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Kaas Plateau 2026: महाराष्ट्र की फूलों की घाटी- कब जाएं?

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क्या आपने कभी ऐसी जगह देखी है, जहाँ जमीन पर घास से ज्यादा फूल दिखाई देते हों? जहाँ दूर-दूर तक सिर्फ रंग ही रंग नजर आते हों? अगर नहीं, तो आपको 2026 में महाराष्ट्र के सतारा जिले में स्थित Kaas Plateau जरूर जाना चाहिए। हर साल मानसून के बाद कुछ ही हफ्तों के लिए Kaas Plateau पूरी तरह बदल जाता है। हरे मैदान पर गुलाबी, पीले, सफेद और बैंगनी फूलों की इतनी खूबसूरत चादर बिछ जाती है कि पहली नजर में यकीन करना मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि आज कास पठार महाराष्ट्र के सबसे खास और तेजी से लोकप्रिय होते पर्यटन स्थलों में गिना जाता है। Kaas Plateau क्यों है इतना खास? Kaas Plateau कोई साधारण पहाड़ी इलाका नहीं है। इसे साल 2012 में यूनेस्को विश्व प्राकृतिक धरोहर स्थल का दर्जा मिला था। यहां 850 से ज्यादा प्रकार के फूल और पौधे पाए जाते हैं। इनमें कई ऐसी प्रजातियां हैं जो दुनिया में बहुत कम जगहों पर देखने को मिलती हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि कास पठार पर फूल सालभर नहीं खिलते। यह खूबसूरत नजारा केवल कुछ हफ्तों के लिए दिखाई देता है। यही वजह है कि लोग हर साल सही समय का इंतजार करते हैं। Kaas Plateau जाने का सबसे अच्छा समय कौन-सा है? अगर आप Kaas Plateau की असली खूबसूरती देखना चाहते हैं, तो सितंबर के मध्य से अक्टूबर के मध्य तक का समय सबसे अच्छा माना जाता है। मानसून की बारिश खत्म होने के बाद जब धूप निकलती है, तब Kaas Plateau के मैदान रंग-बिरंगे फूलों से भर जाते हैं। सितंबर के दूसरे और तीसरे सप्ताह के दौरान यहां फूल अपने सबसे सुंदर रूप में दिखाई देते हैं। Kaas Plateau में कौन-कौन से फूल दिखाई देते हैं? कास पठार में आपको कई दुर्लभ और खूबसूरत फूल देखने को मिलते हैं। यहां छोटे-छोटे जंगली फूलों की इतनी ज्यादा किस्में हैं कि हर कुछ कदम पर रंग बदलता हुआ दिखाई देता है। यहां गुलाबी, पीले, सफेद और बैंगनी फूल सबसे ज्यादा नजर आते हैं। कई फूल इतने छोटे होते हैं कि लोग बिना गाइड के उन्हें पहचान भी नहीं पाते। Kaas Plateau की मिट्टी क्यों है अलग? कास पठार की मिट्टी ज्वालामुखी से बनी लाल बेसाल्टिक मिट्टी है। यही वजह है कि यहां ऐसे पौधे और फूल उगते हैं जो दूसरी जगहों पर आसानी से नहीं मिलते। बारिश का पानी और यहां का मौसम इन फूलों के लिए बिल्कुल सही वातावरण तैयार करता है। Kaas Plateau जाने से पहले ऑनलाइन बुकिंग क्यों जरूरी है? कास पठार का प्राकृतिक वातावरण बहुत संवेदनशील है। इसलिए यहां जाने के