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उत्तराखंड की संस्कृति को परिपूर्ण करते हैं ये पारम्परिक नृत्य

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उत्तराखंड की संस्कृति भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है और जब भी संस्कृति की बात होती है नृत्य का जिक्र अपने आप ही हो जाता है क्योंकि नृत्य संस्कृति का अभिन्न अंग है उत्तराखंड में नृत्य की भरपुर विविधता है। गढ़वाली, कुमाऊँई, छोलिया, लैंगवीर, और बसंती जैसे नृत्यों में स्थानीय समाज की भावनाएँ, रीति-रिवाज और प्राकृतिक सौंदर्य की प्रतियाँ प्रदर्शित की गई हैं। ये नृत्य केवल रंग-बिरंगे और ऊर्जावान होते हैं, बल्कि वे समाज में एकता, समरसता और समृद्धि को भी बढ़ावा देते हैं। उत्तराखंड की नृत्य संस्कृति की भागीदारी-समृद्ध और प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को नई ऊँचाइ तक पहुंचाया जाता है। उत्तराखंड के नृत्य संस्कृति का महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वे स्थानीय जीवन, परंपरा, और धार्मिक आदर्शों का प्रतिबिम्ब करते हैं। इन नृत्यों में स्थानीय भाषा, संगीत, और वेशभूषा का महत्वपूर्ण योगदान होता है, जो संस्कृति की गहराई को और भी बढ़ाता है। उत्तराखंड के नृत्य संस्कृति में स्थानीय जीवन के विभिन्न पहलुओं का प्रतिबिम्ब होता है। गढ़वाली नृत्य में पहाड़ी जीवन की कठिनाइयों और खुशियों का विवरण होता है, जबकि कुमाऊँई नृत्य में उत्तराखंड की प्राकृतिक सौंदर्य को प्रशंसा किया जाता है। छोलिया नृत्य में सैनिक और योद्धा भावनाओं को उजागर किया जाता है, जबकि लंगवीर नृत्य में वीर गाथाओं का गौरव गाया जाता है। उत्तराखंड के नृत्य संस्कृति का महत्व यह भी है कि वे समाज में समरसता और एकता को बढ़ावा देते हैं। इन नृत्यों में समृद्धि, सहयोग, और समरसता की भावना व्यक्त होती है, जो समुदाय को एक साथ आने और मिल-जुलकर जीने की महत्वपूर्ण बातें सिखाती हैं। इसके अलावा, ये नृत्य उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को संजीवनी देते हैं और नई पीढ़ियों को इसे समझने और मानने के लिए प्रेरित करते हैं। गढ़वाली नृत्य : गढ़वाली नृत्य उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में प्रमुख नृत्य शैलियों में से एक है। यह नृत्य गढ़वाल क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है और स्थानीय जनता की जीवनशैली, सांस्कृतिक मान्यताओं, और रीति-रिवाजों को प्रतिबिम्बित करता है। गढ़वाली नृत्य का आदान-प्रदान स्थानीय गीतों, गढ़वाली भाषा, और स्थानीय वेशभूषा के साथ होता है। यह नृत्य जीवन की विविधता, खुशी, और उत्साह को दर्शाता है। गढ़वाली नृत्य में गीतों के साथ-साथ भावनात्मक अभिव्यक्ति की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इस नृत्य में गृहिणियों और पुरुषों के विभिन्न रूप और भावों का प्रदर्शन होता है। गढ़वाली नृत्य के प्रमुख आंगना, बढ़ज्या, रसत्या, और झान्झा आदि हैं। इन नृत्यों में स्थानीय कथाएं, परंपराएं, और धार्मिक मान्यताएं भी दिखाई जाती हैं। गढ़वाली नृत्य का महत्व यह है कि यह स्थानीय समुदाय की अद्वितीयता, एकता, और सांस्कृतिक धरोहर को बचाव करता है और यहाँ की जनता को उनकी विरासत के प्रति गर्व महसूस कराता है। इसके अलावा, गढ़वाली नृत्य का उद्दीपन युवा