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Triund Trek: Delhi से 3 दिन में घूमने की पूरी Travel Guide

Triund

Delhi की भीड़, लगातार भागती गाड़ियां, काम का तनाव और रोज़ की वही भागदौड़ कई बार ऐसा मन बना देती है कि बस कहीं दूर निकल जाएं। ऐसी जगह, जहां सुबह आंख खुले तो सामने ऊंचे पहाड़ हों, हवा में देवदार की खुशबू हो और कुछ घंटों के लिए फोन से ज्यादा पहाड़ों में मन लगे। अगर आप भी ऐसा ही कोई छोटा और बजट वाला पहाड़ी सफर ढूंढ रहे हैं, तो Triund आपके लिए काफी अच्छा विकल्प हो सकता है।

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में मैकलॉडगंज और धर्मकोट के ऊपर बसा Triund करीब 2,850 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एक खूबसूरत पहाड़ी मैदान है। खास बात यह है कि यहां पहुंचने के लिए आपको कोई बहुत मुश्किल या लंबा ट्रेक करने की जरूरत नहीं पड़ती। पहली बार ट्रेकिंग करने वाले लोग भी सही तैयारी के साथ यहां तक पहुंच सकते हैं।

रास्ते में देवदार के जंगल, छोटे कैफ़े, पहाड़ों के बीच खुलते नज़ारे और ऊपर पहुंचने के बाद सामने खड़ी धौलाधार की बर्फीली चोटियां इस सफर को खास बना देती हैं। अगर आप Delhi से Triund जाने का प्लान बना रहे हैं, तो सिर्फ ट्रेक के बारे में जानना काफी नहीं है।

आपको यह भी पता होना चाहिए कि Delhi से मैकलॉडगंज कैसे पहुंचना है, कहां रुकना है, गल्लू देवी मंदिर तक कैसे जाना है, वन विभाग के नियम क्या हैं, रास्ते में खाना-पानी कहां मिलेगा और कितना बजट लेकर चलना चाहिए। 

Delhi से मैकलॉडगंज पहुंचने का सबसे आसान तरीका क्या है?

Delhi से Triund ट्रेक सीधे शुरू नहीं होता। सबसे पहले आपको मैकलॉडगंज या धर्मशाला पहुंचना होगा। Delhi से धर्मशाला की दूरी लगभग 480 से 520 किलोमीटर के आसपास है और सड़क से सामान्य तौर पर 10 से 12 घंटे लग सकते हैं।

अगर आपका बजट सीमित है तो रात की बस सबसे आसान विकल्प बन सकती है। Delhi के कश्मीरी गेट आईएसबीटी, मजनू का टीला और कुछ दूसरे प्रमुख स्थानों से धर्मशाला या मैकलॉडगंज जाने वाली बसें मिलती हैं। सरकारी और निजी दोनों तरह की बसों के विकल्प रहते हैं और किराया बस के प्रकार के हिसाब से बदलता रहता है।

रात की बस से सफर करने पर समय और पैसा दोनों बच सकते हैं

Delhi से Triund जाने वालों के लिए रात की बस काफी सुविधाजनक रहती है। शाम या रात को Delhi से निकलकर सुबह धर्मशाला या मैकलॉडगंज पहुंच सकते हैं। इससे दिन का ज्यादा हिस्सा सफर में खराब नहीं होता और होटल में एक अतिरिक्त रात रुकने का खर्च भी बच सकता है।

Triund

हालांकि बस बुक करने से पहले यह जरूर देखें कि बस आपको कहां उतारेगी और वहां से आपके स्टे तक कैसे जाना है। अगर आप सुबह जल्दी पहुंच रहे हैं तो पहले से होटल या होमस्टे को अपने पहुंचने का समय बता देना बेहतर रहेगा।

ट्रेन से जाना हो तो पठानकोट एक अच्छा विकल्प है

अगर आप बस की जगह ट्रेन से जाना चाहते हैं तो Triund के लिए पठानकोट तक ट्रेन लेना एक विकल्प हो सकता है। Delhi से रात में चलने वाली कई ट्रेनें सुबह पठानकोट पहुंचती हैं। पठानकोट से धर्मशाला और मैकलॉडगंज के लिए बस और टैक्सी मिल सकती है।