लिए ऑनलाइन बुकिंग करना जरूरी है। एक दिन में सीमित संख्या में लोगों को ही प्रवेश दिया जाता है ताकि यहां के फूलों और पौधों को नुकसान न पहुंचे। इसलिए अगर आप सितंबर या अक्टूबर में जाने की योजना बना रहे हैं, तो पहले से टिकट बुक करना बेहतर रहेगा। Kaas Plateau कैसे पहुंचें? कास पठार महाराष्ट्र के सतारा जिले में स्थित है। मुंबई से यहां की दूरी लगभग 280 किलोमीटर है और सड़क मार्ग से पहुंचने में लगभग पांच से छह घंटे लगते हैं। पुणे से Kaas Plateau लगभग 125 से 140 किलोमीटर दूर है और यहां तक पहुंचने में लगभग तीन घंटे का समय लगता है। अगर आप ट्रेन से आना चाहते हैं, तो सतारा रेलवे स्टेशन सबसे नजदीकी स्टेशन है। वहां से टैक्सी और ऑटो आसानी से मिल जाते हैं। Kaas Plateau के आसपास क्या-क्या देखें? अगर आप Kaas Plateau घूमने जा रहे हैं, तो आसपास की कुछ और जगहों को भी अपनी यात्रा में शामिल कर सकते हैं। वजराई वॉटरफॉल भारत के सबसे ऊंचे झरनों में से एक है। कास झील शांत वातावरण और खूबसूरत नजारों के लिए जानी जाती है। सज्जनगढ़ किला इतिहास और आध्यात्मिक महत्व दोनों के लिए प्रसिद्ध है। वहीं ठोसेघर वॉटरफॉल मानसून में बेहद शानदार दिखाई देता है। Kaas Plateau फोटोग्राफी के लिए क्यों है परफेक्ट? आज सोशल मीडिया के दौर में Kaas Plateau फोटोग्राफर्स और प्रकृति प्रेमियों की पसंदीदा जगह बन चुका है। यहां हर तरफ रंग-बिरंगे फूल, हल्की धुंध और पहाड़ों के शानदार नजारे दिखाई देते हैं। सुबह के समय Kaas Plateau की खूबसूरती सबसे ज्यादा निखरकर सामने आती है। यही कारण है कि ज्यादातर लोग सुबह वाले स्लॉट में यहां जाना पसंद करते हैं। Kaas Plateau घूमते समय किन बातों का ध्यान रखें? Kaas Plateau एक बहुत ही नाजुक प्राकृतिक क्षेत्र है। यहां फूलों को तोड़ना, उन पर चलना या कचरा फैलाना सख्त मना है। यहां की खूबसूरती को बचाने के लिए सभी पर्यटकों को तय रास्तों पर ही चलने की सलाह दी जाती है। Five Colors of Travel की ओर से Kaas Plateau के लिए 5 खास सुझाव सुबह जल्दी जाएं ताकि कम भीड़ और बेहतर मौसम मिल सके। अच्छी ग्रिप वाले जूते पहनकर जाएं क्योंकि रास्ते फिसलन भरे हो सकते हैं। फूलों को हाथ लगाने या तोड़ने से बचें। पानी की बोतल और जरूरी सामान अपने साथ रखें। प्लास्टिक और कचरा बिल्कुल न फैलाएं और प्रकृति को साफ रखने में अपना योगदान दें। अगर आप प्रकृति को उसके सबसे रंगीन रूप में देखना चाहते हैं, तो 2026 में कास पठार की यात्रा जरूर करें। कुछ ही हफ्तों के लिए दिखाई देने वाला यह फूलों का संसार आपको जिंदगी भर याद रहेगा।

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तंजावुर का वो मंदिर जिसे देखकर आज भी लोग रह जाते हैं दंग!

