भारत के 10 प्रसिद्ध Gurudwara: इतिहास और धार्मिक महत्व
भारत में कई ऐसी जगहें हैं, जहां पहुंचकर सिर्फ किसी धार्मिक स्थल के दर्शन नहीं होते, बल्कि उस जगह से जुड़ा इतिहास, लोगों की सेवा और सालों पुरानी परंपराओं को भी करीब से समझने का मौका मिलता है। सिख धर्म के धार्मिक स्थल भी कुछ ऐसे ही हैं। यहां आने वाले लोगों को गुरबाणी की आवाज, लंगर में सबके साथ बैठकर भोजन करने की परंपरा और सेवा का भाव एक अलग ही अनुभव देता है। सिख धर्म की शुरुआत गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं से हुई। उन्होंने लोगों को एक ईश्वर में विश्वास, मेहनत की कमाई, जरूरतमंदों की मदद और सभी इंसानों को बराबर समझने का संदेश दिया। आगे आने वाले नौ गुरुओं ने भी इन शिक्षाओं को आगे बढ़ाया। यही वजह है कि सिख इतिहास में भक्ति के साथ-साथ साहस, त्याग और मानवता की सेवा का भी खास महत्व है। देश के अलग-अलग हिस्सों में बने ऐतिहासिक Gurudwara इसी इतिहास की याद दिलाते हैं। कहीं गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म हुआ, कहीं खालसा पंथ की स्थापना हुई और कहीं गुरु ग्रंथ साहिब जी को सिखों का शाश्वत गुरु घोषित किया गया। कुछ धार्मिक स्थल पहाड़ों के बीच हैं, तो कुछ बड़े शहरों में स्थित हैं। श्री हरिमंदिर साहिब, अमृतसर – सिख धर्म का सबसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थल पंजाब के अमृतसर शहर में स्थित श्री हरिमंदिर साहिब को दुनिया भर में गोल्डन टेंपल के नाम से जाना जाता है। यह सिख धर्म का सबसे प्रसिद्ध और प्रमुख धार्मिक स्थल है। हर साल देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन करने आते हैं। रात के समय जब मंदिर की सुनहरी इमारत का प्रतिबिंब अमृत सरोवर के पानी में दिखाई देता है, तो पूरा परिसर बहुत सुंदर लगता है। इस जगह का इतिहास चौथे सिख गुरु, गुरु राम दास जी से जुड़ा है। उन्होंने यहां एक सरोवर और बस्ती के विकास की शुरुआत करवाई थी। बाद में पांचवें गुरु, गुरु अर्जन देव जी ने मुख्य मंदिर के निर्माण का काम आगे बढ़ाया। साल 1604 में यहां आदि ग्रंथ की पहली प्रति स्थापित की गई और बाबा बुड्ढा जी को पहला ग्रंथी नियुक्त किया गया। इस तरह यह स्थान सिखों के लिए एक बड़ा धार्मिक केंद्र बन गया। इस Gurudwara की एक खास बात इसके चार प्रवेश द्वार हैं। ये चारों दिशाओं से आने वाले लोगों के लिए खुलेपन और बराबरी का संदेश देते हैं। मंदिर के चारों तरफ अमृत सरोवर है, जिसके किनारे श्रद्धालु बैठकर शांति से समय बिताते हैं। महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल में मंदिर के ऊपरी हिस्से पर सोने की परत चढ़वाई गई, जिसके बाद इसे गोल्डन टेंपल के नाम से भी पहचान मिलने लगी। यहां का लंगर भी दुनिया भर में जाना जाता है। हर दिन बड़ी संख्या में लोगों को बिना किसी भेदभाव के भोजन कराया जाता है। अगर आप अमृतसर जाएं, तो दर्शन के साथ लंगर में बैठकर भोजन करना और कुछ समय सेवा में देना एक अच्छा अनुभव हो सकता है। गुरुद्वारा बंगला साहिब, दिल्ली – गुरु हरिकिशन जी से जुड़ा इतिहास दिल्ली के कनॉट