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हथवा मार्केट, पटना: परंपराओं, रौनक और पुराने अंदाज़ का जीता जागता ठिकाना!

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हथवा मार्केट पुराने पटना की खुशबू लिए हुए पटना की बात हो और हथवा मार्केट का नाम न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता। यह बाज़ार सिर्फ खरीदारी की जगह नहीं, बल्कि शहर के सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक सफर का एक चमकता हुआ आईना है। कहते हैं कि अंग्रेज़ों के दौर में भी यह इलाका व्यापार का बड़ा केंद्र था। धीरे-धीरे यहां कपड़ों, गहनों, घरेलू सामान और मिठाइयों की दुकानें खुलीं और देखते ही देखते यह पटना का सबसे महत्त्वपूर्ण रिटेल हब बन गया। खास बात यह थी कि यहां सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि लोगों के मिलने-जुलने की परंपरा भी मजबूत होती गई। पुराने लोग बताते हैं कि जो पटना की पहचान बन जाए, वही असली जगह और हथवा मार्केट आज भी उसी पहचान को निभा रहा है भीड़, रंग, रौनक और पुरानी पटना बाइव के साथ। हथवा मार्केट किस लिए प्रसिद्ध है? पटना का हथवा मार्केट अपनी बहुआयामी खरीदारी, रौनक और पुराने शहर की खास तहजीब के लिए मशहूर है। यह बाजार खास तौर पर कपड़ों, ज्वेलरी, मेकअप, चूड़ी-बिंदी, घरेलू सामान, इलेक्ट्रॉनिक आइटम और शादी–विवाह की शॉपिंग के लिए जाना जाता है। यहां लेटेस्ट फैशन से लेकर पारंपरिक पहनावे तक हर तरह का सामान मिल जाता है, उसी वजह से युवाओं से लेकर परिवारों तक सबकी पहली पसंद बन चुका है। हथवा मार्केट अपनी मिठाइयों और स्ट्रीट फूड के लिए भी खासा लोकप्रिय है, खासकर रसगुल्ला, मलाई पान और लिट्टी-चोखा जैसे फेमस स्वादों के लिए। त्यौहारों के दौरान यह बाजार इतनी रोशनी और सजावट से चमक उठता है कि यह पटना की पहचान बन जाता है। पुराने पटना की खुशबू, आधुनिक दुकानों की रौनक और जेब-फ्रेंडली कीमतें इन सबके कारण हथवा मार्केट पटना का सबसे पसंदीदा और जीवंत खरीदारी केंद्र माना जाता है। क्या है खास हथवा मार्केट में? हथवा मार्केट की असली खूबसूरती इसकी बहुआयामी पहचान है। यहां आप शाही शादी के कपड़ों से लेकर रोजमर्रा के घरेलू सामान तक सब कुछ पा सकते हैं। लड़कियों के लिए चूड़ी, बिंदी, कॉस्मेटिक और लेटेस्ट फैशन की भरमार है, तो परिवारों के लिए बड़े-बड़े स्टोर्स जहां किराना, गिफ्ट आइटम, ज्वेलरी वगैरह सब एक छत के नीचे मिल जाते हैं। यहां की मिठाई की दुकानों खासकर रसगुल्ला और चेनापोड़ा जैसी चीज़ों का स्वाद दूर-दूर तक मशहूर है। शनिवार और रविवार को तो यहां पांव रखने की भी जगह नहीं मिलती, क्योंकि पूरा पटना यहां घूमने निकल पड़ता है। दुकानों और गलियों की यह रौनक इस बाज़ार को सिर्फ शॉपिंग प्लेस नहीं, बल्कि पटना का एक सामाजिक हॉटस्पॉट बना देती है।(भीड़, रंग, रौनक और पुरानी पटना बाइव के साथ।) बाज़ार की संकरी गलियों में छुपी कहानी अगर हथवा मार्केट की बनावट पर नज़र डालें, तो इसमें पुराने हिंदुस्तानी बाज़ारों की वही खास झलक मिलती है संकरी गलियां, बारीक रास्ते, दाएं-बाएं दुकानें और ऊपर से बहुमंजिला इमारतें। कई दुकानें 50–70 साल पुरानी हैं, जिनके बोर्ड आज भी रेट्रो फॉन्ट में नजर आते हैं। यह पूरा इलाका बड़े व्यवस्थित तरीके से फैला है, ताकि भीड़ होने पर भी खरीदारी में दिक्कत न हो। यहां के चौराहों पर लगी रंगीन लाइटें, त्यौहारों के वक्त सजने वाले दरवाज़े और दुकानों के ऊपर टंगे पुराने लकड़ी के तख्ते हथवा मार्केट की कला और विरासत को जिंदा रखते हैं। यह मार्केट एक तरह से उस दौर का जीता-जागता पोस्टर है, जब पटना में हर चीज़ हाथ से बनी होती थी चाहे साइन बोर्ड हों या दुकानों की सजावट। भावनाओं से बुनी हुई रौनक हथवा मार्केट के विकास को लेकर कई दिलचस्प किस्से मशहूर हैं। बताया जाता है कि पहले यहां सिर्फ कुछ छोटी दुकानें थीं, जहां गांवों से आने वाले लोग जरूरत का सामान खरीदते थे। लेकिन समय के साथ यह ऐसा केंद्र बन गया जहां से पूरे बिहार में सामान सप्लाई होने लगा। दुकानदारों के बीच एकता का भी बड़ा किस्सा सुनने को मिलता है। एक वक्त ऐसा भी आया जब आग लगने से कई दुकानें जलकर खाक हो गईं, लेकिन पास की दुकानों के लोग आगे आए और सबकी मदद की। पटना की यही कमाल की हम फिर से खड़े हो जाएंगे वाली भावना इस बाजार को आज भी ज़िंदा रखती है। कई दुकानों का कारोबार अब दूसरी-तीसरी पीढ़ी संभाल रही है और हर दीवाली पर वे वही पुराने तरीके से बाजार को सजाते हैं ठीक वैसे ही जैसे उनके दादा करते थे। कैसे पहुंचें बिल्कुल आसान, हर तरफ से कनेक्टेड हथवा मार्केट पहुंचने में कोई झंझट नहीं है। यह फ्रेजर रोड और अशोक राजपथ के बीच के एरिया में आता है और पटना जंक्शन से बस 10–12 मिनट की दूरी पर है। अगर आप ऑटो से आ रहे हैं तो हथवा मार्केट सीधे बोल दीजिए ड्राइवर खुद ही छोड़ देगा। शहर के किसी भी हिस्से से ई-रिक्शा, बस और कैब आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं। सबसे अच्छा समय सुबह 11 बजे से दोपहर 2 बजे और फिर शाम 5 बजे के बाद होता है, जब दुकानें पूरी तरह फैशन और रौनक में चमक उठती हैं। त्यौहारों के समय यह मार्केट पटना का सबसे ज्यादा ट्रैफिक वाला इलाका बन जाता है, इसलिए पार्किंग थोड़ी दूर रखनी पड़ सकती है, पर मज़ा वही है पैदल चलकर बाजार की चमक को महसूस करना। फाइव कलर्स ऑफ ट्रैवल की तरफ से 5 यात्रा सुझाव पटना की धड़कन, एक ज़िंदा पहचान है हथवा मार्केट हथवा मार्केट सिर्फ खरीदारी की जगह नहीं, बल्कि पटना की धड़कन है एक ऐसा इलाका जो इतिहास, आधुनिकता, भावनाओं और रौनक को एक साथ जोड़ देता है। यहां चलते हुए हर मोड़ पर कोई न कोई कहानी मिल जाती है किसी पुरानी दुकान की, किसी परिवार की, किसी त्यौहार की, किसी दोस्ती की। सुबह की हल्की रोशनी से लेकर शाम की चमकती लाइटों तक, यह मार्केट हर पल एक नई तस्वीर पेश करता है। अगर आप पटना घूमने आए हैं और हथवा मार्केट नहीं गए तो मान लीजिए कि आपने शहर की असल खुशबू मिस कर दी। यह बाजार वही जगह है जहां पटना की असली आत्मा बसती है रौनक, रंग, रिश्ते और यादों के साथ। हथवा मार्केट किस लिए ख्याति प्राप्त है? हथवा मार्केट पटना में अपनी विविध खरीदारी, पुरानी रौनक और जेब-फ्रेंडली दामों के लिए ख्याति प्राप्त है। यह बाजार खास तौर

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पटना शहर की अनकही दास्तान, पाटलिपुत्र से पटना तक की सम्पूर्ण यात्रा! जो उधेड़ती है इतिहास की कई परतें!

