ जाता है। इतिहासकारों के अनुसार 11वीं शताब्दी के प्रसिद्ध विद्वान अल-बरूनी ने भी अपने ग्रंथों में इस सरोवर का उल्लेख किया है। वहीं मुगल सम्राट अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फजल इसकी विशालता से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इसे “लघु सागर” यानी छोटा समुद्र कहा था। यह तथ्य बताता है कि Brahma Sarovar केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण रहा है। Brahma Sarovar की भव्य बनावट और संरचना Brahma Sarovar को एशिया के सबसे बड़े मानव निर्मित स्नान कुंडों में गिना जाता है। इसकी लंबाई लगभग 3,600 फीट, चौड़ाई करीब 1,500 फीट और गहराई लगभग 45 फीट बताई जाती है। पूरे सरोवर का घेरा करीब 3.5 किलोमीटर है, इसलिए इसकी परिक्रमा करते हुए आपको इसकी वास्तविक विशालता का अंदाजा होता है। सरोवर के बीचों-बीच एक सुंदर टापू बना हुआ है, जहाँ तक पहुँचने के लिए पुल का निर्माण किया गया है। इस टापू पर स्थित विजय स्तंभ महाभारत की विजय की याद दिलाता है। चारों ओर बने चौड़े घाट श्रद्धालुओं को स्नान और पूजा के लिए पर्याप्त जगह देते हैं। शाम के समय जब घाटों पर लगी रोशनियाँ जलती हैं और उनका प्रतिबिंब पानी में दिखाई देता है, तो पूरा वातावरण बेहद मनमोहक हो जाता है। यही समय फोटोग्राफी और शांत वातावरण का आनंद लेने के लिए सबसे अच्छा माना जाता है। आध्यात्मिक शक्ति और सूर्य ग्रहण मेले का महत्व Brahma Sarovar का धार्मिक महत्व सामान्य दिनों से कहीं अधिक सूर्य ग्रहण के दौरान बढ़ जाता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार सूर्य ग्रहण के समय यहाँ स्नान करने से हजारों अश्वमेध यज्ञों के बराबर पुण्य प्राप्त होता है। इसी कारण ग्रहण के अवसर पर यहाँ विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसमें देशभर से लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं। कई लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए यहाँ तर्पण और पूजा करते हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस पवित्र जल में स्नान करने से मन और आत्मा दोनों शुद्ध होते हैं तथा भगवान का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। यहाँ का शांत वातावरण, मंदिरों से आती मंत्रोच्चार की ध्वनि और श्रद्धालुओं की आस्था मिलकर ऐसा माहौल बनाते हैं, जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना मुश्किल है। Brahma Sarovar की भव्य महा-आरती और दीप दान अगर आप Brahma Sarovar घूमने जाएँ तो यहाँ की शाम की महा-आरती जरूर देखें। यह आरती इस जगह के सबसे बड़े आकर्षणों में से एक मानी जाती है। सूर्यास्त के समय जब घाटों पर श्रद्धालु एकत्र होते हैं और वैदिक मंत्रों के बीच आरती शुरू होती है, तो पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है आरती आमतौर पर शाम 6 बजे से 7:30 बजे के बीच आयोजित की जाती है। पश्चिमी तट पर स्थित पुरुषोत्तम पुरा बाग इसका मुख्य केंद्र होता है। शंखनाद, घंटियों की ध्वनि और दीपों की रोशनी पूरे वातावरण को दिव्यता से भर देती है। आरती के बाद होने वाला दीप दान सबसे आकर्षक दृश्य माना जाता है। श्रद्धालु छोटे-छोटे दीयों को जलाकर सरोवर के जल में प्रवाहित करते हैं। जब हजारों दीपक एक साथ पानी पर तैरते हैं, तो ऐसा लगता है मानो पूरा सरोवर तारों से भर गया हो। यह दृश्य देखने के लिए कई लोग खास तौर पर शाम के समय यहाँ पहुँचते हैं। Brahma Sarovar के मुख्य आकर्षण (What to See) Brahma Sarovar के आसपास कई ऐसी जगहें हैं जिन्हें देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं। सरोवर के बीच बने टापू पर स्थित सर्वेश्वर महादेव मंदिर श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है। मान्यता है कि यह स्थान भगवान शिव की विशेष कृपा से जुड़ा हुआ है। परिसर में स्थापित भगवान कृष्ण और अर्जुन का विशाल कांस्य रथ भी पर्यटकों को खूब आकर्षित करता है। यह वही ऐतिहासिक क्षण दर्शाता है जब भगवान कृष्ण ने अर्जुन को भगवद्गीता का उपदेश दिया था। इसकी भव्यता देखकर लोग अक्सर तस्वीरें खिंचवाते हैं। इसके अलावा यहाँ स्थित द्रौपदी कूप और महाभारत की घटनाओं को दर्शाने वाले 140 से अधिक भित्ति चित्र भी देखने लायक हैं। ये चित्र महाभारत की कहानी को बेहद खूबसूरती से प्रस्तुत करते हैं और इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए खास आकर्षण का केंद्र हैं। अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव: कुरुक्षेत्र का सबसे बड़ा उत्सव हर साल नवंबर और दिसंबर के आसपास आयोजित होने वाला अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव कुरुक्षेत्र की पहचान बन चुका है। इस दौरान पूरा शहर और विशेष रूप से Brahma Sarovar रोशनी से जगमगा उठता है। महोत्सव के दौरान गीता पाठ, सांस्कृतिक कार्यक्रम,

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गीता जयंती 1 दिसंबर 2025 को मनाई जाएगी! कुरुक्षेत्र में नजर आएंगी महाभारत की झलकियां!

