Uttarakhand: Explore the Beauty of the Himalayas
झीलों से लेकर बर्फीली चोटियों तक, पुराने मंदिरों से लेकर घने जंगलों तक — जानिए उत्तराखंड के इतिहास, संस्कृति और घूमने की खास जगहों के बारे में। कभी मन करता है कि कुछ दिन शहर की भीड़, ट्रैफिक और रोज़मर्रा की भागदौड़ से दूर बिताए जाएँ? सुबह आँख खुले तो सामने पहाड़ हों, हवा में ठंडक हो और शाम किसी नदी के किनारे बैठकर गुजरे। अगर आप भी ऐसी छुट्टियों का सपना देखते हैं, तो उत्तराखंड आपकी अगली यात्रा के लिए शानदार जगह हो सकता है।
यहाँ कहीं बर्फ से ढकी चोटियाँ हैं, कहीं हरे-भरे जंगल, कहीं शांत झीलें और कहीं सदियों पुराने मंदिर। इसके अलावा पहाड़ी गाँवों की सादगी, स्थानीय पकवान और लोगों की मेहमाननवाज़ी भी इस सफर को खास बनाती है। Uttarakhand सिर्फ घूमने-फिरने की जगह नहीं, बल्कि ऐसा इलाका है जहाँ हर कुछ किलोमीटर बाद नजारा, खान-पान और रहन-सहन बदलता हुआ दिखाई देता है।
देवभूमि उत्तराखंड की खासियत क्या है?
उत्तराखंड की पहचान यहाँ के पहाड़ों और धार्मिक स्थलों से जरूर जुड़ी है, लेकिन इसकी खूबसूरती इससे कहीं ज्यादा है। राज्य को मुख्य रूप से दो सांस्कृतिक क्षेत्रों — गढ़वाल और कुमाऊँ — में बाँटा जाता है। दोनों क्षेत्रों की अपनी बोलियाँ, लोकगीत, खान-पान और त्योहार हैं। यही विविधता इसे दूसरे पहाड़ी राज्यों से अलग पहचान देती है। Uttarakhand
Uttarakhand का गठन 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर हुआ था। उस समय इसका नाम उत्तरांचल रखा गया था, जिसे 2007 में बदलकर उत्तराखंड कर दिया गया। अलग राज्य की माँग के पीछे पहाड़ी क्षेत्रों की जरूरतों, विकास और स्थानीय पहचान से जुड़े मुद्दे थे। राज्य आंदोलन में इंद्रमणि बडोनी जैसे नेताओं की अहम भूमिका रही, जिन्हें अक्सर ‘पहाड़ का गांधी’ कहा जाता है।
देहरादून राज्य की शीतकालीन राजधानी है, जबकि गैरसैंण के भराड़ीसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया गया है। राज्य में 13 जिले हैं। यहाँ की अर्थव्यवस्था में पर्यटन, खेती, बागवानी, जलविद्युत और स्थानीय कारोबार का महत्वपूर्ण योगदान है।
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पहाड़ों की रानी से लेकर शांत गाँवों तक: 10 खूबसूरत जगहें
उत्तराखंड में घूमने के लिए बहुत सारे विकल्प हैं। कुछ जगहें परिवार के साथ छुट्टियाँ बिताने के लिए अच्छी हैं, कुछ दोस्तों के साथ एडवेंचर के लिए और कुछ उन लोगों के लिए जो भीड़ से दूर शांति चाहते हैं। Uttarakhand की यात्रा तय करते समय अपने पास उपलब्ध दिनों और मौसम को ध्यान में रखकर जगहें चुनना बेहतर रहता है।
मसूरी — पहाड़ों की रानी
देहरादून के पास बसा मसूरी अपने मॉल रोड, पहाड़ी नजारों और आसपास के झरनों के लिए जाना जाता है। यहाँ गन हिल से पहाड़ों का खूबसूरत दृश्य देखा जा सकता है। जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट भी इतिहास और प्राकृतिक नजारों में दिलचस्पी रखने वालों के लिए अच्छा विकल्प है।
मसूरी में वीकेंड और छुट्टियों के समय काफी भीड़ रहती है। अगर आप आराम से घूमना चाहते हैं, तो सुबह जल्दी निकलें और अपनी योजना में ट्रैफिक के लिए अतिरिक्त समय रखें।
