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हम्पी-वो सभ्यता, जो मिटी नहीं, लेकिन शायद पत्थरों में छिप गई

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हम्पी- कर्नाटक राज्य के उत्तरी भाग में स्थित, भारत के इतिहास का एक अद्भुत और गौरवशाली अध्याय है। यह स्थान कभी विश्व प्रसिद्ध विजयनगर साम्राज्य की राजधानी था। जिसकी गिनती भारत के सबसे समृद्ध और शक्तिशाली साम्राज्यों में होती थी। चौदहवीं से सोलहवीं शताब्दी के बीच यह नगरी व्यापार, कला, संस्कृति और वास्तुकला का प्रमुख केंद्र रही है। हम्पी के प्राचीन मंदिर, पत्थर की मूर्तियाँ, विशाल मंडप, वाटर रिसोर्सेस, महल और अन्य आर्किटेक्ट आज भी उस युग की भव्यता और समृद्धि की गवाही देते हैं। हम्पी का ऐतिहासिक वैभव हिस्टोरियन के अनुसार हम्पी की स्थापना हरिहर और बुक्का नामक दो भाइयों ने की थी, जो विजयनगर साम्राज्य की नींव के लिए भी जाने जाते हैं। यह साम्राज्य न केवल दक्षिण भारत बल्कि सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप की राजनीति, अर्थव्यवस्था और संस्कृति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा हैं। पुर्तगाली, फारसी और अरबी यात्रियों ने भी हम्पी की सम्पन्नता का वर्णन किया है। वे लिखते हैं कि इस नगर की गलियाँ सोने-चांदी से भरपूर बाजारों से सजी होती थीं और यहाँ का व्यापार अरब, फारस, चीन और यूरोप तक फैला हुआ था। हम्पी का पतन 1565  ईस्वी में राक्षसी तांगड़ी के युद्ध के बाद हुआ, जब विजयनगर साम्राज्य की सेना को मुस्लिम सल्तनतों की संयुक्त सेना से हार का सामना करना पड़ा था। इसके बाद हम्पी का अधिकांश भाग नष्ट कर दिया गया था परंतु आज भी इसके खंडहरों में वह अद्भुत वैभव प्रतीत होता है। हर पत्थर, हर स्तंभ, हर मूर्ति उस भूतकाल की अमिट गाथा कहती है, जो कभी यहाँ जीवित थी। स्थापत्य कला और मंदिर हम्पी का सबसे बड़ा आकर्षण यहाँ की वास्तुकला यानि आर्किटेक्ट है, जो न केवल शिल्प कौशल का उदाहरण है बल्कि धर्म, संस्कृति और समाज के गहरे जुड़ाव को भी दर्शाती है। यहाँ के मंदिर, मंडप, रथ और महल दक्षिण भारतीय स्थापत्य शैली के सर्वोत्तम उदाहरण में से एक हैं। हर पत्थर पर की गई खुदाई, हर मूर्ति की अभिव्यक्ति और हर स्तंभ की बनावट में उस युग की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। यहाँ का सबसे प्रसिद्ध मंदिर है – विरुपाक्ष मंदिर, सायद इसका नाम हर किसी ने सुन होगा। जो हम्पी का धार्मिक केंद्र भी माना जाता है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और आज भी सक्रिय है जहाँ प्रतिदिन पूजा-अर्चना होती है। और हजारों लाखों श्रद्धालु यहाँ आते हैं। इसके अतिरिक्त विट्ठल मंदिर अपनी उत्कृष्ट वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है। इसमें मौजूद विशाल पत्थर का रथ भारत की सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक बन चुका है और इसे भारतीय मुद्रा के 50 रुपये के नोट पर भी स्थान मिला है। यहाँ के मंदिरों में स्तंभों को इस तरह से तराशा गया है कि उनमें से संगीत के स्वर निकलते हैं। इन्हें संगीतमय स्तंभ कहा जाता है। इसके अलावा लक्ष्मी नरसिंह की विशाल मूर्ति, बदावी लिंग, अच्युतराय मंदिर और हेमकुट पहाड़ी के मंदिर भी स्थापत्य की दृष्टि से अद्वितीय हैं। हम्पी में कुल मिलाकर 1600 से अधिक स्मारक हैं, जो यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल हैं। हम्पी का प्राकृतिक सौंदर्य और भूगोल भी अद्भुत है हम्पी केवल ऐतिहासिक या धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि प्राकृतिक सौंदर्य के लिहाज से भी बहुत ही शानदार है। तुंगभद्रा नदी के किनारे बसा यह क्षेत्र विशाल चट्टानों, घाटियों और हरियाली से भरपूर है, जो इसे एक अद्भुत स्थल बनाता है। नदी के दोनों किनारों पर बसे गाँव, पर्वतीय दृश्य और बिखरी हुई प्राचीन संरचनाएँ किसी भी यात्री को एक अलग ही संसार का अनुभव कराती हैं। इसकी एक विशेषता यह भी है कि यहाँ पत्थरों के पहाड़ अपनी स्वाभाविक बनावट के साथ इस तरह फैले हुए हैं कि ऐसा लगता है, मानो प्रकृति ने इन्हें कला के रूप में यहाँ स्थापित किया हो। सूर्यास्त के समय इन चट्टानों और खंडहरों पर पड़ती सुनहरी रोशनी का दृश्य रोमांचक होता है। जो पर्यटक प्राकृतिक सौंदर्य के प्रेमी हैं, उनके लिए हम्पी किसी स्वर्ग से कम नहीं। तुंगभद्रा नदी के किनारे बैठकर जब सूरज ढलता है, तो उसके प्रतिबिंब में मंदिरों की परछाइयाँ मानो समय के साथ संवाद करती हैं। यह अनुभव आध्यात्मिक भी है और मानसिक शांति देने वाला भी। कुछ स्थानों पर नौका विहार की सुविधा भी उपलब्ध है, जो पर्यटकों को नदी के बीचों-बीच से हम्पी के दृश्य देखने का मौका देती है। हम्पी की सांस्कृतिक पहचान और त्यौहार हम्पी केवल खंडहरों का नगर नहीं बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक केंद्र भी है। यहाँ हर वर्ष आयोजित होने वाला हम्पी उत्सव जिसे विजय उत्सव भी कहा जाता है। पूरे राज्य में प्रसिद्ध है। यह उत्सव तीन दिनों तक चलता है, जिसमें पारंपरिक नृत्य, संगीत, लोक कलाएँ, कठपुतली नाटक, ऐतिहासिक झांकियाँ और आतिशबाज़ी जैसे कार्यक्रम होते हैं। इस दौरान हम्पी की गलियाँ रोशनी से जगमगाती हैं और पूरा शहर मानो फिर से प्राचीन काल की जीवंतता में लौट आता है। इस उत्सव में देश-विदेश से पर्यटक आते हैं और भारत की पारंपरिक कलाओं को सजीव रूप में देखने का अनुभव प्राप्त करते हैं। यह आयोजन न केवल एक पर्व होता है, साथ ही साथ हम्पी की विरासत को संजोने और जनमानस से जोड़ने का माध्यम भी बन चुका है। इसके अलावा, स्थानीय ग्राम सभाएँ भी समय-समय पर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करती हैं। जिनमें पर्यटक भी भाग लेते हैं। यहाँ की लोक कला, विशेषकर चित्रकला और पत्थर पर उकेरी गई कलाकृतियाँ भी हम्पी की पहचान हैं। हम्पी घूमते समय आपको स्थानीय कलाकारों की दुकानें मिलेंगी जहाँ वे हाथ से बनाए गए शिल्प और चित्रकला के नमूने बेचते हैं। इन कलाओं में प्राचीनता की झलक आज भी साफ तौर पर देखी जा सकती है। यात्रा सुझाव और हम्पी तक पहुँचने का मार्ग अगर आप हम्पी की यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो यह एक अत्यंत संतोषप्रद और जीवनभर याद रहने वाला अनुभव होगा। हम्पी पहुँचने के लिए सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन है होसपेट जो हम्पी से मात्र 13 किलोमीटर दूर है। यहाँ से ऑटो, टैक्सी या बस के माध्यम से हम्पी आसानी से पहुँचा जा सकता है। बेंगलुरु, हैदराबाद और गोवा जैसे प्रमुख शहरों से यहाँ के लिए सीधी ट्रेनें उपलब्ध हैं। हवाई यात्रा के लिए निकटतम हवाई अड्डा है हुबली एयरपोर्ट जो हम्पी से लगभग  160 किलोमीटर दूर है। यहाँ