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भारत की धरती पर बसे कई शहरों में से एक ऐसा शहर भी है, जो इतिहास, संस्कृति और आधुनिकता का अद्भुत नजारा पेश करता है। यह शहर है पटना बिहार की राजधानी और गंगा के दक्षिणी तट पर बसा एक प्राचीन नगर। पटना सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि यह भारत के इतिहास का वह अध्याय है जो समय के कई कालखंडों की कहानियां सुनाता है। कभी पाटलिपुत्र के नाम से प्रसिद्ध यह नगर आज आधुनिक भारत की पहचान बन चुका है। यहां अतीत की गूंज भी है और भविष्य की धड़कन भी। पटना का जिक्र आते ही गंगा की लहरें, बुद्ध की शांति, अशोक का शासन और आधुनिक सड़कों की रौनक मन में एक साथ उतर आते हैं। कहा भी गया है जहां इतिहास सांस लेता है, वहां भविष्य जन्म लेता है।और वास्तव में यह माना जा सकता है की यह बात पटना के लिए ही कही गई है। पाटलिपुत्र से पटना तक का सफर, क्या खूब राज छिपे हैं इसमें पटना का इतिहास 2500 वर्षों से भी अधिक पुराना है। यह वही पवित्र भूमि है जहां  मौर्य वंश ने भारत की एकता की नींव रखी थी। सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य और अशोक महान ने यहीं से अपने शासन का विस्तार किया था। उस समय यह शहर पाटलिपुत्र के नाम से जाना जाता था, जो शिक्षा, कला, व्यापार और राजनीति का केंद्र था। चीनी यात्री फाह्यान और ह्वेनसांग ने भी अपनी यात्राओं में इस नगर की समृद्धि का वर्णन किया था। पाटलिपुत्र की मिट्टी में इतिहास की खुशबू अब भी घुली हुई महसूस की जा सकती है। हर पुरानी दीवार, हर मंदिर और हर घाट उस गौरवशाली अतीत की कहानी कहता है। आज से चार सौ साल पहले अंग्रेज़ों के शासनकाल में यह शहर प्रशासनिक केंद्र बना और धीरे-धीरे इसका नाम पटना पड़ गया। आज पटना उस विरासत का आधुनिक रूप है, जो भारत की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक की गवाही देता है। प्रकृति और संस्कृति के अद्भुत मेल के रूप में पटना   पटना की सबसे बड़ी पहचान है गंगा नदी। यह सिर्फ एक जलधारा नहीं, बल्कि शहर की आत्मा है। गंगा के बिना पटना की कल्पना अधूरी कही जा सकती है। सुबह की आरती, दीपों से जगमगाते घाट, और गंगा स्नान के दृश्य मन को शांति से भर देते हैं। गंगा पटना को जीवन देती है खेती के लिए पानी, व्यापार के लिए मार्ग और लोगों के लिए श्रद्धा। यहां के घाटों पर जब सूरज उगता है, तो गंगा के जल पर उसकी सुनहरी किरणें झिलमिलाती हैं। ऐसा लगता है जैसे पूरा शहर रोशनी की चादर ओढ़े खड़ा हो। यहां की हवा में इतिहास की सोंधी महक है और संस्कृति की मिठास। कहा भी जाता है गंगा जहां बहती है, वहां जीवन खिल उठता है। पटना के गंगा तट पर न सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह पर्यटन का आकर्षण भी बन चुका है। हजारों की संख्या में पर्यटक यहां गंगा आरती, नौका विहार और घाटों के दृश्य देखने आते हैं।(पटना का इतिहास 2500 वर्षों से भी अधिक पुराना है।) पर्यटकों के लिए खजाने के पिटारे जैसा है पटना पटना का पर्यटन बिहार की पहचान का प्रतीक बन चुका है। “Patna tourism” आज गूगल पर सबसे अधिक खोजे जाने वाले कीवर्ड्स में से एक है। इसका कारण है यहां की ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता। गोलघर, पटन देवी मंदिर, गांधी मैदान, बिहार म्यूजियम, संजय गांधी बायोलॉजिकल पार्क, कुम्हरार पार्क और गंगा घाट ये सभी स्थान शहर को खास बनाते हैं। गोलघर का इतिहास अंग्रेज़ों के दौर से जुड़ा है। इसका विशाल गुंबद आज भी शहर की पहचान है। बिहार म्यूजियम में प्राचीन मूर्तियां, सिक्के और कलाकृतियां रखी गई हैं, जो पटना की गौरवशाली विरासत को दर्शाती हैं। पटन देवी मंदिर आस्था का केंद्र है जहां दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। यहां का हर कोना किसी न किसी कहानी से जुड़ा है। पटना का पर्यटन सिर्फ घूमने-फिरने का अनुभव नहीं है, बल्कि अतीत को छूने का अवसर है। पटना में हवा सी तेज विकास और प्रगति की रफ्तार पटना आज सिर्फ अतीत में जीने वाला शहर नहीं है, बल्कि यह आधुनिक भारत के साथ कदम मिलाकर चल रहा है। यह मानिए “Modern Patna” अब विकास की नई पहचान बन चुका है। यहां स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट, मेट्रो रेल, फ्लाईओवर, शॉपिंग मॉल, शिक्षा संस्थान और टेक्नोलॉजी हब लगातार बढ़ रहे हैं। आईटी पार्क, मेडिकल हब और बिजनेस सेंटर की योजनाएं पटना को आधुनिक शहरी जीवन की नई दिशा दे रही हैं। शहर के युवाओं में जोश है और सरकार के प्रयासों से शहर की रफ्तार तेज़ हो रही है। जैसे कहा भी गया है जो समय के साथ नहीं बदलता, वो समय के पीछे रह जाता है।पटना ने इस कहावत को सच साबित किया है। यह शहर अब न केवल बिहार का गर्व है बल्कि उत्तर भारत के तेजी से उभरते शहरी केंद्रों में से एक बन चुका है। अक्सर पूछे जाने वाले सवाल- पटना बिहार की राजधानी कब बना? पटना का क्षेत्रफल कितना है? पटना में कितने जिले हैं? पटना कहां है? पटना के फैमस मार्केट्स? जीवनशैली और खानपान में अव्वल पटना पटना की सड़कें सिर्फ व्यस्त नहीं हैं, उनमें जीवन है। यहां की चाय की दुकानों में बहसें होती हैं, गलियों में हंसी गूंजती है और स्वाद हर मोड़ पर मिलता है। पटना का खाना उसकी आत्मा है। लिट्टी-चोखा तो आपने सुना ही होगा और शायद चखा भी हो! मशहूर भी तो इतना है। खैर इसके अलावा ठेकुआ, खजूर का पुआ, खिचड़ी, सत्तू और मिठाइयां जैसे खाजा, अनरसा और पेडा इस शहर की पहचान हैं। Patna food शब्द अपने आप में स्वाद की पहचान बन चुका है। यहां का खाना सिर्फ भूख नहीं मिटाता, यह दिल को सुकून देता है। यहां की संस्कृति में सादगी और अपनापन है। त्यौहारों के समय पटना रंगों से भर जाता है चाहे छठ पूजा हो, मकर संक्रांति, या दिवाली। हर उत्सव यहां पूरे जोश और उमंग के साथ मनाया जाता है। क्यों आज दोराहे पर खड़ा पटना? पटना के सामने कई चुनौतियां भी हैं। ट्रैफिक की समस्या, प्रदूषण, जल-भराव और स्वच्छता जैसे मुद्दे शहर की गति को धीमा करते हैं। लेकिन इसके बावजूद यह शहर रुकता नहीं। यहां के