नैनीताल — झीलों वाला खूबसूरत शहर
नैनीताल अपनी नैनी झील, नयना देवी मंदिर और आसपास की पहाड़ियों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ झील में बोटिंग की जा सकती है और मॉल रोड पर घूमते हुए स्थानीय बाजारों का मजा लिया जा सकता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह स्थान देवी सती के नयनों से जुड़ा है, इसी वजह से इसका नाम नैनीताल पड़ा माना जाता है।
औली — बर्फ और स्कीइंग का मजा
चमोली जिले में स्थित औली सर्दियों में बर्फबारी और स्कीइंग के लिए मशहूर है। साफ मौसम में यहाँ से नंदा देवी सहित कई ऊँची हिमालयी चोटियों के नजारे दिखाई देते हैं। यहाँ रोपवे और आसपास के पहाड़ी रास्ते भी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। बर्फ देखने की योजना हो, तो जाने से पहले मौसम और सड़क की स्थिति जरूर जाँचें।
रानीखेत — हरियाली और सुकून
रानीखेत अपने शांत वातावरण, देवदार के पेड़ों और पहाड़ी नजारों के लिए जाना जाता है। यहाँ चौबटिया गार्डन, झूला देवी मंदिर और गोल्फ कोर्स जैसे आकर्षण देखे जा सकते हैं। शहर की भागदौड़ से दूर कुछ दिन आराम करना चाहते हैं, तो यह जगह अच्छी लग सकती है।
कौसानी — हिमालय का शानदार नजारा
कौसानी से साफ मौसम में नंदा देवी और त्रिशूल जैसी चोटियों के खूबसूरत दृश्य दिखाई दे सकते हैं। महात्मा गांधी यहाँ अनाशक्ति आश्रम में ठहरे थे और हिंदी के प्रसिद्ध कवि सुमित्रानंदन पंत का जन्म भी इसी क्षेत्र में हुआ था। यहाँ का शांत माहौल उन लोगों को पसंद आएगा जो लंबी-लंबी गतिविधियों के बजाय प्रकृति के बीच समय बिताना चाहते हैं।
अल्मोड़ा — संस्कृति और पुराने बाजार
अल्मोड़ा कुमाऊँ की संस्कृति, पुराने बाजारों और स्थानीय खान-पान के लिए जाना जाता है। यहाँ के आसपास कसार देवी मंदिर और कई प्राकृतिक स्थल हैं। बाजार में घूमते हुए स्थानीय मिठाइयाँ और पहाड़ी उत्पाद खरीदने का मौका भी मिलता है।
लैंसडाउन — शांत पहाड़ी छावनी
पौड़ी गढ़वाल जिले में स्थित लैंसडाउन एक शांत छावनी शहर है। इसका इतिहास गढ़वाल राइफल्स से जुड़ा है। यहाँ टिप-इन-टॉप, भुल्ला ताल और आसपास के जंगल लोकप्रिय आकर्षण हैं। यह जगह उन यात्रियों के लिए अच्छी है जो बहुत ज्यादा भीड़ के बजाय शांत माहौल पसंद करते हैं।
चोपता — ट्रेकिंग और पहाड़ी घास के मैदान
चोपता को तुंगनाथ और चंद्रशिला ट्रेक के लिए जाना जाता है। यहाँ से पहाड़ों के खूबसूरत नजारे दिखाई देते हैं और मौसम के अनुसार बुरांश के फूल भी देखने को मिलते हैं। ऊँचाई पर होने के कारण यहाँ रात में ठंड काफी बढ़ सकती है, इसलिए गर्म कपड़े साथ रखना जरूरी है।
धनोल्टी — देवदार के जंगलों के बीच
मसूरी के आसपास स्थित धनोल्टी घने जंगलों और शांत वातावरण के लिए जाना जाता है। यहाँ छोटे वॉकिंग ट्रेल, इको पार्क और आसपास के पहाड़ी नजारे देखे जा सकते हैं। सर्दियों में बर्फबारी की संभावना रहती है, लेकिन यात्रा से पहले मौसम का हाल जरूर देख लें।
पिथौरागढ़ — कुमाऊँ का खूबसूरत इलाका