सड़क से आगे का सफर लगभग ढाई से तीन घंटे का हो सकता है। ट्रेन से जाने में सफर थोड़ा लंबा हो जाता है, लेकिन जिन्हें लंबी बस यात्रा पसंद नहीं है उनके लिए यह तरीका आरामदायक लग सकता है।

फ्लाइट से जाना हो तो गग्गल एयरपोर्ट सबसे पास है

समय बहुत कम है और बजट ज्यादा है तो Triund जाने के लिए फ्लाइट का विकल्प भी देखा जा सकता है। धर्मशाला के पास गग्गल यानी कांगड़ा एयरपोर्ट है। एयरपोर्ट से धर्मशाला और फिर मैकलॉडगंज तक टैक्सी ली जा सकती है। लेकिन फ्लाइट की कीमत मौसम और तारीख के हिसाब से काफी बदल सकती है। इसलिए बजट ट्रिप के लिए बस या ट्रेन ज्यादा व्यावहारिक रहती है।

त्रियुंड ट्रेक के लिए धर्मकोट में रुकना क्यों सही रहेगा?

अगर आपका मुख्य मकसद Triund ट्रेक करना है तो मैकलॉडगंज के बजाय धर्मकोट में रुकना ज्यादा सुविधाजनक हो सकता है। धर्मकोट मैकलॉडगंज से करीब दो किलोमीटर ऊपर है और यहां से गल्लू देवी मंदिर तक पहुंचना आसान रहता है।

यहां का माहौल भी मुख्य बाजार की तुलना में काफी शांत है। आसपास छोटे कैफ़े, हॉस्टल और होमस्टे मिल जाते हैं। इसलिए ट्रेक से एक रात पहले धर्मकोट में रुकने से सुबह जल्दी निकलना आसान हो जाता है।

गल्लू देवी मंदिर ही है असली ट्रेकिंग पॉइंट

Triund का मुख्य पैदल रास्ता गल्लू देवी मंदिर के पास से शुरू होता है। यहां तक मैकलॉडगंज या धर्मकोट से ऑटो या टैक्सी लेकर पहुंचा जा सकता है। गल्लू देवी मंदिर के आसपास देवदार और बुरांश के पेड़ों से घिरा शांत माहौल मिलता है।

यहीं से आगे वन क्षेत्र में ट्रेक शुरू होता है। अगर आप पहली बार जा रहे हैं तो शुरुआत में ही बहुत तेज चलने के बजाय अपनी गति सामान्य रखें, क्योंकि आगे की चढ़ाई में ऊर्जा की जरूरत पड़ेगी।

भागसू वाला रास्ता या गल्लू देवी वाला रास्ता?

Triund जाने के लिए अलग-अलग रास्तों की चर्चा अक्सर होती है। भागसू नाग की तरफ से जाने वाला रास्ता भागसू वाटरफॉल के आसपास से होकर जाता है और कुछ हिस्सों में ज्यादा खड़ी चढ़ाई वाला है।

दूसरी तरफ गल्लू देवी वाला रास्ता यात्रियों के बीच ज्यादा लोकप्रिय है और पहली बार ट्रेक करने वालों के लिए आम तौर पर सुविधाजनक माना जाता है। अगर आपका मकसद आराम से ऊपर पहुंचना है तो गल्लू देवी से शुरू होने वाले रास्ते को प्राथमिकता दी जा सकती है।

2026 में ट्रेक से पहले फॉरेस्ट नियम जरूर जान लें

Triund को लेकर वन विभाग और प्रशासन की तरफ से पर्यावरण और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए नियम लागू किए जाते हैं। आपके दिए कंटेंट के अनुसार डे-हाइकर्स के लिए गल्लू देवी चेकपोस्ट पर कट-ऑफ समय 11:30 बजे बताया गया है, जबकि पंजीकृत कैंपिंग बुकिंग वाले यात्रियों के लिए अलग समय व्यवस्था बताई गई है।

इसी तरह प्रवेश शुल्क और कैंपिंग की सीमा भी लागू हो सकती है। क्योंकि नियम और शुल्क समय के साथ बदल सकते हैं, इसलिए 2026 में जाने से पहले स्थानीय वन विभाग से उसी तारीख की जानकारी जरूर जांच लें।

त्रियुंड की चढ़ाई कितनी मुश्किल है?

