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Tawang: अरुणाचल की इस खूबसूरत जगह पर क्या-क्या देखें?

Tawang

कभी ऐसी जगह जाने का मन हुआ है, जहाँ सुबह खिड़की खोलते ही सामने बर्फ से ढकी पहाड़ियाँ दिखाई दें, रास्ते बादलों के बीच से गुजरते हों और दूर किसी मठ से आती प्रार्थनाओं की आवाज़ पूरे माहौल को शांत कर दे? जहाँ एक तरफ कुदरत की खूबसूरती हो, तो दूसरी तरफ देश की रक्षा में जुटे जवानों की बहादुरी की कहानियाँ। अरुणाचल प्रदेश का Tawang कुछ ऐसा ही है।

हिमालय की ऊँची पहाड़ियों के बीच बसा Tawang सिर्फ घूमने-फिरने की जगह नहीं, बल्कि यहाँ की संस्कृति, बौद्ध परंपरा और भारत के इतिहास को करीब से समझने का मौका भी है। यहाँ आपको सदियों पुराना तवांग मठ, नीले पानी वाली झीलें, ऊँचे पहाड़ी दर्रे और गरजते झरने देखने को मिलेंगे। लेकिन इस सफर की अपनी चुनौतियाँ भी हैं। ऊँचाई, ठंड, घुमावदार सड़कें और मौसम में अचानक बदलाव आपकी यात्रा को थोड़ा मुश्किल बना सकते हैं। इसलिए अगर आप Tawang घूमने की योजना बना रहे हैं, तो इस ट्रैवल गाइड में जानिए यहाँ के प्रमुख पर्यटन स्थल, घूमने का सही समय, परमिट, पहुँचने का रास्ता और यात्रा से जुड़ी ज़रूरी बातें।

Tawang का नाम कैसे पड़ा? जानिए इसकी दिलचस्प कहानी

Tawang के नाम के पीछे एक दिलचस्प स्थानीय मान्यता जुड़ी हुई है। तिब्बती भाषा में ‘ता’ का अर्थ घोड़ा और ‘वांग’ का संबंध चुने जाने या आशीर्वाद से जोड़ा जाता है। प्रचलित लोककथा के अनुसार, 17वीं शताब्दी में मेराक लामा लोद्रे ग्यात्सो एक मठ बनाने के लिए सही जगह तलाश रहे थे। काफी खोजने के बाद भी जब उन्हें उपयुक्त स्थान नहीं मिला, तो उन्होंने प्रार्थना की।

कहा जाता है कि इसके बाद उनका घोड़ा गायब हो गया और तलाश करते हुए उन्हें वह एक पहाड़ी पर मिला। उन्होंने इस घटना को ईश्वरीय संकेत माना और उसी जगह मठ बनवाने का फैसला किया। इसी कहानी से Tawang नाम जुड़ा माना जाता है। यह लोककथा यहाँ की धार्मिक पहचान का अहम हिस्सा है, हालाँकि इसे प्रमाणित ऐतिहासिक घटना की तरह नहीं, बल्कि स्थानीय परंपरा के रूप में समझना चाहिए।

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Tawang का ऐतिहासिक महत्व: दलाई लामा से 1962 के युद्ध तक

Tawang का महत्व केवल इसकी प्राकृतिक खूबसूरती तक सीमित नहीं है। यह तिब्बती बौद्ध धर्म और भारत के सीमावर्ती इतिहास से गहराई से जुड़ा हुआ है। छठे दलाई लामा सांगयांग ग्यात्सो का जन्म तवांग क्षेत्र के उरगेलिंग गोम्पा में हुआ था। वर्ष 1959 में तिब्बत से निकलने के बाद चौदहवें दलाई लामा ने भारत में प्रवेश किया और आगे की यात्रा के दौरान तवांग पहुँचे।

इस वजह से भी यह क्षेत्र बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए खास महत्व रखता है। दूसरी तरफ, 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान तवांग और इसके आसपास के इलाकों ने युद्ध की गंभीर परिस्थितियाँ देखीं। आज यहाँ बने युद्ध स्मारक और सैन्य इतिहास से जुड़े स्थल उन जवानों की याद दिलाते हैं जिन्होंने देश की रक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित किया। Tawang की यात्रा करते समय इन जगहों को देखना आपको इस सीमावर्ती क्षेत्र की अहमियत समझने में मदद करता है।