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तमिलनाडु के तंजावुर शहर में बना Brihadeeswarar Temple सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारत की सबसे बड़ी ऐतिहासिक धरोहरों में से एक है। करीब 1000 साल पहले बना यह मंदिर आज भी अपनी मजबूती, डिजाइन और भव्यता के लिए जाना जाता है। इसे देखने के बाद सबसे पहला सवाल यही आता है कि आखिर उस समय बिना आधुनिक मशीनों के इतना विशाल और सटीक निर्माण कैसे किया गया होगा। यही वजह है कि यह मंदिर आज भी इतिहासकारों, आर्किटेक्ट्स और यात्रियों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। चोल साम्राज्य की ताकत का सबसे बड़ा उदाहरण इस मंदिर का निर्माण 11वीं सदी में चोल राजा राजराजा प्रथम ने करवाया था। उस समय चोल साम्राज्य दक्षिण भारत का सबसे शक्तिशाली साम्राज्य माना जाता था। बृहदीश्वर मंदिर उसी ताकत, कला और सोच का नतीजा है। राजा ने इस मंदिर को भगवान शिव को समर्पित किया था और इसे बनाने में उस दौर की सबसे बेहतरीन तकनीक और कारीगरी का इस्तेमाल किया गया था। बिना सीमेंट के खड़ा है इतना विशाल मंदिर इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि इसे बनाने में सीमेंट का इस्तेमाल नहीं किया गया। पूरा मंदिर ग्रेनाइट पत्थरों से बना है, जिन्हें इस तरह जोड़ा गया है कि हजार साल बाद भी यह मजबूती से खड़ा है। कहा जाता है कि उस समय इतनी बड़ी मात्रा में पत्थर दूर-दूर से लाए गए थे, जो अपने आप में एक बड़ी चुनौती रही होगी। 216 फीट ऊंचा गोपुरम और रहस्यमयी शिखर मंदिर का मुख्य टावर यानी शिखर करीब 216 फीट ऊंचा है, जो इसे उस समय के सबसे ऊंचे मंदिरों में शामिल करता है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसके ऊपर रखा गया विशाल पत्थर का कलश एक ही टुकड़े में बना है, जिसका वजन कई टन बताया जाता है। यह पत्थर इतनी ऊंचाई तक कैसे पहुंचाया गया, यह आज भी एक रहस्य बना हुआ है। मंदिर की छाया से जुड़ी दिलचस्प बात बृहदीश्वर मंदिर के बारे में एक और बात अक्सर सुनने को मिलती है कि इसके शिखर की छाया जमीन पर साफ दिखाई नहीं देती। हालांकि यह पूरी तरह रहस्य नहीं है, लेकिन मंदिर की डिजाइन और एंगल इसे खास बनाते हैं। यही वजह है कि लोग इसे देखकर हैरान रह जाते हैं और इसकी बनावट को समझने की कोशिश करते हैं। नंदी की विशाल मूर्ति भी कम नहीं है खास मंदिर परिसर में भगवान शिव के वाहन नंदी की एक विशाल मूर्ति भी स्थापित है। यह मूर्ति एक ही पत्थर से बनी हुई है और अपने आकार के कारण लोगों का ध्यान तुरंत खींच लेती है। इसे देश की सबसे बड़ी नंदी मूर्तियों में गिना जाता है और यह मंदिर की भव्यता को और बढ़ा देती है। UNESCO की सूची में शामिल है यह धरोहर बृहदीश्वर मंदिर को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है। इसे “Great Living Chola Temples” का हिस्सा माना जाता है। इसका मतलब यह है कि यह मंदिर सिर्फ इतिहास नहीं है, बल्कि आज भी यहां पूजा और धार्मिक गतिविधियां जारी हैं। आज भी वैसे ही खड़ा है जैसे हजार साल पहले था सबसे हैरानी की बात यह है कि इतने सालों बाद भी मंदिर की संरचना में ज्यादा बदलाव नहीं आया है। समय के साथ कई इमारतें कमजोर हो जाती हैं, लेकिन यह मंदिर आज भी उसी मजबूती के साथ खड़ा है। यह उस समय की इंजीनियरिंग और कारीगरी