कागज पर Triund का ट्रेक बहुत आसान लग सकता है, लेकिन पहली बार पहाड़ चढ़ने वाले व्यक्ति को यह फिर भी थका सकता है। गल्लू देवी से ऊपर जाते हुए शुरुआत में जंगल का रास्ता मिलता है और धीरे-धीरे चढ़ाई बढ़ती जाती है।

Triund

रास्ते में कई जगह बैठकर आराम करने की जरूरत पड़ सकती है। आपको तेज चलकर किसी से रेस नहीं करनी है। पहाड़ पर अपनी गति से चलना ही सबसे सही तरीका है। हर 30-40 मिनट में थोड़ा पानी पीना और जरूरत के अनुसार छोटा ब्रेक लेना काफी मदद करता है।

मैजिक व्यू कैफे पर पहली बड़ी राहत मिलती है

Triund के रास्ते में मैजिक व्यू कैफे यात्रियों के लिए एक अच्छा ब्रेक पॉइंट बन जाता है। यहां पहुंचकर पहली बार नीचे फैली कांगड़ा घाटी का खुला नज़ारा देखने को मिलता है। रास्ते में चाय, कॉफी और मैगी जैसी चीजें मिल सकती हैं।

अगर आप सुबह जल्दी निकले हैं तो यहां थोड़ी देर बैठकर आराम करना अच्छा लगेगा। लेकिन बहुत लंबा ब्रेक लेने से बचें, खासकर अगर आपको उसी दिन वापस नीचे भी आना है।

मैजिक व्यू के बाद रास्ता और खुलने लगता है

मैजिक व्यू कैफे के बाद Triund का रास्ता धीरे-धीरे ज्यादा खुला महसूस होने लगता है। पेड़ों के बीच से निकलते हुए कई जगह पहाड़ों का बड़ा हिस्सा दिखाई देने लगता है। कुछ हिस्सों में चढ़ाई पहले से थोड़ी ज्यादा महसूस हो सकती है।

यहां अपनी सांस और कदम दोनों को नियंत्रित रखना जरूरी है। अगर आप थक रहे हैं तो दो मिनट रुकना कोई कमजोरी नहीं है। पहाड़ पर जल्दी पहुंचने से ज्यादा जरूरी सुरक्षित तरीके से पहुंचना है।

22 कर्वेस वाला हिस्सा क्यों याद रह जाता है?

Triund ट्रेक का आखिरी हिस्सा कई यात्रियों को सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण लगता है। इसे आम तौर पर 22 कर्वेस के नाम से जाना जाता है। लगातार घुमावदार चढ़ाई के कारण इस हिस्से में सांस जल्दी फूल सकती है।

पथरीली जमीन पर अच्छी ग्रिप वाले जूते बहुत काम आते हैं। यहां छोटे कदम उठाकर धीरे-धीरे ऊपर बढ़ना बेहतर है। अगर आपके पास ट्रेकिंग पोल है तो वह भी खासकर उतरते समय घुटनों पर पड़ने वाले दबाव को कम करने में मदद कर सकता है।

आखिरकार त्रियुंड टॉप पर पहुंचने का पल

जब Triund के आखिरी हिस्से को पार करके आप ऊपर खुले मैदान में पहुंचते हैं, तो अचानक पूरा नज़ारा बदल जाता है। नीचे कांगड़ा घाटी और सामने धौलाधार की विशाल चोटियां दिखाई देती हैं।

कई लोग इस जगह पहुंचते ही कुछ देर चुपचाप बैठ जाते हैं, क्योंकि सामने का नज़ारा तस्वीर से कहीं ज्यादा बड़ा लगता है। यही वह जगह है जिसके लिए पूरी चढ़ाई की मेहनत की जाती है। अगर मौसम साफ हो तो सुबह और शाम का समय यहां खास खूबसूरत लग सकता है।

