Train के डिब्बे पर लिखे नंबर का क्या मतलब है? जानिए पूरा राज
भारतीय रेलवे से लगभग हर भारतीय का कोई न कोई रिश्ता जरूर है। किसी के लिए Train घर जाने का जरिया है, किसी के लिए रोज ऑफिस जाने का साधन और किसी के लिए लंबी छुट्टी पर निकलने का सबसे आसान तरीका। खिड़की वाली सीट, स्टेशन की चाय, रास्ते में बदलते नजारे और सहयात्रियों के साथ होने वाली बातचीत, इन सबकी वजह से रेल का सफर अपने आप में खास बन जाता है। लेकिन इस पूरे सफर के बीच कुछ ऐसी चीजें भी होती हैं, जिन पर हम शायद ही कभी ध्यान देते हैं। उदाहरण के लिए, जब कोई ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आकर रुकती है, तो उसके डिब्बे के बाहर एक पहचान नंबर लिखा दिखाई देता है। इसी तरह टिकट, स्टेशन की स्क्रीन और रेलवे की जानकारी में भी पांच अंकों का ट्रेन नंबर नजर आता है। अक्सर लोग इन नंबरों को रेलवे का कोई साधारण पहचान नंबर समझकर आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। ट्रेन का नंबर और उसके डिब्बे पर लिखा नंबर, दोनों का काम अलग होता है। इन नंबरों के जरिए ट्रेन की श्रेणी, उसके संचालन और डिब्बे की अलग पहचान जैसी कई बातें समझी जा सकती हैं। हालांकि एक जरूरी बात ध्यान रखें। पुराने डिब्बों में पांच अंकों वाली नंबर व्यवस्था ज्यादा दिखती है, जबकि कई नए कोच में नंबरिंग का तरीका अलग या ज्यादा अंकों वाला भी हो सकता है। इसलिए हर डिब्बे पर पुराने पांच अंकों वाला नियम एक जैसा लागू नहीं होता। पहले 4 अंकों के होते थे Train नंबर आज जिस तरह हर Train को पांच अंकों का नंबर दिया जाता है, यह व्यवस्था हमेशा से ऐसी नहीं थी। पुराने समय में लंबी दूरी की यात्री ट्रेनों के लिए चार अंकों की नंबर व्यवस्था इस्तेमाल की जाती थी। साल 1989 से लेकर 2010 तक कई लंबी दूरी की ट्रेनों में चार अंकों वाले नंबर चलते थे। उस समय रेलवे का नेटवर्क आज की तुलना में छोटा था और ट्रेनों की संख्या भी कम थी। लेकिन समय के साथ देश में यात्रियों की संख्या बढ़ी और रेलवे नेटवर्क का भी लगातार विस्तार हुआ। हजारों ट्रेनें अलग-अलग रूटों पर चलने लगीं। ऐसे में चार अंकों वाली नंबर व्यवस्था धीरे-धीरे कम पड़ने लगी। रेलवे की टिकट व्यवस्था और संचालन से जुड़े कंप्यूटर सिस्टम को भी बेहतर तरीके से जोड़ना जरूरी हो गया था। इसी वजह से 20 दिसंबर 2010 को रेलवे ने पांच अंकों वाली नंबर व्यवस्था लागू की। पहले से चल रही कई नियमित एक्सप्रेस, मेल, सुपरफास्ट, राजधानी और शताब्दी ट्रेनों के पुराने चार अंकों के नंबर के आगे एक अंक जोड़ दिया गया। इस बदलाव के बाद हर ट्रेन को एक अलग पांच अंकों की पहचान मिलने लगी। ट्रेन का नाम वही रहा, लेकिन उसका नंबर नई व्यवस्था के हिसाब से बदल गया। Train के पहले अंक का क्या मतलब है? अगर आप किसी Train का पांच अंकों वाला नंबर देखते हैं, तो सबसे पहले अंक पर ध्यान देना चाहिए। यह अंक उस ट्रेन की श्रेणी या उसके प्रकार के बारे में शुरुआती जानकारी देता है। अगर नंबर की शुरुआत 0 से होती है, तो यह आम तौर पर विशेष ट्रेन के लिए इस्तेमाल किया जाता है। ऐसी ट्रेनें त्योहारों, छुट्टियों, परीक्षा या किसी खास समय पर यात्रियों की बढ़ी हुई भीड़ को संभालने के लिए चलाई जा सकती हैं। अगर नंबर की शुरुआत 1 या 2 से होती है, तो यह आमतौर पर लंबी दूरी की मेल, एक्सप्रेस या सुपरफास्ट श्रेणी की ट्रेन हो सकती है। 