मोन्पा जनजाति: Tawang की संस्कृति और मेहमाननवाज़ी

Tawang की पहचान यहाँ रहने वाले मोन्पा समुदाय के बिना अधूरी है। यह समुदाय अपनी खास जीवनशैली, पारंपरिक कपड़ों, हस्तकला और तिब्बती बौद्ध परंपराओं के लिए जाना जाता है। पहाड़ी मौसम और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार यहाँ के लोगों ने अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को ढाला है। घरों की बनावट, खान-पान और त्योहारों में इस क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों का असर साफ दिखाई देता है।

पारंपरिक खेती में जैविक खाद का इस्तेमाल और स्थानीय संसाधनों पर निर्भरता भी यहाँ की ग्रामीण जीवनशैली का हिस्सा रही है। अगर आप Tawang घूमने जाते हैं, तो सिर्फ लोकप्रिय पर्यटन स्थलों तक सीमित न रहें। स्थानीय बाज़ार में समय बिताएँ, पारंपरिक चीज़ों को देखें और लोगों से उनकी संस्कृति के बारे में जानें। किसी स्थानीय परिवार के होमस्टे में ठहरने का मौका मिले, तो आप यहाँ की मेहमाननवाज़ी और जीवनशैली को और करीब से समझ पाएँगे।

लोसार और तोर्ग्या: Tawang के रंगीन त्योहार

Tawang में त्योहारों का अपना अलग ही रंग देखने को मिलता है। लोसार तिब्बती नव वर्ष का त्योहार है, जो आम तौर पर फरवरी या मार्च के आसपास मनाया जाता है। इस मौके पर लोग अपने घरों और धार्मिक स्थलों की सफाई करते हैं, परिवार के साथ समय बिताते हैं और नई शुरुआत का स्वागत करते हैं। तोर्ग्या यहाँ के प्रमुख धार्मिक आयोजनों में से एक है, जो आम तौर पर जनवरी में तवांग मठ में मनाया जाता है।

इस दौरान बौद्ध भिक्षु पारंपरिक पोशाक और मुखौटे पहनकर छम नृत्य प्रस्तुत करते हैं। इन प्रस्तुतियों में धार्मिक प्रतीकों और स्थानीय मान्यताओं का खास महत्व होता है। छोकसर भी क्षेत्र की एक पारंपरिक धार्मिक परंपरा है, जिसमें पवित्र ग्रंथों के साथ खेतों की परिक्रमा की जाती है। अगर आप Tawang को उसके सांस्कृतिक रूप में देखना चाहते हैं, तो त्योहारों के समय यात्रा की योजना बना सकते हैं। हालाँकि, यात्रा से पहले आयोजन की तारीख और कार्यक्रम की जानकारी स्थानीय स्तर पर ज़रूर जाँच लें।

तवांग मठ: पहाड़ों के बीच बसा आध्यात्मिक केंद्र

तवांग मठ (Tawang Monastery) यहाँ का सबसे प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। इसे गादेन नामग्याल ल्हात्से भी कहा जाता है और यह भारत के सबसे बड़े बौद्ध मठों में गिना जाता है। 17वीं शताब्दी में स्थापित यह मठ पहाड़ी पर स्थित है, जहाँ से आसपास की घाटी का खूबसूरत नज़ारा दिखाई देता है। मठ के मुख्य प्रार्थना भवन में भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमा है। यहाँ की दीवारों पर बने चित्र, धार्मिक सजावट और पुराने ग्रंथ इस जगह की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक पहचान को दर्शाते हैं।

मठ के परिसर में घूमते हुए आपको भिक्षुओं की दिनचर्या, प्रार्थना और धार्मिक अध्ययन की झलक भी मिल सकती है। Tawang आने वाले यात्रियों को इस जगह के लिए पर्याप्त समय निकालना चाहिए। यहाँ जाते समय शालीन कपड़े पहनें, शांत रहें और तस्वीरें लेने से पहले अनुमति माँगें। ध्यान रखें कि मठ एक सक्रिय धार्मिक स्थल है, इसलिए वहाँ के नियमों का सम्मान करना ज़रूरी है।