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भारत में पाकिस्तान? बिहार का एक ऐसा गाँव जिसके बारे में सुनकर आप चौंक जायेंगे

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भारत की गलियों, शहरों और गांवों में हर कदम पर एक कहानी छुपी है। कुछ कहानियां इतिहास की गहराइयों से निकलती हैं, तो कुछ हमारी संस्कृति और लोगों के हौसले की गवाही देती हैं। बिहार के पूर्णिया जिले में बसा पाकिस्तान गांव ऐसी ही एक कहानी है, जो अपने अनोखे नाम और उससे जुड़े इतिहास के लिए मशहूर है। हां, आपने सही सुना पाकिस्तान! भारत की धरती पर एक गांव, जिसका नाम सुनकर हर कोई एक पल के लिए ठिठक जाता है। आखिर यह नाम पड़ा कैसे? यहां के लोग कौन हैं? उनकी जिंदगी कैसी है? आइए, इस फाइव कलर्स ऑफ ट्रैवल की नई पेशकश में जानते हैं। और इस पेशकश में हम आपको इस गांव की सैर कराने जा रहे हैं, जहां हर कोने में इतिहास, मेहनत, और उम्मीद की खुशबू बिखरी है। तो चलिए, इस अनोखे सफर पर निकलते हैं, और इस गांव की कहानी को पांच रंगों में देखते हैं! जंगल के रक्षक संथाल आखिर कैसे जीते हैं अपना जीवन पाकिस्तान गांव पूर्णिया शहर से करीब तीस किलोमीटर दूर, श्रीनगर प्रखंड की सिंघिया पंचायत में बसा है। यहां की आबादी छोटी सी है लेकिन इस गांव में सबसे खास हैं, यहां के रहने वाले संथाल आदिवासी समुदाय । जी हां, इस गांव में एक भी मुस्लिम परिवार नहीं है, जो इसके नाम को और भी रहस्यमयी बनाता है। जैसे की हम जानते हैं की संथाल लोग अपनी सादगी, मेहनत, और रंग-बिरंगी संस्कृति के लिए जाने जाते हैं। यह चीज इस गांव को और खूबसूरत बनाता है। यहां के घर मिट्टी और फूस से बने हैं, जो संथाल समुदाय की पारंपरिक जीवनशैली को दिखाते हैं। सुबह होते ही गांव की गलियों में बच्चे खेलते दिखते हैं, महिलायें खेतों की ओर निकल पड़ती हैं, और बुजुर्ग चौपाल पर बैठकर पुरानी कहानियों की बतकही चलती है। संथाल नृत्य और त्योहार, जैसे सोहराय और करम, इस गांव को उत्सव का रंग देते हैं। रंग-बिरंगे परिधान, ढोल की थाप, और सामूहिक नृत्य यहां की हर शाम को यादगार बनाते हैं। लेकिन, इन सबके बीच, शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं की कमी इनके जीवन को चुनौतीपूर्ण बनाती है। फिर भी, इनका हौसला और जिंदादिली इस गांव को एक अनोखा रंग देती है। कृषि और पशुधन में संथालों की संस्कृति की अहम हिस्सेदारी  पाकिस्तान गांव के लोग मेहनत से अपनी जिंदगी संवारते हैं। यहां का मुख्य व्यवसाय है खेती। पूर्णिया की उपजाऊ जमीन इस गांव के लिए वरदान है। धान, जूट, गेहूं, मक्का, मूंग, मसूर, सरसों, और आलू यहां की प्रमुख फसलें हैं। खास तौर पर जूट इस गांव की नकदी फसल है, जो लोगों की आय का बड़ा स्रोत है। इसके अलावा, कुछ लोग नारियल, केला, आम, और अमरूद जैसे फलों की खेती भी करते हैं। खेती के साथ-साथ पशुपालन भी यहां की आजीविका का हिस्सा है। गाय, बकरी, और मुर्गियां पालना आम बात है। पूर्णिया जिला बिहार में मुर्गी और अंडे के उत्पादन में सबसे आगे है, और इस गांव के कुछ लोग भी इसमें योगदान देते हैं। लेकिन, गांव में कोई बड़ा उद्योग नहीं है। कुछ लोग टोकरी बुनने या मजदूरी जैसे छोटे-मोटे काम करते हैं। आर्थिक तंगी और संसाधनों की कमी के बावजूद, यहां के लोग अपनी मेहनत से हर दिन एक नई उम्मीद जगाते हैं। गांव की गलियों में खेतों की हरियाली और पशुओं की आवाज़ इस जगह को जीवंत बनाती है, जैसे कोई पुरानी पेंटिंग जी उठी हो। इस अद्भुत नाम का रहस्य क्यों पड़ा “पाकिस्तान? पाकिस्तान गांव का नाम सुनकर हर कोई चौंकता है। आखिर भारत में एक गांव का नाम पड़ोसी देश के नाम पर कैसे? इस सवाल का जवाब 1947 के बंटवारे में छुपा है। उस समय, इस गांव में कई मुस्लिम परिवार रहा करते थे। जब भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ, तो यहां के ज्यादातर मुस्लिम परिवार पूर्वी पाकिस्तान आज के बांग्लादेश चले गए। उनकी याद में इस गांव का नाम पाकिस्तान रखा गया। कितना अद्भुत है किसी की याद में गांव का नाम पाकिस्तान रख दिया। यह कोई राजनीतिक या धार्मिक मकसद नहीं था, बल्कि एक भावनात्मक जुड़ाव था, उन दोस्तों और पड़ोसियों की याद में, जो इस गांव से चले गए। आज भी इस गांव का नाम सरकारी रिकॉर्ड में “पाकिस्तान” ही दर्ज है। यहां के लोगों के आधार कार्ड और वोटर आईडी पर भी यही नाम लिखा हुआ है। लेकिन, यह नाम गांव वालों के लिए कभी कभी मुश्किलें भी लाता है। बाहरी लोग इस नाम की वजह से गांव वालों को ताने मारते हैं या भेदभाव करते हैं। कई बार लोग मजाक में पूछते हैं, क्या यह सचमुच भारत में है? फिर भी, गांव वाले इस नाम को अपनी पहचान का हिस्सा मानते हैं। कुछ लोग इस गांव का नाम बदलकर बिरसा नगर करने की मांग करते हैं, जो आदिवासी नायक बिरसा मुंडा के सम्मान में होगा। लेकिन, यह मांग अभी तक अधूरी है। इतिहास की गलियां बंटवारे से लेकर संथाल बस्ती तक पाकिस्तान गांव की कहानी पूर्णिया के समृद्ध इतिहास से जुड़ी है। पूर्णिया मिथिला क्षेत्र का हिस्सा रहा है, जो प्राचीन काल में एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और राजनीतिक केंद्र था। मौर्य, गुप्त, और मुगल काल में यह क्षेत्र अपनी रणनीतिक स्थिति के लिए जाना जाता था। सन् 1765 में जब बंगाल, बिहार, और ओडिशा की दीवानी ईस्ट इंडिया कंपनी को मिली, तो पूर्णिया औपचारिक रूप से एक जिला बनाया गया। पाकिस्तान गांव का इतिहास 1947 के बंटवारे से शुरू होता है। उस समय पूर्णिया पूर्वी पाकिस्तान की सीमा के करीब था। बंटवारे के बाद, यहां के मुस्लिम परिवारों ने पूर्वी पाकिस्तान जाने का फैसला किया। जो लोग बचे, उन्होंने इस गांव को “पाकिस्तान” नाम दिया। उस समय यह क्षेत्र घने जंगलों और टूटी फूटी सड़कों से भरा था। जमीन इतनी सस्ती थी कि 30 रुपये प्रति कट्ठा में मिल जाती थी। बंटवारे के बाद, संथाल आदिवासियों ने इस गांव को बसाया। धीरे-धीरे यह गांव संथाल समुदाय का केंद्र बन गया, लेकिन विकास की रफ्तार धीमी रही। आज भी, यह गांव उस बंटवारे की त्रासदी और संथाल समुदाय की मेहनत का एक अनोखा उदाहरण है। आज की तस्वीरें, चुनौतियां और उम्मीद का अनोखा रंग पाकिस्तान गांव की वर्तमान हालत को देखकर मन में कई भावनाएं उमड़ती हैं। पूर्णिया जिला आज