3 से शुरू होने वाले नंबर कोलकाता की स्थानीय रेल सेवाओं से जुड़े होते हैं। 4 से शुरू होने वाले नंबर दिल्ली, चेन्नई और दूसरे बड़े शहरों की स्थानीय रेल सेवाओं के लिए इस्तेमाल हो सकते हैं। 5 से शुरू होने वाले नंबर पारंपरिक डिब्बों वाली पैसेंजर ट्रेनों से जुड़े होते हैं। 6 से शुरू होने वाले नंबर मेमू सेवाओं के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। 7 से शुरू होने वाले नंबर डेमू और रेलकार सेवाओं से जुड़े हो सकते हैं। 8 से शुरू होने वाले नंबर एक समय सुविधा एक्सप्रेस जैसी सेवाओं से जुड़े रहे हैं। वहीं नई नंबर व्यवस्था में कुछ श्रेणियों में बदलाव भी हो सकते हैं। 9 से शुरू होने वाले नंबर मुंबई की लोकल रेल सेवाओं और कुछ दूसरी शहरी रेल सेवाओं से जुड़े हो सकते हैं। इसलिए सिर्फ Train के नंबर का पहला अंक देखकर उसके प्रकार के बारे में शुरुआती अंदाजा लगाया जा सकता है। लेकिन अंतिम जानकारी के लिए टिकट और रेलवे की ताजा सूचना ही देखनी चाहिए। दूसरे और तीसरे अंक में भी होती है जानकारी Train के नंबर के दूसरे और तीसरे अंक भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं। अगर किसी ट्रेन का पहला अंक 0, 1 या 2 है, तो उसके बाद के अंक रेलवे जोन या संचालन से जुड़ी जानकारी देने में मदद कर सकते हैं। अलग-अलग नंबर भारतीय रेलवे के अलग-अलग जोन से जुड़े होते हैं। उदाहरण के लिए कुछ नंबर सेंट्रल रेलवे, नॉर्दर्न रेलवे, सदर्न रेलवे, वेस्टर्न रेलवे, ईस्टर्न रेलवे, नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर रेलवे और दूसरे जोन से संबंधित हो सकते हैं। हालांकि यहां एक बात समझना जरूरी है। भारतीय रेलवे में रूट, जोन, नई Train, विशेष सेवा और नंबरिंग से जुड़े नियम समय-समय पर बदल सकते हैं। इसलिए दूसरे और तीसरे अंक को देखकर केवल एक सामान्य अंदाजा लगाया जा सकता है। इसे अंतिम या हर ट्रेन पर लागू होने वाला नियम नहीं मानना चाहिए। आखिरी दो अंक क्या बताते हैं? पांच अंकों वाले ट्रेन नंबर के आखिरी दो अंक उस Train की अलग पहचान बनाने में मदद करते हैं। रेलवे के सिस्टम में हजारों ट्रेनें चलती हैं। ऐसे में हर Train के लिए अलग नंबर होना जरूरी है, ताकि दो अलग सेवाओं की पहचान आपस में न मिले। इसी वजह से आखिरी दो अंक उस खास Train की अलग पहचान बनाने में मदद करते हैं। इसे आप आसान भाषा में उसका क्रमांक भी समझ सकते हैं। कई रूटों पर आने और जाने वाली ट्रेन के नंबर एक-दूसरे से जुड़े हो सकते हैं। उदाहरण के लिए एक दिशा की Train का नंबर विषम और वापसी की ट्रेन का नंबर उसके बाद वाला सम हो सकता है। लेकिन यह हर