त्रियुंड में रात रुकना है तो पहले से योजना बनाएं

अगर आप Triund पर रात बिताने की योजना बना रहे हैं तो कैंपिंग की व्यवस्था पहले से समझ लें। टेंट, स्लीपिंग बैग और खाने के पैकेज स्थानीय ऑपरेटरों के जरिए मिल सकते हैं। कीमत मौसम और सुविधा के अनुसार बदलती है।

रात में तापमान नीचे काफी गिर सकता है, इसलिए सिर्फ यह सोचकर न जाएं कि दिन में धूप अच्छी थी। अच्छी जैकेट, गर्म कपड़े और रात के लिए सही स्लीपिंग बैग बहुत जरूरी हैं।

धर्मकोट में स्टे कितना महंगा पड़ सकता है?

Triund ट्रेक से पहले या बाद में धर्मकोट में रुकना हो तो यहां हॉस्टल, डॉर्म और होमस्टे के कई विकल्प मिलते हैं। बजट यात्रियों के लिए डॉर्म बेड लगभग 400 से 700 रुपये के आसपास मिल सकते हैं, जबकि निजी कमरे मौसम और जगह के हिसाब से 1,200 रुपये से ऊपर जा सकते हैं। वीकेंड और छुट्टियों में कीमत बढ़ सकती है। इसलिए अगर आपकी यात्रा किसी व्यस्त तारीख पर है तो पहले से कमरा देख लेना बेहतर रहेगा।

त्रियुंड के रास्ते में खाने-पीने की क्या व्यवस्था है?

Triund का रास्ता पूरी तरह सुनसान नहीं है। कई जगह छोटे कैफ़े और चाय-नाश्ते की दुकानें मिल जाती हैं। मैगी, चाय, कॉफी, पराठे और कुछ सामान्य खाना रास्ते में मिल सकता है।

फिर भी पूरी तरह दुकानों पर निर्भर रहना सही नहीं है। बैग में थोड़ा ड्राय फ्रूट, एनर्जी बार, चॉकलेट और ORS रखना अच्छा रहेगा। इससे जरूरत पड़ने पर तुरंत कुछ खा सकते हैं।

पानी की बोतल पहले ही भर लें

Triund की चढ़ाई शुरू करने से पहले पानी की व्यवस्था जरूर कर लें। ऊपर जाते-जाते पानी महंगा मिल सकता है और हर जगह पानी की सुविधा नहीं होगी। कम से कम अपनी जरूरत के हिसाब से पर्याप्त पानी लेकर चलें और अगर रास्ते में पानी भरने का सुरक्षित स्रोत मिले तो स्थानीय सलाह के अनुसार ही उसका इस्तेमाल करें। पहाड़ पर प्लास्टिक की बोतलें इधर-उधर छोड़ना बिल्कुल सही नहीं है।

मोबाइल नेटवर्क और यूपीआई पर पूरी तरह भरोसा न करें

Triund के रास्ते में नेटवर्क कई जगह कमजोर हो सकता है और ऊपर पहुंचने के बाद सिग्नल लगातार मिलना जरूरी नहीं है। इसलिए यात्रा शुरू करने से पहले परिवार या दोस्तों को अपना प्लान बता दें।

जरूरी मैप ऑफलाइन डाउनलोड कर लें और फोन की बैटरी बचाकर रखें। ऊपर भुगतान की सुविधा भी हर जगह उपलब्ध हो, यह जरूरी नहीं है। इसलिए पर्याप्त नकदी अपने साथ रखना समझदारी है।

त्रियुंड के लिए क्या-क्या सामान लेकर जाएं?

Triund के लिए सबसे जरूरी चीज अच्छे ग्रिप वाले ट्रैकिंग जूते हैं। सामान्य चिकने सोल वाले जूते खासकर उतरते समय फिसल सकते हैं। मौसम के हिसाब से गर्म कपड़े, जैकेट, टोपी और बारिश से बचने के लिए हल्का सामान रखें।

पावर बैंक, टॉर्च, सनस्क्रीन, धूप का चश्मा और छोटा फर्स्ट-एड किट भी बैग में होना चाहिए। सर्दियों में अतिरिक्त गर्म कपड़े जरूरी हैं और मानसून में फिसलन को देखते हुए यात्रा की योजना बनानी चाहिए।

त्रियुंड जाने का सबसे अच्छा मौसम कौन सा है?