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जाने क्यों खास है मधुबनी पेंटिंग?

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क्या आपने कभी पेंटिंग की है? इस सवाल पर अधिकतर लोगों का जवाब हाँ हीं होगा। क्योंकि कहीं ना कहीं बचपन में हम सभी ने अपनी ड्राइंग बुक्स में उन पहाड़ों और फूल पत्तियों को बनाते हुए ही अपना बचपन जिया है। अब आप सोचेंगे कि आज हम अचानक पेंटिंग्स की बात क्यों कर रहे हैं? तो वह इसलिए क्योंकि आज के इस ब्लॉग का पेंटिंग से सीधा-सीधा संबंध है। आज का यह ब्लॉग उत्तर भारत की एक ऐसी चित्रकला के बारे में है, जिसे दुनिया भर में अहम् स्थान मिल रहा है। इस पेंटिंग को बनाने की कला एक ऐसी कला है, जिसे ओलंपिक ने भी अपने गेम्स में शामिल किया है। जी हां, हम बात कर रहे हैं बिहार राज्य की मधुबनी पेंटिंग के बारे में। आप सभी ने इसका नाम जरुर सुना होगा। अगर आप राजधानी दिल्ली में रहते हैं और कभी संसद भवन का चक्कर लगाए हैं तो आपने वहाँ के मुख्य द्वार पर भी मधुबनी पेंटिंग की झलकियां जरूर देखी होगी। लेकिन अब यह सवाल आता है कि ऐसा क्या खास है (Specialty of Madhubani painting) इस पेंटिंग में, कि इसे ओलंपिक तक में शामिल किया गया? तो चलिए इस सवाल के जवाब को हम इस ब्लॉग में ढूंढते हैं– क्या कहता है इतिहास? मधुबनी पेंटिंग के अगर इतिहास की बात की जाए तो इसका सबसे पुराना इतिहास हमें श्रृंगार रस के कवि श्री विद्यापति के द्वारा रचित पुस्तक कीर्तिपताका में देखने को मिलता है। विद्यापति एक मैथिली कवि थे और उन्होंने अपने जीवन काल में एक से एक रचनाएं की थी। विद्यापति से जुड़ी एक और कहानी यह भी है कि मिथिला क्षेत्र में माना जाता है कि विद्यापति वह इंसान थे जिसके यहां स्वयं महादेव ने आकर 12 वर्षों तक उनकी सेवा की थी। अगर बात करें मधुबनी पेंटिंग के प्रकार की तो यह मुख्यतः तीन प्रकार की होती हैं :भित्ति चित्रअरिपनपट्ट चित्र भित्ति चित्र भित्ति चित्र की अगर बात की जाए तो यह मुख्यतः दीवारों पर की जाती है और तीन तरह की होती हैं। जिसमें पहले होता है गोसानी घर की सजावट, जो की मुख्यतः घर में बने मंदिर की दीवारों पर की जाती है। जिसमें देवी देवताओं की चित्रकारी की गई होती है। दूसरी होती है कोहबर घर की सजावट जिसमें दांपत्य जीवन के दर्शन देखने को मिलते हैं। यह वैवाहिक समारोह में देखने को मिलती है और नव विवाहित जोड़ों के कमरे में इस तरह की चित्रकारी से सजावट की जाती है। तीसरी होती है कोहबर घर की कोनिया सजावट जो की विशेषतः शादी के अवसर पर हीं की जाती है और इस सजावट में फूल पत्तियों और प्राकृतिक संकेत के जरिए दांपत्य जीवन के संदेश दिए जाते हैं। यह सजावट नव विवाह दंपति के कमरे के किसी दीवार के एक कोने पर की जाती है। जहां उनकी विवाह से जुड़ी वैवाहिक रस्में में निभाई जाती हैं। अरिपन यह मधुबनी पेंटिंग का एक ऐसा प्रकार है जिसमें भूमि पर चित्रकारी की जाती है। इस चित्रकला में रंग के तौर पर चावल को भींगो कर उसे पीसा जाता है और उसमें आवश्यकता अनुसार पानी मिलाकर उससे पेंटिंग की जाती है। यह चित्रकला आपको अधिकांशत बिहार में मनाए जाने वाले पर्व त्योहारों के अवसर पर देखने को मिलेंगे। इस चित्रकला में मुख्यतः आपको स्वास्तिक, श्री यंत्र, देवी-देवताएं, फूल-पत्तियां, घरों की कोठियाँ, खेतों में काम कर रहे मजदूर आदि देखने को मिलेंगे। आप जब भी कभी बिहार के उत्तरी क्षेत्र में दीपावली के अवसर पर जाएंगे तो आपको वहां हर घर में अरिपन देखने को मिल जाएगा। पट्ट चित्र पट्ट चित्र भी मधुबनी पेंटिंग का हीं एक प्रकार है जो ना सिर्फ बिहार बल्कि नेपाल के अधिकांश भागों में भी देखने को मिलता है। मधुबनी पेंटिंग को विश्व प्रसिद्ध बनाने में पट्ट चित्रों का विशेष योगदान रहा है। पट्ट चित्र मुख्यतः छोटे-छोटे कपड़ों या फिर कागज के टुकड़ों पर बनाया जाता है, हालांकि अब आजकल साड़ी, दुपट्टे और बड़े-बड़े शॉल पर भी मधुबनी पेंटिंग की झलक देखने को मिल जाती है। विशेष कर अगर आप ट्रेड फेयर में जाएंगे तो आपको वहां बिहार के पवेलियन में मधुबनी पेंटिंग के जीवंत उदाहरण देखने को मिल जाएंगे। अगर आप दिल्ली में रहते हैं और ट्रेड फेयर को अटेंड करने जा रहे हैं तो आप कोशिश करें कि बिहार के पवेलियन में जरूर जाएं। क्योंकि यहां पर आपको एक से एक मधुबनी पेंटिंग्स देखने को मिल जाएंगी। उनसे आप बिहार के कल्चर को बहुत हीं अच्छे तरीके से एक्सप्लोर कर पाएंगे। क्यों है मधुबनी पेंटिंग खास? मधुबनी पेंटिंग के खास होने के पीछे कई सारी वजहें हैं। सबसे पहले इस पेंटिंग को खास बनाने का काम करते हैं इसमें उपयोग में लाए जाने वाले रंग। जहां आज के समय में आधुनिक पेंटिंग ब्रश और आधुनिक रंगों का एक बड़ा बाजार तैयार हो चुका है, वहीं मधुबनी पेंटिंग के कलाकार इन सब से इतर प्रकृति में विश्वास रखते हैं। आपको मधुबनी पेंटिंग में प्राकृतिक रंगों के उपयोग देखने को मिलेंगे। जिन्हें पत्तों और फूलों से रस निकालकर बनाया जाता है। मधुबनी पेंटिंग को खास बनाने के पीछे इन रंगों का बहुत हीं बड़ा योगदान होता है। अगर हम बात करें कि मधुबनी पेंटिंग में कौन-कौन से रंग उपयोग में लाए जाते हैं तो आपको मधुबनी पेंटिंग में गहरे चटक नील, लाल, हरे, नारंगी और काले रंग बहुत हीं बहुतायत मात्रा में देखने को मिलेंगे। हालांकि बाकी रंगों का भी इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन वह रंग बहुत कम होते हैं। या ना की मात्रा में होते हैं। मधुबनी पेंटिंग में मुख्यतः बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र की संस्कृति की झलक साफ-साफ देखने को मिल जाएंगी। इस पेंटिंग में काम कर रहे मजदूरों, महिलाओं, देवी-देवताओं, खासकर राम-सीता विवाह, पशुओं, पक्षियों, फूलों और पेड़ पौधों आदि की तस्वीरें देखने को मिल जाएंगी। यह पेंटिंग देखने में जितनी सरल लगती है बनाने में उतनी हीं कठिन होती है। इसे बनाने में महंगे ब्रशों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है, बल्कि इसे बनाने के लिए प्राकृतिक रूप से कुच तैयार किए जाते हैं और फिर चित्रकारी की जाती है। इस पेंटिंग में महीन से महीन और बारीक से बारीक डिटेल की भी जानकारी रखी जाती है। जो इस पेंटिंग को