का सबसे बड़ा सबूत है। देश-विदेश से आते हैं हजारों पर्यटक हर साल हजारों लोग इस मंदिर को देखने आते हैं। इतिहास में दिलचस्पी रखने वाले लोग, आर्किटेक्चर के छात्र और आम पर्यटक सभी यहां पहुंचते हैं। यह जगह सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि पर्यटन के लिहाज से भी काफी महत्वपूर्ण बन चुकी है। बृहदीश्वर मंदिर सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि यह दिखाता है कि भारत में हजार साल पहले भी कितनी उन्नत सोच और तकनीक मौजूद थी। आज भी इसे देखकर यही लगता है कि उस दौर के कारीगर और इंजीनियर अपने समय से काफी आगे थे। यही वजह है कि यह मंदिर आज भी लोगों के लिए कौतूहल और गर्व दोनों का कारण बना हुआ है।

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राखीगढ़ी: सिंधु घाटी सभ्यता का प्रमुख केंद्र और भारतीय इतिहास का वैश्विक सबूत

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हरियाणा के हिसार ज़िले में स्थित प्राचीन हड़प्पा स्थल राखीगढ़ी आज भारतीय इतिहास और पुरातत्व के क्षेत्र में एक नए दौर की शुरुआत का संकेत दे रहा है। केंद्र सरकार ने केंद्रीय बजट में इसके विकास के लिए 500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है, जो इस बात को साफ़ करता है कि अब राखीगढ़ी को सिर्फ़ एक खुदाई स्थल नहीं, बल्कि एक वैश्विक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर के रूप में विकसित करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के अनुसार, इस राशि का उपयोग राखीगढ़ी के संरक्षण, शोध कार्य, पर्यटन विकास और इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए किया जाएगा। सरकार का लक्ष्य इस स्थल को उसी श्रेणी में लाना है, जहाँ आज मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसे विश्व प्रसिद्ध नाम मौजूद हैं। इतिहास की गहराई में छिपा राखीगढ़ी राखीगढ़ी को आज दुनिया का सबसे बड़ा हड़प्पा स्थल माना जाता है। इसका फैलाव लगभग 350 हेक्टेयर से ज़्यादा क्षेत्र में है, जो इसे पाकिस्तान में स्थित मोहनजोदड़ो से भी बड़ा बनाता है। पुरातत्व विशेषज्ञों के मुताबिक, यहाँ पाई गई सभ्यता की जड़ें 7,000 से 8,000 साल पुरानी हैं। इसी वजह से यह स्थल सिंधु घाटी सभ्यता के शुरुआती दौर को समझने के लिए बेहद अहम माना जाता है। राखीगढ़ी सिर्फ़ टूटी-फूटी दीवारों और खंडहरों का ढेर नहीं है, बल्कि यह उस समय के सुनियोजित शहरी जीवन की पूरी तस्वीर पेश करता है। खुदाई में यहाँ चौड़ी सड़कें, व्यवस्थित रिहायशी इलाके, उन्नत जल निकासी व्यवस्था और पक्की ईंटों से बने मकान मिले हैं। इससे साफ़ होता है कि उस दौर में नगर नियोजन और नागरिक सुविधाओं की समझ काफ़ी विकसित थी। उन्नत इंजीनियरिंग और सामाजिक जीवन की झलक राखीगढ़ी में खुदाई के दौरान मिली संरचनाओं में एक विशाल ढांचा सबसे ज़्यादा चर्चा में रहा है, जिसे कई विशेषज्ञ सार्वजनिक सभा स्थल या स्टेडियम मानते हैं। मिट्टी की ईंटों से बना यह ढांचा इस बात की ओर इशारा करता है कि हड़प्पा कालीन समाज में सामूहिक गतिविधियों और सामाजिक आयोजनों को खास महत्व दिया जाता था। इसके अलावा, यहाँ मिले कुएँ, स्नानागार और जल निकासी चैनल बताते हैं कि स्वच्छता और जल प्रबंधन उस समय के लोगों के जीवन का अहम हिस्सा थे। यह पूरी व्यवस्था आज के आधुनिक शहरों जैसी ही एक सुव्यवस्थित सामाजिक संरचना को दर्शाती है। डीएनए शोध जिसने इतिहास की सोच बदल दी राखीगढ़ी से मिले मानव कंकालों पर किए गए डीएनए अध्ययन ने भारतीय इतिहास से जुड़ी कई पुरानी धारणाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इन शोधों से संकेत मिलता है कि यहाँ रहने वाले लोग स्थानीय और स्वदेशी थे और उनका आनुवंशिक संबंध आज के भारतीय समाज से जुड़ता है।