पिथौरागढ़ पूर्वी उत्तराखंड में स्थित है और यहाँ से आसपास की पहाड़ियों के खूबसूरत दृश्य मिलते हैं। पाताल भुवनेश्वर की गुफाएँ भी इस क्षेत्र के प्रमुख आकर्षणों में शामिल हैं। गुफा में प्रवेश करते समय स्थानीय नियमों का पालन करें और फिसलन वाले रास्तों पर सावधानी रखें। Uttarakhand
चार धाम यात्रा: आस्था से जुड़ा खास सफर
उत्तराखंड में धार्मिक यात्रा का अपना अलग महत्व है। हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु चार धाम की यात्रा के लिए आते हैं। यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ को उत्तराखंड के चार धाम कहा जाता है। इनकी यात्रा आम तौर पर इसी क्रम में की जाती है, हालाँकि मौसम, उपलब्ध समय और सड़क की स्थिति के अनुसार योजना बदल सकती है।
Uttarakhand की चार धाम यात्रा में यमुनोत्री देवी यमुना को समर्पित है। गंगोत्री में देवी गंगा की पूजा होती है और यह भागीरथी नदी के पास स्थित है। केदारनाथ भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है, जबकि बद्रीनाथ भगवान विष्णु को समर्पित प्रसिद्ध धाम है।
इन धामों तक पहुँचने के रास्ते पहाड़ी हैं और कुछ जगहों पर पैदल चलना भी पड़ता है। खासकर केदारनाथ की यात्रा के लिए शारीरिक तैयारी, गर्म कपड़े और जरूरी दवाएँ साथ रखना अच्छा रहता है। यात्रा के मौसम में पंजीकरण, स्वास्थ्य संबंधी नियमों और रास्तों की स्थिति के बारे में आधिकारिक जानकारी जरूर लें।
इसके अलावा पंच केदार — केदारनाथ, तुंगनाथ, रुद्रनाथ, मध्यमहेश्वर और कल्पेश्वर — भी धार्मिक और प्राकृतिक महत्व रखते हैं। इन सभी जगहों की यात्रा एक ही बार में करना जरूरी नहीं है। अपनी क्षमता और उपलब्ध समय के हिसाब से योजना बनाना बेहतर है।
नदियाँ और झरने: उत्तराखंड की प्राकृतिक पहचान
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उत्तराखंड की नदियाँ यहाँ के जीवन, खेती और पर्यावरण का अहम हिस्सा हैं। गंगा और यमुना जैसी प्रमुख नदियों के उद्गम क्षेत्र इसी हिमालयी इलाके में हैं। ऊँचे पहाड़ों, ग्लेशियरों और बारिश से मिलने वाला पानी आगे चलकर उत्तर भारत के बड़े हिस्से की जरूरतें पूरी करने में मदद करता है।
भागीरथी नदी का उद्गम गंगोत्री क्षेत्र के गोमुख ग्लेशियर के पास माना जाता है। अलकनंदा नदी भी ऊँचे हिमालयी क्षेत्र से निकलती है। देवप्रयाग में भागीरथी और अलकनंदा के मिलने के बाद नदी को गंगा कहा जाता है। यमुना का उद्गम यमुनोत्री क्षेत्र में है। इसके अलावा मंदाकिनी, पिंडर, टोंस और काली जैसी नदियाँ भी राज्य के अलग-अलग हिस्सों में बहती हैं।
Uttarakhand में नदियों और झरनों के आसपास कई लोकप्रिय पर्यटन स्थल हैं, लेकिन तेज बहाव वाले पानी को हल्के में नहीं लेना चाहिए। बारिश के मौसम में नदी का जलस्तर अचानक बढ़ सकता है। पानी के किनारे तस्वीर लेते समय सुरक्षित दूरी रखें और चेतावनी वाले स्थानों पर न उतरें।
टिहरी बाँध जलविद्युत उत्पादन और पानी के प्रबंधन के लिहाज से महत्वपूर्ण है। वहीं पहाड़ी नदियों के आसपास का वातावरण ट्रेकिंग और प्रकृति प्रेमियों को आकर्षित करता है। इन जगहों पर घूमते समय स्थानीय नियमों का पालन करना जरूरी है। Uttarakhand
एडवेंचर पसंद है? इन ट्रेक्स को जानिए