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गीता जयंती उत्सव गीता जयंती हर साल मार्गशीर्ष मा​ह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। यह सिर्फ एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक धरोहर की सबसे गहरी परंपरा है। यह वही दिन माना जाता है जब श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्धभूमि कुरुक्षेत्र में अर्जुन को जीवन का सबसे बड़ा उपदेश श्रीमद्भगवद्गीता सुनाया था। कहते हैं कि जब अर्जुन मोह, शंका, डर और उलझन में डूब गया था, तब भगवान कृष्ण ने उसे कर्म और धर्म की ऐसी सीख दी, जो न सिर्फ उस समय में बल्कि आज भी हर इंसान के लिए उतनी ही जरूरी है। यही वजह है कि कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र कहा जाता है। इसकी मिट्टी से लेकर हवाओं तक में वो कंपन महसूस होते हैं जिन्हें लोग दिव्य ऊर्जा कहते हैं। इतिहासकार बताते हैं कि इस धरती पर करीब 5000 साल पहले वह संवाद हुआ था जिसने आध्यात्मिक चिंतन का रास्ता बदल दिया। गीता जयंती क्यों मनाई जाती है? गीता जयंती इसलिए मनाई जाती है क्योंकि यह वह दिन है जब हमारी संस्कृति को सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ का उपदेश मिला। यह उत्सव हमें याद दिलाता है कि जीवन सिर्फ भौतिक चीजों का खेल नहीं है, बल्कि कर्म, जिम्मेदारी, प्रेम, नैतिकता और संतुलन की यात्रा है। इसकी सबसे अनोखी बात यह है कि यह उत्सव किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है इसके संदेश सार्वभौमिक हैं। आप दुनिया के किसी कोने से हों, किसी भी पंथ को मानते हों, गीता आपको अपने मन की उलझनें सुलझाने का रास्ता दिखाती है। इसी वजह से गीता जयंती अब एक वैश्विक आयोजन बन चुका है। कुरुक्षेत्र में लोग मानते हैं कि 1 दिसंबर का सूरज जैसे ही उगता है, उसके साथ धरती पर कुछ पवित्र सा उतर आता है कुछ ऐसा जो मन को शांत और दिल को हल्का कर देता है।(इतिहासकार बताते हैं कि इस धरती पर करीब 5000 साल पहले वह संवाद हुआ था ) कैसे मनाया जाता है यह पावन उत्सव? गीता जयंती के दिन कुरुक्षेत्र पूरी तरह त्यौहार के रंग में रंग जाता है। ब्रह्मसरोवर और ज्योतिसरोवर के किनारे सुबह-सुबह मंत्रोच्चार की गूंज होते हुए सुनाई देती है। साधु-संत, विद्वान, विद्यार्थी, पर्यटक—हर कोई इस दिव्य माहौल का हिस्सा बन जाता है। यहां गीता पाठ, दीपदान, शोभा यात्रा, धर्म सभा, कलात्मक झांकियां, और महाभारत पर आधारित नाटक आयोजित होते हैं। हज़ारों लोग सामूहिक रूप से गीता का पाठ करते हैं, जो एक अनोखा दृश्य होता है। रात को दीपदान का दृश्य तो जैसे स्वर्ग जैसा लगता है हजारों दीपक पानी पर तैरते हुए अद्भुत झिलमिलाहट पैदा करते हैं। दुकानों में पवित्र प्रतीक, शंख, गीता ग्रंथ, और हस्तशिल्प बिकते हैं। यह पूरा माहौल न सिर्फ धार्मिक होता है, बल्कि कला, संस्कृति और लोक रंगों से भी भरपूर होता है। कला और कुरुक्षेत्र का आकर्षक सेटअप कुरुक्षेत्र में गीता जयंती के दौरान तैयार की जाने वाली कलात्मक सजावट इसके मुख्य आकर्षण में से एक है। शहर भर में महाभारत थीम पर शिल्प कृतियां और इंस्टॉलेशन्स लगाए जाते हैं। आर्टिस्ट बड़े-बड़े लकड़ी और फाइबर के