कई विद्वान इस शोध को ‘आर्य आक्रमण सिद्धांत’ को खारिज करने वाला अहम प्रमाण मानते हैं। अगर इन निष्कर्षों को व्यापक मान्यता मिलती है, तो यह भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास को देखने और समझने का नजरिया ही बदल सकता है। UNESCO विश्व धरोहर बनने की तैयारी सरकार राखीगढ़ी को UNESCO की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने के लिए ज़रूरी प्रक्रियाओं पर काम कर रही है। इसी दिशा में यहाँ हड़प्पन नॉलेज सेंटर की स्थापना की गई है, ताकि शोधकर्ताओं, छात्रों और आम लोगों को इस प्राचीन सभ्यता के बारे में गहराई से जानकारी मिल सके।इसके साथ ही, करीब 22 से 23 करोड़ रुपये की लागत से एक आधुनिक पुरातात्विक संग्रहालय भी तैयार किया गया है। इस संग्रहालय में खुदाई से मिली कलाकृतियाँ, औज़ार, मुहरें, कंकाल और रोज़मर्रा के जीवन से जुड़े अवशेष प्रदर्शित किए जाने की योजना है। विकास के साथ सामने आती ज़मीनी सच्चाइयाँ हालाँकि सरकारी योजनाएँ काफ़ी बड़ी हैं, लेकिन ज़मीन पर राखीगढ़ी के संरक्षण और विकास में कई दिक्कतें भी सामने आ रही हैं। कुछ जगहों पर मिट्टी की ईंटों को बचाने के लिए अस्थायी और गैर-वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल किया गया है, जो लंबे समय में संरचनाओं को नुकसान पहुँचा सकता है। इसके अलावा, पर्यटकों के लिए बुनियादी सुविधाओं की कमी भी एक बड़ी समस्या है। न तो वहाँ पर्याप्त सूचना पटल हैं और न ही प्रशिक्षित गाइडों की ठीक-ठाक व्यवस्था। जब कोई पर्यटक राखीगढ़ी देखने पहुँचता है, तो उसे ज़्यादातर खुदाई स्थल ढके हुए मिलते हैं। इस वजह से लोग राखीगढ़ी के कई खास और महत्वपूर्ण हिस्सों को ठीक से देख ही नहीं पाते। हालाँकि, पर्यटकों की सीमित आवाजाही के लिए कुछ चुनिंदा जगहों को खोला गया है, लेकिन इससे पूरे प्राचीन नगर की भव्यता और ऐतिहासिक महत्व का पूरा अनुभव नहीं हो पाता। राखीगढ़ी के बेहतर और टिकाऊ विकास के लिए ज़रूरी कदम राखीगढ़ी में खुदाई और संरक्षण से जुड़े सभी काम अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार होने चाहिए, ताकि नाज़ुक संरचनाओं को किसी तरह का नुकसान न पहुँचे और यह कार्य अनुभवी संरक्षण विशेषज्ञों की निगरानी में किया जाए। साथ ही, पर्यटकों के अनुभव को बेहतर बनाने के लिए डिजिटल ऑडियो गाइड, व्यूइंग प्लेटफॉर्म, सूचना केंद्र और एक व्यवस्थित टिकटिंग सिस्टम विकसित करना ज़रूरी है। इसके विकास में स्थानीय लोगों की भागीदारी भी बेहद अहम है। स्थानीय युवाओं को हेरिटेज गाइड और सांस्कृतिक गतिविधियों से जोड़ा जाए, जिससे उन्हें रोज़गार मिले और वे अपनी विरासत को लेकर ज़्यादा जागरूक हों। इसके अलावा, खुदाई स्थलों पर बार-बार अवशेषों को ढकने के बजाय पारदर्शी कवर और स्थायी शेड लगाए जाएँ, ताकि शोधकर्ताओं और पर्यटकों दोनों को साल भर इसका लाभ मिल