पीढ़ियों को अपनी संस्कृति और धरोहर के प्रति उत्साहित करता है। कुमाऊँई नृत्य : कुमाऊँई नृत्य उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र का प्रमुख नृत्य है, जो इस क्षेत्र की विशेष सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत को प्रकट करता है। यह नृत्य उत्तराखंड की लोक कला का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसे समृद्ध और प्रचीन संस्कृति का प्रतीक माना जाता है। कुमाऊँई नृत्य के अद्वितीय और लोकप्रिय चरित्र को स्थानीय कलाकारों की भावनात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। इसमें स्थानीय गायकों द्वारा गाए गए गीतों के साथ-साथ रंग-बिरंगे वेशभूषा, शानदार नृत्य और जीवंत अभिव्यक्ति का अद्वितीय मेल मिलता है। कुमाऊँई नृत्य में गति, लय, और सौंदर्य का अद्वितीय संगम होता है। इसमें समुदाय की भावनाओं, रसों, और परंपराओं को व्यक्त किया जाता है। यह नृत्य लोक कथाओं, पौराणिक कहानियों, और प्राचीन धार्मिक तथ्यों पर आधारित होता है और स्थानीय समुदाय की जीवनशैली को प्रतिबिम्बित करता है। कुमाऊँई नृत्य का महत्व यह है कि यह उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखता है और स्थानीय कलाकारों को उनकी प्राचीन और अमूल्य संस्कृति का मान-सम्मान प्रदान करता है। इसके अलावा, यह नृत्य युवा पीढ़ियों को अपनी संस्कृति के प्रति प्रेरित करता है और उन्हें इसे समझने और मानने के लिए प्रोत्साहित करता है। लंगवीर नृत्य : लंगवीर नृत्य उत्तराखंड के मंडलिक क्षेत्रों में प्रमुख नृत्यों में से एक है। यह नृत्य वीरता, साहस, और धर्म के महत्वपूर्ण संदेशों को समाहित करता है और इसे स्थानीय लोगों के समृद्ध विरासत का अभिन्न हिस्सा माना जाता है। लंगवीर नृत्य में साहित्यिक और धार्मिक कथाओं को अद्वितीय तरीके से प्रस्तुत किया जाता है। इसमें वीर गाथाओं, युद्ध कथाओं, और इतिहासिक घटनाओं को जीवंत किया जाता है, जिससे लोगों को समर्थन और प्रेरणा मिलती है। लंगवीर नृत्य में समुदाय के लोक कथाओं और वीर गाथाओं के साथ-साथ रंग-बिरंगे वेशभूषा, शानदार नृत्य, और वाद्य यंत्रों की ध्वनि का मिलन होता है। यह नृत्य समुदाय की भावनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम होता है और लोगों को उनके वीर गुणों को समझने और समर्थन करने के लिए प्रेरित करता है। लंगवीर नृत्य का महत्व यह है कि यह उत्तराखंड की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर को जीवंत रखता है और स्थानीय लोगों को उनकी वीरता और साहस का मान-सम्मान प्रदान करता है। इसके अलावा, यह नृत्य युवा पीढ़ियों को अपने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के प्रति उत्साहित करता है और उन्हें इसे समझने और मानने के लिए प्रोत्साहित करता है। छोलिया नृत्य : छोलिया नृत्य उत्तराखंड के अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, और उनके आसपास के क्षेत्रों में प्रसिद्ध है। यह नृत्य उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है और स्थानीय लोगों के समृद्ध तथा वीरता भाव को दर्शाता है। छोलिया नृत्य में समुदाय की वीरता, साहस, और उत्साह को प्रकट किया जाता है। इस नृत्य में सामूहिक रूप से वीर गाथाओं का प्रदर्शन होता है, जिसमें समुदाय की भावनात्मक और धार्मिक भावनाओं को उजागर किया जाता