अगर आपको पैदल पहाड़ चढ़ना, जंगलों से गुजरना और खुले आसमान के नीचे समय बिताना पसंद है, तो उत्तराखंड में कई अच्छे ट्रेक मौजूद हैं। हर ट्रेक की कठिनाई, ऊँचाई और मौसम अलग होता है, इसलिए केवल तस्वीरें देखकर रास्ता चुनने के बजाय अपनी फिटनेस और अनुभव का भी ध्यान रखें।
- गोमुख-तपोवन ट्रेक: यह ट्रेक गंगोत्री क्षेत्र से शुरू होकर गोमुख ग्लेशियर के पास तक जाता है। आगे तपोवन के इलाके से माउंट शिवलिंग जैसी चोटियों के नजारे दिखाई देते हैं। यह ऊँचाई वाला ट्रेक है, इसलिए परमिट, मौसम और स्थानीय गाइड की जानकारी पहले से जुटाएँ।
- देवरियाताल-चंद्रशिला ट्रेक: देवरियाताल झील और चोपता के रास्ते चंद्रशिला तक जाने वाला यह ट्रेक प्रकृति प्रेमियों के बीच लोकप्रिय है। रास्ते में जंगल, पहाड़ी गाँव और ऊँची चोटियों के नजारे मिलते हैं। बर्फबारी के समय रास्ता मुश्किल हो सकता है।
- फूलों की घाटी ट्रेक: चमोली जिले में स्थित फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है। जुलाई और अगस्त के आसपास यहाँ कई तरह के जंगली फूल खिलते हैं। मौसम के अनुसार फूलों की संख्या और रंग बदल सकते हैं। यह संरक्षित क्षेत्र है, इसलिए निर्धारित रास्तों पर ही चलें।
- रूपकुंड ट्रेक: ऊँचाई पर स्थित रूपकुंड झील यहाँ मिले पुराने मानव कंकालों के कारण चर्चित रही है। यह कठिन ट्रेक माना जाता है और इसके लिए अच्छी तैयारी जरूरी है। प्रवेश नियमों और स्थानीय पाबंदियों की जानकारी लिए बिना यात्रा तय न करें।
- रूपिन पास ट्रेक: यह ऊँचाई वाला ट्रेक झरनों, जंगलों और बर्फीले रास्तों के लिए जाना जाता है। मौसम के अनुसार इसकी कठिनाई काफी बढ़ सकती है।
- पिंडारी ग्लेशियर ट्रेक: कुमाऊँ क्षेत्र का यह लोकप्रिय ट्रेक पहाड़ी गाँवों और पिंडर नदी के आसपास से गुजरता है। रास्ते में प्राकृतिक नजारे और स्थानीय जीवन करीब से देखने को मिलता है।
- डोडीताल ट्रेक: उत्तरकाशी क्षेत्र में स्थित डोडीताल झील तक पहुँचने वाला यह ट्रेक जंगलों और पहाड़ी रास्तों से होकर जाता है। यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता और शांत वातावरण इसकी खासियत है।
ट्रेकिंग के दौरान कूड़ा न फैलाएँ, वन्यजीवों को परेशान न करें और बिना तैयारी के कठिन रास्तों पर न निकलें। जरूरत पड़ने पर स्थानीय गाइड की मदद लें।
जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क: जंगल और वन्यजीवों की दुनिया
उत्तराखंड सिर्फ मंदिरों और पहाड़ों के लिए ही नहीं, बल्कि वन्यजीवों के लिए भी प्रसिद्ध है। नैनीताल और पौड़ी गढ़वाल के आसपास फैला जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क भारत के सबसे पुराने राष्ट्रीय उद्यानों में से एक है। इसकी स्थापना 1936 में हैली नेशनल पार्क के नाम से हुई थी। बाद में इसका नाम संरक्षणवादी जिम कॉर्बेट के सम्मान में रखा गया। Uttarakhand
यहाँ बंगाल टाइगर, एशियाई हाथी, तेंदुए, हिरण और कई तरह के पक्षी पाए जाते हैं। पार्क में सफारी के लिए अलग-अलग क्षेत्र हैं और हर क्षेत्र के नियम व उपलब्धता अलग हो सकती है। बाघ दिखना तय नहीं होता, इसलिए सफारी का आनंद सिर्फ बाघ देखने की उम्मीद से न लें।