सके। वहीं, संग्रहालय को जल्द से जल्द पूरी तरह शुरू कर उसमें खुदाई से मिली वस्तुओं की प्रदर्शनी लगाई जानी चाहिए, ताकि यह जगह एक जीवंत ज्ञान और इतिहास केंद्र बन सके। राखीगढ़ी सिर्फ़ अतीत की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारत की सभ्यतागत निरंतरता, वैज्ञानिक समझ और सांस्कृतिक समृद्धि का मज़बूत प्रमाण है। अगर संरक्षण और विकास का काम संतुलित और वैज्ञानिक तरीके से किया गया, तो आने वाले समय में राखीगढ़ी न सिर्फ़ भारत, बल्कि पूरी दुनिया के लिए इतिहास, शोध और पर्यटन का एक बड़ा केंद्र बन सकता है।

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उत्तराखंड की फ्लावर वैली, इतनी खूबसूरत जैसे कोई जादुई सपना हो

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क्या आपने कभी किसी ऐसी जगह घूमने जाने का सपना सजाया है जहां दूर-दूर तक पहाड़ियां हो, चारों ओर फूल के बगीचे हो और जहां खूबसूरत रंग-बिरंगे फूल खिले हुए हो? अपनी आंखों को बंद करके सोचिए कि कितनी खूबसूरत होगी वह जगह, जहां यह सब सच होगा? अपने ख्यालों से पूछिए कि उस जगह की फिजाओं में घुली हुई फूलों की खुशबू कितनी खूबसूरत होगी?.. और फिर अपने दिल से पूछिए कि क्या आप उस जगह से वापस लौट कर आना चाहेंगे या वहीं का हो कर रह जाना चाहेंगे? (फ्लावर वैली) यह सब पढ़ कर आपके मन में ख्याल आ रहा होगा कि मैं ऐसा क्यों सोचूं? वैसी जगह तो एक्जिस्ट ही नहीं करती है! लेकिन यह जगह सच में एक्जिस्ट करती है और वह भी भारत में। यह जगह है उत्तराखंड की फ्लावर वैली!आज के इस ब्लॉग में हम आपको इस खूबसूरत सी जगह के बारे में बताने वाले हैं। तो आईए जानते हैं– क्या है फ्लावर वैली? (what is valley of flower?) फ्लावर वैली उत्तराखंड में एक ऐसी जगह है जहां आपको चारों ओर हजारों प्रकार के फूलों, पौधों और छोटे-छोटे जीव जंतुओं को देखने का अवसर मिलेगा। यह जगह इतनी खूबसूरत है कि इस शब्दों में बयां किया जा सकना नामुमकिन है। इस जगह की खूबसूरती को महसूस करने के लिए और यहां के फिजाओं में बसे सुकून के एहसास को समझने के लिए आपको खुद ही यहां तक आना पड़ेगा। नेचर्स लवर के लिए यह जगह किसी जन्नत से कम नहीं है। यह जगह इतनी खूबसूरत है कि आप इसे तस्वीरों में कैद करने से खुद को रोक नहीं पाएंगे। इस जगह के बारे में आपको एक और खास बात यह है कि ये जगह वर्ल्ड हेरिटेज साइट के सूची में शामिल है। वर्ष 2005 में इस यूनेस्को के वर्ल्ड हेरिटेज साइट में स्थान मिला था। कैसे पहुंचे वैली ऑफ फ्लावर? (How to visit valley of flowers?) बद्रीनाथ से 25 किलोमीटर पहले एक जगह पड़ता है, जिसका नाम है गोविंद घाट। जहां अलकनंदा और लक्ष्मण गंगा का संगम होता है। गोविंद घाट से आपको फूलों की घाटी जाने के लिए पहले आपको पुलना गांव जाना होगा। पुलना गांव जाने के लिए आप शेयरिंग टैक्सी भी ले सकते हैं। पुलना पहुंचने के बाद आपको घांघरिया के लिए पैदल ट्रैकिंग करना होगा।लेकिन घांघरिया के लिए निकलने से पहले आप पुलना में ही रुक कर वैली ऑफ फ्लावर के लिए अपना रजिस्ट्रेशन करवा ले। रजिस्ट्रेशन के बाद आप घांघरिया के लिए निकल सकते हैं।