है। छोलिया नृत्य में ध्वनियों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। ढोल, डमाऊ, और शहनाई जैसे स्थानीय वाद्य यंत्रों की ध्वनि के साथ-साथ समूह के सदस्यों की गतिमान नृत्य का प्रदर्शन होता है। छोलिया नृत्य का महत्व यह है कि यह उत्तराखंड की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर को जीवंत रखता है और स्थानीय लोगों को उनकी वीरता और साहस का मान-सम्मान प्रदान करता है। इसके अलावा, यह नृत्य युवा पीढ़ियों को अपने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के प्रति उत्साहित करता है और उन्हें इसे समझने और मानने के लिए प्रोत्साहित करता है। बसंती नृत्य : बसंती नृत्य उत्तराखंड

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देव भूमि उत्तराखंड में है दुनिया का सबसे खूबसूरत नेशनल पार्क जानिए इसके बारे में

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Valley of Flowers “क्या आपने कभी किसी ऐसे जगह घूमने जाने का सपना सजाया है जहां दूर-दूर तक पहाड़ियां हो, चारों ओर फूल के बगीचे हो और जहां खूबसूरत रंग-बिरंगे फूल खिले हुए हो? अपनी आंखों को बंद करके सोचिए कि कितना खूबसूरत होगा वह जगह, जहां यह सब सच होगा? अपने ख्यालों से पूछिए कि उस जगह की फिजाओं में घुली हुई फूलों की खुशबू कितनी खूबसूरत होगी? ….और फिर अपने दिल से पूछिए कि क्या आप उस जगह से वापस लौट कर आना चाहेंगे या वहीं का हो कर रह जाना चाहेंगे?” क्या है वैली ऑफ़ फ्लावर?( what is valley of flower)? वैली ऑफ़ फ्लावर उत्तराखंड में एक ऐसी जगह है जहां आपको चारों ओर हजारों प्रकार के फूलों, पौधों और छोटे-छोटे जीव जंतुओं को देखने का अवसर मिलेगा। यह जगह इतनी खूबसूरत है कि इस शब्दों में बयां किया जा सकना नामुमकिन है। इस जगह की खूबसूरती को महसूस करने के लिए और यहां के फिजाओं में बसे सुकून के एहसास को समझने के लिए आपको खुद ही यहां तक आना पड़ेगा। नेचर्स लवर के लिए यह जगह किसी जन्नत से कम नहीं है। यह जगह इतनी खूबसूरत है कि आप इसे तस्वीरों में कैद करने से खुद को रोक नहीं पाएंगे। इस जगह के बारे में आपको एक और खास बात यह है कि ये जगह वर्ल्ड हेरिटेज साइट के सूची में शामिल है। वैली ऑफ फ्लावर्स नेशनल पार्क पहले नन्दा देवी राष्ट्रीय उद्यान का भाग था लेकिन बाद में इन दोनों नेशनल पार्कों को अलग कर दिया गया। इस फ्लॉवर वैली में खास क्या है? (What’s special in this valley of flower?) फ्लोरा (Floras in Valley of Flowers National Park) अगर बात की जाए फ्लोरा की तो, यहाँ लगभग 500 से भी ज्यादा प्रकार की पौधों और जड़ी बूटियों की प्रजातियाँ पायी जाती हैं जिनमे से कुछ प्रमुख निम्नलिखित है- एनीमोन (Anemone), जर्मेनियम (Germanium), मार्श (Marsh), गेंदा (Marigold), प्रिभुला (Pribula), पोटेन्टिला (Potentilla), जिउम (Geum), तारक (Aster), लिलियम (Lilium), हिमालयी नीला पोस्त (Himalayan Blue Poppy), बछनाग (Bacchanal), डेलफिनियम (Delphinium), रानुनकुलस (Ranunculus), कोरिडालिस (Corydalis), इन्डुला (Indula), सौसुरिया (Saussurea) और कम्पानुला (Campanula)। बेस्ट टाइम टू विजिट वैली ऑफ़ फ्लावर नेशनल पार्क (Best time to visit Valley of Flowers National Park) वैसे तो यहां बहुत सारे विजिटर्स घूमने आते रहते हैं। लेकिन अगर आप शांति से