Uttarakhand में वन्यजीव पर्यटन करते समय जंगल के नियमों का पालन करना बेहद जरूरी है। सफारी के दौरान गाड़ी से बाहर न निकलें, जानवरों को खाना न दें और शोर न मचाएँ। बुकिंग से पहले पार्क की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध जोन, परमिट और समय की जानकारी जाँचें।
ऐपण कला, पिछौड़ा और पहाड़ी हस्तशिल्प
उत्तराखंड की पहचान यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ पारंपरिक कला से भी जुड़ी है। कुमाऊँ की ऐपण कला इसका अच्छा उदाहरण है। इसमें लाल गेरू वाले आधार पर चावल के घोल से सफेद रंग के सुंदर डिजाइन बनाए जाते हैं। त्योहारों, पूजा और शुभ अवसरों पर घरों की चौखटों या आँगन में ऐसी कलाकारी देखने को मिलती है। Uttarakhand
ऐपण से जुड़े डिजाइन आज कपड़ों, सजावटी सामान और घर की चीजों पर भी बनाए जाते हैं। दिसंबर 2021 में इसे भौगोलिक संकेत यानी GI टैग मिला था, जिससे इसकी पारंपरिक पहचान को मान्यता मिली।
रिंगाल से बनी टोकरियाँ और दूसरी उपयोगी चीजें भी स्थानीय हस्तशिल्प का हिस्सा हैं। रिंगाल पहाड़ी बाँस की एक किस्म है, जिससे कारीगर हाथ से कई तरह के सामान बनाते हैं। पुराने मंदिरों और घरों में लकड़ी की बारीक नक्काशी भी देखने को मिलती है।
Uttarakhand की कुमाऊँनी महिलाओं की पारंपरिक पोशाक में पिछौड़ा खास जगह रखता है। इसे आम तौर पर शुभ अवसरों और धार्मिक कार्यक्रमों में पहना जाता है। इसके अलावा ऊनी शॉल, टोपी और स्थानीय बुनाई के उत्पाद भी लोकप्रिय हैं।
यात्रा के दौरान स्थानीय कारीगरों से सीधे सामान खरीदने की कोशिश करें। इससे उनकी कला को बढ़ावा मिलता है और आपकी खरीदारी भी सफर की एक अच्छी याद बन जाती है। Uttarakhand
खेती, फल और गाँवों की बदलती जिंदगी
उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था में खेती और बागवानी का महत्वपूर्ण योगदान है। पहाड़ी क्षेत्रों में आलू, मंडुवा, झंगोरा, दालें और कई तरह की स्थानीय फसलें उगाई जाती हैं। कुछ इलाकों में सेब, नाशपाती और दूसरे फलों की खेती भी होती है। मैदानों और तराई के क्षेत्रों में खेती का स्वरूप अलग दिखाई देता है।
राज्य में खेती के साथ पशुपालन, जड़ी-बूटी, फल-फूल की खेती और पर्यटन से जुड़े कामों को बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही है। पंतनगर स्थित गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कृषि शिक्षा और शोध के लिए महत्वपूर्ण संस्थान है।
Uttarakhand के कई पहाड़ी गाँवों में रोजगार के अवसर बढ़ाना और पलायन की समस्या कम करना एक बड़ी चुनौती है। स्थानीय होमस्टे, गाँवों में पर्यटन, हस्तशिल्प और स्थानीय उत्पादों की बिक्री से कुछ परिवारों को अतिरिक्त आमदनी मिल सकती है। यात्रियों के तौर पर हम भी स्थानीय लोगों से सेवाएँ लेकर और स्थानीय उत्पाद खरीदकर इस प्रयास में मदद कर सकते हैं। Uttarakhand
पहाड़ों की सुरक्षा और जिम्मेदार पर्यटन
हिमालय का वातावरण बेहद संवेदनशील है। पहाड़ों पर सड़क निर्माण, बढ़ती भीड़, प्लास्टिक कचरा और अनियंत्रित निर्माण जैसी समस्याएँ पर्यावरण पर असर डाल सकती हैं। बारिश और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक घटनाएँ भी पहाड़ी इलाकों में यात्रा को प्रभावित करती हैं। इसलिए पर्यटन और विकास के साथ पर्यावरण की सुरक्षा पर ध्यान देना जरूरी है।