Triund को मार्च से जून के बीच देखने का अनुभव काफी अच्छा हो सकता है। इस दौरान मौसम ट्रेकिंग के लिए आरामदायक रहता है और रास्ते में बुरांश के फूल भी दिखाई दे सकते हैं। सितंबर से नवंबर तक मानसून के बाद आसमान साफ रहने पर धौलाधार का नज़ारा बेहद साफ दिखाई दे सकता है।

जुलाई और अगस्त में बारिश के कारण रास्ते फिसलन वाले हो सकते हैं, इसलिए इस समय अतिरिक्त सावधानी जरूरी है। दिसंबर से फरवरी के बीच बर्फबारी का अनुभव मिल सकता है, लेकिन तब ट्रेक ज्यादा कठिन हो सकता है और सही तैयारी जरूरी है।

अगर त्रियुंड के आगे जाना हो तो स्नोलाइन और लाका गोट

अगर Triund पहुंचने के बाद आपके पास अतिरिक्त समय और अच्छी ट्रेकिंग क्षमता है तो आगे स्नोलाइन और लाका गोट की तरफ जाने का विकल्प देखा जा सकता है। स्नोलाइन तक पहुंचने पर धौलाधार की चोटियां और करीब महसूस होती हैं।

इसके आगे लाका गोट का रास्ता और ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो जाता है। सर्दियों में बर्फ की स्थिति के कारण यह क्षेत्र कठिन हो सकता है, इसलिए आगे जाने से पहले स्थानीय गाइड और मौसम की जानकारी जरूर लें।

इंद्रहार पास को हल्के में न लें

Triund से आगे इंद्रहार पास का नाम भी सुनने को मिलता है, लेकिन इसे सामान्य डे-ट्रेक समझना ठीक नहीं होगा। इंद्रहार पास काफी ऊंचाई पर स्थित कठिन ट्रेक है और इसके लिए ज्यादा तैयारी, समय और अनुभव की जरूरत पड़ती है।

अगर आप पहली बार ट्रेकिंग कर रहे हैं तो सिर्फ इसलिए आगे जाने की कोशिश न करें कि आप त्रियुंड तक पहुंच गए हैं। पहाड़ पर अपनी क्षमता समझना सबसे जरूरी है।

Delhi से तीन दिन में त्रियुंड कैसे करें?

अगर आपके पास सिर्फ तीन दिन हैं तो Triund की यात्रा इस तरह बनाई जा सकती है। पहले दिन रात की बस से Delhi से निकलें और सुबह धर्मशाला या मैकलॉडगंज पहुंचें। धर्मकोट में स्टे लेकर थोड़ा आराम करें और आसपास घूम लें।

दूसरे दिन सुबह जल्दी गल्लू देवी से ट्रेक शुरू करें और दोपहर तक त्रियुंड पहुंचने की कोशिश करें। अगर कैंपिंग बुकिंग है तो रात ऊपर रुकें। तीसरे दिन सुबह नज़ारा देखने के बाद नीचे उतरें और शाम की बस से Delhi लौटने की योजना बनाई जा सकती है। हालांकि वापसी के लिए पर्याप्त समय और मौसम की स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी है।

त्रियुंड यात्रा का बजट कितना हो सकता है?

Delhi से Triund की तीन दिन की बजट यात्रा लगभग 4,700 से 6,800 रुपये प्रति व्यक्ति के आसपास पड़ सकती है, लेकिन यह एक अनुमान है। बस के किराए, स्टे, खाने, स्थानीय वाहन, कैंपिंग और मौसम के हिसाब से खर्च ऊपर-नीचे हो सकता है।

Delhi से आने-जाने की बस में करीब 2,200 से 2,600 रुपये, बजट स्टे में लगभग 500 से 1,200 रुपये और कैंपिंग व खाने में करीब 1,000 से 1,500 रुपये तक खर्च हो सकता है। अगर आप कैफ़े, निजी टैक्सी या ज्यादा महंगा स्टे लेते हैं तो बजट बढ़ जाएगा।

इस ट्रेक की सबसे खास बात क्या है?