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पश्चिम चंपारण जिले में स्थित है बिहार का एकमात्र राष्ट्रीय उद्यान

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वाल्मीकि नेशनल पार्क (Valmiki National Park) जो बिहार का एकमात्र राष्ट्रीय उद्यान है, पश्चिमी चंपारण जिले में स्थित है। यह नेशनल पार्क वाल्मीकि टाइगर रिजर्व (Valmiki Tiger Reserve) का हिस्सा है। वाल्मीकि टाइगर रिजर्व लगभग 900 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है और इसकी स्थापना 1978 हुई थी। यह टाइगर रिजर्व भारत का अठारहवाँ टाइगर रिजर्व है। 2022 की रिपोर्ट के अनुसार, वाल्मीकि टाइगर रिजर्व में 54 बाघ है। यह टाइगर रिज़र्व बिहार का एकमात्र टाइगर रिजर्व है। यह संरक्षित क्षेत्र शिवालिक हिमालय की तलहटी में है। गंडक नदी इस राष्ट्रीय उद्यान के पश्चिमी सीमा से गुजरती है। वाल्मीकि टाइगर रिजर्व में फ्लोरा और फॉउना के कई प्रजातियां है जो इस टाइगर रिजर्व को नेचर लवर्स के लिए खास बनाती है। वाल्मीकि नेशनल पार्क का इतिहास (History of Valmiki National Park) 1950 से पहले यह संरक्षित क्षेत्र, बेतिया महाराज के राज में आता था। सर्वप्रथम, 1978 में इस संरक्षित क्षेत्र को वन्य जीव अभ्यारण घोषित कर दिया गया। इसके पश्चात, 1990 में वाल्मीकि वन्य जीव अभ्यारण्य को नेशनल पार्क का दर्जा दे दिया गया। 1990 में ही, इसे प्रोजेक्ट टाइगर के तहत टाइगर रिजर्व बना दिया गया। वाल्मीकि नेशनल पार्क और वाल्मीकि वन्यजीव अभयारण्य वाल्मीकि टाइगर रिजर्व (वीटीआर) का हिस्सा है। वाल्मीकि नेशनल पार्क में फॉउना (Fauna in Valmiki National Park) वाल्मीकि राष्ट्रीय उद्यान में कई प्रकार के फॉउना (Fauna) निवास करते हैं। यहाँ पाए जाने वाले जीव निम्नलिखित हैं। 1. मैमल्स (Mammals) बंगाल टाइगर (Bengal Tiger), इंडियन लेपर्ड (Indian Leopard), एशियन एलीफैंट (Indian Elephant), भारतीय गैंडा (Indian Rhinoceros), क्लाउडेड लेपर्ड (Clouded Leopard), वाइल्ड वाटर बफैलो (Wild Water Buffalo), वाइल्ड बोअर (Wild Boar), एशियाई काला भालू (Asiatic Black Bear), भारतीय स्लॉथ भालू (Indian Sloth Bear), इंडियन गौर (Indian Gaur), स्पॉटेड डियर (Spotted Deer), सांभर (Sambar), बार्किंग डियर (Barking Deer), फिशिंग कैट (Fishing Cat), हॉग डियर (Hog Deer), बंदर (Monkey), उड़ने वाली गिलहरी (Flying Squirrel), औटर (Otter), लेपर्ड कैट (Leopard Cat), वाइल्ड डॉग (Wild Dog), ब्लू बुल या नीलगाय (Blue Bull or Nilgai), लंगूर (Langur), नेवला (Mongoose) 2. बर्ड्स (Birds) पैराडाईज फ्लाईकैचर (Paradise Flycatcher), कलिज तीतर (Kalij Pheasant), व्हाइट-आई बार्बलर (White-eye Barbler), तीन पंजों वाली बटेर (Three-toed Quail), पाइड हॉर्नबिल (Hornbill), स्टॉर्क (Storks), ग्रीन बारबेट (Green Barbet), प्लोवर (Plover), व्हाइट-ईयर नाइट हेरॉन (White-eared Night Heron), स्निप्स (Snipes), ट्री पिपिट (Tree Pipit), आइबिस (Ibis), ग्रे श्राइक (Gray Shrike), पन्ना डव (Emerald Dove), पिटा (Pitta), ग्रीन विलो वार्बलर (Green Willow Warbler), वेडर्स (Waders) 3. रेप्टाइल्स (Reptiles) किंग कोबरा (King Cobra), अजगर (Python ), करैत (Krait), मॉनिटर लिजर्ड (Monitor Lizard), बैंडेड करैत (Banded Krait), घड़ियाल (Alligator), क्रोकोडाइल (Crocodile), दोमुंहा सांप (Two-headed Snake) 4. बटरफ्लाई (Butterfly) ग्लासी टाइगर (Glassy Tiger), ग्रेट मॉर्मन (Great Mormon), ग्रेट एगफ्लाई (Great Eggfly), कॉमन मॉर्मन (Common Mormon), ग्रे पैंसी (Gray Pansy), क्लब बीक (Club Beak), कॉमन क्रो (Common Crow), लाइम बटरफ्लाई (Lime Butterfly) वाल्मीकि नेशनल पार्क में फ्लोरा (Flora in Valmiki National Park) अगर बात की जाए मुकुर्थी नेशनल पार्क के फ्लोरा की तो, यहाँ पाए जाने वाले फ्लोरा निम्नलिखित है। 1. महत्वपूर्ण पेड़ (Important Trees) करम (Karam), साल (Sal), सिमल (Simal), मंदार (Mandar), बंजन (Banjan), बहेरा (Bahera), सतसाल (Satsal), बोडेरा (Bodera), पियार (Piyar), असिद्ध (Asidh), असान (Asan), हर्रा (Harra), चिर पाइन (Chir Pine), 2. घास (Grass) इम्पेराटा सिलिंड्रिका (Imperata Cylindrica), कंस (Kans), चोरंथ (Choranth), मुंज (Munj), सबाई (Sabai), हाथी घास (Elephant Grass), वेटिवेरिया ज़िज़ानियोइड्स (Vetiveria Zizanioides), नरकट (Narkat) 3. औषधीय पौधे (Medicated Plants) कुटज (Cottage), आंवला (Gooseberry), सतावर (Satawar), सफेद मूसली (Safed Musli), पाइपर (Piper) बेस्ट टाइम टू विजिट वाल्मीकि नेशनल पार्क (Best time to visit Valmiki National Park) अगर आप वाल्मीकि राष्ट्रीय उद्यान आने की चाह रख रहे है तो आप समर (Summer) और मानसून (Monsoon) में यहाँ आने से बचें क्योंकि इस समय यहाँ बहुत गर्मी पड़ती है और यह नेशनल पार्क बंद रहता है। यह राष्ट्रीय उद्यान 1 अक्टूबर से 31 मई तक खुला रहता है। आप यहाँ नवंबर से फरवरी के बीच में आने की कोशिश करें क्योंकि इस समय यहाँ का मौसम सुहाना और परिस्थितियां सम रहती हैं और आपको यहाँ ज्यादा से ज्यादा जानवर देखने को मिलेंगे। कैसे पहुंचे वाल्मीकि राष्ट्रीय उद्यान (How to reach Valmiki National Park)? सड़क मार्ग- वाल्मीकि नेशनल पार्क सड़क मार्ग द्वारा प्रमुख शहरों (पटना, लखनऊ और प्रयागराज) से जुड़ा हुआ है। निकटतम शहर बेतिया (80 किमी) से यहाँ के डेली बस सर्विस है। रेल मार्ग- इस नेशनल पार्क के पास में निकटम रेलवे स्टेशन ‘वाल्मीकि रेलवे स्टेशन’ है जहाँ से आप टैक्सी या बस लेकर वाल्मीकि नेशनल पार्क पहुंच सकते है। हवाई मार्ग- इस नेशनल पार्क का निकटम एयरपोर्ट पटना (जय प्रकाश नारायण इंटरनेशनल एयरपोर्ट) में है जो नेशनल पार्क से 295 किलोमीटर दूर है।

