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Travel News: बिना किसी जाति-भेदभाव के मीलों पैदल चलते हैं लोग! इस जादुई ‘वारी यात्रा’ का अनुभव देख विदेशी भी रह जाते हैं हैरान

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Travel News नई दिल्ली । भारत को त्योहारों, मेलों और गहरी आस्था का देश कहा जाता है। यहाँ कई ऐसी धार्मिक यात्राएं होती हैं जो न केवल अध्यात्म से जुड़ी हैं, बल्कि इंसानी एकता और समर्पण की मिसाल पेश करती हैं। जब बात महाराष्ट्र की सबसे बड़ी और पवित्र आध्यात्मिक यात्रा की हो, तो ज्येष्ठ और आषाढ़ के महीने में होने वाली ‘पंढरपुर वारी’ (Pandharpur Wari) का नाम सबसे ऊपर आता है। यह कोई आम धार्मिक यात्रा नहीं है, बल्कि यह इंसानी भावनाओं, कड़े अनुशासन, सेवा और आस्था का एक ऐसा महाकुंभ है, जिसे अपनी आंखों से देखना किसी जादुई सपने जैसा लगता है। हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु, जिन्हें ‘वारकरी’ कहा जाता है, अपने घरों के आराम और सुख-सुविधाओं को छोड़कर भगवान विट्ठल (पांडुरंग) के दर्शन के लिए सैकड़ों किलोमीटर की पैदल यात्रा पर निकल पड़ते हैं। इस यात्रा की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यहाँ उम्र, जाति, धर्म या भाषा की सारी सीमाएं मिट जाती हैं और हर कोई बस एक ही धुन में आगे बढ़ता जाता है। Maharashtra Spiritual Tourism Guide Travel News: इंसान ही नहीं, भारत में इस जगह दी गई ‘पेड़ को समाधि’! एशिया के सबसे ऊंचे महावृक्ष की कहानी जान सैलानी भी रह जाते हैं हैरान Travel News: देहू और आलंदी से शुरू होता है भक्ति का यह अनूठा सैलाब पंढरपुर वारी की असली शुरुआत दो सबसे प्रमुख पालकी यात्राओं (Palkhi Processions) के प्रस्थान के साथ होती है। संत ज्ञानेश्वर महाराज की पालकी: यह पालकी आलंदी से प्रस्थान करती है। संत तुकाराम महाराज की पालकी: यह पवित्र पालकी देहू से अपनी यात्रा शुरू करती है। हाथों में मंजीरे (talas) लिए, कंधों पर भगवा ध्वज लहराते हुए और सिर पर तुलसी वृंदावन रखे हजारों-लाखों श्रद्धालु जब “ज्ञानोबा माउली तुकाराम” के जयकारे लगाते हैं, तो पूरे माहौल की ऊर्जा बदल जाती है। भक्तों के माथे पर लगा चंदन और उनके चेहरे की असीम शांति यह बयां करती है कि वे किसी दिखावे के लिए नहीं, बल्कि अपनी आत्मा की संतुष्टि के लिए इस कठिन सफर पर निकले हैं। Sant Tukaram Dnyaneshwar Palkhi, Lord Vitthal Pandharpur ‘रिंगण’ उत्सव: जब घोड़ा लगाने लगता है पालकी की परिक्रमा इस पूरी यात्रा का सबसे जादुई और रोमांचक हिस्सा ‘रिंगण’ (Ringan) उत्सव होता है, जिसे देखने के लिए देश-विदेश से पर्यटक खिंचे चले आते हैं। भक्तों का विशाल घेरा: रिंगण के दौरान वारकरी एक बड़ा गोलाकार घेरा बनाते हैं, जिसमें मृदंग और झांझ बजाने वाले कलाकार कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हो जाते हैं। घोड़े की परिक्रमा: जैसे ही ताल-मृदंग की थाप तेज होती है, जुलूस में शामिल एक पवित्र घोड़ा (बिना किसी सवार के) अचानक सरपट दौड़ने लगता है और पालकी की इस तरह परिक्रमा करता है मानो वह खुद भगवान को नमन कर रहा हो। पवित्र धूल की चाह: जैसे ही यह घोड़ा अपनी दौड़ पूरी करता है, भक्त उस जगह की ओर दौड़ पड़ते हैं और घोड़े के टापों के नीचे की मिट्टी को बेहद आदर के साथ अपने माथे पर लगाते हैं। इसके अलावा यहाँ पारंपरिक खेल और लोक प्रस्तुतियां भी होती हैं, जो इस धार्मिक अनुष्ठान को एक बड़े उत्सव का रूप दे देती हैं। Travel News: 80 की उम्र में गजब का जज्बा! लद्दाख के 19 हजार फीट ऊंचे उमलिंग ला पास पहुंचीं दादी जी, युवाओं को मिला नया ट्रैवल गोल दाइव घाट का वो अविश्वसनीय नजारा: जब थम जाती हैं नजरें यह यात्रा पुराने मुंबई-पुणे हाईवे से होते हुए सासवड के पास स्थित दाइव घाट (Dive Ghat) से होकर गुजरती है। सावन की रिमझिम फुहारों के बीच जब चारों तरफ की पहाड़ियां हरी-भरी हो जाती हैं और छोटे-छोटे झरने बह रहे होते हैं, तब इस घाट से गुजरता हुआ लाखों लोगों का हुजूम किसी बहती हुई नदी जैसा दिखाई देता है। ड्रोन से देखने पर यह नजारा इतना जादुई लगता है कि विश्वास करना मुश्किल हो जाता है कि यह कोई हकीकत है या सिर्फ कल्पना। समानता और इंसानियत का सबसे बड़ा संदेश इस यात्रा में शामिल हर वारकरी केवल पंढरपुर की ओर कदम नहीं बढ़ा रहा होता, बल्कि वह समाज को समानता और इंसानियत का एक बहुत बड़ा संदेश भी दे रहा होता है। यहाँ कोई अमीर या गरीब नहीं है, सब एक बराबर हैं। किसी बाहरी सैलानी के लिए यह यात्रा सिर्फ एक धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि जीवन को नए नजरिए से देखने का एक अद्भुत उत्सव बन जाती है। Travel News: घूमने के शौकीनों की खुली लॉटरी! हिमाचल प्रदेश में डेवलप होंगी 49 नई ईको टूरिज्म साइटें, अब वादियों में दिखेगा अलग ही नजारा ट्रैवलर गाइड: कैसे लें इस यात्रा का हिस्सा? सही समय (Best Time): इस यात्रा का सबसे सुंदर अनुभव जून और जुलाई (ज्येष्ठ-आषाढ़) के मानसून महीनों में लिया जा सकता है। कैसे पहुंचे: आप पुणे या सोलापुर पहुंचकर इस यात्रा के मार्ग में शामिल हो सकते हैं। सोलापुर जिले में तुलजापुर का तुलजाभवानी मंदिर और अक्कलकोट में स्वामी समर्थ महाराज की समाधि जैसे कई अन्य पवित्र स्थल भी इस मार्ग के नजदीक स्थित हैं, जहां आप दर्शन कर सकते हैं।