यहां घूमना चाहते हैं तो आप ऐसे समय का चयन करें जब बद्रीनाथ के लिए ट्रैकिंग बंद रहती है। क्योंकि यहां आने वाले अधिकतर विजिटर्स बद्रीनाथ के पर्यटक हीं होते हैं। ऐसे में जब बद्रीनाथ की ट्रैकिंग बंद हो जाती है तो यहां आने वाले पर्यटकों की संख्या भी कम जाती है। कैसे पहुंचे फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान (How to reach Valley of Flowers National Park)? वैली ऑफ फ्लावर नेशनल पार्क पहुंचने के लिए आपको ट्रैकिंग करनी पड़ेगी। इसके लिए आपको सबसे पहले उत्तराखंड के गोविंद घाट से पुलना गांव तक पहुंचना होगा। पुलना गांव से आपकी ट्रैकिंग की शुरुआत होगी। जब आप पुलना गांव से अपनी ट्रैकिंग की शुरुआत करेंगे तो रास्ते में आपको सबसे पहले जंगल चट्टी नाम के एक बाजार से गुजरना होगा। जंगल चट्टी से गुजरते हुए आप भ्युवदार गांव पहुंचेंगे। भ्युवदार गांव इस ट्रक का सबसे इंपॉर्टेंट पॉइंट होगा। जहां से आप घांगरिया के लिए निकलेंगे। पुलना से घांगरिया तक का ट्रैक लगभग 10 किलोमीटर का होता है। घांगरिया पहुंचकर आपको एक दिन रुकना पड़ेगा, क्योंकि दिन के 12:00 के बाद घांगरिया से आगे की ट्रैकिंग रोक दी जाती है। अगले दिन आप वैली ऑफ फ्लावर के लिए ट्रैकिंग शुरू कर सकते हैं। घांगरिया से वैली ऑफ फ्लावर का रास्ता लगभग 4 किलोमीटर का है और आप बहुत ही आसानी से इस ट्रैक को पूरा कर लेंगे।

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जन्नत का दूसरा नाम है वैली ऑफ फ्लावर्स

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“क्या आपने कभी किसी ऐसे जगह घूमने जाने का सपना सजाया है जहां दूर-दूर तक पहाड़ियां हो, चारों ओर फूल के बगीचे हो और जहां खूबसूरत रंग-बिरंगे फूल खिले हुए हो? अपनी आंखों को बंद करके सोचिए कि कितना खूबसूरत होगा वह जगह, जहां यह सब सच होगा? अपने ख्यालों से पूछिए कि उस जगह की फिजाओं में घुली हुई फूलों की खुशबू कितनी खूबसूरत होगी? ….और फिर अपने दिल से पूछिए कि क्या आप उस जगह से वापस लौट कर आना चाहेंगे या वहीं का हो कर रह जाना चाहेंगे?” यह सब पढ़ कर आपके मन में ख्याल आ रहा होगा कि मैं ऐसा क्यों सोचूं? वैसी जगह थोड़ी ना एक्जिस्ट करती है! तो मेरे दोस्तों यह जगह सच में एक्जिस्ट करती है, वह भी भारत में। यह जगह है उत्तराखंड की वैली ऑफ़ फ्लावर!आज के इस ब्लॉग में हम आपको इस खूबसूरत से जगह के बारे में बताने वाले हैं। तो आईए जानते हैं- क्या है वैली ऑफ़ फ्लावर?( what is valley of flower?) वैली ऑफ़ फ्लावर उत्तराखंड में एक ऐसी जगह है जहां आपको चारों ओर हजारों प्रकार के फूलों, पौधों और छोटे-छोटे जीव जंतुओं को देखने का अवसर मिलेगा। यह जगह इतनी खूबसूरत है कि इस शब्दों में बयां किया जा सकना नामुमकिन है। इस जगह की खूबसूरती को महसूस करने के लिए और यहां के फिजाओं में बसे सुकून के एहसास को समझने के लिए आपको खुद ही यहां तक आना पड़ेगा। नेचर्स लवर के लिए यह जगह किसी जन्नत से कम नहीं है। यह जगह इतनी खूबसूरत है कि आप इसे तस्वीरों में कैद करने से खुद को रोक नहीं पाएंगे। इस जगह के बारे में आपको एक और खास बात यह है कि ये जगह वर्ल्ड हेरिटेज साइट के सूची में शामिल है। कैसे पहुंचे वैली ऑफ फ्लावर? (How to visit valley of flowers? ) बद्रीनाथ से 25 किलोमीटर पहले एक जगह पड़ता है, जिसका नाम है गोविंद घाट। जहां अलकनंदा और लक्ष्मण गंगा का संगम होता है। गोविंद घाट से आपको फूलों की घाटी जाने के लिए पहले आपको पुलना गांव जाना होगा। पुलना गांव जाने के लिए आप शेयरिंग टैक्सी भी ले सकते हैं। पुलना पहुंचने के बाद आपको घांगरिया के लिए पैदल ट्रैकिंग करना होगा। लेकिन घांगरिया के लिए निकलने से पहले आप पुलना में ही रुक कर वैली ऑफ फ्लावर के लिए अपना रजिस्ट्रेशन करवा ले। रजिस्ट्रेशन के बाद आप घांगरिया के लिए निकल सकते हैं।