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Tughlaqabad Fort: दिल्ली की Mystery या एक भूला हुआ साम्राज्य?

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दक्षिण दिल्ली की भागती-दौड़ती जिंदगी, ट्रैफिक और आधुनिक इमारतों के बीच मौजूद Tughlaqabad Fort दूर से किसी भूली हुई दुनिया जैसा दिखाई देता है। विशाल पत्थर की दीवारें, टूटे हुए दरवाज़े, वीरान रास्ते और चारों तरफ फैली खामोशी इस जगह को दिल्ली के बाकी ऐतिहासिक स्मारकों से बिल्कुल अलग बना देती है। यहाँ आते ही ऐसा महसूस होता है जैसे समय अचानक कई सौ साल पीछे चला गया हो। दिन के समय भी इस किले के अंदर एक अजीब सा सन्नाटा महसूस होता है, जबकि शाम होते-होते इसका माहौल और भी ज्यादा रहस्यमयी दिखाई देने लगता है। यही कारण है कि कई लोग इसे सिर्फ एक ऐतिहासिक स्मारक नहीं, बल्कि दिल्ली की सबसे रहस्यमयी और डरावनी जगहों में से एक मानते हैं। इंटरनेट, लोककथाओं, ट्रैवल ब्लॉग्स और दिल्ली की चर्चित कहानियों में आज भी Tughlaqabad Fort की डरावनी कहानियाँ काफी प्रसिद्ध हैं। कई लोग दावा करते हैं कि इस जगह पर उन्हें अजीब बेचैनी महसूस हुई, जबकि कुछ लोग इसे “श्रापित किला” भी कहते हैं। लेकिन Tughlaqabad Fort सिर्फ डरावनी कहानियों की वजह से प्रसिद्ध नहीं है। इसके पीछे एक ऐसी भूली हुई कहानी छिपी हुई है जिसने कभी दिल्ली की किस्मत बदलने की कोशिश की थी। यह किला एक ऐसे सुल्तान का सपना था जो दिल्ली को दुनिया का सबसे मजबूत शहर बनाना चाहता था, लेकिन कुछ ही सालों में उसका सपना वीरान खंडहरों में बदल गया। आखिर Tughlaqabad Fort को किसने बनवाया था? Tughlaqabad Fort का निर्माण 1321 ईस्वी में गयासुद्दीन तुगलक ने करवाया था, जो तुगलक वंश का संस्थापक माना जाता है। उस समय दिल्ली सल्तनत लगातार बाहरी आक्रमणों के खतरे का सामना कर रही थी, खासकर मंगोल हमलों का डर हमेशा बना रहता था। इसी कारण गयासुद्दीन तुगलक ने एक ऐसे विशाल किले की कल्पना की जो दुश्मनों के लिए लगभग अजेय हो। यह सिर्फ एक साधारण किला नहीं था, बल्कि एक पूरी सुरक्षित नगरी के रूप में बनाया जा रहा था। इतिहासकारों के अनुसार, इसमें महल, सैनिक चौकियाँ, बाजार, पानी के स्रोत, मस्जिदें और आम लोगों के रहने की जगहें भी शामिल थीं। उस समय यह किला दिल्ली की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में से एक माना जाता था। इसकी दीवारें इतनी मोटी और ऊँची बनाई गई थीं कि दुश्मनों के लिए इन्हें तोड़ पाना लगभग असंभव माना जाता था। अरावली की पहाड़ियों पर बने इस किले की वास्तुकला भी बाकी दिल्ली के किलों से अलग दिखाई देती है। इसकी ढलानदार दीवारें, विशाल बुर्ज और ऊँचाई पर बनी सुरक्षा संरचनाएँ इस बात का एहसास कराती हैं कि इसे युद्ध को ध्यान में रखकर बनाया गया था। आज भी जब कोई व्यक्ति इस किले की विशाल दीवारों को देखता है, तो उसे अंदाजा हो जाता है कि गयासुद्दीन तुगलक दिल्ली को कितना शक्तिशाली बनाना चाहता था। आखिर इस किले को “श्रापित किला” क्यों कहा जाता है? Tughlaqabad Fort की सबसे प्रसिद्ध कहानी सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया और गयासुद्दीन तुगलक के बीच हुए विवाद से जुड़ी हुई है। यही कहानी इस किले की डरावनी पहचान की सबसे बड़ी वजह भी मानी जाती है। लोककथाओं के अनुसार, उसी समय जब सुल्तान इस विशाल किले का निर्माण करवा रहा था, तब हजरत निजामुद्दीन औलिया अपनी प्रसिद्ध बावली बनवा रहे थे। लेकिन समस्या यह थी कि दिल्ली के लगभग सभी मजदूरों को किले के निर्माण में लगा दिया गया था, जिसके कारण बावली का काम रुकने लगा। कहा जाता है कि मजदूर दिन में किले पर काम करते थे और रात में चोरी-छिपे बावली बनाने पहुँच जाते थे। जब सुल्तान को इस बात का पता चला, तो उसने रात में काम रोकने के लिए तेल की सप्लाई बंद करवा दी। इसके बाद एक चमत्कार की कहानी सुनाई जाती है कि हजरत निजामुद्दीन औलिया ने बावली के पानी को ही तेल में बदल दिया ताकि काम चलता रहे। यह कहानी आज भी दिल्ली की सबसे प्रसिद्ध ऐतिहासिक कथाओं में गिनी जाती है। इसी विवाद के बाद संत ने कथित रूप से श्राप दिया — “या रहे उजाड़, या बसे गुर्जर।” यानी यह शहर हमेशा उजाड़ रहेगा या फिर यहाँ सिर्फ गुर्जर बसेंगे। आज भी यह पंक्ति Tughlaqabad Fort की पहचान बन चुकी है। कई लोग मानते हैं कि यही श्राप इस किले के पतन की वजह बना। “हुनूज़ दिल्ली दूर अस्त” की कहानी आखिर क्या है? Tughlaqabad Fort की दूसरी सबसे प्रसिद्ध कहानी “हुनूज़ दिल्ली दूर अस्त” से जुड़ी हुई है। यह वाक्य आज भी भारतीय इतिहास की सबसे चर्चित ऐतिहासिक कहावतों में गिना जाता है। कहा जाता है कि जब गयासुद्दीन तुगलक बंगाल अभियान पर गया हुआ था, तब उसे खबर मिली कि मजदूर अब भी निजामुद्दीन औलिया की बावली पर काम कर रहे हैं। गुस्से में उसने दिल्ली लौटकर संत को सजा देने की बात कही। जब यह बात हजरत निजामुद्दीन औलिया तक पहुँची, तो उन्होंने कहा- “हुनूज़ दिल्ली दूर अस्त।” जिसका मतलब होता है- “दिल्ली अभी दूर है।” लोककथाओं के अनुसार, दिल्ली लौटते समय गयासुद्दीन तुगलक की मृत्यु एक रहस्यमयी दुर्घटना में हो गई। कहा जाता है कि उसके स्वागत के लिए बनाया गया लकड़ी का मंडप अचानक गिर पड़ा और उसी में दबकर उसकी मौत हो गई। कई लोगों ने इस घटना को संत के श्राप से जोड़कर देखा। यही वजह है कि धीरे-धीरे Tughlaqabad Fort को “श्रापित किला” की पहचान मिलने लगी। इतना विशाल और शक्तिशाली किला अचानक वीरान क्यों हो गया? इतिहासकारों के अनुसार, Tughlaqabad Fort का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि इतना विशाल और मजबूत शहर कुछ ही वर्षों में लगभग खाली क्यों हो गया। कई लोग इसे श्राप का असर मानते हैं, लेकिन कुछ व्यावहारिक कारण भी बताए जाते हैं। माना जाता है कि इस इलाके में पानी की भारी कमी थी, जिसके कारण इतने बड़े शहर को लंबे समय तक बसाए रखना मुश्किल हो गया। इसके अलावा गयासुद्दीन तुगलक की मृत्यु के बाद उसके बेटे मोहम्मद बिन तुगलक ने राजधानी दूसरी जगह स्थानांतरित कर दी। धीरे-धीरे लोग इस इलाके को छोड़ने लगे और पूरा शहर वीरान हो गया। जो जगह कभी दिल्ली की सबसे सुरक्षित राजधानी बनने वाली थी, वही कुछ समय बाद खंडहरों में बदल गई। यही भूला हुआ इतिहास इस जगह को और भी ज्यादा रहस्यमयी बनाता है।