Triund की सबसे अच्छी बात यही है कि यह उन लोगों को भी हिमालय का करीब से अनुभव देता है जो पहली बार ट्रेकिंग शुरू कर रहे हैं। आपको कई दिनों तक जंगल में नहीं रहना पड़ता और न ही किसी बेहद कठिन चढ़ाई से शुरुआत करनी पड़ती है।

Triund

कुछ घंटे की मेहनत के बाद जब धौलाधार सामने दिखाई देता है तो आपको समझ आता है कि इतनी छोटी यात्रा में इतना बड़ा नज़ारा कैसे मिल सकता है। लेकिन इसे आसान समझकर बिना तैयारी निकलना भी सही नहीं है।

पहाड़ पर घूमने जाएं तो सिर्फ नज़ारा नहीं, जिम्मेदारी भी साथ रखें

Triund जैसे खूबसूरत ट्रेक की सबसे बड़ी जरूरत यही है कि वहां पहुंचने वाले लोग पहाड़ को नुकसान न पहुंचाएं। प्लास्टिक की बोतल, चिप्स के पैकेट या कोई दूसरा कचरा रास्ते में न छोड़ें।

तेज आवाज में संगीत बजाने से बचें और स्थानीय लोगों की जगह और नियमों का सम्मान करें। वन क्षेत्र में आग जलाने या प्रतिबंधित जगह पर जाने की कोशिश न करें। अगर हर यात्री अपना कचरा वापस नीचे लेकर आए, तो आने वाले लोग भी इसी खूबसूरती को देख पाएंगे।

Five Colors of Travel की ओर से खास सुझाव

  • सुबह जल्दी ट्रेक शुरू करें। गल्लू देवी से जितनी जल्दी ट्रेक शुरू करेंगे, उतना आराम से ऊपर पहुंच पाएंगे। खासकर अगर आप डे-हाइक कर रहे हैं तो वन विभाग के उस दिन के कट-ऑफ समय को ध्यान में रखकर चलें और आखिरी समय के लिए ट्रेक न छोड़ें।
  • अच्छे ट्रैकिंग जूते जरूर पहनें। Triund का रास्ता शुरुआत में आसान लग सकता है, लेकिन आखिरी हिस्से में पथरीली और घुमावदार चढ़ाई मिलती है। अच्छे ग्रिप वाले जूते उतरते समय भी बहुत काम आएंगे।
  • कैश और पानी पहले से रखें। गल्लू देवी से आगे निकलने के बाद हर जगह डिजिटल भुगतान या एटीएम की सुविधा मिलेगी, यह मानकर न चलें। पर्याप्त नकदी, पानी और थोड़ा हल्का खाना अपने साथ जरूर रखें।
  • मौसम देखकर ही कैंपिंग तय करें। रात में पहाड़ों पर तापमान तेजी से गिर सकता है। कैंपिंग से पहले मौसम की जानकारी जरूर लें और टेंट, स्लीपिंग बैग व गर्म कपड़ों की व्यवस्था ठीक रखें। खराब मौसम में सिर्फ बुकिंग बचाने के लिए ऊपर जाने की जिद न करें।
  • पहाड़ को साफ छोड़कर वापस आएं। आप Triund से कितनी खूबसूरत तस्वीरें लेकर लौटते हैं, उससे ज्यादा जरूरी यह है कि आप वहां कितना कम कचरा छोड़कर आए। अपनी बोतल, पैकेट और बाकी कचरा वापस नीचे लाएं और जंगल में किसी भी तरह की गंदगी न फैलाएं।

Triund की खूबसूरती सिर्फ उसके टॉप पर पहुंचने में नहीं है। असली मजा उस पूरे रास्ते में है—देवदार के जंगलों से गुजरना, रास्ते में चाय पीना, थककर किसी पत्थर पर बैठना, धीरे-धीरे धौलाधार को अपने करीब आते देखना और आखिर में उस खुले मैदान में पहुंचना जहां सामने पूरा पहाड़ खड़ा दिखाई देता है। Delhi से कुछ दिनों की छुट्टी लेकर अगर आप सच में पहाड़ों के करीब जाना चाहते हैं, तो सही तैयारी के साथ Triund एक यादगार सफर बन सकता है।

Shivani Pal

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