सेला पास और सेला टनल: बर्फीले पहाड़ों का शानदार रास्ता

Tawang की सड़क यात्रा में सेला पास सबसे यादगार पड़ावों में से एक है। समुद्र तल से लगभग 13,700 फीट की ऊँचाई पर स्थित यह पहाड़ी दर्रा अपने बर्फीले नज़ारों और आसपास की झीलों के लिए जाना जाता है। सर्दियों में यहाँ भारी बर्फबारी हो सकती है, जबकि साफ मौसम में पहाड़ों और आसमान का नज़ारा बेहद खूबसूरत दिखाई देता है।

इसी मार्ग पर बनी सेला टनल ने तवांग तक पहुँचने वाले रास्ते को अधिक भरोसेमंद बनाने में अहम भूमिका निभाई है। मार्च 2024 में इसका उद्घाटन किया गया था। इससे खराब मौसम के दौरान सड़क संपर्क बेहतर करने में मदद मिली है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि रास्ता हर परिस्थिति में खुला ही रहेगा। भारी बर्फबारी, भूस्खलन या दूसरी मुश्किलों के कारण यात्रा प्रभावित हो सकती है। इसलिए Tawang जाते समय सेला पास की स्थिति पहले जाँचें और सड़क पर स्थानीय प्रशासन तथा सुरक्षा कर्मियों के निर्देशों का पालन करें।

बुम ला पास: भारत-चीन सीमा के करीब एक खास अनुभव

बुम ला पास Tawang के सबसे चर्चित सीमावर्ती स्थलों में से एक है। यह भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास स्थित है और समुद्र तल से लगभग 15,000 फीट से अधिक ऊँचाई पर है। यहाँ पहुँचने का अनुभव सामान्य पर्यटन स्थलों से काफी अलग होता है, क्योंकि यह एक संवेदनशील सीमा क्षेत्र है। आसपास की ऊँची पहाड़ियाँ, ठंडी हवा और कठिन भौगोलिक परिस्थितियाँ इस जगह की खास पहचान हैं।

बुम ला जाने के लिए विशेष अनुमति की आवश्यकता होती है और यात्रा की अनुमति स्थानीय प्रशासन तथा संबंधित सैन्य अधिकारियों के नियमों पर निर्भर करती है। आम तौर पर यात्रियों को तवांग पहुँचने के बाद परमिट की प्रक्रिया पूरी करनी होती है। स्थानीय पंजीकृत टैक्सी की आवश्यकता और अन्य नियमों की जानकारी भी पहले लेनी चाहिए। Tawang यात्रा के दौरान बुम ला जाने की योजना बना रहे हैं, तो इसे मौसम और अनुमति के हिसाब से तय करें। यह भी याद रखें कि सीमा क्षेत्र में सुरक्षा संबंधी निर्देशों का पालन करना सबसे ज़रूरी है।

माधुरी झील: पहाड़ों के बीच एक अनोखा नज़ारा

शुंगत्सर झील (Shonga-tser Lake) को बहुत से यात्री माधुरी झील के नाम से जानते हैं। यह झील पहाड़ों के बीच स्थित है और इसके पानी में दिखाई देने वाले सूखे पेड़ों के तने इसे बाकी झीलों से अलग रूप देते हैं। स्थानीय भूगोल और पुराने भूकंपीय बदलावों से जुड़ी इस झील का दृश्य साफ मौसम में बेहद आकर्षक लगता है। वर्ष 1997 में यहाँ हिंदी फिल्म ‘कोयला’ की शूटिंग हुई थी, जिसमें माधुरी दीक्षित दिखाई दी थीं।