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ये हैं बिहार की राजधानी पटना के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल

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आज हम आपको लेकर चलेंगे एक ऐसे शहर के सफर पर, जिसका भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। जब बात भारत के इतिहास की हो तो इस शहर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। हम बात कर रहे हैं पटना शहर की। यह शहर गंगा नदी के किनारे बसा हुआ है। अगर बात किया जाए इस शहर के वर्तमान की तो यह काफी विकसित हो चुका है। शहर के बड़े-बड़े बिल्डिंग्स, बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल और यहां की सड़कें यह बताने के लिए काफी हैं कि यह शहर भी किसी अन्य शहर से पीछे नहीं है। पटना पर्यटन के लिए भी काफी मशहूर है। जिन लोगों को इतिहास में रुचि है, यह शहर उनका बाहें फैलाकर स्वागत करता है। आइए जानते हैं इस शहर के प्रमुख पर्यटन स्थलों के बारे में जो इस शहर की शान माने जाते हैं।(visiting places of Patna) 1. गोलघर (Golghar)पटना शहर के बीच में स्थित है गोलघर! जिसे अंग्रेजों द्वारा अनाज के संग्रह के लिए 1786 में बनवाया गया था। एक समय था, जब गोलघर के ऊपर से पूरे पटना शहर के दर्शन किया जा सकता था। लेकिन समय के साथ-साथ इस शहर ने भी तरक्की की और यहां भी बड़े बड़े बिल्डिंग्स बन गए। जिसके कारण अब पूरे पटना शहर का तो दर्शन नहीं किया जा सकता है, लेकिन अब भी गोलघर के शीर्ष से तरक्की की राह पर बढ़ते हुए इस शहर को देखना काफी रमणीय दृश्य होता है। 2. श्री कृष्ण साइंस सेंटर पटना (Shri Krishna Science Center Patna) पटना साइंस सेंटर विज्ञान के क्षेत्र में रुचि रखने वाले लोगों और बच्चों के लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र है। यहां जाकर आप अचंभित कर देने वाली वैज्ञानिक घटनाओं को देख और समझ सकते हैं। यहां बहुत से गाइड मौजूद होते हैं। जो वैज्ञानिक प्रयोगों और उनके कारणों के बारे में पर्यटकों को समझाते हैं। यहां लेजर शो की भी व्यवस्था की गई है।पटना साइंस सेंटर की स्थापना 1978 में की गई थी और इसका नामकरण बिहार के पहले मुख्यमंत्री डॉ श्रीकृष्ण सिंह के नाम पर किया गया है। आपको जानकारियां हैरानी होगी कि यह देश का पहला क्षेत्रीय स्तर का विज्ञान केंद्र है। पटना साइंस सेंटर के खुलने का समय सुबह 9:30 बजे से शाम के 6:00 बजे तक का होता है। लेकिन यहां टिकट का काउंटर हर रोज शाम 5:15 बजे हीं बंद हो जाता है। 3. बिस्कोमान भवन (Biscomaun Bhawan) पटना साइंस सेंटर के बगल में स्थित है बिस्कोमान भवन। यह पटना हीं नहीं बल्कि पूरे बिहार का सबसे ऊंचा बिल्डिंग है। बिस्कोमान भवन में बहुत सारे ऑफिस हैं और इसके टॉप फ्लोर पर एक “पाइंड द रिवाल्विंग रेस्टोरेंट” है। जो अपने जगह पर 360 डिग्री तक घूमता रहता है। घूमते रहने की खासियत के कारण यह रेस्टोरेंट पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है। आप भी यहां जाकर बेहद ही शांत माहौल में लंच इंजॉय कर सकते हैं। बिस्कोमान भवन सुबह 8:00 बजे से शाम के 5:00 बजे तक खुला रहता है। 4. गांधी मैदान (Gandhi maidan) गांधी मैदान जिसे पटना का हार्ट भी कहा जाता है, 62 एकड़ जमीन में फैला एक खुला मैदान है। जहाँ हर दिन पटना के बच्चे, बूढ़े और जवान आपको व्यायाम करते मिलेंगे।गांधी मैदान का उपयोग मुख्यतः 26 जनवरी या 15 अगस्त के दिन झंडोतोलन, परेड और झांकियों के लिए किया जाता है। इसके अलावा यहां बिहार दिवस के अवसर पर भी कई तरह के कार्यक्रम होते हैं। इससे इतर इस मैदान का उपयोग चुनाव प्रचार प्रसार के लिए भी किया जाता है। इस मैदान के दीवारों पर आपको मधुबनी पेंटिंग्स की झलक देखने को मिल जाएंगी। गांधी मैदान में हर वीकेंड पर रात को फिल्म चलाई जाती है। जिसके लिए किसी भी तरह का एंट्री फीस नहीं देना होता है। आप आराम से जाकर खुले आसमान के नीचे बैठकर मूवी को इंजॉय कर सकते हैं। अगर आप भी वीकेंड पर पटना में है तो एक बार गांधी मैदान का चक्कर जरुर लगाएं। यकीनन यह आपको काफी पसंद आएगा। 5. बुद्धा स्मृति पार्क (Buddha smriti park) बुद्धा स्मृति पार्क गांधी मैदान से लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस पार्क की खासियत यह है कि यहां पर हर समय होने वाले बुद्धम शरणम गच्छामि के मंत्रोच्चारण के कारण यहां आने वाले पर्यटकों का मन शांत हो जाता है। इस पार्क में एक 200 फीट ऊंचा एक स्तूप है। जिसमें भगवान बुद्ध की अस्थियों के अवशेष को रखा गया है। इस पार्क का उद्घाटन 27 मई 2010 को दलाई लामा ने किया था। उन्होंने पार्क के स्तूप का नाम पाटलिपुत्र करुणा स्तूप रखा। यह पार्क दुनिया भर के बौद्ध पर्यटकों की आस्था का केंद्र है।यहाँ पार्क ऑफ मेमोरी म्यूजियम, लेजर शो, बोध वृक्ष, लाइब्रेरी और मेडिटेशन सेंटर भी है।इस पार्क में बांकीपुर जेल के अवशेषों को भी सहेज कर रखा गया है।बुद्धा स्मृति पार्क के एंट्री टिकट का प्राइस ₹20 है। यह पार्क सोमवार के अलावा सप्ताह के अन्य दिनों में खुला रहता है और इस पार्क के खुलने की टाइमिंग सुबह के 9:00 से शाम के 7:00 बजे तक की है। 6. महावीर मंदिर (Mahaveer mandir) बुद्धा स्मृति पार्क से वॉकिंग डिस्टेंस पर हीं स्थित है महावीर मंदिर। जो उत्तर भारत के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। यहां हर साल लाखों श्रद्धालु आते हैं और यह मंदिर देश के प्राचीनतम हनुमान मंदिरों में से एक है। अगर आप इस मंदिर में घूमना चाहते हैं तो इस बात का ध्यान रखें कि सामान्य दिनों में ही यहां आएं। क्योंकि रामनवमी, शिवरात्रि या फिर दशहरा के दिनों में यह मंदिर बहुत हीं व्यस्त रहता है। ऐसे में यहां बहुत अधिक मात्रा में श्रद्धालु आते हैं। इस मंदिर की एक और खासियत यह है कि इस मंदिर का ट्रस्ट उत्तर भारत का सबसे बड़ा धार्मिक ट्रस्ट है। जो गरीब लोगों के कैंसर का इलाज करवाने और जरूरतमंदों की सेवा और परोपकार के कार्यों के लिए जाना है। 7. तारामंडल (Patna Planetarium – Taramandal)पटना का तारामंडल उन लोगों के लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र है, जिन्हें पृथ्वी के बाहर के ब्रह्मांड के बारे में जानने में अत्यंत रुचि होती है। यहां जाकर आप अंतरिक्ष के बारे में काफी कुछ सीख