मॉडल बनाते हैं जिनमें अर्जुन का रथ, श्रीकृष्ण का सारथ्य, चक्र, शंख और युद्धभूमि के दृश्य शामिल होते हैं। कई जगहों पर रेत से बनी कलाकृतियां पर्यटकों का मन मोह लेती हैं। ब्रह्मसरोवर को रंग-बिरंगी रोशनी से सजाया जाता है, जिससे लगता है कि पूरा तालाब किसी महाकथा का जीवित हिस्सा बन गया हो। इस दौरान यहां का स्ट्रीट फूड, स्थानीय हरियाणवी कढ़ाई, जूट वर्क, लकड़ी की कला और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की झलक भी देखने को मिलती है। एक तरह से यह पूरा उत्सव कला, अध्यात्मऔर इतिहास को एक साथ दिखाने वाला जीवंत मंच बन जाता है। गीता से जुड़ी पौराणिक कहानी हर यात्री इस उत्सव में आकर सबसे पहले उस कहानी को महसूस करता है जिसे हम बचपन से सुनते आ रहे हैं अर्जुन का द्वंद्व। जब दोनों सेनाएं आमने-सामने थीं, तब अर्जुन करुणा में भर गया। उसे अपने ही रिश्तेदारों, गुरुओं और मित्रों के खिलाफ लड़ने का दुख हुआ। तभी श्रीकृष्ण ने उसे जीवन का वह महान संदेश दिया जिसमें कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग जैसे सिद्धांत समाए हुए हैं। कहते हैं कि कुरुक्षेत्र की भूमि पर वह संदेश सिर्फ अर्जुन को नहीं, पूरी मानवता को दिया गया था। यही वजह है कि युग बदल गए, लेकिन गीता के शब्द आज भी लोगों की जिंदगी संभालते हैं। कोई निराश हो, परेशान हो, डरा हो या रास्ता खो गया हो गीता उसे फिर से खड़ा कर देती है। इसी संदेश के आदर में लोग हर साल यहां आकर भगवान कृष्ण की इस दिव्य वाणी को श्रद्धांजलि देते हैं। कुरुक्षेत्र कैसे पहुंचें? यात्रियों के लिए आसान गाइड अगर आप 1 दिसंबर को गीता जयंती के समय कुरुक्षेत्र पहुंचना चाहते हैं तो यह सफर बेहद आसान है। दिल्ली से कुरुक्षेत्र लगभग 160 किलोमीटर दूर है और सड़क से 3 से 3.5 घंटे में पहुंचा जा सकता है। हरियाणा रोडवेज की बसें, वोल्वो और टैक्सी की सुविधा आसानी से मिल जाती है। रेलमार्ग की बात करें तो कुरुक्षेत्र जंक्शन उत्तर भारत के प्रमुख रूट से जुड़ा है दिल्ली, लखनऊ, जयपुर, चंडीगढ़, अमृतसर सभी जगहों से ट्रेनें आती हैं। निकटतम हवाई अड्डा चंडीगढ़ एयरपोर्ट है, जो लगभग 95–100 किमी दूर है। शहर में ऑटो, ई-रिक्शा और लोकल टैक्सी आसानी से मिल जाती हैं। ब्रह्मसरोवर, ज्योतिसरोवर, कृष्ण संग्रहालय, हैंडीक्राफ्ट बाजार और महाभारत से जुड़े कई स्थल बहुत नजदीक हैं, इसलिए घूमने में ज्यादा दिक्कत नहीं होती। फाइव कलर्स ऑफ ट्रैवल की तरफ से पांच यात्रा सुझाव 1. सुबह-सुबह ब्रह्मसरोवर पहुंचे: सूर्य की पहली किरण के साथ मंत्रोच्चार का अनुभव जीवनभर याद रहेगा। 2. लोकल कला: लकड़ी की कलाकृतियां, जूट वर्क और गीता थीम वाले शोपीस बहुत खास होते हैं। 3. स्ट्रीट फूड ट्राई करें: हरियाणवी कढ़ी-चावल, मिस्सी रोटी, देसी घी वाली मिठाइयां ट्रैवल का मज़ा दोगुना कर देती हैं। 4. आरामदायक कपड़े और पावर बैंक साथ रखें: भीड़ काफी होती है और फोटोग्राफी के मौके भी। 5. रात का दीपदान मिस न करें: यह इस उत्सव की सबसे खूबसूरत चीज़ है यहां तक कि कैमरा भी उस दृश्य का न्याय नहीं कर पाता। आपको इसे अपनी आँखों से देखना चाहिए। भक्त क्या करें? गीता जयंती जैसे पावन अवसर पर भक्तों के लिए सबसे पहली