प्लेस के पास स्थित गुरुद्वारा बंगला साहिब राजधानी के सबसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक है। इसकी पहचान दूर से दिखाई देने वाले सुनहरे गुंबद और परिसर में बने बड़े सरोवर से होती है। शहर की भागदौड़ के बीच यहां पहुंचकर कुछ देर शांति से बैठने का मौका मिलता है। इस जगह का संबंध सिख धर्म के आठवें गुरु, गुरु हरिकिशन जी से है। मान्यता के अनुसार, साल 1664 में जब गुरु हरिकिशन जी दिल्ली आए थे, तब वे राजा जय सिंह के बंगले में ठहरे थे। उस समय दिल्ली में चेचक और हैजा जैसी बीमारियां फैली हुई थीं। गुरु हरिकिशन जी ने बीमार और जरूरतमंद लोगों की मदद की। इसी वजह से इस जगह को उनके जीवन और सेवा से जोड़कर देखा जाता है। बाद में यह स्थान सिख श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण बन गया। यहां का सरोवर, मुख्य प्रार्थना कक्ष और लंगर परिसर के प्रमुख हिस्से हैं। इस Gurudwara में आने वाले लोग मत्था टेकने के साथ लंगर में भोजन भी कर सकते हैं। परिसर में जरूरतमंदों के लिए चिकित्सा से जुड़ी सेवाएं भी उपलब्ध कराई जाती हैं। दिल्ली घूमने जाएं तो बंगला साहिब को अपनी यात्रा में शामिल कर सकते हैं। तख्त श्री केसगढ़ साहिब, आनंदपुर साहिब – खालसा पंथ की स्थापना का ऐतिहासिक स्थान पंजाब के रूपनगर जिले में स्थित आनंदपुर साहिब सिख इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण शहरों में गिना जाता है। यहां पहाड़ी पर बना तख्त श्री केसगढ़ साहिब पांच सिख तख्तों में से एक है। यह वही स्थान है जहां साल 1699 में बैसाखी के दिन गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। उस दिन गुरु गोबिंद सिंह जी ने संगत के सामने एक विशेष आह्वान किया। इसके बाद पांच सिख आगे आए, जिन्हें आज पंज प्यारे के नाम से जाना जाता है। गुरु जी ने उन्हें अमृत छकाया और खालसा पंथ की शुरुआत की। इस घटना ने सिख इतिहास को एक नई दिशा दी। खालसा पंथ ने साहस, बराबरी, अनुशासन और अन्याय के खिलाफ खड़े होने का संदेश दिया। यह Gurudwara एक ऊंचे स्थान पर बना है। यहां के मुख्य भवन में गुरु गोबिंद सिंह जी से जुड़े ऐतिहासिक शस्त्र भी सुरक्षित रखे गए हैं। आनंदपुर साहिब में हर साल होला मोहल्ला का आयोजन भी खास आकर्षण होता है। इस दौरान निहंग सिख पारंपरिक वेशभूषा में गतका, घुड़सवारी और युद्ध कला का प्रदर्शन करते हैं। पास में स्थित विरासत-ए-खालसा संग्रहालय भी सिख इतिहास को समझने के लिए देखा जा सकता है। तख्त श्री हरिमंदिर जी पटना साहिब, पटना – गुरु गोबिंद सिंह जी की जन्मस्थली बिहार की राजधानी पटना के पुराने शहर में स्थित तख्त श्री हरिमंदिर जी पटना साहिब सिख धर्म के पांच तख्तों में से एक है। यह जगह इसलिए खास है क्योंकि दसवें सिख गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म यहीं 22 दिसंबर 1666 को हुआ था। उन्होंने अपने बचपन के शुरुआती साल पटना में ही बिताए थे। यहां का धार्मिक महत्व केवल गुरु गोबिंद सिंह जी के जन्म तक सीमित नहीं है। सिख परंपरा के अनुसार, गुरु नानक देव जी और गुरु तेग बहादुर जी भी पटना आए थे। इस वजह