अगर आप अपने बाइक या फिर कार से आ रहे हैं तो पुलना में आपको छोटे-छोटे होमस्टे, ढाबे और मोटरसाइकिल या कार की पार्किंग मिल जाएगी। पुलना से घांगरिया लगभग 10 किलोमीटर दूर है और इसकी चढ़ाई आपको पैदल ही करनी होगी।थकान तो बहुत होगी, लेकिन यकीन मानिए इस ट्रैकिंग के रास्ते में आने वाले खूबसूरत नजारे देख कर आप खुद को आगे बढ़ने से रोक नहीं पाएंगे। ये रास्ते इतनी खूबसूरत होते हैं कि आपको पहले से ही एक्साइटमेंट होने लगेगी कि अगर रास्ता इतना खूबसूरत है तो मंजिल कितना खूबसूरत होगा? और यकीन मानिए, जब आप फूलों की घाटी तक पहुंचेंगे तो आपको लगेगा कि आप किसी जन्नत में उतर आए हैं। घांगरिया के रास्ते में आपको सबसे पहले जंगल चट्टी नाम का एक बाजार मिलेगा। जो एक बहुत ही छोटा सा बाजार है। जिसके बाद फिर जब आप आगे बढ़ेंगे तो आपको भ्युवदार गांव से गुजरना होगा। यह गांव इस ट्रैक का एक इंपॉर्टेंट पॉइंट माना जाता है। जहां आपको कई सारे ढाबे देखने को मिल जाएंगे। आप यहां कुछ देर रुक कर लंच कर सकते हैं और थोड़ा रेस्ट कर सकते हैं। इस गांव को क्रॉस करते हुए हीं आप लक्ष्मण गंगा को पार करेंगे।पुलना से भ्युवदार गांव के रास्ते में आपको पानी लेकर चलने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। क्योंकि इस रास्ते में जगह-जगह मिनरल वाटर के नल लगाए गए हैं। जहां से आप पानी पी सकते हैं। लेकिन भ्युवदार गाँव से आगे आपको सीधा घांगरिया पहुंचने पर ही पानी मिलेगा। इसीलिए आप घांगरिया के लिए निकलने से पहले आप अपने साथ पानी का बोतल रख ले। ट्रैकिंग का समय (Timing of treckking)घंगारिया से वैली ऑफ फ्लावर का रास्ता लगभग 4 किलोमीटर का है और सुबह के 7:00 बजे से दोपहर के 12:00 बजे के तक हीं यहां से आगे की ट्रैकिंग के लिए रास्ता खुला होता है। 12:00 बजे के बाद घंगारिया से फ्लावर वैली के लिए आपको ट्रैकिंग करने नहीं दिया जाएगा। इसीलिए आपको घंगारिया पहुंचकर उस दिन वहीं रुकना होगा। घांगरिया में आपको बहुत सारे होटल और टेंट्स भी रहने के लिए मिल जाएंगे। घांगरिया से आप अगले दिन सुबह 7:00 बजे के बाद फ्लावर वैली के लिए निकल सकते हैं। पुलना से घांगरिया का रास्ता जितना खूबसूरत है, घांगरिया से फ्लावर वैली का रास्ता उससे कहीं ज्यादा खूबसूरत हो जाता है। जब आप घांगरिया से निकलेंगे तो आपको बहुत ही जल्दी ग्लेशियर दिखने शुरू हो जाएंगे। जैसे-जैसे आप फूलों की घाटी की ओर बढ़ेंगे, आपको रास्ते में कई सारे झरने और देवदार के पेड़ देखने को मिलेंगे। देवदार पहाड़ी इलाकों में मिलने वाला एक ऐसा पेड़ है जिसके छाल से पुराने जमाने में भोजपत्र बनाए जाते थे। इस फ्लॉवर वैली में खास क्या है? (What’s special in this valley of flower?) बेस्ट टाइम टू विजिट (Best time to visit) वैसे तो यहां बहुत सारे विजिटर्स घूमने आते रहते हैं। लेकिन अगर आप शांति से यहां घूमना चाहते हैं तो आप ऐसे समय का चयन करें जब बद्रीनाथ के लिए ट्रैकिंग बंद रहती है। क्योंकि यहां आने वाले अधिकतर विजिटर्स बद्रीनाथ के पर्यटक हीं होते हैं। ऐसे में जब बद्रीनाथ की ट्रैकिंग बंद हो जाती है तो यहां आने वाले पर्यटकों की संख्या भी कम जाती है।