इसके बाद यह जगह माधुरी झील के नाम से भी मशहूर हो गई। यहाँ पहुँचने का रास्ता मौसम और सड़क की स्थिति पर निर्भर कर सकता है, इसलिए जाने से पहले स्थानीय जानकारी लेना बेहतर है। झील के किनारे समय बिताते हुए कचरा न फैलाएँ और पानी में उतरने या किनारे से दूर जाने से बचें। Tawang की यात्रा में यह जगह प्रकृति और फोटोग्राफी पसंद करने वालों के लिए खास पड़ाव हो सकती है।

नूरानांग जलप्रपात: पानी की गूंज और वीरता की कहानी

नूरानांग जलप्रपात, जिसे जंग फॉल्स भी कहा जाता है, तवांग क्षेत्र के सबसे खूबसूरत झरनों में से एक है। जंग कस्बे के आसपास स्थित यह जलप्रपात ऊँचाई से चट्टानों के बीच गिरता है और इसकी आवाज़ दूर से ही सुनाई दे सकती है। बारिश के मौसम में यहाँ पानी का बहाव तेज़ हो सकता है, जबकि दूसरे मौसमों में भी इसका नज़ारा आकर्षक रहता है।

इस जगह का नाम 1962 के युद्ध से जुड़ी स्थानीय वीरता की कहानियों के साथ भी लिया जाता है। नूरा नाम की एक स्थानीय युवती और भारतीय सैनिक जसवंत सिंह रावत की कहानी इस क्षेत्र में सुनाई जाती है, हालाँकि इसके अलग-अलग विवरण मिलते हैं। इसलिए इसे स्थानीय स्मृति और प्रचलित कथा के रूप में समझना बेहतर है। Tawang से आते-जाते इस झरने को देखने के लिए समय निकालें, लेकिन फिसलन भरी चट्टानों के पास सावधानी रखें और सुरक्षा सीमा के भीतर ही रहें।

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जसवंत गढ़ और तवांग वॉर मेमोरियल: जवानों को श्रद्धांजलि

Tawang की यात्रा में जसवंत गढ़ युद्ध स्मारक और तवांग वॉर मेमोरियल का अनुभव खास महत्व रखता है। जसवंत गढ़ राइफलमैन जसवंत सिंह रावत की याद में बनाया गया है, जिन्हें 1962 के युद्ध में दिखाई गई वीरता के लिए याद किया जाता है। उनके बारे में कई प्रेरक कहानियाँ स्थानीय रूप से प्रचलित हैं। तवांग शहर में स्थित वॉर मेमोरियल भी उन भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि देता है जिन्होंने युद्ध में अपनी जान गंवाई।

यहाँ नामों और स्मृतियों के माध्यम से देश की रक्षा करने वाले जवानों के बलिदान को याद किया जाता है। इन जगहों पर घूमना केवल पर्यटन का हिस्सा नहीं है, बल्कि देश के सीमावर्ती इतिहास को समझने का अवसर भी है। Tawang जाते समय इन स्मारकों को अपनी योजना में शामिल करें और वहाँ की गरिमा बनाए रखें। अगर किसी स्थान पर सैन्य नियम लागू हों, तो उनके निर्देशों का पालन करें।

Tawang घूमने का सही समय: किस मौसम में जाएँ?

Tawang हर मौसम में अलग दिखाई देता है, इसलिए सही समय चुनना इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस तरह का अनुभव चाहते हैं। अक्टूबर और नवंबर में आसमान साफ रहने की संभावना रहती है और पहाड़ों के नज़ारे फोटोग्राफी के लिए अच्छे हो सकते हैं। दिसंबर से फरवरी के बीच बर्फबारी का रोमांच मिल सकता है, लेकिन तापमान शून्य से नीचे जा सकता है और रास्तों पर बर्फ जमा होने से यात्रा मुश्किल हो सकती है।

मार्च से जून के बीच मौसम अपेक्षाकृत सुहावना रहता है और पहाड़ियों पर हरियाली लौटने लगती है। जुलाई से सितंबर तक मानसून में भारी बारिश और भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है, इसलिए इस दौरान यात्रा की योजना बहुत सावधानी से बनानी चाहिए। Tawang के लिए कोई भी मौसम चुनें, निकलने से पहले मौसम का पूर्वानुमान और सड़क की ताज़ा स्थिति ज़रूर जाँचें। ऊँचाई वाले इलाकों में मौसम कुछ ही घंटों में बदल सकता है।