2013 की केदारनाथ आपदा और 2021 की चमोली आपदा ने दिखाया कि हिमालयी इलाकों में प्राकृतिक परिस्थितियों को समझना कितना जरूरी है। हर आपदा का कारण एक जैसा नहीं होता, लेकिन मौसम, भूगोल और निर्माण से जुड़े जोखिमों को गंभीरता से लेना चाहिए।
Uttarakhand घूमते समय अपना कचरा साथ रखें और उसे निर्धारित जगह पर ही डालें। नदियों या झीलों में प्लास्टिक न फेंकें, जंगलों में आग न जलाएँ और वन्यजीवों से दूरी बनाए रखें। स्थानीय लोगों की सलाह और प्रशासन के निर्देशों को भी गंभीरता से लें। Uttarakhand
यात्रा की तैयारी: मौसम, कपड़े और जरूरी बातें
उत्तराखंड जाने का सही समय इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस इलाके में जाना चाहते हैं। गर्मियों में कई हिल स्टेशन घूमने के लिए अच्छे रहते हैं। मानसून में हरियाली बढ़ती है, लेकिन भूस्खलन और सड़क बंद होने का खतरा भी रहता है। सर्दियों में ऊँचे इलाकों में बर्फबारी हो सकती है और कुछ रास्ते बंद हो सकते हैं।
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यात्रा पर निकलने से पहले मौसम का पूर्वानुमान और सड़क की ताजा स्थिति जरूर देखें। पहाड़ी रास्तों पर कम दूरी तय करने में भी कई घंटे लग सकते हैं, इसलिए एक दिन में बहुत ज्यादा जगहें देखने की योजना न बनाएँ।
गर्म कपड़े, आरामदायक जूते, रेनकोट या छाता, सनस्क्रीन, निजी दवाएँ और पानी की बोतल साथ रखें। ट्रेकिंग के लिए जा रहे हैं, तो जूते और बाकी सामान रास्ते के हिसाब से चुनें। चार धाम या किसी ऊँचाई वाले ट्रेक पर जाने से पहले स्वास्थ्य और पंजीकरण से जुड़ी जरूरी जानकारी जाँच लें। Uttarakhand
Five Colors of Travel की ओर से खास सुझाव
- स्थानीय संस्कृति का सम्मान करें। मंदिरों और गाँवों में स्थानीय नियमों का पालन करें। किसी की तस्वीर लेने से पहले अनुमति जरूर पूछें।
- स्थानीय खाना जरूर चखें। कुमाऊँनी और गढ़वाली व्यंजनों के साथ भट की चुड़कानी, गहत की दाल और स्थानीय अनाज से बने पकवानों का स्वाद लें।
- मौसम देखकर निकलें। मानसून और सर्दियों में सड़क की स्थिति और मौसम की जानकारी लेकर ही यात्रा करें।
- लोकल कारोबार को बढ़ावा दें। स्थानीय होमस्टे में रुकें और ऐपण कला, रिंगाल के सामान व दूसरे हस्तशिल्प स्थानीय कारीगरों से खरीदें।
- प्रकृति को साफ रखें। पहाड़ों, जंगलों और नदियों में कचरा न छोड़ें। ट्रेकिंग के दौरान निर्धारित रास्तों पर ही चलें।
उत्तराखंड की खूबसूरती सिर्फ बर्फ से ढकी चोटियों या प्रसिद्ध मंदिरों तक सीमित नहीं है। यहाँ की असली पहचान पहाड़ी गाँवों, स्थानीय खान-पान, पारंपरिक कला और लोगों की सादगी में भी दिखाई देती है। हर इलाके का अपना अलग अनुभव है, इसलिए अपनी पसंद के हिसाब से जगह चुनें और यात्रा को आराम से पूरा करें।
अगर आप Uttarakhand घूमने जा रहे हैं, तो सिर्फ मशहूर जगहों की सूची पूरी करने के बजाय आसपास की जिंदगी को भी करीब से देखें। किसी स्थानीय दुकान पर चाय पीना, पहाड़ी खाना चखना या गाँव के बाजार में घूमना भी सफर की अच्छी याद बन सकता है। थोड़ी तैयारी और जिम्मेदार तरीके से की गई यात्रा आपकी छुट्टियों को और खास बना देगी। Uttarakhand