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आईए जानते हैं देश के योग कैपिटल ऋषिकेश के प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों के बारे में

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ऋषिकेश भारत का एक ऐसा शहर है जहां के कण-कण में अध्यात्म बसता है। ऋषिकेश की पावन धरती पर आते हीं आपको ऐसा एहसास होगा की इससे ज्यादा सुकून तो कहीं और हो ही नहीं सकता है। पहाड़ियों की गोद में बसा हुआ यह शहर, अपने शांत और खूबसूरत माहौल के लिए जाना जाता है। यहां आपको हर ओर सिर्फ पॉजिटिविटी हीं नजर आएगी और यहाँ आने के बाद आपका स्ट्रेस तुरंत छूमंतर हो जाएगा।आज के इस ब्लॉग में हम आपको इसी शहर के बारे में बताने वाले हैं। तो आईए जानते हैं इस शहर के बारे में:- भारत के योगा कैपिटल के नाम से मशहूर इस शहर में घूमने लायक बहुत सी ऐसी जगहें हैं जहां जाने के बाद आपको वापस लौटने का बिल्कुल मन भी नहीं होगा। ऐसे हीं कुछ दूर प्लेसेस के नाम नीचे दिए गए हैं। 1. शिव प्रतिमा (Statue of Shiva)2. नीलकंठ महादेव मन्दिर (Neelkanth Mahadev temple)3. नीलगढ़ वाटरफॉल्स (Neelgarh waterfalls)4. बीटल्स आश्रम (Beatles Ashram)5. त्रंबकेश्वर मंदिर (Triyambkeshwara temple)6. भरत मंदिर (Bharat mandir)7. त्रिवेणी घाट की आरती (Ganga aarti of Triveni ghaat)8. ऋषिकुंड (Rishi kund)9. लक्ष्मण झूला (laxman jhoola) शिव प्रतिमा (Statue of Shiva)ऋषिकेश के परमार्थ निकेतन में भगवान शिव की बहुत बड़ी प्रतिमा है। जहाँ भगवान शिव ध्यान की मुद्रा में बैठे हुए हैं और इस मूर्ति की खास बात यह है कि यह मूर्ति गंगा नदी में बनी हुई है। जिसके कारण यह और भी अनोखी प्रतीत होती है। बहती गंगा के धारा के बीच में स्थित विशालकाय शिव की प्रतिमा को देखकर आने वाले पर्यटकों का भी मन योगा की और आकर्षित हो जाता है। परमार्थ निकेतन आश्रम से जब आप इस मूर्ति को देखेंगे तो आपको बहुत हीं अलौकिक और अद्भुत एहसास होगा। परमार्थ निकेतन का यह भाग बहुत ही खूबसूरत और मनमोहक है। जब आप परमार्थ निकेतन में प्रवेश करेंगे तो आपका मन खुद-ब-खुद शांत हो जाएगा और आपके अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होगा। आश्रम जितना शान्त है उतना ही ज्यादा खूबसूरत भी है। इसीलिए दूर दूर से पर्यटक इस स्थान पर घूमने के लिए आते हैं। नीलकंठ महादेव मन्दिर (Neelkanth Mahadev temple)ऋषिकेश के नजदीक स्थित चित्रकूट पर्वत पर बना यह मंदिर हजारों साल पुराना है। पुरानी कथाओं के अनुसार ऋषिकेश के इसी स्थान पर महादेव ने समुंद्र मंथन से निकले हलाहल को पिया था और उनका शरीर नीला हो गया था। यही कारण है कि इस मंदिर को नीलकंठ महादेव मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर से जुड़ी सबसे खास बात यह है कि यह मन्दिर तीन पर्वतों से घिरा हुआ है। जिनका नाम है- मनिकुट, विष्णुकुट और ब्रह्मकुट। इस मंदिर का आर्किटेक्चर बहुत हीं कलरफुल है। जब आप इस मंदिर में एंटर करेंगे तो आपको सबसे पहले समुंद्र मंथन का दृश्य