Tawang कैसे पहुँचें? गुवाहाटी से यात्रा की पूरी जानकारी

Tawang तक पहुँचने के लिए बहुत से यात्री असम के गुवाहाटी से अपनी यात्रा शुरू करते हैं। गुवाहाटी तक हवाई जहाज़, ट्रेन और सड़क मार्ग से पहुँचा जा सकता है। इसके बाद सड़क से तेज़पुर, भालुकपोंग या दिरांग होते हुए तवांग की ओर बढ़ा जा सकता है। रास्ते में पहाड़ी घाटियाँ, जंगल और ऊँचे दर्रे दिखाई देते हैं, लेकिन घुमावदार सड़कों के कारण यात्रा लंबी हो सकती है।

गुवाहाटी से Tawang की दूरी चुने गए रास्ते के अनुसार लगभग 450 से 500 किलोमीटर के आसपास हो सकती है। कई यात्री इस सफर को दो दिनों में पूरा करते हैं और बीच में दिरांग या आसपास के किसी कस्बे में रुकते हैं। सेला टनल के कारण सड़क संपर्क में सुधार हुआ है, फिर भी मौसम और सड़क की स्थिति के अनुसार यात्रा का समय बदल सकता है। पहली बार जाने वाले यात्रियों के लिए अनुभवी ड्राइवर के साथ यात्रा करना बेहतर रहेगा।

सात दिनों में Tawang घूमने का आसान यात्रा कार्यक्रम

अगर आपके पास सात दिन हैं, तो Tawang और आसपास की जगहों को आराम से देखने के लिए यह कार्यक्रम उपयोगी हो सकता है। पहले दिन गुवाहाटी से भालुकपोंग या तेज़पुर की ओर जाएँ और रात वहीं रुकें। दूसरे दिन दिरांग पहुँचें और समय मिले तो आसपास की घाटी देखें। तीसरे दिन सेला पास या सेला टनल के रास्ते Tawang पहुँचें। चौथे दिन तवांग मठ, उरगेलिंग गोम्पा, बुद्ध प्रतिमा और वॉर मेमोरियल घूम सकते हैं।

पाँचवें दिन मौसम और परमिट की अनुमति मिलने पर बुम ला पास और माधुरी झील जाने की योजना बनाएँ। छठे दिन Tawang से दिरांग या बोमडिला की ओर लौटें और रास्ते में नूरानांग जलप्रपात देखें। सातवें दिन गुवाहाटी की ओर वापसी शुरू करें। यह एक सुझाव भर है, पक्का कार्यक्रम नहीं। बर्फबारी, सड़क बंद होने या परमिट में देरी की स्थिति के लिए एक अतिरिक्त दिन रखना समझदारी होगी।

Tawang में क्या खाएँ और कहाँ ठहरें?

Tawang में स्थानीय मोन्पा भोजन के साथ तिब्बती और दूसरे उत्तर-पूर्वी व्यंजनों का स्वाद भी मिल सकता है। ठंडे मौसम में गरमा-गरम मोमो और थुपका खाना अच्छा लगता है। बटर टी यहाँ की पारंपरिक पेय संस्कृति का हिस्सा है और इसे चखना एक अलग अनुभव हो सकता है। इसके अलावा स्थानीय भोजनालयों में चावल, सब्ज़ियों और मांस से बने व्यंजन मिल सकते हैं।

शाकाहारी भोजन चाहने वाले यात्रियों को भी विकल्प मिल जाते हैं, लेकिन दूरस्थ इलाकों में विकल्प सीमित हो सकते हैं, इसलिए पहले पूछ लेना बेहतर है। ठहरने के लिए Tawang और दिरांग में होटल, गेस्टहाउस, सरकारी पर्यटन आवास और स्थानीय होमस्टे जैसे विकल्प मिलते हैं। सर्दियों में कमरा बुक करते समय हीटर, गर्म पानी और बिजली की उपलब्धता की पुष्टि कर लें। यात्रा के दिनों में नकद पैसे भी रखें, क्योंकि पहाड़ी इलाकों में नेटवर्क और डिजिटल भुगतान हर जगह भरोसेमंद नहीं होते।