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भारत के समृद्ध इतिहास के गवाह हैं नालंदा विश्वविद्यालय के ये खंडहर

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अगर आप भी ऐतिहासिक धरोहरों (Historical monuments) को देखने और उनके इतिहास के बारे में समझने की चाहत रखते हैं तो, आपको बिहार के नालंदा विश्वविद्यालय को देखना और समझना भी काफी पसंद आएगा। ऐसा विश्वविद्यालय जिसे पूरे दुनिया में ज्ञान का केंद्र माना जाता था, आज वह मात्र एक वर्ल्ड हेरिटेज साइट (World Heritage Site) के रूप में सिमट कर रह गया है। आइए जानते हैं इस विश्वविद्यालय के विनाश की कहानी और आप कैसे यहां घूमने जा सकते हैं इसके बारे में।आइए जानते हैं नालंदा विश्वविद्यालय के बारे में (Lets know about Nalanda University):- किसने बनवाया ? who was the Founder of Nalanda University?यह विश्वविद्यालय ना सिर्फ भारत बल्कि संपूर्ण संसार के प्राचीनतम विश्वविद्यालय के रूप में जाना जाता है। इस विश्वविद्यालय का निर्माण गुप्त वंश के शासक कुमारगुप्त ने पांचवी सदी में करवाया गया था। बाद में कुमारगुप्त के उत्तराधिकारियों (successors) ने इसे सहेज कर रखा। गुप्त वंश के पतन (Downfall) के बाद आने वाले दूसरे शासकों ने भी इसके विकास में सहयोग दिया। इसे महान सम्राट हर्षवर्धन और पाल शासकों का भी संरक्षण (Protection) मिला। किसने खोजा? Discovery of Nalanda University 19वीं शताब्दी में एक अंग्रेज (Englishman) को नालंदा में पढ़ रहे एक चीनी यात्री की डायरी मिली। जब वह उस डायरी (diary) में लिखे पते पर पहुंचा तो वह चारों ओर वीरान खंडहर (deserted ruins) थे। वहाँ टहलते हुए अंग्रेज ने देखा कि वहां कुछ चौथी शताब्दी के बने ईट के अवशेष हैं। फिर उसने हल्के हाथों से उस जगह को कुरेद (scrape) कर देखा तो उसे एक के बाद एक सजी हुई ईटों की श्रंखला (series) दिखाई दिया। उसके बाद उसने हीं वहां की खुदाई (digging) प्रारंभ करवाई और इस प्रकार खोज हुआ विश्व के प्राचीनतम विश्वविद्यालय, नालंदा विश्वविद्यालय की। 19वीं सदी में नालंदा विश्वविद्यालय की खुदाई के समय सिर्फ 5% भाग हीं खुदाई करके बाहर निकाला गया। फिर इसकी खुदाई का काम रोक दिया गया। लेकिन नरेंद्र मोदी की गवर्नमेंट (Goverment) के नेतृत्व में 2016 में इसकी खुदाई और पुनरुद्धार (Restoration) का काम प्रारंभ किया गया। आज के समय में नालंदा विश्वविद्यालय भारत के प्रमुख ऐतिहासिक पर्यटन स्थलों में से एक है। यूनेस्को (UNESCO) ने भी इसे वर्ल्ड हेरिटेज साइट के रूप में मान्यता दी है। नालंदा विश्वविद्यालय में 1500 से अधिक शिक्षक थे और 10,000 से अधिक छात्र पढाई किया करते थे। यहां विश्व के कोने-कोने से विद्यार्थी पढ़ने आते थे।यहां छात्रों के रहने के लिए 300 से अधिक कमरे बने हुए थे। सभी कमरे में रोशनी की व्यवस्था थी। विद्यालय के परिसर में जगह जगह पढ़ने का स्थान, प्रार्थना का प्रांगण (prayer hall) और स्टडी हॉल (study hall) बने हुए थे। एक कमरे में एक या एक से अधिक छात्रों के रहने की व्यवस्था थी।इन कमरों का प्रबंधन (management) संस्थानों और छात्र संगठनों (Institutions and student organizations) के द्वारा संभाला जाता था। नालंदा विश्वविद्यालय के नजदीक हीं एक म्यूजियम बनवाया गया है। यहां पर नालंदा विश्वविद्यालय की खुदाई से मिलने वाले मूर्तियों और अवशेषों को संरक्षित करके रखा गया है। इसमें कई तरह की बुद्ध की काँसे की मूर्तियां भी शामिल हैं। कैसे पहुंचे? how to reach? अगर आप नालंदा आना चाहते हैं तो नालंदा का सबसे करीबी हवाई अड्डा पटना में स्थित जयप्रकाश नारायण अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (Jaiprakash Narayan International Airport) है। जहां से नालंदा शहर की दूरी लगभग 90 किलोमीटर है। आपको बता दें कि पटना का जयप्रकाश नारायण अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, चंडीगढ़, देहरादून, जयपुर, अहमदाबाद और कोयंबटूर के साथ-साथ देश के काफी सारे अन्य हवाई अड्डों से जुड़ा हुआ है। जिसकी वजह से आपको फ्लाइट (Flight) से पटना पहुंचने में कोई भी तकलीफ नहीं होगी। नालंदा का सबसे करीबी रेलवे स्टेशन नालंदा जिला में ही स्थित है। लेकिन नालंदा रेलवे स्टेशन के लिए आपको सिर्फ नालंदा के नजदीकी रेलवे स्टेशन पटना, दानापुर, गया, बिहार शरीफ और राजगीर से ही ट्रेन की सुविधा मिल पाएगी। अगर आप इन शहरों से जुड़े हुए हैं, तो आप आसानी से अपने शहर से ट्रेन पकड़ कर नालंदा पहुंच सकते हैं और नालंदा शहर को विजिट कर सकते हैं। लेकिन अगर आपके शहर से नालंदा के लिए डायरेक्ट (Direct) ट्रेन की सुविधा उपलब्ध नहीं है तो आपको अपने शहर से गया या पटना जंक्शन के लिए ट्रेन पकड़नी होगी। अगर प्राचीनतम इमारतों को देखने और उसके बारे में जानने में आपकी भी रुचि है, तो इस जगह पर आना आपके लिए बेहद ही रोमांचक सफर साबित होगा।