दिखेगा। जिसमें नागराज वासुकी को रस्सी बनाकर देवता और दानव समुंद्र का मंथन कर रहे होते हैं। ऋषिकेश से नीलकंठ महादेव मंदिर कि दूरी लगभग 32 किलोमीटर है। अगर आप नीलकंठ महादेव मंदिर जाना चाहते हैं तो कोशिश करें कि आप 6:00 बजे तक इस मंदिर में पहुंच जाएं। ताकि आप यहां सुबह की आरती में हिस्सा ले सके। नीलगढ़ वाटरफॉल (Neelgarh waterfall) तीन वॉटर फॉल्स को मिलाकर बना हुआ यह वाटरफॉल ऋषिकेश के सीक्रेट वाटरफॉल के नाम से भी जाना जाता है। यह वाटरफॉल इतना खूबसूरत है कि इसकी खूबसूरती देखते ही बनती है। जंगलों से घिरे हुए इस वाटरफॉल की खास बात यह है कि यहां का पानी इतना क्लीयर है कि आप वाटरफॉल के नीचे की जमीन को भी साफ साफ देख सकते हैं। अगर आप ऋषिकेश घूमने आ रहे हैं तो इस वाटरफॉल को विजिट करना बिल्कुल ना भूलें।यहाँ पहुँचने के लिए 1-1.5 किलोमीटर की ट्रैकिंग भी करनी पड़ती है। लेकिन आपका यह सफर बहुत हीं खूबसूरत होने वाला है। साथ ही रास्ते में आपको दो ब्रिज क्रॉस करने होंगे। झांसी दिखने वाला नजारा इतना खूबसूरत होता है कि आप एक पल को सब कुछ भूल कर खुशी पल में हो जाएंगे। इस वॉटर फॉल तक पहुंचने के लिए आपको ऋषिकेश बस स्टैंड से 8.5 किलोमीटर का सफ़र करना पड़ेगा। आप इसके लिए कोई प्राइवेट टैक्सी में बुक कर सकते हैं। अगर आप यहाँ के वॉटर फॉल में जाना चाहते हैं तो यहां जाने का सबसे बेहतरीन समय मॉनसून की ठीक बाद सितंबर या अक्टूबर का होता है। क्योंकि इस समय वाटरफॉल में पानी ज्यादा होता है और आसपास का माहौल भी बहुत हीं खूबसूरत होता है। वहाँ जाने के लिए आप अपने साथ कुछ स्नैक्स, पानी की बॉटल और अपने साथ एक कपड़ा ले जा सकते हैं। ताकि आप इस विज़िट को बहुत अच्छे से एंजॉय कर सके। बीटल्स आश्रम (Beatles Aashram)बीटल्स आश्रम को चौरासी कुटिया के नाम से भी जाना जाता है। यह आश्रम महा ऋषि महेश योगी के विद्यार्थियों के लिए ट्रेनिंग सेंटर था। इस आश्रम को पहचान तब मिली जब रॉकबैंड द बीटल्स यहां पर मेडिटेशन करने के लिए आए थे। बैंड के लोगों का कहना था कि जो समय उन्होंने यहाँ बिताया वह उनकी लाइफ का सबसे बेस्ट टाइम था और यही पर उन्होंने अपने बहुत से फेमस गाने लिखे। बीटल्स आश्रम 1990 में फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के हवाले कर दिया गया था। 2015 में इस आश्रम को पर्यटकों के लिए खोला गया। बिट्स आश्रम में जाने की टाइमिंग सुबह के 10:00 बजे से शाम के 4:00 बजे तक की है। यहां जाने के लिए पर्यटकों को किसी भी प्रकार का टिकट नहीं लेना पड़ता है। यह बिल्कुल फ्री ऑफ कॉस्ट है। त्रंबकेश्वर मंदिर ऋषिकेश (Triyambkeshwara Temple Rishikesh)त्रंबकेश्वर मंदिर को तेरह मंजिला मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर के हर एक फ्लोर पर अलग-अलग देवी देवताओं की पूजा की जाती हैं। यह मंदिर लक्ष्मण झूला के बहुत नजदीक है। जहां से आप लक्ष्मण झूला का व्यू देख सकते हैं। साथ हीं इस मंदिर से दिखने वाला गंगा जी का दृश्य बहुत खूबसूरत होता है। यहाँ का वातावरण बहुत शांत है और दिल को सुकून देने वाला है। कुछ किंवदंतियों के अनुसार इस मंदिर को शंकराचार्य द्वारा 8 शताब्दी के आसपास बनवाया था। इस मंदिर के सबसे ऊपर के फ्लोर पर भगवान महादेव की शिवलिंग स्थापित है। इस मंदिर 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