Tawang जाने से पहले परमिट और पैकिंग की तैयारी

Tawang अरुणाचल प्रदेश में स्थित है, इसलिए भारतीय नागरिकों को सामान्य तौर पर राज्य में प्रवेश के लिए इनर लाइन परमिट यानी ILP की आवश्यकता होती है, जबकि कुछ श्रेणियों के लोगों पर अलग नियम लागू हो सकते हैं। परमिट के लिए आवेदन करने से पहले अरुणाचल प्रदेश के आधिकारिक पोर्टल या संबंधित सरकारी कार्यालय से मौजूदा नियम और दस्तावेज़ों की जानकारी लें।

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बुम ला पास के लिए अलग अनुमति की प्रक्रिया होती है, जो स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा अधिकारियों की मंज़ूरी पर निर्भर करती है। यात्रा के दौरान पहचान पत्र, परमिट की डिजिटल और प्रिंटेड कॉपी तथा बुकिंग की जानकारी अपने पास रखें। पैकिंग में गर्म कपड़े, थर्मल इनरवियर, दस्ताने, ऊनी टोपी, विंडप्रूफ जैकेट और अच्छी पकड़ वाले जूते ज़रूर रखें। ऊँचाई पर पहुँचने के बाद शरीर को मौसम के अनुसार ढलने का समय दें, पानी पीते रहें और अस्वस्थ महसूस होने पर इसे नज़रअंदाज़ न करें। Tawang की यात्रा तभी बेहतर होगी, जब आप रोमांच के साथ अपनी सुरक्षा का भी ध्यान रखेंगे।

Five Colors of Travel की ओर से खास सुझाव

  • पहले दिन आराम करें। ऊँचाई पर पहुँचने के बाद शरीर को मौसम और कम ऑक्सीजन के अनुकूल होने का समय दें। शुरुआत में बहुत ज्यादा भागदौड़ न करें और पर्याप्त पानी पिएँ।
  • परमिट पहले से तैयार रखें। अरुणाचल प्रदेश के ILP और बुम ला पास की अनुमति के नियम यात्रा से पहले जाँच लें। दस्तावेज़ों की प्रिंटेड और डिजिटल कॉपी साथ रखें।
  • सुबह जल्दी निकलें। सेला पास और बुम ला जैसे ऊँचाई वाले इलाकों में मौसम तेजी से बदल सकता है। स्थानीय सलाह के अनुसार यात्रा शुरू करें और शाम तक लौटने की योजना बनाएँ।
  • स्थानीय संस्कृति का सम्मान करें। तवांग मठ में तस्वीरें लेने से पहले अनुमति माँगें, प्रार्थना के समय शांति बनाए रखें और धार्मिक परंपराओं का सम्मान करें।
  • यात्रा में एक-दो दिन का अतिरिक्त समय रखें। बर्फबारी, बारिश, भूस्खलन या सड़क बंद होने के कारण कार्यक्रम बदल सकता है। इसलिए हर जगह पहुँचने के लिए बहुत सख्त समय तय न करें।

Tawang उन जगहों में से है जहाँ प्राकृतिक खूबसूरती, आध्यात्मिक शांति और देश के इतिहास की झलक एक साथ मिलती है। यहाँ के बर्फीले पहाड़, प्राचीन मठ, शांत झीलें और युद्ध स्मारक यात्रा को खास बना देते हैं। लेकिन इस जगह को देखने का सबसे अच्छा तरीका है कि आप इसे जल्दबाज़ी में घूमने के बजाय समय लेकर समझें। स्थानीय लोगों की संस्कृति को जानें, मौसम का सम्मान करें और पहाड़ों में सुरक्षित यात्रा करें।

अगर आप अपनी अगली छुट्टियों में ऐसी जगह जाना चाहते हैं जहाँ हर मोड़ पर कोई नया नज़ारा और हर पड़ाव पर कोई नई कहानी मिले, तो Tawang को अपनी यात्रा सूची में ज़रूर शामिल करें।

Shivani Pal

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