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जानिए बुद्ध की भूमि बोधगया के बारे में…

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अगर भागदौड़ की जिंदगी से कहीं दूर जाना चाहते हैं और खुद को नेचर (Nature) के करीब महसूस करना चाहते हैं तो, आपके लिए बोधगया सबसे बेस्ट ऑप्शन (best option) हो सकता है।जैसा कि नाम से ही पता चल रहा है, बोधगया महात्मा बुद्ध की धरती है। यह शहर बिहार की राजधानी पटना (Patna) से लगभग 100 किलोमीटर दूर है। खूबसूरत पहाड़ियों और बुद्ध स्मृतियों से जुड़े हुए इस शहर में आकर लाइफ की सारी निगेटिविटी (Negativity) को खत्म किया जा सकता है। बोधगया का इतिहास (History of Bodhgaya) : बोधगया एक प्राचीन शहर है। जहां लगभग 500 साल पहले भगवान बुद्ध को फल्गु नदी के तट पर, बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। कहते हैं भगवान बुद्ध को वैशाख महीने में पूर्णिमा के दिन ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। जिसके बाद से वह बुद्ध के नाम से प्रसिद्ध हुए और यहां बौद्ध भिक्षुओं के आने का सिलसिला शुरू हो गया। वैशाख की पूर्णिमा जिस दिन भगवान महावीर को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी, उस दिन को बौद्ध पूर्णिमा के रूप में मनाया जाने लगा। माना जाता है कि, बोधगया के महाबोधि मंदिर में स्थित बुद्ध की प्रतिमा उसी अवस्था में है, जिस अवस्था में महावीर बुद्ध ने तपस्या की थी। 13वीं शताब्दी तक यह शहर पूरी दुनिया भर में काफी प्रसिद्ध था। बोधगया में घूमने की जगह : 1. महाबोधि मंदिर (Mahabodhi temple):बोधगया आने वाले लोगों के लिए महाबोधि मंदिर एक खास आकर्षण (Attraction) का केंद्र होता है। दुनिया भर से भगवान बुद्ध के भक्त यहां इस मंदिर में दर्शन करने आते हैं। इस मंदिर को महाबोधि वृक्ष के चारों ओर बनाया गया है। इस मंदिर को सम्राट अशोक ने बनवाया था।इस मंदिर के बीच स्थित महाबोधि वृक्ष और उसके नीचे मौजूद भगवान बुद्ध की मूर्ति लोगों के बीच काफी पॉपुलर (popular) है। विक्रमशिला विश्वविद्यालय और नालंदा विश्वविद्यालय में भी इस मूर्ति के प्रतिरूप को स्थापित किया गया है। 2. थाई मठ (Thai Monastery):इस शहर में कई सारे प्रसिद्ध बौद्ध मठ भी हैं। इन्हीं प्रसिद्ध मठों में से एक है थाई मठ। इस मठ के निर्माण में सोने से बनी टाइलों (Golden Tiles) का इस्तेमाल किया गया है। इसके दीवारों और छतों में की गई नक्काशी भारतीय संस्कृति का एक बेहतरीन उदाहरण है। यहां का शांत माहौल और स्वच्छ वातावरण इतना सुकून देने वाला है कि आपको यहीं का होकर रह जाने का मन करेगा। 3. भगवान बुद्ध की प्रतिमा (Statue of Buddha) :इस शहर में भगवान बुद्ध की एक 80 फीट ऊंची प्रतिमा भी है। इस प्रतिमा को भगवान बुद्ध के प्रसिद्ध स्मारकों में से एक माना जाता है। इस मूर्ति को देश के सबसे ऊंची बुद्ध की मूर्तियों में से एक माना जाता है। इसका का उद्घाटन (Inaugration) दलाई लामा द्वारा 1989 में किया गया था। इसे बलुआ पत्थर के ब्लॉक (Block of sand stone) और लाल ग्रेनाइट (Red granite) से बनाया गया है। इस मूर्ति की लोकप्रियता (Popularity) का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पर्यटक (Tourist) विशेषकर इस मूर्ति को देखने के लिए दूर-दूर से आते हैं। 4. जापानी मंदिर (Japanese temple) :प्राकृतिक खूबसूरती (Natural beauty) से भरा हुआ यह शहर वास्तु कला में भी धनी है। इस शहर में एक जापानी मंदिर है, जिसमें जापानी आर्किटेक्चर (Architecture) देखने को मिलता है। इस मंदिर के दीवारों पर महात्मा बुद्ध के उपदेशों की नक्काशी की गई है। इस मंदिर का निर्माण 1972 में किया गया था। यह मंदिर मुख्य शहर से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। 4. आर्कियोलॉजिकल म्यूजियम (Archaeological Museum):इस शहर में आर्कियोलॉजिकल म्यूजियम भी है। यहाँ बौद्ध और हिंदू धर्म तरह-तरह की मूर्तियां और कलाकृतियां मौजूद हैं। साथ ही साथ यहां खुदाई में मिले हुए अन्य वस्तुओं को भी रखा गया है, जो लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है। 5. पितृपक्ष मेला (Pitrupaksha Mela):गया का हिंदू धर्म में भी विशेष महत्व रहा है। क्योंकि हिंदू धर्म में इसे मोक्ष भूमि के नाम से भी जाना जाता है। माना जाता है कि, पितृपक्ष के समय यहां आकर पिंडदान करने से पूर्वजों के आत्मा को शांति मिलती है और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। हर साल भाद्रपद के पूर्णिमा से अश्विन के कृष्ण पक्ष तक यहां पितृपक्ष का मेला लगता है। गया जाने के लिए सबसे सही समय (Best time to visit Gaya) : वैसे तो गया में साल भर सैलानियों (Visitors) की भीड़ लगी रहती है। लेकिन अगर आप मौसम का लुफ्त उठाते हुए और बिना किसी परेशानी के गया घूमना चाहते हैं तो, फरवरी से अप्रैल और सितंबर से नवंबर तक के समय में यहां घूमने जा सकते हैं। सितंबर से नवंबर के बीच यहां पितृपक्ष का मेला लगता है। इस समय लोग यहां जाकर अपने पूर्वजों के मोक्ष की प्राप्ति के लिए पिंडदान करते हैं। कैसे पहुँचें? (How to reach): बोधगया हवाई, रेल और सड़क तीनों ही मार्गो से जुड़ा हुआ है। बोधगया जाने के लिए सबसे आसान रास्ता हवाई मार्ग है। गया जिला का एयरपोर्ट बिहार का इंटरनेशनल एयरपोर्ट(International Airport) है, जो भारत के अन्य शहरों से भी अच्छी तरह से जुड़ा (Well connected) हुआ है। बोध गया आने का दूसरा सबसे सरल मार्ग रेल मार्ग है। बोधगया से 13 किलोमीटर दूर स्थित गया जंक्शन (Junction) भी भारत के अलग-अलग शहरों से जुड़ा हुआ है। गया आने के लिए आप पटना जंक्शन तक की ट्रेन भी ले सकते हैं। पटना गया की दूरी लगभग 100 किलोमीटर है। जिससे रोड रेल दोनों ही रास्तों से आसानी से तय किया जा सकता है।