अगर आप अपने बाइक या फिर कार से आ रहे हैं तो पुलना में आपको छोटे-छोटे होमस्टे, ढाबे और मोटरसाइकिल या कार की पार्किंग मिल जाएगी। पुलना से घांघरिया लगभग 10 किलोमीटर दूर है और इसकी चढ़ाई आपको पैदल ही करनी होगी। थकान तो बहुत होगा, लेकिन आप खुद को रोक नहीं पाएंगे.. थकान तो बहुत होगा, लेकिन यकीन मानिए इस ट्रैकिंग के रास्ते में आने वाले खूबसूरत नजारे देख कर आप खुद को आगे बढ़ने से रोक नहीं पाएंगे। ये रास्ते इतनी खूबसूरत होते हैं कि आपको पहले से ही एक्साइटमेंट होने लगेगी कि अगर रास्ता इतना खूबसूरत है तो मंजिल कितना खूबसूरत होगा? और यकीन मानिए, जब आप फूलों की घाटी तक पहुंचेंगे तो आपको लगेगा कि आप किसी जन्नत में उतर आए हैं। घांघरिया के रास्ते में आपको सबसे पहले जंगल चट्टी नाम का एक बाजार मिलेगा। जो एक बहुत ही छोटा सा बाजार है। जिसके बाद फिर जब आप आगे बढ़ेंगे तो आपको भ्युवदार गांव से गुजरना होगा। यह गांव इस ट्रैक का एक इंपॉर्टेंट पॉइंट माना जाता है। जहां आपको कई सारे ढाबे देखने को मिल जाएंगे। आप यहां कुछ देर रुक कर लंच कर सकते हैं और थोड़ा रेस्ट कर सकते हैं। इस गांव को क्रॉस करते हुए हीं आप लक्ष्मण गंगा को पार करेंगे। पुलना से भ्युवदार गांव के रास्ते में आपको पानी लेकर चलने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। क्योंकि इस रास्ते में जगह-जगह मिनरल वाटर के नल लगाए गए हैं। जहां से आप पानी पी सकते हैं। लेकिन भ्युवदार गाँव से आगे आपको सीधा घांघरिया पहुंचने पर ही पानी मिलेगा। इसीलिए आप घांघरिया के लिए निकलने से पहले आप अपने साथ पानी का बोतल रख ले। घांघरिया से वैली ऑफ फ्लावर घांघरिया से वैली ऑफ फ्लावर का रास्ता लगभग 4 किलोमीटर का है और सुबह के 7:00 बजे से दोपहर के 12:00 बजे के तक हीं यहां से आगे की ट्रैकिंग के लिए रास्ता खुला होता है। 12:00 बजे के बाद घांघरिया से फ्लावर वैली के लिए आपको ट्रैकिंग करने नहीं दिया जाएगा। इसीलिए आपको घांघरिया पहुंचकर उस दिन वहीं रुकना होगा। घांघरिया में आपको बहुत सारे होटल और टेंट्स भी रहने के लिए मिल जाएंगे। फिर आप अगले दिन सुबह 7:00 बजे के बाद फ्लावर वैली के लिए निकल सकते हैं। पुलना से घांघरिया का रास्ता जितना खूबसूरत है, घांघरिया से फ्लावर वैली का रास्ता उससे कहीं ज्यादा खूबसूरत हो जाता है। जब आप घांघरिया से निकलेंगे तो आपको बहुत ही जल्दी ग्लेशियर दिखने शुरू हो जाएंगे। जैसे-जैसे आप फूलों की घाटी की ओर बढ़ेंगे, आपको रास्ते में कई सारे झरने और देवदार के पेड़ देखने को मिलेंगे। देवदार पहाड़ी इलाकों में मिलने वाला एक ऐसा पेड़ है जिसके छाल से पुराने जमाने में भोजपत्र बनाए जाते थे। इस फ्लॉवर वैली में खास क्या है?(What’s special in this valley of flower?) जब आप इस वैली तक पहुंचेंगे तो आपको यहां लगभग 500 से भी ज्यादा प्रकार की पौधों और जड़ी बूटियों की प्रजातियाँ देखने को मिलेंगे।उनके साथ-साथ यहां कई तरह की तितलियां और अलग-अलग तरह के इंसेक्ट्स भी देखने को मिलेंगे।इस वैली के लिए ट्रैकिंग सिर्फ 4 महीने के लिए हीं खुली रहती है। आप सिर्फ मानसून के समय में ही यहां जा सकते हैं।इससे जुड़ी एक और खास बात यह है कि यहां हर सप्ताह आपको अलग रंग के फूल खिले हुए दिखेंगे कभी यह वैली बिल्कुल गुलाबी रंगों के फूलों से सजी होती है तो कभी यहां हर तरफ पीले या फिर नीले रंग के फूल देखने को मिलते हैं।इस वाली से आपको हिमालय के ग्लेशियर बहुत ही आसानी से दिख जाएंगे।जब इस वैली में कोहरा छा जाता है तब यह वैली